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Updated: 13 hours 25 min ago

मटर की खेती

Tue, 05/08/2018 - 14:18

 

मटर की उन्नत खेती 

 

शीतकालीन सब्जियो मे मटर का स्थान प्रमुख है। इसकी खेती हरी फल्ली (सब्जी), साबुत मटर, एवं दाल के लिये किया जाता है।  मटर की खेती सब्जी और दाल के लिये उगाई जाती है। मटर दाल की आवश्यकता की पूर्ति के लिये पीले मटर का उत्पादन करना अति महत्वपूर्ण है, जिसका प्रयोग दाल, बेसन एवं छोले के रूप में अधिक किया जाता है ।आजकल मटर की डिब्बा बंदी भी काफी लोकप्रिय है। इसमे प्रचुर मात्रा मे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, रेशा, पोटेशियम एवं विटामिन्स पाया जाता है। देश भर मे इसकी खेती व्यावसायिक रूप से की जाती है।

जलवायु

 

मटर की फसल के लिए नम और ठंडी जुलाई की आवश्यकता होती है अत: हमारे देश में अधिकांश स्थानों पर मटर की फसल रबी  की ऋतु में गई जाती है  इसकी बीज अंकुरण के लिये औसत 22 डिग्री सेल्सियस एवं अच्छी वृद्धि एवं विकास के लिये 10-18 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। यदि फलियो के निर्माण के समय गर्म या शुष्क मौसम हो जाये तो मटर के गुणो एवं उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।उन सभी स्थानों पर जहां वार्षिक वर्षा 60-80 से.मी. तक होती है मटर की फसल सफलता पूर्वक उगाई जा सकती है मटर के वृद्धि काल में अधिक वर्षा का होना अत्यंत हानिकारक होता है

 Submi(सब्जी), साबुत मटर, एवं दाल के लिये किया जाता है।  मटर की खेती सब्जी और दाल के लिये उगाई जाती है। मटर दाल की आवश्यकता की पूर्ति के लिये पीले मटर का उत्पादन करना अति महत्वपूर्ण है, जिसका प्रयोग दाल, बेसन एवं छोले के रूप में अधिक किया जाता है ।आजकल मटर की डिब्बा बंदी भी काफी लोकप्रिय है। इसमे प्रचुर मात्रा मे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, रेशा, पोटेशियम एवं विटामिन्स पाया जाता है। देश भर मे इसकी खेती व्यावसायिक रूप से की जाती है।

 

भूमि 

इसकी सफल खेती के लिये उचित जल निकास क्षमता वाली, जीवांश पदार्थ मृदा उपयुक्त मानी जाती है। जिसका पी.एच.मान. 6-7.5 हो तो अधिक उपयुक्त होती है।मटियार दोमट तथा दोमट भूमि मटर की खेती के लिए अति उत्तम है बलुअर दोमट भूमियों में भी सिचाई की सुबिधा उपलब्ध होने पर मटर की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है कछार क्षेत्रों की भूमियाँ भी पानी सूख जाने के पश्चात् भी मटर की खेती करने योग्य नहीं होती है  |

प्रजातियाँ 

 

 

फील्ड मटर

 

 इस वर्ग के किस्मो का उपयोग साबुत मटर, दाल के लिये, दाने एवं चारे के लिये किया जाता है। इन किस्मो मे प्रमुख रूप से रचना, स्वर्णरेखा, अपर्णा, हंस, जे.पी.-885, विकास, शुभा्र, पारस, अंबिका आदि है।

गार्डन मटर

 

 इस वर्ग के किस्मो का उपयोग सब्जियो के लिये किया जाता है। 

अगेती किस्मे (जल्दी तैयार होने वाली)

आर्केल 
यह यूरोपियन अगेती किस्म है इसके दाने मीठे होते है इसमें बुवाई के ५५-६५ दिन बाद फलियाँ तोड़ने योग्य हो जाती है इसकी फलियाँ ८-१० से.मी. लम्बी एक समान होती है प्रत्येक फली में ५-६ दाने होते है हरी फलियों की ७०-१०० क्विंटल उपज मिल जाती है इसकी फलियाँ तीन बार तोड़ी जा सकती है इसका बीज झुर्री दार होता है |
बोनविले 
यह जाति अमेरिका से लाई गई है इसका बीज झुर्री दार होता है यह मध्यम उचाई की सीधे उगने वाली जाति है यह मध्यम समय में तैयार होने वाली जाति है इसकी फलियाँ बोवाई के ८०-८५ दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाती है फूल की शाखा पर दो फलियाँ लगती है इसकी फलियों की औसत पैदावार १३०-१४० क्विंटल प्रति हे. तक प्राप्त होती है |
अर्ली बैजर
यह किस्म संयुक्त राज्य अमेरिका से लाई गई है यह अगेती किस्म है बुवाई के ६५-७० दिन बाद इसकी फलियाँ तोड़ने केलिए तैयार हो जाती है फलियाँ हलके हरे रंग की लगभग ७ से.मी. लम्बी तथा मोटी होती है दाने आकार में बड़े ,  मीठे व झुर्रीदार होते है हरी फलियों की औसत उपज ८०-१०० क्विंटल प्रति हे. होती है |
अर्ली दिसंबर
टा. १९ व अर्ली बैजर के संस्करण से तैयार की गई है यह अगेती किस्म है ५५-६० में तोड़ने के लिए तैयार हो जाती है फलियों की लम्बाई ६-७ से.मी. व रंग गहरा हरा होता है हरी फलियों की औसत उपज ८०-१०० क्विंटल प्रति हे. हो जाती है |
असौजी
यह एक अगेती बौनी किस्म है इसकी फलियाँ बोवाई के ५५-६५ दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाती है इसकी फलियाँ गहरे हरे रंग की ५-६ से. मी. लम्बी व दोनों सिरे से नुकीली , लम्बी होती है प्रत्येक फली में ५-६ दाने होते है हरी फलियों की औसत उपज ९०-१०० क्विंटल प्रति हे. होती है |
पन्त उपहार
इसकी बुवाई २५ अक्टूम्बर से १५ नवम्बर तक की जाती है और इसकी फलियाँ बुवाई से ६५-७५ दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाती है |
जवाहर मटर 
 इसकी फलियाँ बुवाई से ६५-७५ दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाती है यह मध्यम किस्म है फलियों की औसत लम्बाई ७-८ से. मी. होती है और प्रत्येक फली में ५-८ बीज होते है फलियों में दाने ठोस रूप में भरे होते है हरी फलियों की औसत पैदावार १३०-१४० क्विंटल प्रति हे. होती है |
मध्यम किस्मे
T9
यह भी मध्यम किस्म है इसकी फलियाँ ७५ दिन में तोड़ने लायक हो जाती है फसल अवधि १२० दिन है पौधों का रंग गहरा हरा फूल सफ़ेद व बीज झुर्रीदार व हल्का हरापन लिए हुए सफ़ेद होते है फलियों की पैदावार ८०-१०० क्विंटल प्रति हे. पैदावार होती है |
T56
यह भी मध्यम अवधि की किस्म है पौधे हलके हरे , सफ़ेद बीज झुर्रेदार होते है हरी फलियाँ ७५ दिन में तोड़ने लायक हो जाती है प्रति हे. ८०-९० क्विंटल हरी फलियाँ प्राप्त हो जाती है |
NP29
यह भी अगेती किस्म है फलियाँ ७५-८५ दिन में तोड़ने लायक हो जाती है इसकी फसल अवधि १००-११० दिन है बीज झुर्रीदार होते है हरी फलियों की औसत पैदावार १००-१२० क्विंटल प्रति हे. है |
पछेती किस्मे (देरी से तैयार होने वाली):- ये किस्मे बोने के लगभग 100-110 दिनो बाद पहली तुड़ाई करने योग्य हो जाती है जैसे- आजाद मटर-2, जवाहर मटर-2 आदि।      

बीज 

 अगेती किस्मो के लिये 100 कि.ग्रा. एवं मध्यम व पछेती किस्मो के लिये 80 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर लगता है। बीज सदैव प्रमाणित एवं उपचारित बोना चाहिए बीज को बोने से पहले नीम का तेल या गौमूत्र या कैरोसिन से उपचारित कर बुवाई करें |
बीज एवं अंतरण :-
प्राय: मटर शुद्ध फसल या मिश्रित के रूप में ली जाती है  इसकी बुंवाई हल के पीछे कूड़ो मे या सीड ड्रील द्वारा की जाती है। बुबाई के समय  ३०-४५ से.मी पंक्ति से पंक्ति तथा १०-१५ से.मी. पौध से पौध की दूरी तथा  ५-७ से.मी. गहराई पर बोते है |
बोने का समय 
 उत्तरी भारत में दाल वाली में मटर की बुवाई का उत्तम समय १५-३० अक्टूम्बर तक है  फलियों सब्जी के लिए बुवाई २० अक्टूम्बर से १५ नवम्बर तक करना लाभदायक है |

 

खाद एवं उर्वरक

मटर की फसल में अच्छी तरह से पैदावार लेने के लिए एक एकड़  भूमि में 10-15  क्विंटल गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद और नीम की खली को खेत में समान रूप से बखेर कर जुताई के समय मिला देना चाहिए ट्राईकोडरमा 25 किलो एकड़ के अनुपात से खेत में मिलाना चाहिए लेकिन याद रहे कि खेत में पर्याप्त नमी हो बुबाई के 15-20 दिन बाद वर्मिवाश  का अच्छी तरह से छिड्काब करें ताकि पोधा तर बतर हो जाये निराई के बाद जीवामृत का छिड्काब कर दें  फूल आनें के समय नीम और करंज को गोमूत्र में मिलाकर छिद्काब कर दें 
जब फसल फूल पर हो या समय हो रहा हो तो एमिनो असिड एवं पोटाशियम होमोनेट की मात्रा स्प्रे के द्वारा देनी चाहिए 15 दिनों के बाद एमिनो असिड पोटाशियम होमोनेट फोल्विक एसिड को मिला कर छिडक देना चाहिए नमी बनी रहे इसका ध्यान रखें 
यदि रासायनिक खाद का प्रयोग करते है तो  गोबर या कम्पोस्ट खाद (10-15 टन/हे.) खेत की तैयारी के समय देवें। चूंकि यह दलहनी फसल है इसलिये इसका जड़ नाइट्रोजन स्थिरीकरण का कार्य करता है अतः फसल को कम नाइट्रोजन देने की आवश्यकता पड़ती है। रासायनिक खाद के रूप मे 20-25 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40-50 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस एवं 40-50 कि.ग्रा. पोटाश/हे. बीज बुंवाई के समय ही कतारों में दिया जाना चाहिये। यदि किसान उर्वरको की इस मात्रा को यूरिया, सिंगल सुपर फाॅस्फेट एवं म्यूरेट आफ पोटाश के माध्यम से देना चाहता है तो 1 बोरी यूरिया, 5 बोरी सिंगल सुपर फास्फेट एवं 1.5 बोरी म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है।
सिचाई 
मटर की देशी व उन्नत शील जातियों में दो सिचाई की आवश्यकता पड़ती है शीतकालीन वर्षा हो जाने पर दूसरी सिचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती पहली सिचाई फूल निकलते समय बोने के ४५ दिन बाद व दूसरी सिचाई आवश्यकता पड़ने पर फली बनते समय बीज बोने के ६० दिन बाद करें साधारणतया मटर को हल्के  पानी की आवश्यकता होती है सिचाई सदैव हलकी करनी चाहिए |

खरपतवार 

मटर की फसल के प्रमुख खरपतवार है - बथुआ , गजरी, चटरी-मटरी , सैजी , अंकारी  इन सब खरपतवारों को निराई-गुड़ाई करके फसल से बाहर निकाला जा सकता है। फसल बोने के ३५-४० दिन तक फसल को खरपतवारों से बचाना आवश्यक है आवश्यकतानुसार एक या दो निराई बोने के ३०-३५ दिन बाद करनी चाहिए |
कीट नियंत्रण
तना छेदक 
यह काले रंग की मक्खी होती है इसकी गिडारें फसल की प्रारंभिक अवस्था  में छेद कर अन्दर से खाती है जिसमे पौधे सूख जाते है |
रोकथाम 
10 लीटर गोमूत्र रखना चाहिए। इसमें ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़कर इसे 15 दिनों तक गोमूत्र में सड़ने दें। 15 दिन बाद इस गोमूत्र को छान लें फिर छिड़काव करें  |
पत्ती में सुरंग बनाने वाले कीट 
इस कीट का आक्रमण पौधे की प्रारंभिक अवस्था में ही शुरू हो जाता है इसकी गिडारे पत्तियों में ही सुरंग बनाकर कोशिकाओं को खा जाती है यह सुरंग पत्तियों पर दिखाई देती है |
रोकथाम
४०-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें फिर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें  |
फली छेदक 
देर से बोई गई फसल में इस कीट का आक्रमण अधिक होता है इस कीट की सुंडियां फली में छेद करके उनके अन्दर तक पूर्णतया प्रवेश कर जाती है और दोनों को खाती रहती है |
 रोकथाम 
मदार की 5 किलोग्राम पत्ती 15 लीटर गोमूत्र में उबालें। 7.5 लीटर मात्रा शेष रहने पर छान लें फिर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें  |
माहू 
इस कीट का प्रकोप जनवरी के बाद प्राय: होता है |
रोकथाम 
10 लीटर गोमूत्र रखना चाहिए। इसमें ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़कर इसे 15 दिनों तक गोमूत्र में सड़ने दें। 15 दिन बाद इस गोमूत्र को छान लें फिर छिड़काव करें  |
रोग नियंत्रण 
बुकनी 
इसे चित्ती या चूर्णी रोग कहते है पतियाँ , फलियाँ तथा तने पर सफ़ेद चूर्ण सा फैलता है और बाद में पत्तियां आदि काली होकर मरने लगती है |
रोकथाम 
10 लीटर गोमूत्र रखना चाहिए। इसमें ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़कर इसे 15 दिनों तक गोमूत्र में सड़ने दें। 15 दिन बाद इस गोमूत्र को छान लें फिर छिड़काव करें  |
उकठा
इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में पौधों की पत्तियां नीचे से ऊपर की ओर पीली पड़ने लगती है और पूरा पौधा सूख जाता है यह बीज जनित रोग है फलियाँ बनती नहीं है |
रोकथाम 
जिस खेत एक बार मटर में इस बीमारी का प्रकोप हुआ हो उस खेत में ३-४ वर्षों तक यह फसल नहीं बोना चाहिए और तंबाकू की 2.5 किलोग्राम पत्तियां ढार्इ किलो आक या आँकड़ा तथा  5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों  को 10 लीटर गोमूत्र में उबालें और 5 लीटर मात्रा शेष रहने पर छान लें फिर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें  |
तुलासिता 
इस रोग में पत्तियों की उपरी सतह पर प्रारंभिक अवस्था में पीले रंग के धब्बे दिखाई देते है जिसके नीचे सफ़ेद रुई के समान फफूंदी की वृद्धि दिखाई देती है |
रोकथाम :
इसकी रोकथाम के लिए 10 लीटर गोमूत्र रखना चाहिए। इसमें ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़कर इसे 15 दिनों तक गोमूत्र में सड़ने दें। 15 दिन बाद इस गोमूत्र को छान लें फिर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें

 
सफ़ेद विगलन 

यह रोग पर्वतीय क्षेत्र में व्यापक रूप से फैलता है इस रोग से पौधों के सभी वायवीय भाग रोग से ग्रसित हो जाते है जिससे पूरा पौधा सफ़ेद रंग का होकर मर जाता है पौधे के रोग ग्रस्त भागों पर सफ़ेद रंग की फफूंदी उग जाती है और बाद में रोग ग्रस्त भागों में ऊपर तथा अन्दर काले रंग के गोल दाने बन जाते है |
रोकथाम 
फसल की बुवाई नवम्बर के प्रथम सप्ताह से पहले नहीं करनी चाहिए , जिस खेत में इस रोग का प्रकोप पिछले सालों अधिक देखने को मिला हो उसमे कम से कम 5 वर्षों

इसकी सफल खेती के लिये उचित जल निकास क्षमता वाली, जीवांश पदार्थ मृदा उपयुक्त मानी जाती है। जिसका पी.एच.मान. 6-7.5 हो तो अधिक उपयुक्त होती है।मटियार दोमट तथा दोमट भूमि मटर की खेती के लिए अति उत्तम है बलुअर दोमट भूमियों में भी सिचाई की सुबिधा उपलब्ध होने पर मटर की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है कछार क्षेत्रों की भूमियाँ भी पानी सूख जाने के पश्चात् भी मटर की खेती करने योग्य नहीं होती है  |

 

 

 

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पालक की खेती

Tue, 05/08/2018 - 14:07

 पालक की उन्नत खेती कैसे करें

पत्तियों वाली सब्जियों में पालक भी एक भारतीय सब्जी है जिसकी खेती अधिक क्षेत्र में की जाती है । यह हरी सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है । इसकी पत्तियां स्वास्थ्य के लिये बहुत ही लाभकारी हैं । इसकी खेती सम्पूर्ण भारतवर्ष में की जाती है । यह सब्जी विलायती पालक की तरह पैदा की जाती है ।

पालक एक खनिज पदार्थ युक्त एवं विटामिन्स युक्त वाली फसल है जिसका कि प्रत्येक मनुष्य को साधारण प्रयोग करना चाहिए । यहां तक कि 100-125 ग्राम पालक रोज दैनिक जीवन के लिये संतुलित आहार के रूप में खाने की सिफारिश की जाती है । अन्यथा पत्ती वाली सब्जी अवश्य प्रतिदिन खानी चाहिए । इसकी पत्तियों का प्रयोग सब्जी के अतिरिक्त नमकीन पकौड़े, आलू मिलाकर तथा भूजी बनाकर किया जाता है । पालक के सेवन से पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है । अधिक मात्रा में प्रोटीन, कैलोरीज, खनिज, कैल्शियम तथा विटामिन्स ए, सी का एक मुख्य साधन है जो कि दैनिक जीवन के लिए अति आवश्यक है ।

 

पालक की खेती के लिये आवश्यक भूमि व जलवायु 

पालक की खेती के लिये ठन्डे मौसम की जलवायु की आवश्यकता होती है । यह फसल जाड़े में होती है । पालक के लिये अधिक तापमान की आवश्यकता नहीं होती लेकिन कुछ जगह पर वसन्त ऋतु के आसपास पैदा करते हैं अर्थात् जायद की फसल के साथ पैदा करते हैं । पालक जनवरी-फरवरी में अधिक वृद्धि करता है ।

 

पालक की खेती के लिये खेत की तैयारी 

 

पालक की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमियों में पैदा की जा सकती है लेकिन सबसे उत्तम भूमि बलुई दोमट होती है । पालक का हल्का अम्लीय भूमि में भी उत्पादन किया जा सकता है । उर्वरा शक्ति वाली भूमि में बहुत अधिक उत्पादन किया जा सकता है । पालक के खेत में जल निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिए । भूमि का पी. एच. मान 6.0 से 6.7 के बीच का अच्छा होता है ।

पालक के खेत की 3-4 बार जुताई करके खेत तैयार करना चाहिए । जुताई के समय हरी या सूखी घास को खेत से बाहर निकाल कर जला देना चाहिए । इस प्रकार से खेत को अच्छी तरह तैयार व साफ करके मिट्‌टी को भुरभुरा करना चाहिए तथा बाद में खेत में क्यारियां तैयार कर लेनी चाहिए । खेत में खाद आदि डालकर मिट्‌टी में भली-भांति मिला देना चाहिए ।

इसे भी पढ़ें -> विलायती पालक की खेती कैसे करें

 

गोबर की खाद एवं रासायनिक खादों का प्रयोग 

 

पालक की फसल के लिये 18-20 ट्रौली गोबर की खाद तथा 100 किलो D.A.P. प्रति हेक्टर की दर से बुवाई से पहले खेत तैयार करते समय मिट्‌टी में मिलाना चाहिए तथा पहली कटाई के बाद व अन्य कटाई के बाद 20-25 किलो यूरिया प्रति हेक्टर देने से फसल की पैदावार अधिक मिलती है । इस प्रकार से वृद्धि शीघ्र होती है ।

बगीचे की यह एक मुख्य फसल है । पालक को बोने के लिये खेत को ठीक प्रकार से तैयार करके बोना चाहिए । खेत को तैयार करते समय 4-5 टोकरी गोबर की खाद सड़ी हुई या डाई अमोनियम फास्फेट 500 ग्राम 8-10 वर्ग मी. के लिये लेकर मिट्‌टी में बुवाई से पहले मिला देते हैं । बाद में फसल को बढ़ने के पश्चात् काटते हैं तो प्रत्येक कटाई के बाद 100 ग्राम यूरिया उपरोक्त क्षेत्र में छिड़कना चाहिए जिससे पत्तियों की वृद्धि शीघ्र होती है तथा सब्जी के लिये पत्तियां जल्दी-जल्दी मिलती रहती हैं ।

 

पालक की उन्नतशील जातिया

 

पालक की कुछ मुख्य जातियां हैं जिनको भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा बोने की सिफारिश की जाती है, वे निम्नलिखित हैं-

1. पालक ऑल ग्रीन (Palak All Green)– इस किस्म से एक साथ हरी पत्तियां प्राप्त होती हैं । पत्तियां 40 दिन में तैयार हो जाती है । पत्तियां छोटी-बड़ी न होकर एक-सी होती हैं । वृद्धि काल-अन्तिम सितम्बर से जनवरी आरम्भ का समय होता है । इसे 5-6 बार काटा जा सकता है ।

2. पालक पूसा ज्योति (Palak Pusa Jyoti)- यह जाति अधिक पैदावार देती है । पत्तियां समान, मुलायम होती हैं तथा गहरी हरे रंग की होती हैं । पहली कटाई 40-45 दिनों में आरम्भ हो जाती है । सितम्बर से फरवरी के अन्त तक पत्तियों की वृद्धि अधिक होती है । 8-10 बार फसल की कटाई की जाती है । यह फसल 45 हजार किलोग्राम-हेक्टर पैदावार देती है ।

3. पालक पूसा हरित (Palak Pusa Harit)- इस किस्म के पौधे ऊंचे, एक समान तथा वृद्धि वाले होते हैं । अधिक पैदा देने वाली किस्म है जो सितम्बर से मार्च तक अच्छी वृद्धि करती है ।

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बैगन की खेती

Tue, 05/08/2018 - 13:29

वैज्ञानिक तरीके से करे बैगन की खेती

सामान्य परिचय  :-  किसान बाग़वानी में आज बैंगन की खेती को वैज्ञानिक तरीके से कैसे करते है। इस पर बतायेग

परिचय   बैंगन की खेती भारत और चीन में ज्यादा की जाती है। ऊंचे पहाड़ि इलाकों को छोड़कर पुरे देश में इसकी खेती की जा सकती है। क्यों की भारत की जलवायु गर्म होती है और ये began ki kheti के लिए उपयुक्त रहती है।

बैंगन की किस्में :-

 बैंगन की बहुत सारी किस्में होती है। में कुछ विशेष किस्मों के बारे में यहाँ पर बताउगा जो hiybird है। और अच्छा उत्पादन देने वाली होती है।

1 पूसा 

    इसमे पौधा बड़ा और अच्छी शाखाओं युक्त होता है। ये फसल 80 से 90 दिनों आ जाती है।

प्रति हेक्टेयर 450 से 600 क्विंटल होती है। 

2 पूसा 

गोल फल लगते है। 85 से 90 दिनों की औसत प्रति हेक्टेयर 500 से 600 क्विंटल

3 पूसा 

85 से 90 दिनों में फल लगते है।

औसत 400 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

इसके अलावा पूसा क्रांति,पूसा भैरव,पूसा बिंदु,पूसा उत्तम ,पूसा उपकार,पूसा अंकुर, जो की प्रति हेक्टेयर 200 से 400 क्विंटल तक उत्पादन देते है। 

कैसे करे नर्सरी तैयार :-

नर्सरी तैयार करने के लिए खेत की मिट्टी को अच्छे से देसी खाद् (गोबर) को मिट्टी की सतह पर बिखेर कर फिर जुताई करे। (अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण अवश्य करावे ताकि उचित मात्रा में खाद् दे सके) जुताई होने के बाद उठी हुई क्यारियां बना ले फिर एक हेक्टेयर के लिए hibird बीज 400 ग्राम तक  काफी होता है। बनी हुई क्यारियों में  1 से.मी. की गहराई में 6 से 7 सेमी. की दूरी पर बीजो को डाल दे।  फिर उसे पर्याप्त मात्रा में पानी देते रहे ।

कब करे बुआई :-

उसे तो इस फसल को पुरे वर्ष में सभी ऋतुओ में लगाया जा सकता है। लेकिन में आपको माह से बता देता है।
नर्सरी मई जून में करने पर बुआई 1 या डेढ़ माह में यानि जून या जुलाई तक कर सकते है।
जो नर्सरी नवम्बर में लगाते है उसे जनवरी में शीत लहर और पाले का प्रकोप से बचा कर लगा सकते है
जो नर्सरी फरवरी और मार्च में लगाते है उसे मार्च लास्ट और अप्रैल तक की जा सकती है।

कैसे करे खेत तैयार:-

नर्सरी में पौधे तैयार होने के बाद दूसरा महत्वपूर्ण कार्य होता है खेत को तैयार करना । मिट्टी परीक्षण करने के बाद खेत में एक हेक्टेयर के लिए 4 से 5 ट्रॉली पक्का हुआ गोबर का खाद् बिखेर दे।

              गोबर से खाद् कैसे बनाने के लिए पढ़े

उसके बाद 2 बेग यूरिया 3 बेग सिंगल सुपर फास्फेट और पोटेशियम सल्फ़ेट की मात्रा ले कर जुताई करे। फिर खेत में 70 सेमी. की दूरी पर क्यारियां बना लीजिए अब पोधों को 60×60 सेमी. या 60×50 में पोधों की रोपाई करे।

बैंगन की फसल में लगने वाले रोग 

नर्सरी में लगने वाले रोग:-
आद्रगलन(डम्पिंगऑफ़)
यह एक कवक है जो पोधों को बहार से निकलने से पूर्व ही ख़त्म कर देता है। और बहार निकलने के बाद भी पोधों को सूखा देता है।
रोपाई के बाद लगने वाले रोग:-
झुलसा रोग,पत्ता धब्बा रोग,अंग मारी रोग,मलानी रोग,छोटी पत्ती रोग,सुतकर्मि रोग,
बैंगन की फसलो में लगते है। जिनका समय समय पर उपचार आवश्यक रूप से करे।

     

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पपिते की खेती

Thu, 05/03/2018 - 12:32

पपीता की खेती करने से आपको कम खर्च में ज्यादा benefit हो सकता है। खाने में स्‍वादिष्‍ट लगने वाला फल पपीता में विटामिन ए, सी और इ पाया जाता है। पपीते में  पपेन नामक पदार्थ पाया जाता है जो अतिरिक्त चर्बी को गलाने के काम आता है। पपीता सबसे कम समय में तैयार होने वाला फल है जिसे पके तथा कच्चे दोनों रूप में प्रयोग किया जाता है। इसलिए इसकी खेती कि लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। 

वैसे तो पपिते की खेती भारत में किसी भी राज्य में की जा सकती है परन्तु छत्तीसगढ़ के किसानो को पपीते की खेती करने की सलाह दी जाती है क्योंकि वहां का तापमान  पपीते के मुताबिक है। पपीता के सफल खेती के लिए 10 डिग्री से. से 40 डिग्री से. तक का तापमान उपयुक्त होता है ।

अधिक ठण्ड से खेती को नुकसान पंहुचा सकता है जिससे पौधा और फल दोनों ख़राब हो सकता है। देश के कई राज्यों में जैसे  बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश , पंजाब , हरियाणा,और  दिल्ली में इसकी खेती कि जा रही है । किसान स्वयं और राष्ट्र को आर्थिक दृष्टी से लाभांवित कर सकते है इसके लिए तकनिकी रूप में निम्न बातो का ध्यान रखना चाहिए 

मिट्टी का चयन -पपीता लगाने के लिए भूमि का अच्छे से त्यारी करना चाहए, कृषि वैज्ञानिक पपीता के अच्छी उपजाव के लिए और अधिक उत्पादन के लिए बालुई दोमट मिट्टी की सलाह देते है जिसमे जल निकास कि व्यवस्था अच्छी हो । भूमि की अच्छे से जुताई कर लेना चाहए।गहरा जुताई करने के बाद खेत से सारे खर-पतवार को अच्छे से साफ़ कर लेना चाहए

पपीता के उत्पादन के लिए नर्सरी में पौधों का उगाना बहुत महत्व रखता है। जिस जगह पर नर्सरी हो उस  जगह कि अच्छी जुताई करके समस्त कंकड़  पत्थर निकाल कर साफ कर देना चाहिए ।

बीज कि मात्रा एक हे.के (hectare) लिए 500 ग्राम काफी होती है बीज अच्छे से पका हुआ , अच्छी तरह सुखा हुआ और शीशे के बोतल में रखा हो जिसका मुहं ढका  हो और 6 महीने से पुराना न हो। संकर (hybrid) किस्म की बिजे उत्पादकता और गुणवता दोनों ही तरह से अच्छा होता है। ऐसा माना जाता है की संकर बीजो से उत्पन सभी पौधे जादातर मादा या उभयलिंग होता है।</p>

पपीते के दो पौधों के बिच कम से कम 2 मीटर की दुरी होनी चाहए। पपीता बोने के लिए त्यार उचित माप के गढ़ढ़ो के मिटटी को 15 से 20 दिनों के लिए खुले हवा और धुप में रखने के बाद उसमे गोबर की खाद 10 kg, सुपर फास्फेट 200g, म्यूरेट ऑफ पोटाश 75g, और एन्डोसल्फान 50g,मिलाकर भर देना चाहये।अच्छे से पपीता का रोपन हो जाने से 5 से 6 महीने में फल आने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है।

किट पतंग से बचाव

जैसा की हम जानते है अगर किसी भी पेड़ या पौधे में कीड़े मकोड़े लग जाये तो वो पुरे पेड़ पौधे को नष्ट कर देता है। आमतौर पर माना जाता है की पपीता  में जादा कीड़े मकोड़े नहीं लगते है लेकिन फिर भी कभी कभी अगर जादा गर्मी या जादा ठंड होती है तो उसकी वजह से फल खराब हो सकता है। इसलिए किसानो के लिए ये जानना बहुत हीं जरुरी है की पपीता में  कीड़े मकोड़े , fungus , या फिर virus, किस कारण से लगते है और उनसे बचने की विधि क्या है।

अपने पपीते के फसल को वेज्ञानिक तरीके से बचा सकते है

 

लाल मकड़ी किट

माहू किट

 

आद्रगलन किट- ये एक fungus दवारा होने वाला रोग है। इस रोग में पौधे का तना प्रारंभिक रूप से गल जाता है। इस रोग से बचाव के लिए बिज का भली भांती उपचारित होना जरुरी है।</li>

मोज़ेक किट – ये पपीते का virus से होने वाला एक रोग होता है। इससे बचने के लिए प्रभावित पौधे को उखाड़ कर फेंक देना चाहए।

 

पपीते की खेती की कुल प्रतिशत में से केवल 0.08% हीं निर्यात(export) किया जाता है बाकीं अपने ही देश के उपयोग में लाई जाती है। अगर आप papita ke kheti के बारे में सोच रहे है तो आप इसी विधि से खेती करे। इस खेती में आपको बहुत आमदनी होगी।

 ध्यान रहे की उचित समय में पपिते की फल को तोड़ कर उसे सब्जी मंडी (sabji mandi) में बेच दिया करे ताकि फल ख़राब होने से पहले हे बिक जाये .

साभार: http://www.hindiremedy.com/papita-ki-vaigyanik-kheti-jankari/

मूली की खेती कैसे करे

Thu, 05/03/2018 - 12:29

मूली वा मूलक भूमी के अन्दर पैदा होने वाली सब्ज़ी है। वस्तुतः यह एक रूपान्तिरत प्रधान जड़ है जो बीच में मोटी और दोनों सिरों की ओर क्रमशः पतली होती है। मूली पूरे विश्व में उगायी एवं खायी जाती है। मूली की अनेक प्रजातियाँ हैं जो आकार, रंग एवं पैदा होने में लगने वाले समय के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। कुछ प्रजातियाँ तेल उत्पादन के लिये भी उगायी जाती है।

आज के समय में यह कहना कि मूली सिर्फ इसी मौसम में लगाई जाती है या लगाई जाना चाहिए, उचित नहीं होगा, क्योंकि मूली हमें हर मौसम व समय में उपलब्ध हो जाती है। अतः कृषक भाई चाहें तो निर्धारित समय अंतराल के साथ ही कभी भी मूली की खेती कर सकते हैं। सामान्यतः मैदानी क्षेत्रों के लिए बुवाई के लिए सितंबर से फरवरी तक का समय उत्तम होता है। 5-6 जुताई कर खेत को तैयार किया जाए। मूली की एक हैक्टेयर खेती के लिए 5-10 किग्रा बीज पर्याप्त होता है। मूली की बुवाई खेत की मेढ़ों पर की जाती है। यहाँ मेढ़ों के बीच की दूरी 45 सेमी तथा ऊँचाई 22-25 सेमी रखी जाती है। किसान भाई यह अवश्य ध्यान रखें कि मूली के बीजों का बीजोपचार अवश्य हो। इसके लिए थीरम 2.5 ग्राम प्रति किग्रा बीज के हिसाब से उपयोग कर सकते हैं।

उन्नत किस्म का चयन करें 
अन्य फसलों व सब्जियों की ही तरह मूली की भरपूर पैदावार के लिए आवश्यक होता है कि कृषक भाई उन्नत जाति का चयन करें। मूली की उन्नत किस्मों में प्रमुख हैं- पूसा हिमानी, पूसा चेतवी, पूसा रेशमी, हिसार मूली नं. 1, पंजाब सफेद, रैपिड रेड, व्हाइट टिप आदि। पूसा चेतवी जहाँ मध्यम आकार की सफेद चिकनी मुलायम जड़ वाली है, वहीं यह अत्यधिक तापमान वाले समय के लिए भी अधिक उपयुक्त पाई गई है। इसी तरह पूसा रेशमी भी अधिक उपयुक्त है तथा अगेती किस्म के रूप में विशष महत्वपूर्ण है। इसी तरह अन्य किस्में भी अपना विशेष महत्व रखती हैं तथा हर जगह, हर समय लगाई जा सकती हैं। 

गोबर की खाद उपयुक्त 
कृषक भाइयों को सलाह दी जाएगी कि वे अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण अवश्य करवा लें। परीक्षण उपरांत ही वे अपने खेत में दी जाने वाली उर्वरकों व खाद की मात्रा निर्धारित करें। मूली की पैदावार के लिए गोबर-कचरे की कम्पोस्ट खाद का भरपूर उपयोग करें। साथ ही साधारणतः इसमें 75 किग्रा नत्रजन, 40 किग्रा फास्फोरस तथा 40 किग्रा पोटाश देना चाहिए। गोबर व गोबर कचरे से बनी कम्पोस्ट खाद खेत की तैयारी के समय ही डाल देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा पोटाश व फास्फोरस की पूरी मात्रा अंतिम जुताई में दे देना चाहिए तो लाभकारी होता है। मूली की बुवाई के पश्चात यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि मेढ़ों पर खरपतवारों की बढ़त न हो। खरपतवार के लिए समय-समय पर निंदाई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। साथ ही मेढ़ों पर मिट्टी भी चढ़ाते रहना चाहिए। 

नमी का ध्यान रखें 
मूली की जड़ों की अच्छी बढ़त के लिए आवश्यक है कि हम नमी का पर्याप्त ध्यान रखें। इसके लिए आवश्यकता पड़ने पर सिंचाई की व्यवस्था करना चाहिए। मूली की फसल खुदाई के लिए 25 से 70 दिन में तैयार हो जाती है। विभिन्न किस्मों के पकने का समय प्रायः अलग-अलग होता है। अतः कृषक भाई खुदाई का अवश्य ध्यान रखें, क्योंकि खुदाई में थोड़ा भी विलंब जड़ों को खराब कर देता है, जो खाने योग्य नहीं रह पातीं। अतः कृषक भाई स्वास्थ्य के लिए लाभकारी सब्जियों में अपना विशेष महत्व रखने वाली सलाद का एक प्रमुख अंग मूली की खेती कर विपुल लाभ कमाएँ तथा अपनी आमदनी बढ़ाएँ। 

Category: खेतीTags: मूली

गेहूं की अधिक उपज देने वाली किस्में

Thu, 05/03/2018 - 12:20

अच्छी फसल लेने के लिए गेहूं की किस्मों का सही चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है। विभिन्न अनुकूल क्षेत्रों में समय पर, तथा प्रतिकूल जलवायु, व भूमि की परिस्थितियों में, पक कर तैयार होने वाली, अधिक उपज देने वाली व प्रकाशन प्रभावहीन किस्में उपलब्ध हैं। उनमें से अनेक रतुआरोधी हैं। यद्यपि `कल्याण सोना' लगातार रोग ग्रहणशील बनता चला जा रहा है, लेकिन तब भी समय पर बुआई और सूखे वाले क्षेत्रों में जहां कि रतुआ नहीं लगता, अच्छी प्रकार उगाया जाता है। अब `सोनालिका' आमतौर पर रतुआ से मुक्त है और उन सभी क्षेत्रों के लिए उपयोगी है, जहां किसान अल्पकालिक (अगेती) किस्म उगाना पसन्द करते हैं। द्विगुणी बौनी किस्म `अर्जुन' सभी रतुओं की रोधी है और मध्यम उपजाऊ भूमि की परिस्थितियों में समय पर बुआई के लिए अत्यन्त उपयोगी है, परन्तु करनल बंटा की बीमारी को शीघ्र ग्रहण करने के कारण इसकी खेती, पहाड़ी पट्टियों पर नहीं की जा सकती। `जनक' ब्राऊन रतुआ रोधी किस्म है। इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में भी उगाने की सिफारिश की गई है। `प्रताप' पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वर्षा वाले क्षेत्रों में मध्यम उपजाऊ भूमि की परिस्थितियों में अच्छी प्रकार उगाया जाता है। `शेरा' ने मध्य भारत व कोटा और राजस्थान के उदयपुर मंडल में पिछेती, अधिक उपजाऊ भूमि की परिस्थितियों में, उपज का अच्छा प्रदर्शन किया है।

`राज ९११' मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में सामान्य बुआई व सिंचित और अच्छी उपजाऊ भूमि की परिस्थिति में उगाना उचित है। `मालविका बसन्ती' बौनी किस्म महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश की अच्छी सिंचाई व उपजाऊ भूमि की परिस्थितियों के लिए अच्छी है। `यू पी २१५' महाराष्ट्र और दिल्ली में उगाई जा रही है। `मोती' भी लगातार प्रचलन में आ रही है। यद्यपि दूसरे स्थानों पर इसको भुलाया जा रहा है। पिछले कई वर्षों से `डबल्यू जी-३५७' ने बहुत बड़े क्षेत्र में कल्याण सोना व पी वी-१८ का स्थान ले लिया है। भिन्न-भिन्न राज्यों में अपनी महत्वपूर्ण स्थानीय किस्में भी उपलब्ध हैं। अच्छी किस्मों की अब कमी नहीं हैं। किसान अपने अनुभव के आधार पर, स्थानीय प्रसार कार्यकर्ता की सहायता से, अच्छी व अधिक पैदावार वाली किस्में चुन लेता है। अच्छी पैदावार के लिए अच्छे बीज की आवश्यकता होती है और इस बारे में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।

Category: खेतीTags: गेहूं

जायफलकी खेती

Sat, 04/28/2018 - 11:09

 परिचय

जीनस मिरिस्टिका में पेड़ों की कई प्रजातियों में जायफल होते हैं। व्यावसायिक प्रजातियों में से मिरिस्टिका फ्रेग्रेंस सबसे महत्वपूर्ण प्रजाति है, यह सदा बहार वृक्ष मूल रूस से इंडोनेशिया के मोलुकस के बंडा द्वीप या स्पाइस द्वीप में पाए जाते हैं। जायफल वृक्ष दो मसालों के लिए काफी महत्वपूर्ण है जो जायफल और जावित्री दो फलों से लिया गया है।[1]

वृक्ष की वास्तविक बीज जायफल है, जो मोटे तौर पर अंडे के आकार का होता है और 20 से 30 मि॰मी॰ (0.07 से 0.1 फीट) लंबा और 15 से 18 मि॰मी॰ (0.05 से 0.06 फीट) चौड़ा और 5 और 10 ग्राम (0.2 और 0.4 औंस) के बीच वजन होता है, जबकि जावित्री एक सूखा "लैसदार" लाल कवर या बीज को ढ़कने वाला छिलका होता है। यही एक ऐसा उष्णकटिबंधीय फल है जिसका स्रोत दो अलग मसाले हैं।

इसके वृक्ष से कई अन्य व्यावसायिक उत्पादों का भी उत्पादन होता है, जिसमें आवश्यक तेल, निचोड़े हुए ओलियोरेसिन्स और जायफल मक्खन शामिल हैं (नीचे देखें).

जायफल का बाहरी सतह आसानी से कुचल जाता है।

पेरिक्रेप (फल / फली) का प्रयोग ग्रेनाडा में जैम बनाने के लिया किया जाता है जिसे "मोर्ने डेलिस" कहा जाता है। इंडोनेशिया में भी इस फल से जैम बनाया जाता है जिसे सेलेई वुआह पाला कहा जाता है या इसे पतले रूप में काट कर चीनी के साथ पकाया जाता है और सुगंधित कैंडी बनाने के लिए उसे रवादार बनाया जाता है जिसे मनिसन पाला कहा जाता है ("जायफल मिठाई").

सामान्य या सुगंधित जायफल मिरिस्टिका फ्रेग्रेंस का मूल उत्पादन इंडोनेशिया के बांडा द्वीप में होता है लेकिन मलेशिया के पेनांग द्वीप और कैरिबियन में भी इसका उत्पादन होता है, विशेष कर ग्रेनाडा में. साथ ही इसकी उपज केरल में भी होती है, जो भारत के दक्षिण भाग में स्थित एक राज्य है। जायफल के अन्य प्रजातियों में न्यू गुइयाना से पपुअन जायफल M. अर्जेनटिया, भारत से बम्बई जायफल M. मालाबरिका, जिसे हिन्दी में जायफल कहते हैं, शामिल हैं; दोनों का उपयोग M. फ्रेग्रेंस के अपमिश्रक उत्पाद के रूप में होता है।

प्रमुख मिरिस्टका प्रजातियां

  
M. अलिल्बा
M. M. अंडामानिका
M. अर्फाकेनसिस
M. अर्जेंटिया
M. बसिलानिका
M. ब्राचेपोडाbrachypoda
M. ब्रेविटाइप्स
M. बुचनेरियाना
M. बिसासिया
M. सिलानिका
M. सिनामोमिया
M. कोयक्टा
M. कोलिनरिड्सडालेई
M. कोंसपर्सा
M. कोर्टीसाटा
M. क्रासा
  
M. डेसीकार्पा
M. डेप्रेसा
M. डेवोजेली
M. एलिपटिका
M. एक्सटेंसा
M. फेसीकुलाटा
M. फिलिपेस
M. फिसुराटा
M. फ्लेवोविरेंस
M. फ्रेग्रंस
M. फ्रुगीफेरा
M. जिगांटिया
M. गिलेसपियाना
M. ग्लोबोसा
M. ग्रांडीफोलिया
M.ग्वाडालकेनालेंसिस
M. ग्वेटरीफोलिया
 
M.ग्विलामिनियाना
M. होल्लरूंगी
M. इनायक्एम्पयाटा
वेलिस
M. इनक्रेडिबिलिस
M. इनर्स
M. इनुनडाटा
M. इनुटिलिस
M. कल्कमनी
M. जेलबर्गी
M. लेप्टोफिला
M. मेक्रोफिला
M. मालाबरिका
M. मेक्सिमा
M. ओटोबा
M. प्लाटीपर्मा
M. सिंकलेयरी
M. जायलोकर्पाxylocarpa
 

रसोई में प्रयोग[संपादित करें]

 

जायफल का वृक्ष

जायफल और जावित्री का स्वाद गुण लगभग समान होता है, जायफल थोड़ा अधिक मीठा होता है वहीं जावित्री का स्वाद अधिक स्वादिष्ट होता है। अक्सर जावित्री को हल्के खाद्य पदार्थों में इसके नारंगी और केसरिया रंग के कारण प्रयोग किया जाता है। जायफल में अतिरिक्त रूप से चीज़ सॉसमिलाने से वह और भी स्वादिष्ट हो जाता है और वह सबसे ताजा अंगीठी है (अंगीठी जायफल देखें). म्यूल्ड साइडर(बिना अल्कोहल वाला सेब की मदिरा),म्यूल्ड शराब और एग्गनोग में जायफल एक परंपरागत मसाला है।

पेनांग व्यंजनों में जायफल का अचार बनाया जाता है और ये अचार टोपिंग्स के रूप में विशिष्ट पेनांग एस कसांग पर कटे होते हैं। जायफल मिश्रित भी होते हैं (ताजा बनाने के लिए, हरे, टंगी स्वाद और सफेद रंग का रस) या उबले हुए होते हैं (परिणामस्वरूप बहुत मीठा और भूरे रंग का रस होता है) जिससे आइस्ड जायफल का रस बनाया जाता है या पेनांग होक्केन जिसे "लाउ हउ पेंग" कहा जाता है, के रूप में बनाया जाता है।

भारतीय व्यंजनों में जायफल का प्रयोग मिठाई के साथ-साथ स्वादिष्ट व्यंजनों में किया जाता है (मुख्य रूप से मुगलाई व्यंजनों में). भारत के अधिकांश भागों में इसे जायफल के रूप में जाना जाता है वहीं केरल में इसे जतिपत्रि और जथी बीज कहा जाता है। इसका प्रयोग कम मात्रा में गरम मसाले में भी किया जा सकता है। भारत में भूमि जायफल का प्रयोग धूम्रपान के लिए भी किया जाता है।

मध्य पूर्वी व्यंजनों में भूमि जायफल का इस्तेमाल अक्सर स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए एक मसाले के रूप में किया जाता है। अरबी में जायफल को Jawzt at-Tiyb कहा जाता है।

ग्रीस और साइप्रस में जायफल को μοσχοκάρυδο (मोस्चोकारीडो) (ग्रीक: "मुस्की नट") और खाना पकाने और स्वादिष्ट व्यंजनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है।

यूरोपीय व्यंजनों में जायफल का इस्तेमाल विशेष रूप से आलू के व्यंजनो और परिष्कृत मांस उत्पादों में की जाती है; सूप, सॉस और पके हुए भोजन में भी वे इसका इस्तेमाल करते हैं। डच व्यंजनों में जायफल काफी लोकप्रिय है, चोकीगोभी, गोभी और पतले सेम की तरह सब्जियों में इसका उपयोग किया जाता है।

विभिन्न जापानी करी पाउडर में जायफल का इस्तेमाल एक घटक के रूप में शामिल किया जाता है।

कैरेबियन में जायफल का इस्तेमाल अक्सर बुशवेक्कर, पेनकिलर, बार्वाडोस रम पंच जैसे पेय पदार्थो में किया जाता है। आमतौर पर इसे सिर्फ पेय पदार्थ के ऊपर छिड़का जाता है।

महत्वपूर्ण तेल

 

जायफल बीज

भूमि जायफल के भाप आसवन द्वारा महत्वपूर्ण तेल प्राप्त किया जाता है और इत्रादि सुगंधित वस्‍तुऍं या सामग्री और दवा में उद्योगों में भारी मात्रा में इसका इस्तेमाल किया जाता है। यह तेल रंगहीन या हल्का पीले रंग की होती है और इसमें जायफल की खुशबू और स्वाद आती है। ओलियोकेमिकल उद्योग के लिए इसके अनेक अंश महत्वपूर्ण होते हैं और बेक किया हुए पदार्थों, सीरप्स, पेय पदार्थों और मिठाई में एक प्राकृतिक खाद्यपदार्थ के स्वाद के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। यह भूमि जायफल को प्रतिस्थापित करता है चूंकि यह भोजन में अंश को नहीं छोड़ता. इस महत्वपूर्ण तेल का इस्तेमाल कॉस्मेटिक और दवा उद्योगों में भी किया जाता है, उदाहरणस्वरूप टूथपेस्ट में और कुछ खांसी की दवाईयों प्रमुख संघटक के रूप में प्रयोग किया जाता है। परंपरागत चिकित्सा में जायफल और जायफल तेल का इस्तेमाल नसों और पाचन प्रणाली से संबंधित बीमारियों के लिए प्रयोग किया जाता था।

जायफल मक्खन

जायफल के बीज के निष्पीड़न से जायफल बटर की प्राप्ती होती है। यह अर्ध-ठोस और भूरे रंग की लाल होती है और इसमें जायफल का स्वाद और खुशबू आती है। जायफल का लगभग 75% (वजन द्वारा) बटर ट्रिमिरिल्स्टिन होता है जिसे मिरिस्टिक एसिड में तब्दील किया जा सकता है, एक 14-कार्बन फैटी एसिड, कोकोआ बटर के लिए एक स्थानापन्न के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और दूसरे चर्बियों के साथ मिश्रित किया जा सकता है जैसे कॉटनसीड तेल या ताड़ का तेल और एक औद्योगिक लुब्रिकेंट के रूप में भी संप्रयोग किया जाता है।

इतिहास

 

जायफल के अंदर मेस (लाल)

कुछ सबूत सुझाव देते हैं कि रोमन पादरी जायफल का इस्तेमाल अगरबत्ती के रूप में करते थे, हालांकि यह विवादास्पद है। यह जाना जाता है कि मध्ययुगीन व्यंजनों में यह महत्वपूर्ण और महंगा मसाला था जिसका इस्तेमाल व्यंजनों में स्वाद के लिए और दवाओं में इसका इस्तेमाल किया जाता था और साथ ही एजेंटो के संरक्षण में भी इसका इस्तेमाल था क्योंकि उस समय यूरोपीय बाजारों में ये काफी मूल्यवान था। सेंट थियोडेर द स्टुडिटे (ca. 758 -. Ca 826) अपने संन्यासियों को उनके मटर के हलवा पर जब खाने की आवश्यकता होती थी तब उस पर जायफल छिड़कने की अनुमति देने के लिए प्रसिद्ध था। एलिज़ाबेथन के समय में ऐसा माना जाता था कि जायफल ने प्लेग को दूर किया था इसलिए जायफल काफी लोकप्रिय था।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

विश्व भर में एक छोटा सा बांडा द्वीप ही जायफल और जावित्री का एकमात्र स्रोत था। मध्य युग के दौरान जायफल का अरब द्वारा कारोबार किया गया और वेनिस को अत्यधिक कीमतों के लिए बेच दिया गया था, पर व्यापारियों ने लाभदायक हिंद महासागर व्यापार में उनके स्रोत के सटीक स्थान को प्रकट नहीं किया था और कोई भी यूरोपीयन उनके स्थान का पता लगाने में सक्षम नहीं थे।

अगस्त 1511 में पुर्तगाल के राजा की ओर से अफोंसो दे अल्बुकर्क ने मलक्का पर विजय प्राप्त की, जो उस समय एशियाई व्यापार का केंद्र था। मलक्का को प्राप्त करने और बांडा स्थान के अध्ययन के बाद उस साल के नवंबर में अल्बुकर्क ने अपने एक अच्छे दोस्त एंटोनियो डे एब्रियू के नेतृत्व में तीन जहाजों के एक अभियान के साथ उन्हें खोजने के लिए भेजा. मलय पायलटों को या तो भर्ती कराया गया था या जबरन रखा गया था, उन्हें जावा द्वारा लेसर संडस और अम्बों से बांडा तक का निर्देशन दिया गया और 1512 के प्रारम्भ में वहां पहुंचे।[2] पहली बार यूरोपीयन बांडा तक पहुंचे और यह अभियान करीब एक महीने तक जारी बांडा में रहा और वे बांड़ा के जायफल और मेस की खरीदारी करते रहे और जहाज में रखते गए, साथ ही लाँग की भी खरीदारी एंटरपोट से की जिसका बंडा में एक सम्पन्न व्यापार था।[3] सुमा ओरियंटल किताब में पहली बार बांडा के व्यापार का वर्णन किया गया है जिसे एक पुर्तगाली औषधकार टोमे पिरेस द्वारा लिखा गया था और 1512 से 1515 के मलक्का के आधार पर यह किताब लिखी गई है। लेकिन इस व्यापार का पूरा नियंत्रण संभव नहीं था और जब से टर्नेट अधिकारियों ने बांडा द्वीप के जायफल उत्पादन पर नियंत्रण रखा, जो काफी सीमित था, तबसे वे मालिक के बजाए केवल हिस्सेदार बनकर रह गए। इसलिए, द्वीप में पुर्तगाली अपनी पकड़ मज़बूत करने में विफल रहे।

बाद में 17 वीं शताब्दी में डच ने जायफल के व्यापार में अपना वर्चस्व कायम किया। ब्रिटिश और डच लंबे समय तक द्वीप पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिए संघर्ष में लगे रहे, जो जायफल का एकमात्र स्रोत था। द्वितीय आंग्ल-डच युद्ध के अंत में ब्रिटिश के उत्तरी अमेरिका में न्यू एम्सटरडेम (न्यूयार्क) पर नियंत्रण करने के बदले डच को इसकी नियंत्रण प्राप्त हुई।

1621 में द्वीप के अधिकांश निवासियों की हत्या या निष्कासन को समाप्त करने के लिए विस्तृत सैन्य अभियान के बाद बांडा द्वीप पर नियंत्रण स्थापित करने में डच सफल रहे। इसके बाद दूसरे स्थानों के जायफलों को उखाड़न के लिए वार्षिक स्थानीय युद्ध अभियानों को बढ़ाने के साथ बांडा द्वीप को वृक्षारोपण एस्टेट की एक श्रृंखला के रूप में नियंत्रित किया गया था।

नपालियान युद्धों के दौरान डच राजाओं के भीतर एक परिणाम के रूप में अंग्रेजों ने नेबांडा द्वीप पर अस्थायी रूप से नियंत्रण प्राप्त कर लिया और अपने औपनिवेशिक क्षेत्रों में जायफल का प्रतिरोपण किया, विशेष रूप से ज़ंजीबार और ग्रेनाडा में रोपण किया। आज एक जायफल की खंडित शैली ग्रेनाडा के राष्ट्रीय ध्वज पर पाई जाती है।

कनेक्टिकट से यह अपना उपनाम ("जायफल राज्य", "नट्मेगर") एक किंवदन्ति से प्राप्त करता है जिसमें कुछ विवेकहीन व्यापारी लकड़ी से खरोच-खरोच कर जायफल बना लेते थे जिसे "लकड़ी का जायफल" कहते थे (एक ऐसा शब्द जिसका अर्थ किसी भी जालसाजी से था) [2].

विश्व उत्पादन

 

मेस जायफल के लिए वाणिज्यिक जार

जायफल का विश्व उत्पादन प्रति वर्ष 10,000 और 12,000 टन (9,800 और 12,000 लंबे टन) के बीच अनुमानित है और विश्व भर में वार्षिक मांग 9,000 टन (8,900 लंबे टन) का अनुमान लगाया गया है और मेस का उत्पादन 1,500 से 2,000 टन (1,500 से 2,000 लंबे टन) अनुमानित है। इंडोनेशिया और ग्रेनाडा में इसका उत्पादन सबसे अधिक है और विश्व बाजार में क्रमशः 75% और 20% की हिस्सेदारी के साथ दोनों उत्पादों का निर्यात करता है। अन्य निर्माताओं भारतमलेशिया (विशेष रूप से पेनांगशामिल है जहां जंगली क्षेत्रों में पेड़ देशी हैं), पापुआ न्यू गिनीश्रीलंका और कैरेबियाई द्वीप जैसे सेंट विन्सेन्ट. मुख्य आयात बाजारों में यूरोपीय समुदायसंयुक्त राज्य अमेरिकाजापान और भारत हैं। सिंगापुर और नीदरलैंड दोबारा निर्यातकों में प्रमुख हैं।

एक समय में जायफल सबसे मूल्यवान मसालों में से एक था। इंग्लैंड में यह कहा गया है कि, कई सैकड़ों वर्ष पहले जीवन के लिए वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए कुछ जायफलों को पर्याप्त पैसे में बेचा जा सकता था।

जायफल के पहले फसल बोने के बाद 7-9 साल में यह परिपक्वता प्राप्त करती है और 20 साल के बाद वृक्ष अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने में सफल होती है।

मानसिक प्रभाव और विषाक्तता

कम मात्रा में जायफल शारीरिक या न्यूरोलॉजिकल प्रतिक्रिया पैदा नहीं करता है।

जायफल में मिरिस्टिसिन होता है एक कमजोर मोनोमाइन ओक्सीडेस इन्हिबिटर होता है। मिरिस्टियन विषाक्तन संक्षौभ, धकधकी, उबकाई, संभावित निर्जलीकरण और सामान्यीकृत शरीर दर्द को उत्प्रेरित कर सकता है।[4] इसे एक मजबूत प्रलापक माना जाता है।[5]

घातक मिरिस्टिसिन विषाक्तन मानव में बहुत दुर्लभ होते हैं, लेकिन अब तक दो की जानकारी मिली है, पहला है 8 वर्षीय बच्चे में और एक 55 वर्षीय प्रौढ़ में[7].

मिरिस्टिसिन विषाक्तन यहां तक कि रसोई मात्रा में भी संभावित पालतू और पशुओं के लिए घातक होता है। इस कारण से, उदाहरण स्वरुप पशु के खाद्य में एग्गनोग मिलाकर कुत्तों को नहीं खिलाने की सिफारिश की गई है।

आनंददायक दवा के रूप में प्रयोग

जायफल का स्वाद में कड़वापन होने के चलते आनंददायक दवा के रूप में इसका सेवन अलोकप्रिय है और इसके संभावित नकारात्मक पक्ष भी होते हैं जिसमें चक्कर आना, तमतमाहट, शुष्क चेहरा, तेजी से दिल की धड़कन, अस्थायी कब्ज, पेशाब में कठिनाई, उबकाई शामिल हैं। इसके अलावा आमतौर पर इसका अनुभव 24 घंटे से भी अधिक रहता है और कभी-कभी 48 घंटे से भी अधिक होता है जो आनंददायक के बजाय अव्यावहारिक बनाता है।

नशा और (आनंद) जायफल के प्रभावों की उन्मत्तता और MDMA (आनंद) के बीच प्रत्याशित तुलना की गई है।[9]

मैल्कम एक्स अपनी आत्मकथा में जेल कैदियों के जायफल पाउडर लेने की घटनाओं को बताया है, जो आमतौर पर एक गिलास पानी में पाउडर को मिलाकर पीते हैं और नशे में धुत हो जाते हैं। जेल गार्ड अंततः उनके इस अभ्यास को पकड़ लेता है और जेल प्रणाली में आनंददायक के रूप जायफल के इस्तेमाल पर रोक लगाने की कोशिश करता है। विलियम बुरोघ के नेकेड लंच की परिशिष्ट में उन्होंने उल्लेख किया है कि मरिजुआना की ही तरह जायफल भी अनुभव पैदा करता है लेकिन उबकाई से राहत देने के बजाए ये उसका कारण बन जाता है।

गर्भावस्था के दौरान विषाक्तता

जायफल को एक बार गर्भस्त्राव माना जाता था, लेकिन गर्भावस्था के दौरान रसोई उपयोग के लिए यह सुरक्षित हो सकता है। तथापि यह प्रोस्टाग्लैंडीन उत्पादन को रोकता है और इसमें विभ्रमजनक औषधियां होती हैं जिनका सेवन अधिक मात्रा में करने से गर्भ प्रभावित हो सकता है

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चन्दन की खेती

Thu, 04/26/2018 - 12:24

चन्दन

 

चन्दन का वृक्ष 

 

भारतीय चंदन (Santalum album) का संसार में सर्वोच्च स्थान है। इसका आर्थिक महत्व भी है। यह पेड़ मुख्यत: कर्नाटक के जंगलों में मिलता है तथा भारत के अन्य भागों में भी कहीं-कहीं पाया जाता है। भारत के 600 से लेकर 900 मीटर तक कुछ ऊँचे स्थल और मलयद्वीप इसके मूल स्थान हैं।

इस पेड़ की ऊँचाई 18 से लेकर 20 मीटर तक होती है। यह परोपजीवी पेड़, सैंटेलेसी कुल का सैंटेलम ऐल्बम लिन्न (Santalum album linn.) है। वृक्ष की आयुवृद्धि के साथ ही साथ

 उसके तनों और जड़ों की लकड़ी में सौगंधिक तेल का अंश भी बढ़ने लगता है। इसकी पूर्ण परिपक्वता में 8 से लेकर 12वर्ष तक का समय लगता है। इसके लिये ढालवाँ जमीन, जल सोखनेवाली उपजाऊ चिकली मिट्टी तथा 500 से लेकर 625 मिमी. तक वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है।

 

चन्दन की एक डाली पर लगीं पत्तियाँ

 

तने की नरम लकड़ी तथा जड़ को जड़, कुंदा, बुरादा, तथा छिलका और छीलन में विभक्त करके बेचा जाता है। इसकी लकड़ी का उपयोग मूर्तिकला, तथा साजसज्जा के सामान बनाने में और अन्य उत्पादनों का अगरबत्ती, हवन सामग्री, तथा सौगंधिक तेज के निर्माण में होता है। आसवन द्वारा सुगंधित तेल निकाला जाता है। प्रत्येक वर्ष लगभग 3,000 मीटरी टन चंदन की लकड़ी से तेल निकाला जाता है। एक मीटरी टन लकड़ी से 47 से लेकर 50 किलोग्राम तक चंदन का तेल प्राप्त होता है। रसायनज्ञ इस तेल के सौगंधिक तत्व को सांश्लेषिक रीति से प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।

चंदन के प्रसारण में पक्षी भी सहायक हैं। बीजों के द्वारा रोपकर भी इसे उगाया जा रहा है। सैंडल स्पाइक (Sandle spike) नामक रहस्यपूर्ण और संक्रामक वानस्पतिक रोग इस वृक्ष का शत्रु है। इससे संक्रमित होने पर पत्तियाँ ऐंठकर छोटी हो जाती हैं और वृक्ष विकृत हो जाता है। इस रोग की रोकथाम के सभी प्रयत्न विफल हुए हैं।

 

चंदन के न पर उस्थायोग पमें आनेवाले निम्नलिखित वृक्षों की लकड़ियाँ भी हैं 

 

  • (१) आस्ट्रेलिया में सैंटेलेसिई (Santalaceae) कुल का
  • (क) यूकार्या स्पिकैटा (आर.बी-आर.) स्प्रैग. एवं सम्म.उ सैंटेलम स्पिकैटम् (आर.बी-आर.) ए. डी-सी. (Eucarya Spicata (R.Br.) Sprag. et Summ, Syn. Santalum Spicatum (R.Br.) A.Dc.),
  • (ख) सैंटेलम लैंसियोलैटम आर. बी-आर. (Santalum lanceolatum (R.Br.)) तथा
  • (ग) मायोपोरेसी (Myoporaceae) कुल के एरिमोफिला मिचेल्ली बैंथ. (Eremophila mitchelli Benth.) नामक वृक्ष;
  • (२) पूर्वी अफ्रीका तथा मैडेगास्कर के निकटवर्ती द्वीपों में सैंटेलेसी कुल का ओसाइरिस टेनुइफोलिया एंग्ल. (Osyris tenuifolia Engl.); तथा
  • (३) हैटी और जमैका में रूटेसिई (Rutaceae) कुल का एमाइरिस बालसमीफेरा एल. (Amyris balsmifera L.), जिसे अंग्रेजी में वेस्ट इंडियन सैंडलवुड भी कहते हैं।
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बबूल की खेती

Thu, 04/26/2018 - 12:05

बबूल खेती

उत्तरी भारत में बबूल की हरी पतली टहनियां दातून के काम आती हैं। बबूल की दातुन दांतों को स्वच्छ और स्वस्थ रखती है। बबूल की लकड़ी का कोयला भी अच्छा होता है। हमारे यहां दो तरह के बबूल अधिकतर पाए और उगाये जाते हैं। एक देशी बबूल जो देर से होता है और दूसरा मासकीट नामक बबूल. बबूल लगा कर पानी के कटाव को रोका जा सकता है। जब रेगिस्तान अच्छी भूमि की ओर फैलने लगता है, तब बबूल के जगंल लगा कर रेगिस्तान के इस आक्रमण को रोका जा सकता है। इस प्रकार पर्यावरण को सुधारने में बबूल का अच्छा खासा उपयोग हो सकता है।[2] बबूल की लकड़ी बहुत मजबूत होती है। उसमें घुन नहीं लगता. वह खेती के औजार बनाने के काम आती है।[3]बबूल या कीकर (वानस्पतिक नाम : आकास्या नीलोतिका) अकैसिया प्रजाति का एक वृक्ष है। यह अफ्रीका महाद्वीप एवं भारतीय उपमहाद्वीप का मूल वृक्ष है।

 

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देवदार की खेती

Thu, 04/26/2018 - 01:45

देवदार वृक्ष कहा  बढ़ता है

 

वैज्ञानिक-वनस्पतिशास्त्रियों ने चार प्रकार के देवदार में भेद किया:

 

  • लेबनान;
  • एटलस;
  • साइप्रस;
  • हिमालय

देवदार की पहली दो किस्में सबसे अधिक बार होती हैंउत्तरी अफ्रीका, साइप्रस साइप्रस के द्वीप पर, और हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों में पाया - पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान में। इसके अलावा, लेबनान और एटलस देवदार पूरी तरह से जड़ Crimea के दक्षिणी तट पर साथ ही साथ कई भूमध्य देशों, जहां सर्दियों में तापमान -25 डिग्री नीचे चला जाता है में के रूप में लिया। और जहां साइबेरियाई देवदार बढ़ता है और क्यों यह 4 विज्ञान के लिए ज्ञात प्रजातियों की सूची में स्थान दिया गया है है? बात यह है कि, कडाई के साथ एक देवदार साइबेरियाई देवदार बिल्कुल नहीं है। साइबेरियाई देवदार आमतौर पर साइबेरियाई पत्थर पाइन की बात कर रहे के बारे में बोलते - एक शक्तिशाली पेड़, ऊंचाई में लगभग चालीस मीटर और परिधि में के बारे में ढाई मीटर तक पहुंच गया।

 

साइबेरियाई देवदार रूस में कहां बढ़ रहा है?

 

रूस में जंगली देवदार के जंगलों में पाया जा सकता हैTransbaikalia, साइबेरिया और Urals। अन्य क्षेत्रों में देवदार की खेती भी काफी सफल साबित हुई है। उदाहरण के लिए, साइबेरिया के देवदारों को मास्को क्षेत्र, लेनिनग्राद और यारोस्लावल क्षेत्रों में लगाया गया, न केवल सुरक्षित रूप से आदी हो गए, बल्कि नियमित रूप से फल भी उगाते हैं। पहली बार लंबी फसल के लिए सच प्रतीक्षा - प्राकृतिक परिस्थितियों में चालीस से सत्तर साल तक और देश में बढ़ते हुए पच्चीस वर्ष। साइबेरियाई देवदार एक या दो सौ साल की उम्र में फ्राईटिंग की चोटी पर पहुंच जाते हैं। इस वृक्ष का औसत जीवनकाल तीन सौ से पांच सौ साल तक होता है।

देवदार

देवदार (वैज्ञानिक नाम:सेडरस डेओडारा, अंग्रेज़ी: डेओडार, उर्दु: ديودار देओदार; संस्कृत: देवदारु) एक सीधे तने वाला ऊँचा शंकुधारी पेड़ है, जिसके पत्ते लंबे और कुछ गोलाई लिये होते हैं तथा जिसकी लकड़ी मजबूत किन्तु हल्की और सुगंधित होती है। इनके शंकु का आकार सनोबर (फ़र) से काफी मिलता-जुलता होता है। इनका मूलस्थान पश्चिमी हिमालय के पर्वतों तथा भूमध्यसागरीय क्षेत्र में है, (१५००-३२०० मीटर तक हिमालय में तथा १०००-२००० मीटर तक भूमध्य सागरीय क्षेत्र में)।[1]यह इमारतों में काम आती है।[2] यह पश्चिमी हिमालय, पूर्वी अफगानिस्तान, उत्तरी पाकिस्तान, उत्तर-मध्य भारत के हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू एवं कश्मीर तथा दक्षिण-पश्चिमी तिब्बत एवं पश्चिमी नेपाल में १५००-३२०० मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। यह एक शंकुधारी वृक्ष होता है, जिसकी ऊंचाई ४०-५० मी. तक और कभी-कभार ६० मी. तक होती है। इसके तने २ मीटर तक और खास वृक्षों में ३ मीटर तक के होते हैं।[1] इसकी कुछ प्रजातियों को स्निग्धदारु और काष्ठदारु के नाम से भी जाना जाता है। स्निग्ध देवदारु की लकड़ी और तेल दवा बनाने के काम में भी आते हैं। इसके अन्य नामों में देवदारु प्रसिद्ध है। यह निचले पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है।[3]

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टिंडे की खेती

Thu, 04/26/2018 - 01:00

 टिंडा की उन्नत खेती

 

टिन्डा भी कुकरविटेसी परिवार की मुख्य फसलों में से है जो कि गर्मियों की सब्जियों में से प्रसिद्ध है । इसको पश्चिमी भारतवर्ष में बहुत पैदा किया जाता है । टिन्डा भारत के कुछ भागों में अधिक पैदा किया जाता है । जैसे-पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में मुख्य रूप से इसकी खेती की जाती है । टिन्डे के फलों को अधिकतर सब्जी बनाने के रूप में प्रयोग किया जाता है । सब्जी अन्य सब्जियों के साथ मिलाकर भी बनायी जाती है । कच्चे फलों को दाल आदि में मिलाकर हरी सब्जी के रूप में खाया जाता है । इस प्रकार से इस फसल के फलों के प्रयोग से स्वास्थ्य के लिये अधिक पोषक-तत्व-युक्त सब्जी मिलती है ।

 

टिन्डा की खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु 

 

 फसल के लिये गर्मतर जलवायु अच्छी होती है । अधिक गर्म व ठन्डी जलवायु उपयुक्त नहीं होती है । बीज के अंकुरण के लिये फरवरी-मार्च का मौसम अच्छा होता है तथा भूमि सबसे अच्छी हल्की बलुई दोमट उपयुक्त पायी जाती है । भूमि में जल-निकास का भी उचित प्रबन्ध होना चाहिए । भूमि का पी. एच. मान  6.0 से 6.5 के बीच का उचित होता है ।

 

टिन्डा खेती के लिए तैयारी 

 

फसल के लिये मिट्‌टी ढेले रहित व भुरभुरी होनी चाहिए । इस प्रकार से 4-5 जुताई करनी चाहिए । अन्त में भूमि में खाद आदि मिलाकर बोने के योग्य बनाना चाहिए तथा खेत में मेड़-बन्दी करके क्यारियां बना लेनी चाहिए । क्यारियाँ अधिक बड़ी नहीं बनाना चाहिए ।

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धतूरा की खेती

Wed, 04/25/2018 - 14:55

धतूरा

भूमि एवं जलवायुः किसी भी प्रकार की जमीन या जलवायु में यह पौधा पनप जाता है । फसल हेतु हल्की परती जमीन का 

इस्तेमाल करना चाहिए । खुली तथा अच्छे प्रकाशवाली जगह इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है ।

भूमि की तैयारीः बखर चलाकर मिट्टी थोड़ी पोली करनी चाहिए । अगर उपलब्ध है तो प्रति एकड़ 2॰3 टन सड़ी हुई गोबर खाद डालनी चाहिए । प्रति एकड़ 25 किलो नत्रजन 15 किलो स्फुरद और 12 किलो पोटाष छिड़कना चाहिए ।

उन्नत प्रजातियां आर आर एल परपल आर आर एल ग्रीन ।

पौधषालाः धतूरा खरीफ और रबी दोनों सीजन में लगा सकते हैं । फसल लेते वक्त पौधषाला तैयार करना अच्छा रहता है । रेज्ड बेडस पर प्रति एकड़ 2॰5 से 3 किलो बीज बोने चाहिए । बोते वक्त बीजों को रायसोबियम जीवाणु लगाना चाहिए । बीजों को रात भर पानी में भीगोकर रखकर इस्तेमाल करना चाहिए । बोते वक्त बीज 2॰3 सेमी गहराई में बोना चाहिए । खरीफ के हिसाब से मई जुन या रबी हेतु अक्टूबर माह में पौधषाला माह में पौधषाला तैयार करनी चाहिए । बीज अंकुरण 15 दिन में होता है । 30॰45 दिन के 12॰15 से मी ऊंचाई के 4॰5 पत्तियों वाले पौधे स्थानांतरण हेतु तैयार समझे जाते है ।

रोपाईः पौधषाला के तैयार पौधों को मीटर अंतर पर लगाना चाहिए । भूमि का प्रकार और सिंचन व्यवस्था के अनुसार यह अंतर कम कर सकते है । 10॰15 दिन में एक बार सिंचन रबी फसल हेतु आवश्यक होता है ।

उपजः खरीफ के पौधों पर सितंबर में और रबी के पौधों पर जनवरी माह में फूल आते हैं । फल आने के बाद 30॰40 दिन में पकना होना शुरू हो जाता है । फलों को काले पड़कर सूखने लगते ही तोड़ लेना चाहिए । 2॰3 तोड़ाई में पूरे फल निकल सकते हैं । फल तोड़ाई होते ही पौधों को भूमि से 50॰60 सेमी अंतर पर काटना चाहिएए जिससे केवल नाजुक शाखाओं तथा पत्तियों को ही काटकर जमा किया जाता है । काटी हुई पत्तियां और शाखाओं को छाया में सुखाना चाहिए । कटे हुए पौधों को सिंचन तथा प्रति एकड़ 12 किलो नत्रजन एवं 8 किलो पोटाष देने से 60॰75 दिन में पौधो फिर से कटाई योग्य हो जाता है इस तरह 2॰3 बार कटाई की जा सकती है ।

औषधीय उपयोग धतूरे के बीज का उपयोग नींद न आने पर बेहोशी की दवा के रूप में बच्चा पैदा होने के समय सुघनी के रूप में दस्त रोकने दमा कम करने स्नायु रोग और फेफड़े की सूजन कम करने छाती तथा श्वसन संस्थान के विकार तथा कृमिनाषक के तौर पर और जूंण्लीखों को नष्ट करने हेतु किया जाता है । धतूरे की ज्यादा मात्रा नषीली और जहरीली होने से जानलेवा होती है । इसका वातवर्धन गुण अधिक मात्रा में सेवन करने से उन्माद आदि के रूप प्रकट होता है । यह स्वयं एक उग्र उपविष होते हुए भी पागल कुत्ते सियार आदि के विष को नष्ट करने की क्षमता रखता है । अत इसे विषनाषक कहा जाता है ।

धतूरे की पत्तियों का रस स्नायु दर्द वातरोग जोड़ों के दर्द में निवारक के तौर पर और सूजन क करने हेतु तथा अंतडियों के व्रणों में उपयोगी है । पत्तियां ट्रोपेन अल्कोलाइड प्राप्त करने हेतु उपयोग में लाई जाती है । पत्तियों की बीड़ी बनाकर या सिगरेट में भरकर पीने से दमा व अस्थमा रोगियों को आराम मिलता है । एट्रोपिन का मुख्य उपयोग आखों के विकार तथा लकवा में होता है । यह व्रणों को ठीक करने वाला होता है ।

उत्पादन प्रगतिषील उन्नत प्रजातियां इस्तेमाल करने से प्रति एकड़ 100 किवंटल हरी पतितयां व शाखाएं और 6॰8 किवंटल बीजों का उत्पादन होता है । बीजो से 0॰24 से 0॰35 प्रतिशत और पतितयों से 0॰12 से 0॰20 प्रतिषत अल्कोलाइड युक्त तेल प्राप्त होता है ।

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चमेली की खेती

Wed, 04/25/2018 - 12:43

चमेली 

चमेली का फूल झाड़ी या बेल जाति से संबंधित है, इसकी लगभग २०० प्रजाति पाई जती हैं। "चमेली" नाम पारसी शब्द "यासमीन" से बना है, जिसका मतलब "प्रभु की देन" है।

चमेली, जैस्मिनम (Jasminum) प्रजाति के ओलिएसिई (Oleaceae) कुल का फूल है। भारत से यह पौधा अरब के मूर लोगों द्वारा उत्तर अफ्रीका, स्पेन और फ्रांस पहुँचा। इस प्रजाति की लगभग 40 जातियाँ और 100 किस्में भारत में अपने नैसर्गिक रूप में उपलब्ध हैं। जिनमें से निम्नलिखित प्रमुख और आर्थिक महत्व की हैं:

1. जैस्मिनम ऑफिसनेल लिन्न., उपभेद ग्रैंडिफ्लोरम (लिन्न.) कोबस्की जै. ग्रैंडिफ्लारम लिन्न. अर्थात् चमेली

2. जै. औरिकुलेटम वाहल अर्थात् जूही

3. जै. संबक (लिन्न.) ऐट. ॠत्द्य.) अर्थात् मोगरावनमल्लिका

4. जै. अरबोरेसेंस रोक्स ब.उ जै. रॉक्सबर्घियानम वाल्ल. अर्थात् बेला

हिमालय का दक्षिणावर्ती प्रदेश चमेली का मूल स्थान है। इस पौधे के लिये गरम तथा समशीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु उपयुक्त है। सूखे स्थानों पर भी ये पौधे जीवित रह सकते हैं। भारत में इसकी खेती तीन हजार मीटर की ऊँचाई तक ही होती है। यूरोप के शीतल देशों में भी यह उगाई जा सकती है। इसके लिये भुरभुरी दुमट मिट्टी सर्वोत्तम है, किंतु इसे काली चिकनी मिटृटी में भी लगा सकते हैं। इसे लिए गोबर पत्ती की कंपोस्ट खाद सर्वोत्तम पाई गई है। पौधों को क्यारियों में 1.25 मीटर से 2.5 मीटर के अंतर पर लगाना चाहिए। पुरानी जड़ों की रोपाई के बाद से एक महीने तक पौधों की देखभाल करते रहना चाहिए। सिंचाई के समय मरे पौधों के स्थान पर नए पौधों को लगा देना चाहिए। समय-समय पर पौधों की छँटाई लाभकर सिद्ध हुई है। पौधे रोपने के दूसरे वर्ष से फूल लगन लगते हैं। इस पौधे की बीमारियों में फफूँदी सबसे अधिक हानिकारक है।

आजकल चमेली के फूलों से सौगंधिक सार तत्व निकालकर बेचे जाते हैं। आर्थिक दृष्टि से इसका व्यवसाय विकसित किया जा सकता है।

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कुकरमुत्ता की खेती

Wed, 04/25/2018 - 12:19

 

(कुकुरमुत्ताकवक)

 

म) एक प्रकार का कवक है, जो बरसात के दिनों में सड़े-गले कार्बनिक पदार्थ पर अनायास ही दिखने लगता है। इसे या खुम्ब, 'खुंबी' या मशरूम भी कहते हैं। यह एक मृतोपजीवी जीव है जो हरित लवक के अभाव के कारण अपना भोजन स्वयं संश्लेषित नहीं कर सकता है। इसका शरीर थैलसनुमा होता है जिसको जड़, तना और पत्ती में नहीं बाँटा जा सकता है। खाने योग्य कुकुरमुत्तों को खुंबी कहा जाता है।

'कुकुरमुत्ता' दो शब्दों कुकुर (कुत्ता) और मुत्ता (मूत्रत्याग) के मेल से बना है, यानि यह कुत्तों के मूत्रत्याग के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है। ऐसी मान्यता भारत के कुछ इलाकों में प्रचलित है, किन्तु यह बिलकुल गलत धारणा है।

 

अनुकूल तापमान

 

भारत के मैदानी भागों में श्वेत बटन मशरूम को शरद ऋतु में नवम्बर से फरवरी तक, ग्रीष्मकालीन श्वेत बटन मशरूम को सितम्बर से नवम्बर व फरवरी से अप्रैल तक, काले कनचपडे़ मशरूम को फरवरी से अप्रैल तक, ढींगरी मशरूम को सितम्बर से मई तक, पराली मशरूम को जुलाई से सितम्बर तक तथा दूधिया मशरूम को फरवरी से अप्रैल व जुलाई से सितम्बर तक उगाया जा सकता है।

मध्यम उंचाई पर स्थित पहाड़ी स्थानों में श्वेत बटन मशरूम को सितम्बर से मार्च तक, ग्रीष्मकालीन श्वेत बटन मशरूम को जुलाई से अगस्त तक व मार्च से मई तक, षिटाके मशरूम को अक्टूबर से फरवरी तक, ढिंगरी मशरूम को पूरे वर्ष भर, काले कनचपड़े मशरूम को मार्च से मई तक तथा दूधिया मशरूम को अप्रैल से जून तक उगाया जा सकता है।

अधिक उंचाई पर स्थित पहाड़ी क्षेत्रों में श्वेत बटन मशरूम को मार्च से नवम्बर तक, ढिंगरी मशरूम को मई से अगस्त तक तथा षिटाके मशरूम को दिसम्बर से अप्रैल तक उगाया जा सकता है।

 

भारत में  मशरूम की खेती के बारे में जानकारी

 

मशरुम की खेती का प्रचलन भारत में करीब 200 सालों से है। हालांकि भारत में इसकी व्यावसायिक खेती की शुरुआत हाल के वर्षों में ही हुई है। नियंत्रित वातावरण में मशरुम की पैदावार करना हाल के दिनों का उभरता ट्रेंड है। इसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है और यह आयात निर्देशित एक व्यवसाय का रुप ले चुका है। हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और  राजस्थान (शीतकालीन महीनों में) जैसे राज्यों में भी मशरुम की खेती की जा रही है। जबकि इससे पहले इसकी खेती सिर्फ हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पहाड़ी इलाकों तक ही सीमित थी। मशरुम प्रोटीन, विटामिन्स, मिनरल्स, फॉलिक एसिड का बेहतरीन श्रोत है। यह रक्तहीनता से पीड़ित रोगी के लिए जरूरी आयरन का अच्छा श्रोत है।

 

मशरूम तीन तरह की होती है

 

  1. ढिंगरी (घोंघा)
  2. पुआल मशरुम (सभी प्रकार के)
  3. बटन मशरुम
Tags: मशरूम की खेतीमशरूम का बाजारबटन मशरूम की खेतीमशरूम के प्रकारराजस्थान में मशरूम की खेतीमशरूम की खेती से लाभमशरूम के बीजमशरूम के भावCategory: खेती

पटसन की खेती

Wed, 04/25/2018 - 12:00

पटसन

 

पटसनपाट या पटुआ एक द्विबीजपत्री, रेशेदार पौधा है। इसका तना पतला और बेलनाकार होता है। इसके तने से पत्तियाँ अलग कर पानी में गट्ठर बाँधकर सड़ने के लिए डाल दिया जाता है। इसके बाद रेशे को पौधे से अलग किया जाता है। इसके रेशे बोरे, दरी, तम्बू, तिरपाल, टाट, रस्सियाँ, निम्नकोटि के कपड़े तथा कागज बनाने के काम आता 

 

पटसन के पौधे

 

पटसन के रेशे दो प्रकार के जुट के पौधों से प्राप्त होते हैं। ये पौधे टिलिएसिई (Tiliaceae) कुल के कौरकोरस कैप्सुलैरिस (Corchorus capsularis) और कौरकोरस ओलिटोरियस (Oolitorius) हैं और रेशे के लिये दोनों ही उगाए जाते हैं। पहले प्रकार की फसल कुल वार्षिक खेती के 3/4 भाग में और दूसरे प्रकार की फसल कुल खेती के शेष 1/4 भाग में होती है। ये प्रधानता भारत और पाकिस्तान में उपजाए जाते हैं।

कैप्सुलैरिस कठोर होता है और इसकी खेती ऊँची तथा नीची दोनों प्रकार की भूमियों में होती है जब कि ओलिटोरियस की खेती केवल ऊँची भूमि में होती है। कैप्सुलैरिस की पत्तियाँ गोल, बीज अंडाकार गहरे भूरे रंग के और रेशे सफेद पर कुछ कमजोर होते हैं, जब कि ओलिटोरियस की पत्तियाँ वर्तुल, सूच्याकार और बीज काले रंग के होते हैं और रेशे सुंदर सुदृढ़ पर कुछ फीके रंग के। कैप्सुलैरिस की किस्में फंदूक, घालेश्वरी, फूलेश्वरी, देसीहाट, बंबई डी 154 और आर 85 हैं तथा ओलिटोरियस की देसी, तोसाह, आरथू और चिनसुरा ग्रीन हैं। बीज से फसल उगाई जाती है। बीज के लिये पौधों को पूरा पकने दिया जाता है, पर रेशे के लिये पकने के पहले ही काट लिया जाता है।

पटसन की खेती

 

जूट की खेती गरम और नम जलवायु में होती है। ताप 25-35 सेल्सियस और आपेक्षिक आर्द्रता 90 प्रतिशत रहनी चाहिए। हलकी बलुई, डेल्टा की दुमट मिट्टी में खेती अच्छी होती है। इस दृष्टि से बंगाल का जलवायु इसके लिये सबसे अधिक उपयुक्त है। खेत की जुताई अच्छी होनी चाहिए। प्रति एकड़ 50 से 100 मन गोबर की खाद, या कंपोस्ट और 400 पाउंड लकड़ी या घास पात की राख डाली जाती है। पुरानी मिट्टी में 30-60 पाउंड नाइट्रोजन दिया जा सकता है। कुछ नाइट्रोजन बोने के पहले और शेष बीजांकुरण के एक सप्ताह बाद देना चाहिए। पोटाश और चूने से भी लाभ होता है। नीची भूमि में फरवरी में और ऊँची भूमि में मार्च से जुलाई तक बोआई होती है। साधारणतया छिटक बोआई होती है। अब ड्रिल का भी उपयोग होने लगा है। प्रति एकड़ 6 से लेकर 10 पाउंड तक बीज लगता है।

पौधे के तीन से लेकर नौ इंच तक बड़े होने पर पहले गोड़ाई की जाती है। बाद में दो या तीन निराई और की जाती है। जून से लेकर अक्टूबर तक फसलें काटी जाती हैं। फूल झर जाने तथा फली निकल आने पर ही फसल काटनी चाहिए। अन्यथा देर करने से पछेती कटाई से रेशे मजबूत, पर भद्दे और मोटे हो जाते हैं और उनमें चमक नहीं होती। बहुत अगेती कटाई से पैदावार कम और रेशे कमजोर होते हैं।

भूमि की सतह से पौधे काट लिए जाते हैं। कहीं कहीं पौधे आमूल उखाड़ लिए जाते हैं। ऐसी कटी फसल को दो तीन दिन सूखी जमीन में छोड़ देते हैं, जिससे पत्तियाँ सूख या सड़ कर गिर पड़ती हैं। तब डंठलों को गठ्ठरों में बाँधकर पत्तों, घासपातों, मिट्टी आदि से ढँककर छोड़ देते हैं। फिर गठ्ठरों से कचरा हटाकर उनकी शाखादार चोटियों को काटकर निकाल लेते हैं। अब पौधे गलाए जाते हैं। गलाने के काम दो दिन से लेकर एक मास तक का समय लग सकता है। यह बहुत कुछ वायुमंडल के ताप और पानी की प्रकृति पर निर्भर करता है। गलने का काम कैसा चल रहा है, इसकी प्रारंभ में प्रति दिन जाँच करते रहते हैं। जब देखते है कि डंठल से रेशे बड़ी सरलता से निकाले जा सकते हैं तब डंठल को पानी से निकाल कर रेशे अलग करते और धोकर सुखाते हैं।

रेशा निकालने वाला पानी में खड़ा रहकर, डंठल का एक मूठा लेकर जड़ के निकट वाले छोर को छानी या मुँगरी से मार मार कर समस्त डंठल छील लेता है। रेशा या डंठल टूटना नहीं चाहिए। अब वह उसे सिर के चारों ओर घुमा घुमा कर पानी की सतह पर पट रख कर, रेशे को अपनी ओर खींचकर, अपद्रव्यों को धोकर और काले धब्बों को चुन चुन कर निकाल देता है। अब उसका पानी निचोड़ कर धूप में सूखने के लिये उसे हवा में टाँग देता है। रेशों की पूलियाँ बाँधकर जूट प्रेस में भेजी जाती हैं, जहाँ उन्हें अलग अलग विलगाकर द्रवचालित दाब (Hydraulic press) में दबाकर गाँठ बनाते हैं। डंठलों में 4.5 से 7.5 प्रति शत रेशा रहता है।

जूट पटसन के रेशे

 

जूट को सुखाया जा रहा है।

ये साधारणतया छह से लेकर दस फुट तक लंबे होते हैं, पर विशेष अवस्थाओं में 14 से लेकर 15 फुट तक लंबे पाए गए हैं। तुरंत का निकाला रेशा अधिक मजबूत, अधिक चमकदार, अधिक कोमल और अधिक सफेद होता है। खुला रखने से इन गुणों का ह्रास होता है। जूट के रेशे का विरंजन कुछ सीमा तक हो सकता है, पर विरंजन से बिल्कुल सफेद रेशा नहीं प्राप्त होता। रेशा आर्द्रताग्राही होता है। छह से लेकर 23 प्रति शत तक नमी रेशे में रह सकती है।

जूट की पैदावार, फसल की किस्म, भूमि की उर्वरता, अंतरालन, काटने का समय आदि, अनेक बातों पर निर्भर करते हैं। कैप्सुलैरिस की पैदावार प्रति एकड़ 10-15 मन और ओलिटोरियस की 15-20 मन प्रति एकड़ होती है। अच्छी जोताई से प्रति एकड़ 30 मन तक पैदावार हो सकती है।

जूट के रेशे से बोरे, हेसियन तथा पैंकिंग के कपड़े बनते हैं। कालीन, दरियाँ, परदे, घरों की सजावट के सामान, अस्तर और रस्सियाँ भी बनती हैं। डंठल जलाने के काम आता है और उससे बारूद के कोयले भी बनाए जा सकते हैं। डंठल का कोयला बारूद के लिये अच्छा होता है। डंठल से लुगदी भी प्राप्त होती है, जो कागज बनाने के काम आ सकती है।

 

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सदाबहार की खेती

Tue, 04/24/2018 - 13:48

सदाफूली

सदाफूली या सदाबहार बारहों महीने खिलने वाले फूलों का एक पौधा है। इसकी आठ जातियां हैं। इनमें से सात मेडागास्कर में तथा आठवीं भारतीय उपमहाद्वीप में पायी जाती है। इसका वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस है।[1][2] भारत में पायी जाने वाली प्रजाति का वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस रोजस है। इसे पश्चिमी भारत के लोग सदाफूली के नाम से बुलाते है।

मेडागास्कर मूल की यह फूलदार झाड़ी भारत में कितनी लोकप्रिय है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि लगभग हर भारतीय भाषा में इसको अलग नाम दिया गया है- उड़िया में अपंस्कांति, तमिल में सदाकाडु मल्लिकइ, तेलुगु में बिल्लागैन्नेस्र्, पंजाबी में रतनजोत, बांग्ला में नयनतारा या गुलफिरंगी, मराठी में सदाफूली और मलयालम में उषामालारि। इसके श्वेत तथा बैंगनी आभावाले छोटे गुच्छों से सजे सुंदर लघुवृक्ष भारत की किसी भी उष्ण जगह की शोभा बढ़ाते हुए सालों साल बारह महीने देखे जा सकते हैं। इसके अंडाकार पत्ते डालियों पर एक-दूसरे के विपरीत लगते हैं और झाड़ी की बढ़वार इतनी साफ़ सुथरी और सलीकेदार होती है कि झाड़ियों की काँट छाँट की कभी ज़रूरत नहीं पड़ती।

गुलाबी जिसके बीच की आँख गहरी गुलाबी थी) और पिपरमिंट कूलर (सफेद पंखुरियाँ, लाल आँख) विकसित किए गए।

विकसित प्रजातियाँ

रॉन पार्कर की कुछ नई प्रजातियाँ बाज़ार में आईं। इनमें से प्रिटी इन व्हाइट और पैरासॉल को आल अमेरिका सेलेक्शन पुरस्कार मिला। इन्हें पैन अमेरिका सीड कंपनी द्वारा उगाया और बेचा गया। इसी वर्ष कैलिफोर्निया में वॉलर जेनेटिक्स ने पार्कर ब्रीडिंग प्रोग्राम की ट्रॉपिकाना शृंखला को बाज़ार में उतारा। इन सदाबहार प्रजातियों के फूलों में नए रंग तो थे ही, आकार भी बड़ा था और पंखुरियाँ एक दूसरे पर चढ़ी हुई थीं। १९९३ में पार्कर जर्मप्लाज्म ने पैसिफ़का नाम से कुछ नए रंग प्रस्तुत किए। जिसमें पहली बार सदाबहार को लाल रंग दिया गया। इसके बाद तो सदाबहार के रंगों की झड़ी लग गई और आज बाज़ार में लगभग हर रंग के सदाबहार पौधों की भरमार है।

यह फूल सुंदर तो है ही आसानी से हर मौसम में उगता है, हर रंग में खिलता है और इसके गुणों का भी कोई जवाब नहीं, शायद यही सब देखकर नेशनल गार्डेन ब्यूरो ने सन २००२ को इयर आफ़ विंका के लिए चुना। विंका या विंकारोज़ा, सदाबहार का अंग्रेज़ी नाम है।

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गुलाब की खेती

Tue, 04/24/2018 - 11:59

  

परिचय

गुलाब प्रायः सर्वत्र १९ से लेकर ७० अक्षांश तक भूगोल के उत्तरार्ध में होता है। भारतवर्ष में यह पौधा बहुत दिनों से लगाया जाता है और कई स्थानों में जंगली भी पाया जाता है। कश्मीर और भूटान में पीले फूल के जंगली गुलाब बहुत मिलते हैं। वन्य अवस्था में गुलाब में चार-पाँच छितराई हुई पंखड़ियों की एक हरी पंक्ति होती है पर बगीचों में सेवा और यत्नपूर्वक लगाए जाने से पंखड़ियों की संख्या में बृद्धि होती है पर केसरों की संख्या घट जाती हैं। कलम पैबंद आदि के द्बारा सैकड़ों प्रकार के फूलवाले गुलाब भिन्न-भिन्न जातियों के मेल से उत्पन्न किए जाते हैं। गुलाब की कलम ही लगाई जाती है। इसके फूल कई रंगों के होते हैं, लाल (कई मेल के हलके गहरे) पीले, सफेद इत्यादि। सफेद फूल के गुलाब को सेवती कहते हैं। कहीं कहीं हरे और काले रंग के भी फूल होते हैं। लता की तरह चढ़नेवाले गुलाब के झड़ भी होते हैं जो बगीचों में टट्टियों पर चढ़ाए जाते हैं। ऋतु के अनुसार गुलाब के दो भेद भारतबर्ष में माने जाने हैं सदागुलाब और चैती। सदागुलाब प्रत्येक ऋतु में फूलता और चैती गुलाब केवल बसंत ऋतु में। चैती गुलाब में विशेष सुगंध होती है और वही इत्र और दवा के काम का समझ जाता है।

भारतवर्ष में जो चैती गुलाब होते है वे प्रायः बसरा या दमिश्क जाति के हैं। ऐसे गुलाब की खेती गाजीपुर में इत्र और गुलाबजल के लिये बहुत होती है। एक बीघे में प्रायः हजार पौधे आते हैं जो चैत में फूलते है। बड़े तड़के उनके फूल तोड़ लिए जाते हैं और अत्तारों के पास भेज दिए जाते हैं। वे देग और भभके से उनका जल खींचते हैं। देग से एक पतली बाँस की नली एक दूसरे बर्तन में गई होती है जिसे भभका कहते हैं और जो पानी से भरी नाँद में रक्खा रहता है। अत्तार पानी के साथ फूलों को देग में रख देते है जिसमें में सुगंधित भाप उठकर भभके के बर्तन में सरदी से द्रव होकर टपकती है। यही टपकी हुई भाप गुलाबजल है।

गुलाब का इत्र बनाने की सीधी युक्ति यह है कि गुलाबजल को एक छिछले बरतन में रखकर बरतन को गोली जमीन में कुछ गाड़कर रात भर खुले मैदान में पडा़ रहने दे। सुबह सर्दी से गुलाबजल के ऊपर इत्र की बहुत पतली मलाई सी पड़ी मिलेगी जिसे हाथ से काँछ ले। ऐसा कहा जाता है कि गुलाब का इत्र नूरजहाँ ने १६१२ ईसवी में अपने विवाह के अवसर पर निकाला था।

भारतवर्ष में गुलाब जंगली रूप में उगता है पर बगीचों में दह कितने दिनों से लगाया जाता है। इसका ठीक पता नहीं लगता। कुछ लोग 'शतपत्री', 'पाटलि' आदि शब्दों को गुलाब का पर्याय मानते है। रशीउद्दीन नामक एक मुसलमान लेखक ने लिखा है कि चौदहवीं शताब्दी में गुजरात में सत्तर प्रकार के गुलाब लगाए जाते थे। बाबर ने भी गुलाब लगाने की बात लिखी है। जहाँगीर ने तो लिखा है कि हिंदुस्तान में सब प्रकार के गुलाब होते है।

इतिहास में

इतिहास में वर्णन मिलता है कि असीरिया की शाहजादी पीले गुलाब से प्रेम करती थी और मुगल बेगम नूरजहाँ को लाल गुलाब अधिक प्रिय था। मुगलानी जेबुन्निसा अपनी फारसी शायरी में कहती है ‘मैं इतनी सुन्दर हूँ कि मेरे सौन्दर्य को देखकर गुवाब के रंग फीके पड़ जाते हैं।‘ रजवाडे़ गुलाब के बागीचे लगवाते थे। सीरिया के बाशाद गुलाबों का बाग स्थापित करते थे। पं॰ जवाहर लाल नेहरू गुलाब के प्रतीक माने जाते हैं। यूरोप के दो देशों का राष्ट्रीय पुष्प सफेद गुलाब और दूसरे देश का राष्ट्रीय पुष्प लाल गुलाब थे। दोनों देशों के बीच गुलाब युद्ध छिड़ गया था। इसके बावजूद यूरोप के कुछ देशों ने गुलाब को अपना राष्ट्रीय पुष्प घोषित किया है। राजस्थान की राजधानी जयपुर को गुलाबी नगर कहा जाता है। गुलाब के इत्र का आविष्कार नूरजहाँ ने किया था

 

खेती

एक आधुनिक शंकर गुलाब

ग्रामीण किसान गुलाब की खेती कर अपनी आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करते है।[2] भारत में सुगन्धित उद्योग और गुलाब की खेती पुरानी है परन्तु उत्पादन की दृष्टि से यह अन्य देशों जैसे कि बुलगारिया, टर्की, रुस, फ्रांस, इटली और चीन से काफी पिछड़ा हुआ है। भारत में उत्तर प्रदेश के हाथरस, एटा, बलिया, कन्नौज, फर्रुखाबाद, कानपुर, गाजीपुर, राजस्थान के उदयपुर (हल्दीघाटी), चित्तौड़, जम्मू और कश्मीर में, हिमाचल इत्यादि राज्यों में २ हजार हे० भूमि में दमिश्क प्रजाति के गुलाब की खेती होती है। यह गुलाब चिकनी मिट्टी से लेकर बलुई मिट्टी जिसका पी०एच० मान ७.०-८.५ तक में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। दमिश्क गुलाब शीतोष्ण और समशीतोष्ण दोनों ही प्रकार की जलवायु में अच्छी तरह उगाया जा सकता है। समशीतोष्ण मैदानी भागों में जहाँ पर शीत काल के दौरान अभिशीतित तापक्रम (चिल्ड ताप) तापक्रम लगभग १ माह तक हो वहाँ भी सफलतापूर्वक की जा सकती है।

पुष्प

गुलाब के पौधे में पुष्पासन जायांग से होता हुआ लम्बाई में वृद्धि करता है तथा पत्तियों को धारण करता है। हरे गुलाब के पुष्पत्र पत्ती की तरह दिखाई देते हैं। पुष्पासन छिछला, चपटा या प्याले का रूप धारण करता है। जायांग पुष्पासन के बीच में तथा अन्य पुष्पयत्र प्यालानुमा रचना की नेमि या किनारों पर स्थित होते हैं। इनमें अंडाशय अर्ध-अधोवर्ती तथा अन्य पुष्पयत्र अधोवर्ती कहलाते है। पांच अखरित या बहुत छोटे नखरवाले दल के दलफलक बाहर की तरफ फैले होते हैं। पंकेशर लंबाई में असमान होते है अर्थात हेप्लोस्टीमोनस. बहुअंडपी अंडाशय, अंडप संयोजन नहीं करते हैं तथा एक-दुसरे से अलग-अलग रहते हैं, इस अंडाशय को वियुक्तांडपी कहते हैं और इसमें एक अंडप एक अंडाशय का निर्माण करता है।

 

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चंपा की खेती

Tue, 04/24/2018 - 11:39

चम्पा 

चम्पा का वृक्ष दक्षिण- पूर्व एशिया (चीन, मलेशिया, सुमात्रा, जावा और भारत में प्राकृतिक रूप से) पाया जाता है। चम्पा का मूल उत्पत्ति स्थान भारत में पूर्वी हिमालय तथा अन्य पड़ोसी देशों में इंडोनोशिया को माना जाता है। चम्पा निकारगोवा और लाओस देशों का राष्ट्रीय फूल है। चम्पा के वृक्षों का उपयोग घर, पार्क, पार्किग स्थल और सजावटी पौधे के रूप में किया जाता है।

भारतीय संस्कृति में-

चम्पा के खूबसूरत, मन्द, सुगन्धित हल्के सफेद, पीले फूल अक्सर पूजा में उपयोग किये जाते हैं। चम्पा का वृक्ष मन्दिर परिसर और आश्रम के वातावरण को शुद्ध करने के लिए लगाया जाता है। हिन्दू पौराणिक कथाओं में एक कहावत है कि ’’चम्पा तुझमें तीन गुण-रंग रूप और वास, अवगुण तुझमें एक ही भँवर न आयें पास’’। 
रूप तेज तो राधिके, अरु भँवर कृष्ण को दास, इस मर्यादा के लिये भँवर न आयें पास।।
चम्पा में पराग नहीं होता है। इसलिए इसके पुष्प पर मधुमक्खियाँ कभी भी नहीं बैठती हैं, लेकिन इसके बीज पक्षियों कोबहुत आकर्षित करते हैं। कहा जाता है, कि चम्पा को राधिका और कृष्ण को भँवर और मधुमक्खियों को कृष्ण के दास-दासी के रूप में माना गया है। राधिका कृष्ण की सखी होने के कारण मधुमक्खियाँ चम्पा के वृक्ष पर कभी नहीं बैठती हैं। चम्पा को कामदेव के पाँच फूलों में गिना जाता है। देवी माँ ललिता अम्बिका के चरणों में भी चम्पा के फूल को अन्य फूलों जैसे- अशोक, पुन्नाग के साथ सजाया जाता है। पुन्नाग प्रजाति के फूल का सम्बन्ध भगवान विष्णु से माना जाता है। रविन्द्रनाथ टैगोर ने इसे अमर फूल कहा है। चम्पा का वृक्ष वास्तु की दृष्टि से सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। इसी कारण दक्षिणी एशिया के बौद्ध मंदिरों में ये बहुतायत से पाए जाते हैं।

विदेशी संस्कृति में-

बांग्लादेश में इसके पुष्प को मृत्यु से जोड़ा जाता है। अनेक स्थानीय लोक-मान्यताओं में चम्पा का भूत-प्रेत और राक्षसों को आश्रय प्रदान करने वाला वृक्ष माना जाता है। इसकी सुगन्ध को मलय लोक कथाओं में एक पिशाच से सम्बन्धित माना गया है। फिलीपीन्स में, जहाँ इसे कालाचूची कहते हैं इसे मृत आत्माओं से संबंधित माना गया है,  इसकी कुछ प्रजातियों को कब्रिस्तानों में लगाया जाता है। फीजी आदि द्वीप समूह के देशों में महिलाओं द्वारा इसके फूल को रिश्ते के संकेत के रूप में कानों में धारण किया जाता है। दाहिने कान में पहनने का मतलब रिश्ते की माँग और बाँये कान में पहनने का मतलब रिश्ता मिल गया है।

 
विभिन्न भाषाओ में चंपा के' नाम

भारतीय भाषाओं में देखें तो चंपा को मराठी में सोनचम्पा, तमिल में चम्बुगम या चम्बुगा, मणिपुरी में लिहाओ, तेलगु में चम्पानजी, कन्नड चम्पीजे, बगाली में चंपा, शिंगली सपु,  उड़िया में चोम्पो,  इण्डोनेशियाई में कम्पक, कोंकणीं में पुड़चम्पो, असमिया में तितान्सोपा तथा संस्कृत चम्पकम् कहते हैं। विदेशी भाषाओं में अंग्रेजी में इसे प्लूमेरिया अल्बा या फ्रेंजीपानी, स्पैनिश में चम्पका, बर्मी में मवाक-सम-लग, चीनी में चाय-पा, थाई में चम्पा या खोओ तथा फ्रेंच इलांग- इंलग कहते हैं।

वानस्पतिक विवरण-

 

चम्पा मैग्नोलिशिया परिवार का उष्ण-कटिबन्धीय झाड़ियों और छोटे पेड़, पौधे जगत में ९५ (अरब) वर्ष पहले अस्तित्व में आया। चम्पा की लगभग ४० प्रजातियाँ उष्ण-कटिबन्धीय और उपउष्ण-कटिबन्धीय क्षेत्रों में पायी जाती हैं। इसके सदाबहार वृक्ष सामान्यतः १८ से २१ मी. लम्बे होते हैं। इसकी खुशबू अत्यन्त मादक होती है। इसके पौधों को बोनसाई के रूप में बनाकर घर के भीतर के वातावरण को सुगन्धित किया जाता है। इसके वृक्ष अर्धपर्ण पाती छोटे से मध्यम आकार के होते है। पेड़ की छाल, सतह चिकनी, भूरे रंग की सफेद भीतरी छाल रेशेदार होती है। पत्तियाँ, सामान्य पूर्ण और गोले के आकार में व्यवस्थित होती हैं। पत्तियाँ डण्डलों से मुक्त होती हैं। पेड़ फूल और फल वर्ष भर देते है। फूलों का परागण कीटों (बीटल) द्वारा होता है। जो पराग (दलपुंज) से निकलता है। कीटों के लिए उपयुक्त आहार होता है। 

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सूरजमुखी की खेती

Tue, 04/24/2018 - 11:25

सूरजमुखी

सूरजमुखी की खेती खरीफ, रबी, एवं जायद तीनो ही मौसम में की जा सकती है, लेकिन खरीफ में इस पर अनेक रोगों एवं कीटो का प्रकोप होने के कारण फूल छोटे होते है, तथा दाना कम पड़ता हैI जायद में सूरजमुखी की अच्छी उपज प्राप्त होती हैI इस कारण जायद में ही इसकी खेती ज्यादातर की जाती हैI

वायुजल और भूमि

सूरजमुखी की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु  और भूमि की आवश्यकता पड़ती है?

सूरजमुखी की खेती खरीफ रबी जायद तीनो मौसम में की जा सकती हैI फसल पकते  समय शुष्क जलवायु की अति आवश्यकता पड़ती हैI सूरजमुखी की खेती अम्लीय एवम क्षारीय भूमि को छोड़कर सिंचित दशा वाली सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है, लेकिन दोमट भूमि सर्वोतम मानी जाती हैI

 

प्रजातियाँ

उन्नतशील प्रजातियाँ कौन कौन सी होती है, जिन्हें हमें खेत में बोना चाहिए?

इसमे मख्य रूप से दो प्रकार की प्रजातियाँ पायी जाती हैI एक तो सामान्य या  संकुल प्रजातियाँ इसमे मार्डन और सूर्य पायी जाती हैI दूसरा संकर प्रजातियाँ इसमे के बी एस एच-1 और एस एच 3322 एवं ऍफ़ एस एच-17 पाई जाती हैI

 

खेत की तैयारी

सूरजमुखी की फसल के लिए खेतो की तैयारी हमारे किसान भाई किस प्रकार करें?

खेत की तयारी में जायद के मौसम में प्राप्त नमी न होने पर खेत को पलेवा करके जुताई करनी चाहिएI एक जुताई मिटटी पलटने वाले हल से तथा बाद में 2 से 3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए मिटटी भुरभुरी कर लेना चाहिए, जिससे की नमी सुरक्षित बनी रह सकेI

 

बुवाई का समय

बुवाई का सही समय क्या है और किस विधि से ये बोये जाते है?

जायद में सूरजमुखी की बुवाई का सर्वोत्तम समय फरवरी का दूसरा पखवारा है इस समय बुवाई करने पर मई के अंत पर जून के प्रथम सप्ताह तक फसल पक कर तैयार हो जाती है, यदि देर से बुवाई की जाती  है तो पकाने पर बरसात शुरू हो जाती है और दानो का नुकसान हो जाता है, बुवाई लाइनों में हल के पीछे 4 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर करनी चाहिएI लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटी मीटर तथा पौध से पौध की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर रखनी चाहिएI

 

बीज की मात्रा

सूरजमुखी की बुवाई में प्रति हेक्टयर बीज की कितनी मात्रा लगती है, और इनका शोधन किस प्रकार करे?

बीज की मात्रा अलग अलग पड़ती है, जैसे की संकुल या सामान्य प्रजातियो  में 12 से 15 किलो ग्राम प्रति हैक्टर बीज लगता है और संकर प्रजातियो में 5 से 6 किलो ग्राम प्रति हैक्टर बीज लगता हैI यदि बीज की जमाव गुणवता 70% से कम हो तो बीज की मात्रा बढ़ाकर बुवाई करना चाहिए, बीज को बुवाई से पहले 2 से 2.5 ग्राम थीरम प्रति किलो ग्राम बीज को शोधित करना चाहिएI बीज को बुवाई से पहले रात में 12 घंटा भिगोकर सुबह 3 से 4 घंटा छाया में सुखाकर सायं 3 बजे के बाद बुवाई करनी चाहिए जायद के मौसम में I

 

सिंचाई का समय

सूरजमुखी की फसल में सिचाई कब और कैसे करनी चाहिए?

पहली सिचाई बुवाई के 20 से 25 दिन बाद हल्की या स्प्रिकलर से करनी चाहिएI बाद में आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अन्तराल पर सिचाई करते रहना चाहिएI कुल 5 या  6 सिचाइयो की आवश्यकता पड़ती हैI फूल निकलते समय दाना भरते समय बहुत हल्की सिचाई की आवश्यकता पड़ती हैI जिससे पौधे जमीन में गिरने न पाए क्योकि जब दाना पड जाता है तो सूरजमुखी के फूल के द्वारा बहुत ही पौधे पर वजन आ जाता है जिससे की गिर सकता है गहरी सिचाई करने सेI

 

निराइ एवं गुड़ाई

फसल की निराई गुड़ाई कब करनी चाहिए और उसमे खरपतवारो  का नियत्रण हमारे किसान भाई किस प्रकार करें?

बुवाई के 20 से 25 दिन बाद पहली सिचाई के बाद ओट आने के बाद निराई गुड़ाई करना अति आवश्यक है, इससे खरपतवार भी नियंत्रित होते हैI रसायनो द्वारा खरपतवार नियत्रण हेतु पेंडामेथालिन 30 ई सी की 3.3 लीटर मात्रा 600 से 800 लीटर पानी घोलकर प्रति हैक्टर की दर से बुवाई के 2-3 दिन के अन्दर छिडकाव करने से खरपतवारो का जमाव नहीं होता हैI

 

मिट्टी की मात्रा

सूरजमुखी की फसल में पौधों पर कब, कैसे और कितनी मिट्टी चढानी चाहिए, ताकि उनका संतुलन बना रहे?

सूरजमुखी का फूल बहुत ही बड़ा होता है इससे पौधा गिराने का भय बना रहता है इसलिए नत्रजन की टापड्रेसिंग करने के बाद एक बार पौधों पर 10 से 15 सेंटीमीटर ऊँची मिट्टी चढाना अति आवश्यक है जिससे पौधे गिरते नहीं हैI

 

परिषेचन की क्रिया

सूरजमुखी में परिषेचन की क्रिया कब करनी चाहिए किन साधनों के द्वारा करना चाहिए?

सूरजमुखी एक परिषेचित फसल है इसमे परिषेचन क्रिया अति आवश्यक है यदि परिषेचन क्रिया नहीं हो पाती तो पैदावार बीज न बन्ने के कारण कम हो जाती है इसलिए परिषेचन क्रिया स्वतः भवरो, मधुमक्खियो तथा हवा आदि के द्वारा होती रहती है फिर ही अच्छी पैदावार हेतु  अच्छी तरह फूलो, फुल आने के बाद हाथ में दस्ताने पहनकर या रोयेदार कपडा लेकर फसल के मुन्दको अर्थात फूलो पर चारो ऒर धीरे से घुमा देने से परिषेचन की क्रिया हो जाती है यह क्रिया प्रातः 7 से 8 बजे के बीच में कर देनी चाहिएI

 

फसल सुरक्षा

सूरजमुखी की फसल में फसल सुरक्षा किस प्रकार करें?

सूरजमुखी में कई प्रकार के कीट लगते है जैसे की दीमक हरे फुदके डसकी बग आदि हैI इनके नियंत्रण के लिए कई प्रकार के रसायनो का भी प्रयोग किया जा सकता हैI मिथाइल ओडिमेंटान 1 लीटर 25 ई सी या फेन्बलारेट 750 मिली लीटर प्रति हैक्टर 800 से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिएI

 

कटाई और मड़ाई

सूरजमुखी की फसल की कटाई और मड़ाई करने का सही समय क्या है कब करनी चाहिए?

जब सूरजमुखी के बीज कड़े हो जाए तो मुन्डको की कटाई करके या फूलो के कटाई करके एकत्र कर लेना चाहिए तथा इनको छाया में सुख लेना चाहिए इनको ढेर बनाकर नहीं रखना चाहिए इसके बाद डंडे से पिटाई करके बीज निकल लेना चाहिए साथ ही  सूरजमुखी थ्रेशर का प्रयोग करना उपयुक्त होता हैI

 

भण्डार

फसल प्राप्त होने के पश्चात उसका भण्डारण हम किस प्रकार  करें?

बीज निकलने के बाद अच्छी तरह सुख लेना चाहिए बीज में 8 से 10% नमी से आधिक नहीं रहनी चाहिएI बीजो से 3 महीने के अन्दर तेल निकल लेना चाहिए अन्यथा तेल में कड़वाहट आ जाती है, अर्थात पारिस्थिकी के अंतर्गत भंडारण किया जा सकता हैI

सूरजमुखी की फसल से कितनी पैदावार प्राप्त हो जाती है?दोनों तरह की प्रजातियों की पैदावार अलग- अलग होती हैI संकुल या सामान्य  प्रजातियों की पैदावार 12 से 15 कुन्तल प्रति हैक्टर होती है तथा संकर प्रजातियों की पैदावार 20 से 25 कुन्तल प्रति हैक्टर प्राप्त होती हैI

 

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गुड्हेल की खेती

Tue, 04/24/2018 - 11:17

गुड़हल

गुड़हल या जवाकुसुम वृक्षों के मालवेसी परिवार से संबंधित एक फूलों वाला पौधा है। इसका वनस्पतिक नाम है- हीबीस्कूस् रोज़ा साइनेन्सिस। इस परिवार के अन्य सदस्यों में कोकोकपासभिंडी और गोरक्षी आदि प्रमुख हैं। यह विश्व के समशीतोष्ण, उष्णकटिबंधीय और अर्द्ध उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। गुडहल जाति के वृक्षों की लगभग २००–२२० प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से कुछ वार्षिक तथा कुछ बहुवार्षिक होती हैं। साथ ही कुछ झाड़ियाँ और छोटे वृक्ष भी इसी प्रजाति का हिस्सा हैं। 

आकार

गुड़हल की पत्तियाँ प्रत्यावर्ती, सरल, अंडाकार या भालाकार होती हैं और अक्सर इनके किनारे दंतीय होते हैं। फूल आकार में बड़े, आकर्षक, तुरही के आकार के होते हैं। प्रत्येक पुष्प में पाँच या इससे अधिक पंखुड़ियाँ होती हैं। इन पंखुडियों का रंग सफेद से लेकर गुलाबी, लाल, पीला या बैंगनी भी हो सकता है और इनकी चौडाई ४-५ सेमी तक होती है। इसका फल सूखा और पंचकोणीय होता है जिसकी हर फाँक में बीज होते हैं। फल के परिपक्व होने पर यह अपने आप फूटता है और बीज बाहर आ जाते हैं

जवा एक पूर्ण एवं नियमित पुष्प का उदाहरण है। पुष्प के चारो भाग पुटचक्र, दलचक्र, पुमंग तथा जायांग इसमें पाएँ जाते हैं। पुटचक्र संख्या में पाँच तथा युक्तनिदल होते हैं। पुटचक्र के नीचे स्थित निपत्रों के चक्र को अनुबाह्यदल कहते हैं। दलचक्र पाँच एवं पृथकदल होते हैं परन्तु ये आधारतल पर कुछ दूर तक जुड़ा हुए होते हैं।. दलपत्रों की संख्या पाँच होती है। दलपत्रों का व्यास 4 से लेकर 15 सेंटीमीटर तक होता है। विभिन्न प्रजातियों के दलपत्र विभिन्न रंगों के एवं आकर्षक होते हैं। पुमंग अनेक एवं एकसंलाग होते हैं। तंतु संयुक्त होकर एक नली बनाते हैं परंतु परागशय अलग होते हैं। परागशय का आकार वृक्क के समान होता है। जायांग पाँच एवं प्रत्येक अंडप के अंतिम भाग में एक वर्तिकाग्र होते हैं

औषधीय उपयोग

भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के अनुसार सफेद गुड़हल की जड़ों को पीस कर कई दवाएँ बनाई जाती हैं। मेक्सिको में गुड़हल के सूखे फूलों को उबालकर बनाया गया पेय एगुआ डे जमाईका अपने रंग और तीखे स्वाद के लिये काफी लोकप्रिय है। अगर इसमें चीनी मिला दी जाय तो यह क्रैनबेरी के रस की तरह लगता है। डायटिंग करने वाले या गुर्दे की समस्याओं से पीडित व्यक्ति अक्सर इसे बर्फ के साथ पर बिना चीनी मिलाए पीते हैं, क्योंकि इसमें प्राकृतिक मूत्रवर्धक गुण होते हैं। ताइवान के चुंग शान मेडिकल यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि गुड़हल के फूल का अर्क दिल के लिए उतना ही फायदेमंद है जितना रेड वाइन और चाय। इस फूल में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने में मददगार होते हैं। विज्ञानियों के मुताबिक चूहों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि गुड़हल (हीबीस्कूस्) का अर्क कोलेस्ट्राल को कम करने में सहायक है।

पुष्प

जवा एक पूर्ण एवं नियमित पुष्प का उदाहरण है। पुष्प के चारो भाग पुटचक्र, दलचक्र, पुमंग तथा जायांग इसमें पाएँ जाते हैं। पुटचक्र संख्या में पाँच तथा युक्तनिदल होते हैं। पुटचक्र के नीचे स्थित निपत्रों के चक्र को अनुबाह्यदल कहते हैं। दलचक्र पाँच एवं पृथकदल होते हैं परन्तु ये आधारतल पर कुछ दूर तक जुड़ा हुए होते हैं।. दलपत्रों की संख्या पाँच होती है। दलपत्रों का व्यास 4 से लेकर 15 सेंटीमीटर तक होता है। विभिन्न प्रजातियों के दलपत्र विभिन्न रंगों के एवं आकर्षक होते हैं। पुमंग अनेक एवं एकसंलाग होते हैं। तंतु संयुक्त होकर एक नली बनाते हैं परंतु परागशय अलग होते हैं। परागशय का आकार वृक्क के समान होता है। जायांग पाँच एवं प्रत्येक अंडप के अंतिम भाग में एक वर्तिकाग्र होते हैं

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