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Updated: 22 hours 40 min ago

काजू की खेती

Wed, 04/18/2018 - 12:43

परिचय

विदेशी मुद्रा प्राप्त करने वाली भारत की एक प्रमुख फसल है। वैसे तो काजू की व्यवसायिक एवं बड़े पैमाने पर खेती केरल, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा एवं पं. बंगाल में की जाती है परन्तु झारखंड राज्य के कुछ जिले जो बंगाल और उड़ीसा से सटे हुए है वहाँ पर भी इसकी खेती की विपुल सम्भावनाएँ हैं। प्राय: देखा गया है कि राज्य के पूर्वी सिंहभूम, पं. सिंहभूम, सरायकेला खरसावाँ एवं अन्य कुछ जिलों में काजू के देशी प्रजातियों के पौधे पाये जाते है। इन पौधों से बहुत गुणवत्ता के काजू नट तो नहीं पैदा होते हैं परन्तु इससे एक संकेत जरुर मिलता है कि यदि इन क्षेत्रों में काजू की उन्नत किस्मों के बागीचे लगाये जाएं एवं उनका सही तरीके से देख-रेख एवं रख-रखाव किया जाय तो झारखंड से भी काजू का निर्यात सम्भव है। प्रस्तुत अध्याय में काजू की व्यवसायिक खेती के कुछ पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है।

 

भूमि एवं जलवायु

काजू एक उष्ण कटिबन्धीय फसल है जो गर्म एवं उष्ण जलवायु में अच्छी पैदावार देता है। जिन क्षेत्रों में पाला पड़ने की सम्भावना होती है या लम्बे समय तक सर्दी पड़ती है वहाँ पर इसकी खेती प्रभावित होती है। 700 मी. ऊँचाई वाले क्षेत्र जहाँ पर तापमान 200 सें.ग्रे. से ऊपर रहता है काजू की अच्छी उपज होती है। 600-4500 मि.मी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र के लिए उपयुक्त माने गये है। काजू को अनेक प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है परन्तु समुद्र तटीय प्रभाव वाले लाल एवं लेटराइट मिट्टी वाले भू-भाग इसकी खेती के लिए ज्यादा उपयुक्त होते है। झारखंड राज्य के पूर्वी एवं पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला खरसावाँ जिले काजू की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त पाये गये हैं। इन जिलों की मिट्टी एवं जलवायु काजू की खेती के लिए उपयुक्त हैं।

 

उन्नत किस्में

विभिन्न राज्यों के लिए काजू की उन्नत किस्मों की संस्तुति राष्ट्रीय काजू अनुसंधान केंद्र (पुत्तूर) द्वारा की गई है। इसके अनुसार वैसे तो झारखंड राज्य के लिए किस्मों की संस्तुति नहीं है परन्तु जो किस्में उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बंगाल एवं कर्नाटक के लिए उपयुक्त है उनकी खेती झारखंड राज्य में भी की जा सकती है। क्षेत्र के लिए काजू की प्रमुख किस्में वेगुरला-4, उल्लाल-2, उल्लाल-4, बी.पी.पी.-1, बी.पी.पी.-2, टी.-40 आदि है।

 

खेती की तैयारी

काजू की खेती के लिए सर्वप्रथम खेत की झाड़ियों तथा घासों को साफ़ करके खेत की 2-3 बार जुताई कर दें। झाड़ियों की जड़ों को निकाल कर खेत को बराबर कर दें। जिससे नये पौधों को प्रारम्भिक अवस्था में पनपने में कोई कठिनाई न हो।

काजू के पौधों को 7-8 मी. की दूरी पर वर्गाकार विधि में लगाते हैं। अत: खेत की तैयारी के बाद अप्रैल-मई के महीने में निश्चित दूरी पर 60x 60 x 60 सें.मी. आकार के गड्ढे तैयार कर लेते हैं। अगर जमीन में कड़ी परत है तो गड्ढे के आकार को आवश्यकताअनुसार बढ़ाया जा सकता है। गड्ढों की 15-20 दिन तक खुला छोड़ने के बाद 5 कि.ग्रा. गोबर की खाद या कम्पोस्ट, 2 कि.ग्रा. रॉक फ़ॉस्फेट या डीएपी के मिश्रण को गड्ढे की ऊपरी मिट्टी में मिलाकर भर देते हैं। गड्ढों के आसपास ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि वहाँ पानी न रुके। अधिक सघनता से बाग़ लगाने के पौधों की दूरी 5x 5 या 4 x 4 मी. रखते हैं। शेष प्रक्रियाएं सामान्य ही रहती है।

पौध प्रसारकाजू के पौधों को साफ्ट वुड ग्राफ्टिंग विधि से तैयार किया जा सकता है। भेंट कलम द्वारा भी पौधों को तैयार कर सकते हैं। पौधा तैयार करने का उपयुक्त समय मई-जुलाई का महीना होता है।

 

रोपण पौध

काजू के पौधों को वर्षा काल में ही लगाने से अच्छी सफलता मिलती है। तैयार गड्ढों में पौधा रोपने के बाद थाला बना देते हैं तथा थालों में खरपतवार की समय-समय पर निकाई-गुड़ाई करते रहते हैं। जल संरक्षण के किए थालों में सूखी घास का पलवार भी बिछाते हैं।

 

खाद एवं उर्वरक

प्रत्येक वर्ष पौधों को 10-15 कि.ग्रा. गोबर की सही खाद, के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों की भी उपयुक्त मात्रा देनी चाहिए। प्रथम वर्ष में 300 ग्राम यूरिया, 200 ग्राम रॉक फास्फेट, 70 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति पौधा की दर से दें दूसरे वर्ष इसकी मात्रा दुगुनी कर दें और तीन वर्ष के बाद पौधोको 1 कि.ग्रा. यूरिया, 600 ग्रा. रॉक फास्फेट एवं 200 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति वर्ष मई-जून और सितम्बर-अक्टूबर के महीनों में आधा-आधा बांटकर देते रहे।

 

काट-छांट

काजू के पौधों को प्रारंभिक अवस्था में अच्छा ढांचा देने की जरूरत होती है अत: उपयुक्त काट-छांट के द्वारा पौधों को अच्छा ढांचा के तत्पश्चात फसल तोड़ाई के बाद सूखी, रोग एवं कीट ग्रसित तथा कैंची शाखाओं को काटते रहें।

 

पौध संरक्षण

काजू में ‘टी मास्कीटो बग’ की प्रमुख समस्या होती है। इसके वयस्क तथा नवजात नई कोपलों, मंजरों, फलों से रस चूसकर नुकसान पहुँचाते हैं। कभी-कभी इसकी समस्या इतनी गम्भीर हो जाती है कि इसके नियंत्रण के लिए पूरे क्षेत्र में एक साथ स्पेशल छिड़काव का प्रबंध करना पड़ता है। इसके नियंत्रण के लिए एक स्प्रे सिड्यूल बनाया गया है जो इस प्रकार है।

पहला स्प्रे – कल्ले आते समय – मोनोक्रोटोफास (0.05 प्रतिशत) का

दूसरा स्प्रे – फूल आते समय – कर्वेरिल (0.1 प्रतिशत) का तथा

तीसरा स्प्रे – फल लगते समय – कार्वेरिल (0.1 प्रतिशत) का

 

फसल तोड़ाई एवं उपज

काजू में पूरे फल की तोड़ाई नहीं की जाती है केवल गिरे हुए नट को इक्ट्ठा किया जाता है और इसे धूप में, सुखाकर तथा जूट के बोरों में भरकर ऊँचे स्थान पर रख दिया जाता है। प्रत्येक पौधे से लगभग 8 किलोग्राम नट प्रतिवर्ष प्राप्त होता है। इस प्रकार एक हेक्टेयर में लगभग 10-15 क्विंटल काजू ने नट प्राप्त होते है। जिनको प्रसंस्करण के बाद खाने योग्य काजू प्राप्त होता है।

 

 

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Tags: काजू की खेती की जानकारीकाजू की खेती कैसे की जाती हैकाजू की खेती कहा होती हैकाजू के बीजकाजू का फलकाजू का पौधाCategory: खेती

काजू की खेती

Wed, 04/18/2018 - 12:43

परिचय

विदेशी मुद्रा प्राप्त करने वाली भारत की एक प्रमुख फसल है। वैसे तो काजू की व्यवसायिक एवं बड़े पैमाने पर खेती केरल, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा एवं पं. बंगाल में की जाती है परन्तु झारखंड राज्य के कुछ जिले जो बंगाल और उड़ीसा से सटे हुए है वहाँ पर भी इसकी खेती की विपुल सम्भावनाएँ हैं। प्राय: देखा गया है कि राज्य के पूर्वी सिंहभूम, पं. सिंहभूम, सरायकेला खरसावाँ एवं अन्य कुछ जिलों में काजू के देशी प्रजातियों के पौधे पाये जाते है। इन पौधों से बहुत गुणवत्ता के काजू नट तो नहीं पैदा होते हैं परन्तु इससे एक संकेत जरुर मिलता है कि यदि इन क्षेत्रों में काजू की उन्नत किस्मों के बागीचे लगाये जाएं एवं उनका सही तरीके से देख-रेख एवं रख-रखाव किया जाय तो झारखंड से भी काजू का निर्यात सम्भव है। प्रस्तुत अध्याय में काजू की व्यवसायिक खेती के कुछ पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है।

 

भूमि एवं जलवायु

काजू एक उष्ण कटिबन्धीय फसल है जो गर्म एवं उष्ण जलवायु में अच्छी पैदावार देता है। जिन क्षेत्रों में पाला पड़ने की सम्भावना होती है या लम्बे समय तक सर्दी पड़ती है वहाँ पर इसकी खेती प्रभावित होती है। 700 मी. ऊँचाई वाले क्षेत्र जहाँ पर तापमान 200 सें.ग्रे. से ऊपर रहता है काजू की अच्छी उपज होती है। 600-4500 मि.मी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र के लिए उपयुक्त माने गये है। काजू को अनेक प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है परन्तु समुद्र तटीय प्रभाव वाले लाल एवं लेटराइट मिट्टी वाले भू-भाग इसकी खेती के लिए ज्यादा उपयुक्त होते है। झारखंड राज्य के पूर्वी एवं पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला खरसावाँ जिले काजू की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त पाये गये हैं। इन जिलों की मिट्टी एवं जलवायु काजू की खेती के लिए उपयुक्त हैं।

 

उन्नत किस्में

विभिन्न राज्यों के लिए काजू की उन्नत किस्मों की संस्तुति राष्ट्रीय काजू अनुसंधान केंद्र (पुत्तूर) द्वारा की गई है। इसके अनुसार वैसे तो झारखंड राज्य के लिए किस्मों की संस्तुति नहीं है परन्तु जो किस्में उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बंगाल एवं कर्नाटक के लिए उपयुक्त है उनकी खेती झारखंड राज्य में भी की जा सकती है। क्षेत्र के लिए काजू की प्रमुख किस्में वेगुरला-4, उल्लाल-2, उल्लाल-4, बी.पी.पी.-1, बी.पी.पी.-2, टी.-40 आदि है।

 

खेती की तैयारी

काजू की खेती के लिए सर्वप्रथम खेत की झाड़ियों तथा घासों को साफ़ करके खेत की 2-3 बार जुताई कर दें। झाड़ियों की जड़ों को निकाल कर खेत को बराबर कर दें। जिससे नये पौधों को प्रारम्भिक अवस्था में पनपने में कोई कठिनाई न हो।

काजू के पौधों को 7-8 मी. की दूरी पर वर्गाकार विधि में लगाते हैं। अत: खेत की तैयारी के बाद अप्रैल-मई के महीने में निश्चित दूरी पर 60x 60 x 60 सें.मी. आकार के गड्ढे तैयार कर लेते हैं। अगर जमीन में कड़ी परत है तो गड्ढे के आकार को आवश्यकताअनुसार बढ़ाया जा सकता है। गड्ढों की 15-20 दिन तक खुला छोड़ने के बाद 5 कि.ग्रा. गोबर की खाद या कम्पोस्ट, 2 कि.ग्रा. रॉक फ़ॉस्फेट या डीएपी के मिश्रण को गड्ढे की ऊपरी मिट्टी में मिलाकर भर देते हैं। गड्ढों के आसपास ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि वहाँ पानी न रुके। अधिक सघनता से बाग़ लगाने के पौधों की दूरी 5x 5 या 4 x 4 मी. रखते हैं। शेष प्रक्रियाएं सामान्य ही रहती है।

पौध प्रसारकाजू के पौधों को साफ्ट वुड ग्राफ्टिंग विधि से तैयार किया जा सकता है। भेंट कलम द्वारा भी पौधों को तैयार कर सकते हैं। पौधा तैयार करने का उपयुक्त समय मई-जुलाई का महीना होता है।

 

रोपण पौध

काजू के पौधों को वर्षा काल में ही लगाने से अच्छी सफलता मिलती है। तैयार गड्ढों में पौधा रोपने के बाद थाला बना देते हैं तथा थालों में खरपतवार की समय-समय पर निकाई-गुड़ाई करते रहते हैं। जल संरक्षण के किए थालों में सूखी घास का पलवार भी बिछाते हैं।

 

खाद एवं उर्वरक

प्रत्येक वर्ष पौधों को 10-15 कि.ग्रा. गोबर की सही खाद, के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों की भी उपयुक्त मात्रा देनी चाहिए। प्रथम वर्ष में 300 ग्राम यूरिया, 200 ग्राम रॉक फास्फेट, 70 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति पौधा की दर से दें दूसरे वर्ष इसकी मात्रा दुगुनी कर दें और तीन वर्ष के बाद पौधोको 1 कि.ग्रा. यूरिया, 600 ग्रा. रॉक फास्फेट एवं 200 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति वर्ष मई-जून और सितम्बर-अक्टूबर के महीनों में आधा-आधा बांटकर देते रहे।

 

काट-छांट

काजू के पौधों को प्रारंभिक अवस्था में अच्छा ढांचा देने की जरूरत होती है अत: उपयुक्त काट-छांट के द्वारा पौधों को अच्छा ढांचा के तत्पश्चात फसल तोड़ाई के बाद सूखी, रोग एवं कीट ग्रसित तथा कैंची शाखाओं को काटते रहें।

 

पौध संरक्षण

काजू में ‘टी मास्कीटो बग’ की प्रमुख समस्या होती है। इसके वयस्क तथा नवजात नई कोपलों, मंजरों, फलों से रस चूसकर नुकसान पहुँचाते हैं। कभी-कभी इसकी समस्या इतनी गम्भीर हो जाती है कि इसके नियंत्रण के लिए पूरे क्षेत्र में एक साथ स्पेशल छिड़काव का प्रबंध करना पड़ता है। इसके नियंत्रण के लिए एक स्प्रे सिड्यूल बनाया गया है जो इस प्रकार है।

पहला स्प्रे – कल्ले आते समय – मोनोक्रोटोफास (0.05 प्रतिशत) का

दूसरा स्प्रे – फूल आते समय – कर्वेरिल (0.1 प्रतिशत) का तथा

तीसरा स्प्रे – फल लगते समय – कार्वेरिल (0.1 प्रतिशत) का

 

फसल तोड़ाई एवं उपज

काजू में पूरे फल की तोड़ाई नहीं की जाती है केवल गिरे हुए नट को इक्ट्ठा किया जाता है और इसे धूप में, सुखाकर तथा जूट के बोरों में भरकर ऊँचे स्थान पर रख दिया जाता है। प्रत्येक पौधे से लगभग 8 किलोग्राम नट प्रतिवर्ष प्राप्त होता है। इस प्रकार एक हेक्टेयर में लगभग 10-15 क्विंटल काजू ने नट प्राप्त होते है। जिनको प्रसंस्करण के बाद खाने योग्य काजू प्राप्त होता है।

 

 

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बादाम

Tue, 04/17/2018 - 14:47

बादाम

बादाम का पुष्पित पेड़

बादाम हालांकि एक मेवा होता है, किन्तु तकनीकी दृष्टि से यह बादाम के पेड़ के फल का बीज होता है। बादाम का पेड़ एक मध्यम आकार का पेड़ होता है और जिसमें गुलाबी और सफेद रंग के सुगंधित फूल लगते हैं। ये पेड़ पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसके तने मोटे होते हैं। इसके पत्ते लम्बे, चौड़े और मुलायम होते हैं। इसके फल के अन्दर की मिंगी को बादाम कहते हैं। बादाम के पेड़ एशिया में ईरान, ईराक, मक्का, मदीना, मस्कट, शीराज आदि स्थानों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।[1] इसके फल वानस्पतिक रूप से अष्ठिफल के रूप में जाने जाते हैं और उनमें एक बाह्य छिलका होता है तथा एक कठोर छाल के साथ अंदर एक बीज होता है। आमतौर पर बादाम बिना छिलके के ही मिलता है। इसका बीज निकालने के लिए छिलके को अलग करना होता है।[4] छिले हुए बादाम गेरुए या गहरे पीले रंग के होते हैं। बादाम दो प्रकार के होते हैं- मीठे और कड़वे। मीठा बादाम वह किस्म है जिसे लोग एक खाद्य उत्पाद के रूप में सीधे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खाते हैं। कड़वा बादाम मीठे बादाम से थोडा़ छोटा व चौडा़ होता है और मुख्य रूप से बादाम तेल निकालने के काम आता है तथा इसे खाद्य के रूप में उपयोग नहीं किया जाता है क्योंकि यह कुछ विषैला होता है।[1] बादाम के उपयोग की तीन मुख्य वैश्विक श्रेणियां हैं, चॉकलेट कॉन्फेक्शनरी, बेकरी और अल्पाहार।

विश्व में उत्पादन

 

२००५ में बादाम उत्पादन

संसार भर में हाल के वर्षों में छिलके के आधार पर बादाम का उत्पादन ७-८.५ लाख टन हुआ है। इसमें फसल और उत्पादन में २००५- ०९ के बीच निरंतर बढ़ोत्तरी देखी गई। प्रतिकूल मौसमी स्थितियों के कारण विशेषज्ञों द्वारा २००९-१० में उत्पादन में कमी आने का पूर्वानुमान है। वैश्विक बादाम उत्पादन में ८०% भाग के साथ अमेरिका मीठे बादामों का इकलौता सबसे बडा़ उत्पादक, ग्राहक और निर्यातक देश है। अमेरिकी उत्पादन का ९९% भाग अमेरिकी कैलिफोर्निया राज्य का है, जो मीठे बादामों का सबसे महत्वपूर्ण उत्पादक रहा है। यहां लगाया जाने वाली नॉनपरेल इकलौती सबसे बडी़ किस्म है। इसका उत्पादन कुल उपज का ३८% है।[4] इसके बाद कैमल (१२%), मोंटेरी (१०%), बट/पडरे (९%) और बट (८%) है। विश्व का सबसे बड़ा बादाम व्यापार करने वाला ब्ल्यु डॉयमंड ग्रोवर्स को-ऑपरेटिव है, जो कैलिफोर्निया में सैक्रामेंटो में स्थित है। ब्ल्यु डॉयमंड कैलिफोर्निया के दो तिहाई उत्पादकों के स्वामित्व वाला संगठन है और कैलिफोर्निया की एक तिहाई फसलों का विपणन करता है। छिलके के आधार पर वर्ष २००८-०९ में २६०००, १६०००, ९५००, ७९८००, १५०० और १२०० टन उत्पादन के साथ क्रमश: अन्य उत्पादक देश हैं – आस्ट्रेलिया, तुर्की, चिली, यूरोपीय संघ, चीन और भारत। यूरोपीय संघ में स्पेन इकलौता सबसे बडा़ उत्पादक है। पिछले कुछ वर्षों में (शेल्ड आधार पर) बादाम का वार्षिक व्यापार लगभग ४.६ लाख टन रहा है। वर्ष २००८-०९ में ४४०,०००, १२३०० और ६७०० टनों के निर्यात के साथ क्रमश: अमेरिका, आस्ट्रेलिया और चिली (शेल्ड आधार पर) मुख्य निर्यातक रहे हैं। वर्ष २००८-०९ में २००,००० टन, ४५,००० टन, २१,००० टन, १९,००० टन और १४,००० टन के क्रमश: आयात के साथ यूरोपीय संघ, भारत, जापान, कनाडा और टर्की साल २००८-०९ में प्रमुख आयातक रहे हैं।[4] कैलिफोर्नियाई फसल की सर्वोच्च कटाई की अवधि मध्य अगस्त से सितंबर तक रहती है, आस्ट्रेलियाई फसल की कटाई का समय फरवरी और अप्रैल के बीच होता है।

विभिन्न देशों में

 

बादाम का पुष्पित पेड़

बादाम का पेड़ भी आड़ू की तरह ही दिखता है और उसे भी आडू की समकूल परस्थिति में उगाया जाता है। बादाम आड़ू परिवार का ही फल है। बादाम का उल्लेख प्राचीन बाईबिल और प्राचीन यूनान के इतिहास में भी मिलता है। यूनानी इतिहास के अनुसार ३००० ईसा पूर्व भी वहां इसकी पैदावार होती थी। उसके १०० वर्ष बाद प्राचीन रोमवासीइसे अपने साथ इटली ले गए। इसे उन्होंने अपने राजा को उपहार स्वरूप दिया।[3] उसके बाद यह मिस्र से होता हुआ इंग्लैंड पहुंचा। स्पेन और इटली पहले ऐसे देशों में शामिल हैं जहां इसके लिये विपरीत जलवायु होने पर भी सबसे पहले बादाम निर्यातक देशों में गिने गये। इससे पहले बादाम के बारे में विश्व के लोग नहीं जानते थे। १७०० मध्यपूर्व से आज तक इसके उत्पादन में खूब बढोत्तरी हुई है और अनेक प्रतिकूल स्थानों पर भी यह आसानी से उगाया जा रहा है। सन १८०० के बाद बादाम की विभिन्न किस्मे भी खोजी गई हैं और उनमे कैलिफोर्निया से निर्यात होने वाली बादाम की किस्में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं।

 

भुने हुए बादाम गिरि

एशिया के भारत और जापान जैसे देशों में बादाम खूब उगाया जाता रहा है। भारत में इसकी उपयोगिता केवल भोजन के साथ ही बेहतर मानी जाती है लेकिन जापान में इसे चॉकलेट और दूध से बनने वाले विभिन्न उत्पतादों में कैल्शियम के सबसे मजबूत विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाता है। चीन में इसे सर्दियों में भूनकर खाया जाता है और नव वर्ष के अवसर पर यह उनका विशेष उपहार माना जाता है। यूरोप में इसे विवाह के अवसर पर ऐतिहासिक काल से प्रयोग किया जा रहा है और बच्चों के लिए इसे ख़ुशी और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है।[3]जर्मनी में बादाम का पेस्ट नाश्ते में प्रयोग किया जाता रहा है और इसे आइसक्रीम के बेकरी उत्पादों में प्रयोग किया जाता है। २०१० जनवरी में फ्रांस में बनने वाला पारम्परिक राजा का केक बादाम की विशेष क्रीम से बनाया गया था। इसे सोने के मुकुट के साथ बाजार में बेचा गया।

सेवन

बादाम को रोजाना सेवन किया जा सकता है। प्रतिदिन चौथाई कप या २२-२४ बादाम सेवन कर सकते हैं। अनेक शोधों से यह ज्ञात हुआ है, कि रोजाना उपरोक्त मात्रा में बादाम खाने से मोटापा नहीं होता है।[5] किन्तु कच्चे बादाम खाने से टायफाइड हो सकता है।[2] इस लिये हमेशा भुना हुआ, नमक के साथ या नमक के बिना, खाना चाहिये। बादाम का तेल, मालिश के लिये प्रयोग किया जाता है

बादाम का पुष्पित पेड़

बादाम हालांकि एक मेवा होता है, किन्तु तकनीकी दृष्टि से यह बादाम के पेड़ के फल का बीज होता है। बादाम का पेड़ एक मध्यम आकार का पेड़ होता है और जिसमें गुलाबी और सफेद रंग के सुगंधित फूल लगते हैं। ये पेड़ पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसके तने मोटे होते हैं। इसके पत्ते लम्बे, चौड़े और मुलायम होते हैं। इसके फल के अन्दर की मिंगी को बादाम कहते हैं। बादाम के पेड़ एशिया में ईरान, ईराक, मक्का, मदीना, मस्कट, शीराज आदि स्थानों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।[1] इसके फल वानस्पतिक रूप से अष्ठिफल के रूप में जाने जाते हैं और उनमें एक बाह्य छिलका होता है तथा एक कठोर छाल के साथ अंदर एक बीज होता है। आमतौर पर बादाम बिना छिलके के ही मिलता है। इसका बीज निकालने के लिए छिलके को अलग करना होता है।[4] छिले हुए बादाम गेरुए या गहरे पीले रंग के होते हैं। बादाम दो प्रकार के होते हैं- मीठे और कड़वे। मीठा बादाम वह किस्म है जिसे लोग एक खाद्य उत्पाद के रूप में सीधे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खाते हैं। कड़वा बादाम मीठे बादाम से थोडा़ छोटा व चौडा़ होता है और मुख्य रूप से बादाम तेल निकालने के काम आता है तथा इसे खाद्य के रूप में उपयोग नहीं किया जाता है क्योंकि यह कुछ विषैला होता है।[1] बादाम के उपयोग की तीन मुख्य वैश्विक श्रेणियां हैं, चॉकलेट कॉन्फेक्शनरी, बेकरी और अल्पाहार।

विश्व में उत्पादन

 

२००५ में बादाम उत्पादन

संसार भर में हाल के वर्षों में छिलके के आधार पर बादाम का उत्पादन ७-८.५ लाख टन हुआ है। इसमें फसल और उत्पादन में २००५- ०९ के बीच निरंतर बढ़ोत्तरी देखी गई। प्रतिकूल मौसमी स्थितियों के कारण विशेषज्ञों द्वारा २००९-१० में उत्पादन में कमी आने का पूर्वानुमान है। वैश्विक बादाम उत्पादन में ८०% भाग के साथ अमेरिका मीठे बादामों का इकलौता सबसे बडा़ उत्पादक, ग्राहक और निर्यातक देश है। अमेरिकी उत्पादन का ९९% भाग अमेरिकी कैलिफोर्निया राज्य का है, जो मीठे बादामों का सबसे महत्वपूर्ण उत्पादक रहा है। यहां लगाया जाने वाली नॉनपरेल इकलौती सबसे बडी़ किस्म है। इसका उत्पादन कुल उपज का ३८% है।[4] इसके बाद कैमल (१२%), मोंटेरी (१०%), बट/पडरे (९%) और बट (८%) है। विश्व का सबसे बड़ा बादाम व्यापार करने वाला ब्ल्यु डॉयमंड ग्रोवर्स को-ऑपरेटिव है, जो कैलिफोर्निया में सैक्रामेंटो में स्थित है। ब्ल्यु डॉयमंड कैलिफोर्निया के दो तिहाई उत्पादकों के स्वामित्व वाला संगठन है और कैलिफोर्निया की एक तिहाई फसलों का विपणन करता है। छिलके के आधार पर वर्ष २००८-०९ में २६०००, १६०००, ९५००, ७९८००, १५०० और १२०० टन उत्पादन के साथ क्रमश: अन्य उत्पादक देश हैं – आस्ट्रेलिया, तुर्की, चिली, यूरोपीय संघ, चीन और भारत। यूरोपीय संघ में स्पेन इकलौता सबसे बडा़ उत्पादक है। पिछले कुछ वर्षों में (शेल्ड आधार पर) बादाम का वार्षिक व्यापार लगभग ४.६ लाख टन रहा है। वर्ष २००८-०९ में ४४०,०००, १२३०० और ६७०० टनों के निर्यात के साथ क्रमश: अमेरिका, आस्ट्रेलिया और चिली (शेल्ड आधार पर) मुख्य निर्यातक रहे हैं। वर्ष २००८-०९ में २००,००० टन, ४५,००० टन, २१,००० टन, १९,००० टन और १४,००० टन के क्रमश: आयात के साथ यूरोपीय संघ, भारत, जापान, कनाडा और टर्की साल २००८-०९ में प्रमुख आयातक रहे हैं।[4] कैलिफोर्नियाई फसल की सर्वोच्च कटाई की अवधि मध्य अगस्त से सितंबर तक रहती है, आस्ट्रेलियाई फसल की कटाई का समय फरवरी और अप्रैल के बीच होता है।

विभिन्न देशों में

 

बादाम का पुष्पित पेड़

बादाम का पेड़ भी आड़ू की तरह ही दिखता है और उसे भी आडू की समकूल परस्थिति में उगाया जाता है। बादाम आड़ू परिवार का ही फल है। बादाम का उल्लेख प्राचीन बाईबिल और प्राचीन यूनान के इतिहास में भी मिलता है। यूनानी इतिहास के अनुसार ३००० ईसा पूर्व भी वहां इसकी पैदावार होती थी। उसके १०० वर्ष बाद प्राचीन रोमवासीइसे अपने साथ इटली ले गए। इसे उन्होंने अपने राजा को उपहार स्वरूप दिया।[3] उसके बाद यह मिस्र से होता हुआ इंग्लैंड पहुंचा। स्पेन और इटली पहले ऐसे देशों में शामिल हैं जहां इसके लिये विपरीत जलवायु होने पर भी सबसे पहले बादाम निर्यातक देशों में गिने गये। इससे पहले बादाम के बारे में विश्व के लोग नहीं जानते थे। १७०० मध्यपूर्व से आज तक इसके उत्पादन में खूब बढोत्तरी हुई है और अनेक प्रतिकूल स्थानों पर भी यह आसानी से उगाया जा रहा है। सन १८०० के बाद बादाम की विभिन्न किस्मे भी खोजी गई हैं और उनमे कैलिफोर्निया से निर्यात होने वाली बादाम की किस्में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं।

भुने हुए बादाम गिरि

एशिया के भारत और जापान जैसे देशों में बादाम खूब उगाया जाता रहा है। भारत में इसकी उपयोगिता केवल भोजन के साथ ही बेहतर मानी जाती है लेकिन जापान में इसे चॉकलेट और दूध से बनने वाले विभिन्न उत्पतादों में कैल्शियम के सबसे मजबूत विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाता है। चीन में इसे सर्दियों में भूनकर खाया जाता है और नव वर्ष के अवसर पर यह उनका विशेष उपहार माना जाता है। यूरोप में इसे विवाह के अवसर पर ऐतिहासिक काल से प्रयोग किया जा रहा है और बच्चों के लिए इसे ख़ुशी और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है।[3]जर्मनी में बादाम का पेस्ट नाश्ते में प्रयोग किया जाता रहा है और इसे आइसक्रीम के बेकरी उत्पादों में प्रयोग किया जाता है। २०१० जनवरी में फ्रांस में बनने वाला पारम्परिक राजा का केक बादाम की विशेष क्रीम से बनाया गया था। इसे सोने के मुकुट के साथ बाजार में बेचा गया।

सेवन

बादाम को रोजाना सेवन किया जा सकता है। प्रतिदिन चौथाई कप या २२-२४ बादाम सेवन कर सकते हैं। अनेक शोधों से यह ज्ञात हुआ है, कि रोजाना उपरोक्त मात्रा में बादाम खाने से मोटापा नहीं होता है।[5] किन्तु कच्चे बादाम खाने से टायफाइड हो सकता है।[2] इस लिये हमेशा भुना हुआ, नमक के साथ या नमक के बिना, खाना चाहिये। 

 

 

 

 

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इलायची की खेती

Tue, 04/17/2018 - 13:31

 

इलायची की जैविक खेती

 

छोटी इलायची एक मध्य पूर्व के बाजार में मसाले के बाद की मांग की है। यह केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में खेती की जाती है। भारत इलायची के छोटे cardamom.In जैविक खेती का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, का पालन किया जाना तरीकों के प्रयोजन के लिए निर्धारित मानकों के अनुरूप होना चाहिए। विस्तृत कम से कम 25 मीटर की अलगाव बेल्ट सभी पारंपरिक वृक्षारोपण भर से छोड़ा जा सकता है। इस क्षेत्र से उपज जैविक रूप में इलाज नहीं किया जाएगा। तीन साल के एक रूपांतरण अवधि जैविक खेती के लिए एक मौजूदा वृक्षारोपण के लिए आवश्यक है। Replanted और नए लगाए क्षेत्रों के लिए, चौथे वर्ष से उपज के बाद ही जैविक उत्पाद के रूप में विचार किया जाएगा। बवाल उत्पादित रोपण सामग्री का इस्तेमाल कर रहे हैं तो कम से कम दो साल पहले रोपण करने के लिए क्षेत्र में किसी भी अकार्बनिक सामग्री के उपयोग के बिना बीत चुके हैं और अगर इस तरह के एक फसल से उपज जैविक रूप में विचार किया जाएगा। कुंवारी भूमि और कोई रासायनिक आदानों अतीत में लागू किया गया है, जिसमें खेतों में खेती के मामले में, रूपांतरण अवधि छूट दी जा सकती है। जंगल में उपलब्ध जंगली इलायची पौधों के मामले में, पूरे उपज जैविक रूप में माना जा सकता है।

रोपण सामग्री

किसी भी अभिजात वर्ग के बागान से एकत्र किया जा सकता है। हालांकि, तरीकों कार्बनिक मानकों के अनुरूप होना चाहिए अंकुरों को ऊपर उठाने के लिए पीछा किया। Rhizomes सामग्री रोपण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहे हैं, वृक्षारोपण कम से कम एक वर्ष पूर्व संग्रह करने के लिए उत्पादन की जैविक विधियों का पालन किया जाना चाहिए था। टिशू कल्चर पौधे प्रचार के प्राकृतिक तरीकों के साथ निष्ठा रखने के क्रम में रोपण सामग्री के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। बीज के एसिड उपचार ट्राइकोडर्मा संस्कृति (बीज के 100 ग्राम के लिए 50 मिलीलीटर बीजाणु निलंबन) के साथ बीज का उपचार नर्सरी सड़ांध रोगों के प्रबंधन के लिए एक रोगनिरोधी उपाय के रूप में वांछनीय है, बचा जाना चाहिए। बेड की तैयारी के समय, VAM का समावेश किया जा सकता है की सिफारिश की जैविक माध्यम में गुणा। 1: कार्बनिक पदार्थ में समृद्ध 1 मिट्टी, अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर या वर्मीकम्पोस्ट और रेत polybag के अंकुर (अधिमानतः जैव degradable polybags) जुटाने के लिए, potting मिश्रण 3 का उपयोग करके तैयार किया जा सकता है। इस VAM करने के लिए और ट्राइकोडर्मा भी जोड़ा (अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की 25 किलो के साथ मिश्रित बड़े पैमाने पर कई मीडिया के 250 ग्राम) किया जा सकता है। पौध की वृद्धि नहीं पर्याप्त है, तो एक महीने में एक बार vermiwash छिड़काव वांछनीय (संयंत्र प्रति 20 मिलीग्राम) है। नर्सरी में रोगों नियमित निगरानी और पादप उपायों को गोद लेने के द्वारा प्रबंधित किया जा सकता है। बोर्डो मिश्रण के प्रतिबंधित आवेदन 1% प्रारंभिक चरण में ही सड़ांध रोग को नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है। नर्सरी साइट बदलने से कीट और रोगों और पौध की जोरदार वृद्धि के लिए चौकसी करने के लिए लाभ हुआ है।

रोपण के लिए भूमि की तैयारी

रोपण के लिए जमीन तैयार करते समय मैला क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में मिट्टी और जल संरक्षण के उपाय जरूरी हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों, विकर्ण रोपण में ढलानों भर में खाइयों में रोपण और मिट्टी मिट्टी और जल संरक्षण में मदद मिलेगी mulching।

सांस्कृतिक प्रथाएं

स्वच्छ निराई संयंत्र कुर्सियां ​​(50 सेमी) और अंतर पंक्तियों स्लैश निराई द्वारा बनाए रखा जा करने के लिए कर रहे हैं करने के लिए सीमित किया जा रहा है। समाप्त सामग्री पलवार के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ट्रैश किए गए माल और गिर पत्तियों भी पलवार के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। सूखे पत्ते और पत्ती शीथ के साथ-साथ rhizomes के साथ साथ सामने आए पुराने suckers के हटाने Trashing खाद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जो अंतिम फसल के पूरा होने के बाद एक महीने के बारे में एक साल में एक बार से बाहर किया जा सकता है। इंटर पंक्तियों किसी भी कीमत पर खोदा नहीं किया जाना चाहिए। कीटनाशकों, fungicides, अन्य रसायन और उर्वरक leachates के साथ दूषित पानी नहीं केवल खेती के लिए जैविक प्रणाली के तहत सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस सिंचाई स्रोतों के लिए वाटरशेड भी उत्पादन की जैविक विधियों का पालन बनाए रखा जाना चाहिए कि निकलता है। पर्याप्त मिट्टी संरक्षण के उपायों और पलवार अभ्यास किया गया है उन क्षेत्रों में जहाँ, ज़मीन खोदना के लिए किसी भी आवश्यकता नहीं होगी।

पर्याप्त प्रकाश के प्रवेश को सुविधाजनक बनाने के लिए, छाया पेड़ की शाखाओं के प्रतिबंधित छाल निकालना बनाया जा सकता है। हालांकि, यहां तक ​​ऐसी स्थितियों के तहत कोई पेड़ शीर्ष नाश किया जाए। Overexposed हैं जो क्षेत्रों में, छाया पेड़ के रोपण एक आवश्यक कार्रवाई है और ऐसा करते समय, स्थानीय स्थिति के लिए अनुकूल अधिकतम जैव-विविधता पर विचार किया जा सकता है। ऐसी गर्मी और औषधीय मूल्य के दौरान बरसात के मौसम, आत्म छंटाई आदत, फूल दौरान पतझड़ के रूप में वांछनीय अक्षर होने पेड़ पर विचार किया जा सकता है। इस तरह के पेड़ फली प्रजातियों के हैं, तो वे पसंद कर रहे हैं। प्रतिबंधित उछाल और पत्ती कूड़े हरी पत्ती खाद या खाद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। मधुमक्खी वनों का संरक्षण जैविक खेती का एक अभिन्न हिस्सा है। मधुमक्खी पालन की एकता जैव विविधता को सुनिश्चित करने, लेकिन यह भी आश्वासन दिया परागण के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी ही नहीं।

 डालनाऐसे नीम की खली @ 1 किलो या मुर्गी की खाद / संयंत्र प्रति farmyard खाद / कम्पोस्ट / वर्मीकम्पोस्ट @ 2kg के रूप में जैविक खाद का आवेदन मई-जून के दौरान एक वर्ष में एक बार किया जा सकता है। मसूरी रॉक फास्फेट या हड्डी भोजन के अनुप्रयोग मिट्टी विश्लेषण के आधार पर, आवश्यक पाया, तो किया जा सकता है।

प्लांट का संरक्षण
रोग

इलायची को प्रभावित करने वाले प्रमुख फंगल रोगों azhukal (Phytophthora medii) और पेड़ों का झुरमुट सड़ांध हैं (Pythium vexans, Rhizoctonia सोलानी और Fusarium सपा।)। ट्राइकोडर्मा का निगमन संयंत्र आधार (पेड़ों का झुरमुट प्रति 1 किलो) मानसून के मौसम की शुरुआत (मई) के लिए पहले पेड़ों का झुरमुट सड़ांध रोग के लिए एक रोगनिरोधी ऑपरेशन है में उपयुक्त जैविक माध्यम में गुणा। आवश्यक पाया जब बोर्डो मिश्रण 1% का उपयोग करने के लिए सहारा की जा सकती है। वायरस से प्रभावित पौधों की नियमित rouging प्रसार को कम करने के लिए किया जाना चाहिए। Rouged पौधों को जलाकर नष्ट कर दिया जाना चाहिए।

कीट

Drooping सूखे पत्ते, सूखी पत्ती म्यान, पुराने panicles और अन्य शुष्क संयंत्र भागों का हटाया बागान में कीट inoculum को कम करने के लिए सिफारिश की एक महत्वपूर्ण स्वच्छता विधि है। मैकेनिकल संग्रह और कीट के अंडे की जनता का विनाश, बालों कमला (Eupterote सपा) और जड़ GRUB (Balepta fuliscorna) की भृंग के लार्वा कीट क्षति को कम करने में अन्य दृष्टिकोण हैं। बाद के पुनरुत्थान कम किया जा सकता है, ताकि जैसे ही स्टेम बोरर (Conogethes punctiferalis) के बोर होल गौर कर रहे हैं, के रूप में बोर होल में बेसिलस thuringiensis तैयारी (10 मिलीलीटर पानी में 0.5 मिलीग्राम) के इंजेक्शन के लार्वा को मार देंगे। खेती की जैविक विधियों सफेद मक्खियों के प्रकोप को अपनाया जहाँ भी रहे हैं (Dialeurodes cardamomi) शायद ही कभी मनाया जाता है। हालांकि इस तरह के प्रकोप, न्यूनतम कास्टिक सोडा (500 मिलीलीटर नीम और पानी की 100 लीटर में 500 ग्राम नरम साबुन) से बाहर कर दिया नरम साबुन के साथ नीम का तेल छिड़काव द्वारा पीला चिपचिपा जाल और nymphs के नियंत्रण का प्रयोग वयस्कों के संग्रह की स्थिति में होना करने के लिए है पीछा किया। नेमाटोड, के लिए प्रवण क्षेत्रों में (Meloidogine सपा।) को कुचल दिया नीम के बीज के आवेदन की समस्याओं की देखभाल कर सकते हैं। मछली के तेल राल साबुन के अनुप्रयोग के प्रबंध कीटों (Sciothrips cardamomi) के लिए किया जा सकता है। मालाबार किस्मों एक निश्चित सीमा तक कीटों के प्रति सहनशील होना पाया जाता है। नियमित निगरानी समय पर पता लगाने और इलायची को प्रभावित करने

टों के खिलाफ उपचारात्मक उपायों को अपनाने के लिए बिल्कुल जरूरी है।

हार्वेस्ट और पोस्ट हार्वेस्ट आपरेश

फसल कटाई के बाद, हौसले से काटा कैप्सूल गंदगी से साफ करने की जरूरत है। इलायची कैप्सूल का इलाज अधिकतम सीमा तक हरे रंग बनाए रखने के द्वारा एक अधिकतम तापमान में 8-12% से 80% से नमी को कम करने के द्वारा किया जाता है। इलायची दो तरीकों से ठीक किया जा सकता है।

सूर्य सुखाने

इलायची सीधे धूप के तहत सूख रहा है। सूर्य सुखाने आम तौर पर 5-6 दिनों की आवश्यकता है। यह बरसात के मौसम के दौरान भरोसेमंद नहीं है। इस अभ्यास केवल कर्नाटक के कुछ भागों में पीछा किया जाता है। इस विधि के द्वारा, यह अच्छा हरे रंग प्राप्त करने के लिए संभव नहीं है।

पारंपरिक इलाज

इस इलायची का इलाज करने के लिए सबसे अधिक अपनाया विधि है। यह भट्ठी, ग्रिप पाइप, चिमनी, वेंटिलेटर आदि यह दो अपार्टमेंट, एक इलाज का कमरा और एक भट्ठी कमरे से मिलकर चिनाई संरचना है के साथ लगे एक संरचना की आवश्यकता है। कमरे के इलाज के लिए एक लंबा एक ही छत पर छत के साथ प्रदान की और तार गेज के साथ लगे बीम पर भूमि तल के लिए कमरे के समानांतर के बीच में, दो डिब्बों में जगह बना है। जस्ती लोहा शीट से बना लगभग 25 सीएमएस के दायरे होने ग्रिप पाइप छत के माध्यम से धुआं निष्कासित करने के लिए पाइप चिमनी के लिए भट्ठी से दूसरे के लिए एक छोर से भूमि तल में प्रदान की जाती हैं। आयताकार ट्रे पकड़े रैक भी इलायची की बड़ी मात्रा को समायोजित करने के लिए की ओर दीवारों के लिए फिट हैं।

कैप्सूल रैक और ट्रे पर एक परत में फैले हुए हैं। प्रसार करने के बाद इलाज के कमरे में बंद हो गया है और हीटिंग भट्ठी में जलाऊ लकड़ी जल रहा है और गर्मी का उत्पादन आयोजित किया जाता है के द्वारा किया जाता है। केवल पेड़ गिर गया और lopped शाखाओं ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। गर्म धुएं 50 डिग्री सेल्सियस से 45 कमरे के तापमान को लाने के पाइप के माध्यम से गुजरता है। इस तापमान में 3 से 4 घंटे के लिए बनाए रखा है। इस स्तर पर कैप्सूल पसीना और नमी से दूर दे। कृत्रिम सांस तो अचानक ठंडा करने के लिए खोला और सुखाने कैप्सूल से भाप बाहर व्यापक हैं। वाष्प पूरी तरह से बच निकला है और तापमान के बारे में 24 से 30 घंटे के लिए 40 डिग्री सेल्सियस पर बनाए रखा है के बाद कृत्रिम सांस बंद हो जाती हैं। तापमान एक घंटे के लिए 45 डिग्री सेल्सियस के लिए फिर से उठाया है। इलाज की पूरी प्रक्रिया के बारे में 28 से 36 घंटे लगते हैं। सामान्य में, इस विधि से ठीक कैप्सूल की गुणवत्ता बहुत अच्छी है। सामुदायिक इलाज सस्ता और कम प्रदूषण है।

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सेब की खेती

Tue, 04/17/2018 - 12:49

 

शिमला: सेब की खेती के लिए एशिया का सबसे अमीर और पूरी दुनिया में मशहूर हिमाचल का ये गांव है। जानकारी के मुताबिक शिमला जिले के मड़ावग गांव को एशिया का सबसे अमीर गांव भी माना जाता है। यहां के सेबों को विदेशों में काफी पसंद किया जाता है। बता दें कि सेब की खेती ने इस गांव को डेवलप बना दिया है।

सेबएक साल में 150 करोड़ का
बताया जा रहा है कि मड़ावग गांव शिमला जिले के चौपाल तहसील में स्थित है। मड़ावग गांव की आबादी करीब 2 हजार की है। यहां हर साल 150 करोड़ रुपए का सेब उगाया जाता है। इस गांव में हरेक परिवार की सालाना आया 75 लाख के करीब है। आपको बता दें कि मड़ावग कहने को तो गांव है, लेकिन यहां आलीशान मकानों की कमी नहीं है। 

ऐसे करते हैं बगीचों का मेंटेनेंस
मड़ावग गांव के लोग लैटेस्ट टेक्नोलॉजी के जरिए सेब की खेती करते हैं। सोशल मीडिया के जरिए यहां के किसान विदेशों से भी जानकारी हासिल करते रहते हैं। सबसे खास बात तो यह है कि यहां सेब की खेती को ऑन ईयर प्रोडक्शन और ऑफ इयर प्रोडक्शन के जरिए किया जाता है।

गुजरात के गांव से आगे
बता दें कि मड़ावग गांव ने प्रति व्यक्ति आय के मामले में गुजरात को भी पीछे छोड़ दिया है। इस गांव से पहले गुजरात का माधवपर एशिया का सबसे अमीर गांव रह चुका है। मड़ावग के ग्रामीणों का प्रति व्यक्ति आय लाखों में है। शिमला जिले का एक और गांव क्यारी भी एशिया का सबसे अमीर गांव रह चुका है।

 

 

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केले की फसल

Tue, 04/17/2018 - 12:13

परिचय

केला भारत वर्ष का प्राचीनतम स्वादिष्ट पौष्टिक पाचक एवं लोकप्रीय फल है अपने देश में प्राय:हर गाँव में केले के पेड़ पाए जातेहै इसमे शर्करा एवं खनिज लवण जैसे कैल्सियम तथा फास्फोरस प्रचुर मात्रा में पाए जाता हैI फलों का उपयोग पकने पर खाने हेतु कच्चा सब्जी बनाने के आलावा आटा बनाने तथा चिप्स बनाने के कम आते हैI  इसकी खेती लगभग पूरे भारत वर्ष में की जाती हैI

जलवायु एवं भूमि

केला की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु एवं भूमि की आवश्यकता होती है?
गर्मतर एवं सम जलवायु केला की खेती के लिए उत्तम होती है अधिक वर्षा वाले क्षेत्रो में केला की खेती सफल रहती है जीवांश युक्त दोमट एवम मटियार दोमट भूमि ,जिससे जल निकास उत्तम हो उपयुक्त मानी जाती है भूमि का पी एच मान 6-7.5 तक इसकी खेती के लिए उपयुक्त होता हैI

 

प्रजातियाँ

कौन कौन सी प्रजातियाँ है जिनका इस्तेमाल हम केले की खेती करते वक्त करे?
उन्नतशील प्रजातियाँ केले की दो प्रकार की पाई जाती है फल खाने वाली किस्स्मो में गूदा मुलायम, मीठा तथा स्टार्च रहित सुवासित होता है जैसे कि बसराई,ड्वार्फ ,हरी छाल,सालभोग,अल्पान,रोवस्ट तथा पुवन इत्यादि प्रजातियाँ है दूसरा है सब्जी बनाने वाली इन किस्मों में गुदा कडा स्टार्च युक्त तथा फल मोटे होते है जैसे कोठिया,बत्तीसा, मुनथन एवं कैम्पिरगंज हैI

 

खेती की तैयारी

खेत की तैयारी कैसी होनी चाहिए व किस प्रकार करें?
खेत की तैयारी समतल खेत को 4-5 गहरी जुताई करके भुर भूरा बना लेना चाहिए उत्तर प्रदेश में मई माह में खेत की तैयारी कर लेनी चाहिए इसके बाद समतल खेत में लाइनों में गढढे तैयार करके रोपाई की जाती हैI

 

रोपाई हेतु गढढे की तैयारी

केला की रोपाई हेतु गढढे किस प्रकार से तैयार किए जाते हैI
खेत की तैयारी के बाद लाइनों में गढढे किस्मो के आधार पर बनाए जाते है जैसे हरी छाल के लिए 1.5 मीटर लम्बा 1.5 मीटर चौड़ा के तथा सब्जी के लिए 2-3 मीटर की दूरी पर 50 सेंटीमीटर लम्बा 50 सेंटीमीटर चौड़ा 50 सेंटीमीटर गहरा गढढे मई के माह में खोदकर डाल  दिये जाते है 15-20 दिन खुला छोड़ दिया जाता है जिससे धूप आदि अच्छी तरह लग जाए इसके बाद 20-25 किग्रा गोबर की खाद 50 ई.सी. क्लोरोपाइरीफास 3 मिली० एवं 5 लीटर पानी तथा आवश्यकतानुसार ऊपर की मिट्टी के साथ मिलाकर गढढे को भर देना चाहिए गढ़ढो में पानी लगा देना चाहिएI

 

पे़ड़ों की रोपाई

केले के पेड़ो की रोपाई किस प्रकार की जाती है?
पौध रोपण में केले का रोपण पुत्तियों द्वारा किया जाता है, तीन माह की तलवार नुमा पुत्तियाँ जिनमे घनकन्द पूर्ण विकसित हो का प्रयोग किया जाता है पुत्तियो का रोपण 15-30 जून तक किया जाता है इन पुत्तियो की पत्तियां काटकर रोपाई तैयार गढ़ढो में करनी चाहिए रोपाई के बाद पानी लगाना आवश्यक हैI

 

खाद एवं उर्वरक का प्रयोग

केले की खेती के लिए किस प्रकार की खाद एवं उर्वरक का प्रयोग हमें करना चाहिए और कितनी मात्रा में करना चाहिए इस बारे में बताये?
भूमि के उर्वरता के अनुसार प्रति पौधा 300 ग्राम नत्रजन 100 ग्राम फास्फोरस तथा 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता पड़ती है फास्फोरस की आधी मात्रा पौध रोपण के समय तथा शेष आधी मात्रा रोपाई के बाद देनी चाहिए नत्रजन की पूरी मात्रा ५ भागो में बाँटकर अगस्त, सितम्बर ,अक्टूबर तथा फरवरी एवं अप्रैल में देनी चाहिए पोटाश की पूरी मात्रा तीन भागो में बाँटकर सितम्बर ,अक्टूबर एवं अप्रैल में देना चाहिएI

 

सिंचाईका समय

केले की खेती में सिचाई का सही समय क्या है और किस प्रकार सिचाई करनी चाहिए?
केले के बाग में नमी बनी रहनी चाहिए पौध रोपण के बाद सिचाई करना अति आवश्यक है आवश्यकतानुसार ग्रीष्म ऋतु 7 से 10 दिन के तथा शीतकाल में 12 से 15 दिन अक्टूबर से फरवरी तक के अन्तराल पर सिचाई करते रहना चाहिए मार्च से जून तक यदि केले के थालो पर पुवाल गन्ने की पत्ती अथवा पालीथीन आदि के बिछा देने से नमी सुरक्षित रहती है, सिचाई की मात्रा भी आधी रह जाती है साथ ही फलोत्पादन एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती हैI

 

निराई एवं गुड़ाई

केला की खेती में निराई गुड़ाई का सही समय क्या है और किस प्रकार करनी चाहिए?
केले की फसल के खेत को स्वच्छ रखने के लिए आवश्यकतानुसार निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए पौधों को हवा एवं धूप आदि अच्छी तरह से निराई गुड़ाई करने पर मिलता रहता है जिससे फसल अच्छी तरह से चलती है और फल अच्छे आते हैI

 

मल्चिंग
 

केले की खेती में मल्चिंग कब और किस प्रकार करनी चाहिए?
केले के खेत में प्रयाप्त नमी बनी रहनी चाहिए, केले के थाले में पुवाल अथवा गन्ने की पत्ती की 8 से 10 सेमी० मोटी पर्त बिछा देनी चाहिए इससे सिचाई कम करनी पड़ती है खरपतवार भी कम या नहीं उगते है भूमि की उर्वरता शक्ति बढ़ जाती है साथ ही साथ उपज भी बढ़ जाती है तथा फूल एवं फल एक साथ आ जाते हैI

कटाई छंटाई

केले की कटाई छटाई और सहारा देना कब शुरू करना चाहिए और कैसे करना चाहिए?
केले के रोपण के दो माह के अन्दर ही बगल से नई पुत्तियाँ निकल आती है इन पुत्तियों को समय - समय पर काटकर निकलते रहना चाहिए रोपण के दो माह बाद मिट्टी से 30 सेमी० व्यास की 25 सेमी० ऊँचा चबूतरा नुमा आकृति बना देनी चाहिए इससे पौधे को सहारा मिल जाता है साथ ही बांसों को कैची बना कर पौधों को दोनों तरफ से सहारा देना चाहिए जिससे की पौधे गिर न सकेI

 

रोगों का नियंत्रण

केले की खेती में  फसल सुरक्षा हेतु रोगों का नियंत्रण कैसे करते रहना चाहिए और इसमे कौन कौन से रोग लगने की संभावना रहती है?
केले की फसल में कई रोग कवक एवं विषाणु के द्वारा लगते है जैसे पर्ण चित्ती या लीफ स्पॉट ,गुच्छा शीर्ष या बन्ची टाप,एन्थ्रक्नोज एवं तनागलन हर्टराट आदि लगते है नियंत्रण के लिए ताम्र युक्त रसायन जैसे कापर आक्सीक्लोराइट 0.3% का छिडकाव करना चाहिए या मोनोक्रोटोफास 1.25 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के साथ छिडकाव करना चाहिएI

कीट नियंत्रण

केले की खेती में कौन कौन से कीट लगते है और उसका नियंत्रण हम किस प्रकार करे?
केले में कई कीट लगते है जैसे केले का पत्ती बीटिल (बनाना बीटिल),तना बीटिल आदि लगते है नियंत्रण के लिए मिथाइल ओ -डीमेटान 25 ई सी 1.25 मिली० प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिएI या कारबोफ्युरान अथवा फोरेट या थिमेट 10 जी दानेदार कीटनाशी प्रति पौधा 25 ग्राम प्रयोग करना चाहिएI

तैयार फल की कटाई

केला तैयार होने पर उसकी कटाई किस प्रकार करनी चाहिए?    
केले में फूल निकलने के बाद लगभग 25-30 दिन में फलियाँ निकल आती है पूरी फलियाँ निकलने के बाद घार के अगले भाग से नर फूल काट देना चाहिए और पूरी फलियाँ निकलने के बाद 100 -140 दिन बाद फल तैयार हो जाते है जब फलियाँ की चारो घरियाँ तिकोनी न रहकर गोलाई लेकर पीली होने लगे तो फल पूर्ण विकसित होकर पकने लगते है इस दशा पर तेज धार वाले चाकू आदि के द्वारा घार को काटकर पौधे से अलग कर लेना चाहिएI

पकाने की विधि

केला की कटाई करने के बाद जो घार के फल होते है उनको पकाने की क्या विधि है किस प्रकार पकाया जाता है?
केले को पकाने के लिए घार को किसी बन्द कमरे में रखकर केले की पत्तियों से ढक देते है एक कोने में उपले अथवा अगीठी जलाकर रख देते है और कमरे को मिट्टी से सील बन्द कर देते है यह लगभग 48 से 72 घण्टे में कमरें केला पककर तैयार हो जाता हैI

उत्पादन

केला की खेती से प्रति हेक्टेयर कितनी पैदावार यानी की उपज प्राप्त कर सकते है?
सभी तकनीकी तरीके अपनाने से की गई केले की खेती से 300 से 400 कुन्तल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।

 

 

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        रसभरी की खेती

        Tue, 04/17/2018 - 12:02

         

        रसभरी

        रसभरी (वानस्पनाम तिक : Physalis peruviana ; physalis = bladder) एक छोटा सा पौधा है। इसके फलों के ऊपर एक पतला सा आवरण होता है। कहीं-कहीं इसे 'मकोय' भी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में इसे 'चिरपोटी'व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पटपोटनी भी कहते हैं। इसके फलों को खाया जाता है। रसभरी औषधीय गुणो से परिपूर्ण है।

        रसभरी का पौधा किसानो के लिये सिरदर्द माना जाता है। जब यह खर पतवार की तरह उगता है तो फसलों के लिये मुश्किल पैदा कर देता है।

        औषधीय गुण

        रसभरी का फल और पंचांग (फल, फूल, पत्ती, तना, मूल) उदर रोगों (और मुख्यतः यकृत) के लिए लाभकारी है। इसकी पत्तियों का काढ़ा पीने से पाचनअच्छा होता है साथ ही भूख भी बढ़ती है। यह लीवर को उत्तेजित कर पित्त निकालता है। इसकी पत्तियों का काढ़ा शरीर के भीतर की सूजन को दूर करता है। सूजन के ऊपर इसका पेस्ट लगाने से सूजन दूर होती है। रसभरी की पत्तियों में कैल्सियम, फास्फोरस, लोहा, विटामिन-ए, विटामिन-सी पाये जाते हैं। इसके अलावा कैटोरिन नामक तत्त्व भी पाया जाता है जो ऐण्टी-आक्सीडैंट का काम करता है। बाबासीर में इसकी पत्तियों का काढ़ा पीने से लाभ होता है। संधिवात में पत्तियों का लेप तथा पत्तियों के रस का काढ़ा पीने से लाभ होता है। खांसी, हिचकी, श्वांस रोग में इसके फल का चूर्ण लाभकारी है। बाजार में अर्क-रसभरी मिलता है जो पेट के लिए उपयोगी है। सफेद दाग में पत्तियों का लेप लाभकारी है।[1]

         

        Category: खेती

        खरबूजे की खेती

        Tue, 04/17/2018 - 10:28

         

        खरबूजे की खेती कैसे करें 

          खेती प्रायः उच्च तापमान युक्त शुष्क जलवायु में बेहतर होती है|इसके लिए कम आपेक्षिक आद्रता (Relative Humidity) की जलवायु सबसे उत्तम होती है | विष मुक्त कृषि के  व्यावहारिक प्रयोगों से यह पाया गया कि फल पकने के समय यदि जमीन में अधिक नमी रहती है तो फलों की मिठास कम हो जाती है|

        भूमि का चयन कैसे करें 

        खरबूजे की खेती के लिए कचनार वाली जमीन सबसे उत्तम होती है लेकिन मैदानी क्षेत्रों में खरबूजे की खेती के लिए जल निकास वाली रेतीली दोमट जनवर भी उपयुक्त है घूमने उनके साथ पीएस 8 से ज्यादा नहीं होना चाहिए

        खरबूजे की किस्मे

        1. हरा मधु 

        इस किस्म के फलों पर हल्की हरी धारियां होती हैं| गूदा हल्का हरा एवं रसीला होता है| इस प्रजाति के फलों में 12 से 15% चीनी पाई जाती है | इस प्रजाति की उपज प्रति एकड़ 60 क्विंटल से अधिक है| हरा मधु खरबूजे का औसत भार  800 ग्राम से एक किलोग्राम तक रहता है|

        2. पंजाब रसीला 

        इस प्रजाति के फलों का गूदा सुगन्धयुक्त और हरा होता है| फल का वजन 600 ग्राम तक रहता है और इसमें चीनी का प्रतिशत 10 तक एवम उपज 65-70 क्विंटल प्रति एकड़ तक प्राप्त होती है|

        3. दुर्गापुर मधु

        खरबूजे की यह सबसे अच्छी प्रजातियों में से एक है| इसके फलों में मिठास बहुत ज्यादा होती है| इसका गूदा हरे रंग का होता है जिसमें 14% तक चीनी पाई जाती है| फलों का वजन 500 ग्राम के लगभग होता है और इससे 1 एकड़ में 65-70 कुंतल तक उपज ली जा सकती है|

        4. पूसा रसराज 

        यह खरबूजे की काफी प्रचलित प्रजाति है और यह उत्तर भारत के किसानों में काफी लोकप्रिय है क्योंकि यह एक संकर प्रजाति है और इस वजह से इसका उत्पादन ज्यादा मिलता है| इसके फल लंबोदर, चिकने तथा बिना धारी के होते हैं| इसकी पैदावार100 क्विंटल प्रति एकड़ होती है|

        5. अर्का राजहंस 

        इस किस्म के फलों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा अंडाकार और छिलका जालीदार होता है| इसमे चीनी का प्रतिशत 12 से अधिक होने की वजह से मिठास भरपूर रहती है| इससे 50 से 55 क्विंटल प्रति एकड़ तक उपज होती है|

        6. अर्का जीत 

        यह खरबूजे की एक अगेती किस्म है और इस प्रजाति के फल छोटे नारंगी रंग लिए होते हैं| जो दिखने में आकर्षक लगते हैं| फलों का वजन 400 ग्राम तक होता है| इसका गूदा सफ़ेद तथा सुगंध मनमोहक होती है| इसमें विटामिन-सी की मात्रा टमाटर से भी ज्यादा पाई जाती है|

        खेत की तैयारी एवं बुवाई कैसे करें                                                                                                                                                                                                               खरबूजे की खेती तैयारी लौकी की खेती की तरह की जाती है| पहले खेत में 1000 लीटर बायोगैस स्लरी अथवा संजीवक खाद (पतंजली की) 1000 लिटर प्रति एकड़ की दर से डालना चाहिए| उसके बाद तीन से चार बार देसी हल से जुताई करके पाटा लगा कर खेत को समतल बना लेते हैं| इसके बाद 10-10 सीट पर नालियां बनाकर उनमें 3-3 फिट के अंतराल पर लगभग 2 फीट गहरे थावले बनाकर प्रत्येक थावले में वर्मी कंपोस्ट खाद तथा 200 ग्राम राख मिलाते हैं| उसके बाद नालियों में सिंचाई कर देते हैं| सिंचाई के 6 दिन बाद बीज की बुवाई करते हैं| खरबूजा बीजों को 2 सेंटीमीटर गहरी बुवाई करनी चाहिए तथा प्रत्येक थावले में 5 से 7 बीज बोने चाहिए| उगने पर केवल तीन से चार स्वस्थ पौधे रोक लिए जाते हैं| एक एकड़ खेत के लिए एक किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है|

         

        सिंचाई एवं निराई गुडाई कैसे करें 

        जब खरबूजे के पौधे में दो से तीन पत्तियां निकल आएं तब उस समय पहली सिंचाई कर देनी चाहिए| उसके बाद प्रत्येक सप्ताह सिंचाई करते रहें| फलों के विकसित होने वाले समय में सिंचाई बहुत सावधानीपूर्वक करनी चाहिए क्योकि ज्यादा सिंचाई करने से फलों की मिठास और स्वाद पर विपरीत असर पड़ता है| खरबूजे की लताएं जब खेत में फैलने लगे उससे पहले ही निराई गुडाई कर खेत को खरपतवार से निजात दिलाना बहुत जरूरी है|

        फसल की सुरक्षा कैसे करें 

        खरबूजे की फसल को सुरक्षित रखने के लिए कुदरती कीट रक्षकों का प्रयोग नियमित अंतराल पर करते रहना चाहिए| जिसके बारे में नीचे हम आपको बता रहे हैं –

        रेड पंपकिन बीटल -> यह बहुत हानिकारक कीट होता है| यह खरबूजे के पौधों पर प्रारंभिक दौर में प्रकोप करता है और यह कीट पत्तियों एवं फलों को खाकर पौधे को नुकसान पहुंचाता है| कभी-कभी इस कीट की सूंडी भूमि के अंदर पौधों की जड़ों को काट देती है|

        इसकी रोकथाम कैसे करें

        इस कीट से फसल की सुरक्षा के लिए पतंजलि निम्बादि कीटनाशक बहुत प्रभावी है| 10 लीटर कीट रक्षक को 30 लीटर पानी के साथ फसल पर प्रति सप्ताह छिड़काव करने से 3 सप्ताह तक फसल पूरी तरह से सुरक्षित रहती है|

        सफेद ग्रब

        यह कीट भी खरबूजे की फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है|यह कीट जमीन के अंदर रहता है तथा मौका लगते ही यह पौधे की जड़ों को काट देता है जिससे पूरा पौधा सूख जाता है|

        सफेद ग्रब कीट का उपचार कैसे करें

        इस कीट से फसल को बचाने के लिए सबसे कारगर उपाय यह है कि खेत की तैयारी करते समय थावले में राख एवं सरसों अथवा नीम की खली का प्रयोग करें| हर थावले में 100 ग्राम नीम या सरसों की खली में 200 ग्राम राख मिलाकर मिट्टी से थावले को ढक दे| 

        फलों की तोड़ाई कब और कैसे करें

        खरबूजे की फसल पूरी तरह से तैयार हुई या नहीं यह आप इन लक्षणों को देखकर समझ सकते हैं और उसके बाद ही फलों की दवाई करना अच्छा होगा

        • खरबूजे का फल सदैव नीचे की ओर से पकना प्रारंभ होता है तथा पकने के साथ फलों का रंग भी बदलने लगता है तथा छिलका मुलायम हो जाता है|
        • फल पकने पर फल से जुड़ी हुई बेल/तने का रंग हरे से सफेद हो जाता है|
        • पके फल से एक अलग प्रकार की सुगंध आने लगती है जिससे यह आभास हो जाता है कि अब फल पक चुका है|
        • फलों को सदैव सुबह के समय ही तोड़ना चाहिए|

        यदि आप ऊपर दी गई सलाह के अनुसार खरबूजे की खेती करेंगे तो आप अधिक से अधिक उपज पा सकेंगे और इसके साथ ही विषमुक्त खेती का आनंद भी ले पाएंगे तथा इसके साथ ही समाज की सेवा भी करेंगे|

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        तरबूज की खेती

        Tue, 04/17/2018 - 10:15

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        लाभकारी है तरबूज की खेती

         तरबूज की खेती शुरू करने के लिए यह सही समय है। किसान तरावट देने वाले तरबूज की खेती से अच्छी कमाई कर सकते हैं। गर्मियों में इसकी मांग भी ज्य़ादा रहती है जिससे किसान बढिय़ा मुनाफा कमा सकता है।

        भूमि एवं जलवायु

        तरबूज की खेती कई तरह की मिट्टी में की जाती है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त रहती है। खेत तैयार करने के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और बाद की जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करते हैं। खेत को समतल कर ले तो पूरे खेत में पानी की खपत एक समान रहेगी। अगर खेत नदियों के किनारे है तो नालियों और थालों को पानी की उपलब्धता के हिसाब से बनवाए। इन नालियों और थालों में सड़ी हुई गोबर की खाद और मिट्टी के मिश्रण से भर देते हैं। गर्म एवं औसत आद्र्रता वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए सबसे अच्छे रहते हैं। बीज के जमाव व पौधें के बढ़वार के लिए 25-32 सेन्टीग्रेड तापक्रम उपयुक्त होता है।

        शुगर बेबी

        इसकी बेलें औसत लम्बाई की होती हैं और फलों का औसत वजन दो से पांच किलोग्राम तक होता है। फल का ऊपरी छिलका गहरे हरे रंग और उन पर धूमिल सी धारियां होती हैं। फल का आकार गोल तथा गूदे का रंग गहरा लाल होता है। यह शीघ्र पकने वाली प्रजाति है। औसत पैदावार 200-300 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म लगभग 85 दिन पककर तैयार हो जाती है।

        दुर्गापुर केसर

        यह देर से पकने वाली किस्म है, तना तीन मीटर लम्बा, फलों का औसत वजन छह से आठ किलोग्राम, गूदे का रंग पीला तथा छिलका हरे रंग व धारीदार होता है। इसकी औसत उपज 350-450 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है।

        इस किस्म के फल गोल, अण्डाकार व छिलका हरा जिस पर गहरी हरी धारियां होती हैं तथा गुलाबी रंग का होता है। औसत फल वजन छह किलोग्राम होता है। इसकी भण्डारण एवं परिवहन क्षमता अच्छी है। औसत उपज 500 कुन्तल प्रति हेक्टेयर 110-115 दिन में प्राप्त की जा सकती है।

        दुर्गापुर मीठा

        इस किस्म का फल गोल हल्का हरा होता है। फल का औसत वजन आठ से नौ किलोग्राम तथा इसकी औसत उपज 400-500 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है। यह लगभग 125 दिन में तैयार हो जाती है।

        खाद एवं उर्वरक

        कम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद दो किलोग्राम प्रत्येक नाली या थाले में डालते हैं। इसके अतिरिक्त 50 किलोग्राम यूरिया, 47 किलोग्राम डीएपी तथा 67 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश प्रति एकड़ की दर से देना। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत में नालियां या थाले बनाते समय देते हैं। नत्रजन की आधी मात्रा को दो बराबर भागों में बांट कर खड़ी फसल में जड़ों से 30-40 सेमी दूर गुड़ाई के समय तथा फिर 45 दिन बाद देना चाहिए।

        बुआई का समय

        उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में तरबूज की बुआई फरवरी से अप्रैल के बीच एवं नदियों के किनारे इसकी बुआई नवम्बर से जनवरी के बीच में की जाती है।

        बीज की मात्रा

        एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए 25.4 किलोग्राम पर्याप्त होता है।

        बुआई

        तरबूज की बुआई के लिए 2.5 से 3.0 मीटर की दूरी पर 40 से 50 सेमी चौड़ी नाली बना लेते है। इन नालियों के दोनों किनारों पर 60 सेमी की दूरी पर बीज बोते हैं। यह दूरी मृदा की उर्वरता एवं प्रजाति के अनुसार घट बढ़ सकती है। नदियों के किनारे 60 गुणा 60 गुणा 60 सेमी क्षेत्रफल वाले गड्ढïे बनाकर उसमें 1:1:1 के अनुपात में मिट्टी, गोबर की खाद तथा बालू का मिश्रण भर कर थालें को भर देते है उसके बाद प्रत्येक थाले में तीन से चार बीज लगते है।

        सिंचाई

        यदि तरबूज की खेती नदियों के कछारों में की जाती है तो सिंचाई की कम आवश्यकता नहीं पड़ती है। जब मैदानी भागों में इसकी खेती की जाती है, तो सिंचाई 7 से 10 दिन के अन्तराल पर करते हैं। जब तरबूज आकार में पूरी तरह से बढ़ जाते हैं तो सिंचाई बन्द कर देते हैं जिससे फल में मिठास हो जाती है और फल नहीं फटते हैं।

        तरबूज के जमाव से लेकर प्रथम 30-35 दिनों तक निराई गुड़ाई करके खरपतवार को निकाल देते हैं। इससे फसल की वृद्वि अच्छी होती है तथा पौधे की बढ़वार रुक जाती है। रासायनिक खरपतवारनाशी के रुप में बूटाक्लोर रसायन 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बुआई के तुरन्त बाद छिड़काव करते हैं।

         

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        अंगूर की खेती

        Mon, 04/16/2018 - 11:01

         प्रस्तावना

        हमारे देश में व्यावसायिक रूप से अंगूर की खेती पिछले लगभग छः दशकों से की जा रही है और अब आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बागवानी उद्यम के रूप से अंगूर की खेती काफी उन्नति पर है। आज महाराष्ट्र में सबसे अधिक क्षेत्र में अंगूर की खेती की जाती है तथा उत्पादन की दृष्टि से यह देश में अग्रणी है। भारत में अंगूर की उत्पादकता पूरे विश्व में सर्वोच्च है। उचित कटाई-छंटाई की तकनीक का उपयोग करते हुए मूलवृंतों के उपयोग से भारत के विभिन्‍न क्षेत्रों में अंगूर की खेती की व्‍यापक संभावनाएं उजागर हुई हैं।

        भारत में अंगूर की खेती अनूठी है क्योंकि यह, उष्ण शीतोष्ण,सभी प्रकार की जलवायु में पैदा किया जा सकता है। हालांकि अंगूर की अधिकांशतः व्यावसायिक खेती (85प्रतिशत क्षेत्र में) उष्णकटिबन्धीय जलवायु वाले क्षेत्रों में (महाराष्ट्र,कर्नाटक,आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु) तथा उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु वाले उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से ताजा अंगूर उपलब्ध नहीं होते हैं। अतः उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश तथा दिल्ली व राजस्थान के कुछ भागों में अंगूर की खेती की जा रही है, जिससे जून माह में भी अंगूर मिलते हैं।

        संस्थान द्
        वारा की गई पहल भारतीय कृषि अनुसंधान में अंगूर की खेती जननद्रव्य के संग्रहण,नए जीन प्ररूपों के प्रजनन,वृद्धि नियामकों के इस्तेमाल,सस्य तकनीकों के मानकीकरण(इनमें कटाई-छंटाई, मूल-वृन्त,जल एवं पोषकतत्वों की आवश्यकता आदि विषय भी शामिल हैं) और कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी पर वर्ष 1956 मं अनुसंधान कार्य शुरू किया गया। प्रचलन में लाने के लिए अंगूर की अनेक किस्में विकसित की गई। इन सभी किस्मों की व्यावसायिक खेती की जा रही है, तथापि इन तीनों में ही इस क्षेत्र की आदर्श किस्म बनने की दृष्टि से कोई न कोई कमी है। इसे ध्यान में रखते हुए अगेती परिपक्वता,अच्छे सरस फल के साथ उच्च पैदावार के गुणों से युक्त जीनप्ररूपों के विकास का एक सघन प्रजनन कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। भा.कृ.अं.सं. में दो सफल हाइब्रिड नामतः पूसा उर्वशी एवं पूसा नवरंग विकसित किए गए और उन्हें कई सालों तक बहु-स्थानक परीक्षणों के उपरांत 1996-97 में जारी किया गया। उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में बुवाई के लिए उपयुक्त अंगूर की किस्मों के मुखय गुण नीचे दिए गए हैं:

        भा.कृ.अ.सं. द्वारा जारी /सिफारिश की गई किस्में

        मूलतः कैलिफोर्निया (यूएसए) की किस्म ब्यूटी सीडलेस एक जल्दी पकने वाला किस्म है। इसके गुच्छे शंक्वाकार व छाटे से मध्यम आकार के होते हैं। इसके दाने सरस, छोटे, गोल, गहरे लसल से लगभग काले रंग के होते है। फलों का गूदा मुलायम और हल्का सा अम्लीय होता है। फलों में एक-दो खाली व अप्पविकसित खोखले बीज हाते हैं तथा छिलका मध्यम मोटा होता है। इस किस्म में कुल घुलनशील शर्करा (टीएसएस) 18-19 प्रतिशत है। यह किस्म मध्य जून तक पकती है। तत्काल खाने की दृष्टि से यह एक उपयुक्त किस्म है।

        पर्लेट

        मूलतः कैलिफोर्निया की किस्म पर्लेट को उगाने की सिफारिश उत्तर भारत की परिस्थितियों के लिए की जाती है। यह शीघ्र पकने वाली, मध्यम प्रबल, बीजरहित तथा मीठे स्वाद वाली किस्म है। इसके गुच्छे मध्यम से लंबे, खंक्वाकार और गठे हुए होते हैं। इसका फल सरस, हरा, मुलायम गूदे और पतल छिलके वाला होता है। इस किस्म में कुल घुलनशील शर्करा (टीएसएस) 20-22 प्रतिशत है। फसल के आधे पक जाने पर जिब्रेलिक अम्ल (30 प्रति दस लक्षांश) GA3 का छिड़काव बहुत लाभदायक होता है। यह किस्म जून के दूसरे सप्ताह से पकना शुरू हो जाती है।

        पसा सीडलेस

        लोकप्रिय किस्म पूसा सीडलेस की खेती उत्तरी भार में की जाती है। यह जून के तीसरे सप्ताह में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी लताएं समजबूत होती हैं और उनमें मध्यम से लंबे आकार के गठीले गुच्छे आते हैं। इसके दाने सरस, छोटे, बीज रहित और हरापन लिए हुए पीले रंग के हाते हैं। गूदा मुलायम और मीठा हाता हैं जिसमें कुल घुलनशील शर्करा (टी एस एस) 22 प्रतिशत है।

        पूसा उर्वशी (हर X ब्यूटी सीडलेस)

        पूसा उर्वशी अंगूर की एक शीघ्र पकने वाली हाइब्रिड किस्म है जिसके फल तने के आधरा पर लगने शुरू हो जाते हैं। इसके गुच्छे कम गठीले (खुले) तथा आकार में मध्यम हाते हैं जिनमें मध्यम आकार के, अंडाकार,हरापन लिए हुए पीले बीज रहित अंगूर लगते है। यह किस्म ताजा खाने तथा किशमिश बनाने हेतु उपयुक्त हैं। इस हाइब्रिड में कुल घुलनशील शर्करा (टी एस एस) का स्तर 20-22 प्रतिशत है और यह बीमारियों का प्रतिरोधी है तथा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों मंध जहां मानसून से पहले छुट-पुट वर्षा की समस्याहै, उगाए जाने के लिए अच्छी है।

        पूसा नवरंग (मेडीलाइन एंजीवाइन X रूबीरेड)

        पूसा नवरंग एक टंनटुरियर हाइब्रिड किस्म है जो जल्दी पकने वाली है। इसमें फल बेल में नीचे की ओर लगते है। इसके गुच्छे कम गठीले, मघ्यम आकर के होते हैं। तथा अंगूर मध्यम गोलाकार होते हैं। यह किस्म जूस तथा रंगीन शराब के लिए अच्छी है। यह हाइब्रिड ऐन्थ्रक्नोज बीमारी का प्रतिरोधी है तथा उपोष्ण-कटिबन्धीय क्षेत्रों में जहां मानसून से पहले छुट-पुट वर्षा की समस्या है, उगाए जाने के लिए अच्छा है।

        अंगूर की पूसा किस्मों की लोकप्रियता

        पूसा उर्वशी एवं पूसा नवरंग दोनों किस्मों के जारी होने के बाद से ही अंगूर की खेती करने वाले किसानों को आकर्षित किया है। जननद्रव्य विनिमय एवं वितरण के तहत, राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केन्द्र, पुणे, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना तथा चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर सहित विभिन्न अनुसंधान केन्द्रों को अंगूर की बेलों की कलमों की आपूर्ति की गयी। इसी प्रकार सिनौली, मेरठ (उ. प्र.); सांगली (हि.प्र.); हिन्दौर (म. प्र.) तथा रायपुर के समीप राजनंद गांव (छत्तीसगढ़); रायगढ़ (उड़ीसा) आदि के प्रगतिशील किसानों को अंगूर की कलमें उपलब्ध कराई गई जहां इनका प्रदर्शन बेहतर रहा। ऊपर बताए गए बहुत से क्षेत्र अंगूर की खेती के लिए परंपरागत क्षेत्र नहीं माने जाते। अतः पूसा अंगूर किस्मों को लोकप्रिय बनाने और विभिन्न क्षेत्रों में अंगूर की खेती की संभावना तलाशने के उद्‌देश्य से प्रगतिशील किसानों की मदद से एक सहयोगी अनुसंधान कार्यक्रम की शुरूआत की गयी।

        गैर-परंपरागत क्षेत्रों में अंगूर की सफल खेती की शुरूआत

        इस विवरण में छत्तीसगढ़ में अंगूर की खेती की सफलतम तकनीकों पर प्रकाश डाला गया है। संस्थान ने रायपुर जिले के राजनंद  गांव के निवासी एवं प्रगतिशील किसान डॉ. बी. एन पालीवाल के साथ सक्रिय सम्पर्क स्थापित किया। पारम्भ में उनके भालूकोन्हा गांव स्थित फार्म हाउस पर थॉमसन सीडलेस, पर्लेट, हिमरोद, सोनाका, तास-ए-गणेश आदि जैसी आठ किस्मों के साथ पूसा नवरंग और पूसा उर्वसी दोनों की 50-50 कलमें लगाई गई। साथ ही अंगूर की खेती की पूरी सस्य विधियां उपलब्ध कराई गई। वर्ष 1999 में फार्म हाउस की अंगूर लताओं में फल आने के उपरांत छत्तीसगढ़ जैसे अंगूर की खेती वाले गैर-परंपरागत क्षेत्र में अंगूर की सफल खेती एक  राष्ट्रीय समाचार बन गई। भा. कृ. अं. सं. के वैज्ञानिकों के सक्रिय परामर्श और खेत दौरों के परिणामस्वरूप अंगूर की खेती की विभिन्न सस्य क्रियाओं का मानकीकरण किया गया। इस सफलता से समग्र क्षेत्र की आंखें खोल दीं तथा क्षेत्र के अन्य किसानों को भी पूसा नवरंग और पूसा उर्वशी पौधों की हाइब्रिड कलमों की आपूर्ति की गई।

        वर्तमान में, लगभग 15 हैक्टर क्षेत्र में पूरी तरह से पूसा अंगूर की खेती की जाती है। इस सफलता ने राज्य के किसानों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित किया और राज्य कृषि विभाग ने रायपुर को छतीसगढ़ का अंगूर की खेती वाला जिला घोषित कर दिया है। पिछले कुछ वर्षो के दौरान स्थानीय गैर सरकारी संगठन, पालीवाल ग्रेप रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्‌यूट, भालूकोना, राजनन्द गांव के प्रयासों से अंगूर की खेती का दायरा पड़ोसी जिलों नामतः दुर्ग और कावर्धा तक बढ़ा। वर्तमान में अंगूर की व्यावसायिक खेती करने वाले 15 से अधिक प्रगतिशील किसानों ने एक सहकारी समिति का गठन किया है।

        लवण सहिष्णु मूलवृंतों का उपयोग, ड्रिप सिंचाई आदि जैसी अंगूर की खेती की नई तकनीकें काफी लोकप्रिय हो रही है। डॉ. पालीवाल के फार्म हाउस में प्राप्त नतीजे उत्साहवर्धक हैं। समुचित छंटाई तकनीक के साथ मूलवृंत के प्रयोग से उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई है। डॉगरिज मूलवृंत के इस्तेमाल से पूसा उर्वशी और पूसा नवरंग किस्माकें के अंगूरों के आकार और गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय सुधार पाया गया है। क्षेत्र में अंगूर की खेती से प्राप्त लागत : लाभ आकलन से पता चलता है कि ताजे अंगूरों के उत्पादन में जहां प्रति एकड़ 1,0,000 रूपये का लाभ है, वहीं किशमिश उत्पादन में यह लाभ बढ़कर 1,50,000 रूपये प्रति एकड़ हो जाता है।

        मृदा एवं जलवायु संबंधी आवश्यकताएं

        इस क्षेत्र के लिए मानकीकृत और अनुशंसित अंगूर उत्पादन प्रौद्योगिकी नीचे दी गई हैः

        अंगूर की खेती के लिए गर्म, शुष्क व वर्षा रहित गर्मी तथा अति ठंड वाले सर्दी के मौसमों की आवश्यकता होती है। मई -जून के दौरान फलों के पकते समय वर्षा का होना नुकसान दायक है। इससे फल की मिठास में कमी आती है, फल असमान रूप से पकता है और चटक जाता है। अंगूर की खेती  के लिए अच्छी जल-निकासी वाली मिट्‌टी बेहतर मानी जाती है। अंगूर की खेती अलग-अलग प्रकार की ऐसी मिट्‌टी मे की जा सकती है जिसमें फर्टिलाइजर का पर्याप्त उपयोग हुआ हो और उसकी अच्छी देखभाल की गई हो। रेतीली तथा बजरीदार मिट्‌टी में भी अंगूर की अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की परिस्थतियों के तहत अंगूर की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्‌टयों यथा लाल बजरी, काली मिट्‌टी, कंकड़ीली तथा कठोर सतह वाले क्षेत्रों में भी संभव है। हालांकि इस क्षेत्र में लाल बजरी और यहां तक कि रेतीली मिट्‌टी की बहुतायत है, फिर भी परिणामों से पता चलता है कि पर्याप्त उर्वरकों और सिंचाई के प्रयोग से यहां अंगूर की अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है। सामान्तः 2.5 मीटर गहराई तक की मिट्‌टी आदर्श मानी जाती है। इसका pH मान 6.5 से 8 होना चाहिए। विनिमय शील सोडियम की दर 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। किसानों को 0.3 प्रतिशत अथवा अधिक अवणता वाली मिट्‌टी में अंगूर की खेती से बचना चाहिए। समस्याग्रस्त क्षेत्रों समें अंगूर की खेती के लिए साल्ट क्रीक, डॉगरिज ओर 1613 जैसे लवण सहिष्णु मूलवृंतों के प्रयोग का सुझाव दिया जाता है जिनका प्रयोग उपरोक्त किस्मों के मूलवृंत रोपण के लिए किया जा सकता है।

        प्रवर्धन

        प्रूनिंग वुड से ली गई एक वर्षीय परिपक्व केन से तने की कटिंग कर अंगूर का प्रवर्धन आसानी से किया जा सकता है। प्रत्येक कटिंग पैंसिल जितनी मोटी व 20-25 सें. मी. लंबी होनी चाहिए जिसमें 3-4 गांठे हों। इस प्रकार तैयार की गई कलम को या तो क्यारियों में अथवा मेंड़ों पर 45 डिग्री के कोण पर रोपा जाता है। अभी हाल ही में, वेज ग्राफ्टिंग का प्रयोग करते हुए फरवरी -मार्च (सुशुप्त कलियों में अंकुरण से पूर्व) तथा जुलाई-अगस्त (वर्षा उपरान्त) के दौरान एक वर्ष पुरानी मूलवृंत की स्व-स्थाने (इन सिटू) (मूल अवस्था में) ग्राफ्टिंग की गयी है।

        रोपण

        बेलों के बीच उचित दूरी रखने के लिए रोपण से पहले किसानों को एक ले-आउट प्लान तैयार कर लेना चाहिए। सामान्य तौर पर यह दूरी इस प्रकार रखी जाती है - हैड सिस्टम में 2 मी. ग 2 मी.; ट्रेलिस सिस्टम में 3 मी. ग 3 मी.; बॉवर सिस्टम में 4 मी. ग 4 मी.; Y सिस्टम में 3 मी. ग 4 मी.।

        नवम्बर-दिसंबर के दौरान 75 सें मी. ग 75 सें. मी. आकार के गड्‌ढे खोदकर उनमें गोबर की खाद और 1000 ग्राम नीम की खली को मिट्‌टी के  साथ 1:1 अनुपात में मिला देना चाहिए। अच्छी तरह मिलाने के उपरांत इसमें  एक कि. ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट और 500 ग्रा. सल्फेट ऑफ पोटाश मिला देना चाहिए। दीमकों द्वारा संक्रमित क्षेत्रों में गड्ढों को 30-50 लीटर जल में 0.2 प्रतिशत क्लोरापइरीफॉस मिलाकर पानी से भर देना चाहिए। एक भारी सिंचाई करके मिट्‌टी को ठीक से बैठ जाने लिए छोड़ देना चाहिए। जनवरी के अंतिम सप्ताह में शाम के समय प्रत्येक गड्‌ढे में एक वर्षीय जड़ कटिंग का रोपण किया जाता है। एक पखवाड़े के बाद बेल कांट-छांट करके एक मजबूत व परिपक्व तने के रूप में रहने दिया जाता है। ऐसी बेलों का रोपण समुचित अंतराल पर किया जाना चाहिए।

        बेलों की स्थाई (ट्रेनिंग)

        यद्यपि उपोष्ण क्षेत्र के लिए बेल के आधार पर फल देने वाली किस्में अधिक उपयुक्त है लेकिन ऐसे क्षेत्र में पुष्ट बेल वाली किस्में उगाई जाती है।

        हैड सिस्टम :

        यह सिस्टम सबसे सस्ता है क्योंकि इसमें कम निवेश की जरूरत होती है। अतः यह अल्प संसाधन वाले किसानों के लिए उपयुक्त है। इस प्रणली के तहत, बेलों को एकल तने के रूप में 1.2 मी. ऊंचाई तक बढ़ाया जाता है और उनमें विभिन्न दिशाओं में अच्छी तरह से फैली हुई चार से छः शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है। बाद में ये शाखाएं लकड़ी की भांति काष्ठीय बन जाती हैं जिनमें फलों के 8-10 गुच्छे लगते हैं। छंटाई करने पर अगले वर्ष के लिए नई शाखाएं निकलती हैं। सामान्यतः अंगूर की खेती के लिए कुछ अन्य प्रणालियों को भी आजमाया जा सकता है। जिनमें प्रमुख हैः

        ट्रेलिस सिस्टम :

        हालांकि यह थोड़ी खर्चीली है, फिर भी इसे सभी अर्ध-प्रबल किस्मों हेतु अपनया जा सकता है। पौधे 3 मी. ग् 3 मी. दूरी पर रोपे जाते हैं तथा लता की शाखाओं को तार पर 2 स्तरों पर फैलने दिया जाता है। लोहे के खंभों की मदद से तार क्षैतिज बांधे जाते हैं, पहला भू-सतह से 3/4मीटर की ऊंचाई पर तथा दूसरा पहले से 25 सें. मी. ऊपर रखा जाता है।शाखाओं को मुख्य तने के दोनों और फैलने दिया जाता है।

        बॉवर, परगोला अथवा पंडाल सिस्टम :

        पौधों को 2 मी. की ऊंचाई तक एकल तने के रूप में बढ़ने दिया जाता है तथा उसके उपरांत लता को मंडप के ऊपर सभी दिशाओं में फैलने दिया जाता है। यह लता मंडप 12 गेज वाली तारो से जाली के रूप में बुना जाता है। और इस जाली को एंगल आरनपत्थरों या लकड़ी के खंभों के सहारे फैलाया जाता है। बेल की मुखयटहनियों पर फल देने वाली शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है और इनकी कटाई-छटाई प्रति वर्ष की जाती है।

        ‘Y’ ट्रेलिस सिस्टम :

        अंगूर की बेलों को विभाजित कर खुली (केनोपी) परबढ़ने दिया जाता है। ‘Y’ के आकार वाले एंगल ट्रेलिस पर 120 से 130 सें.मी. की ऊंचाई पर बांधे गए तारों पर फलदार शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है। सामन्यतः एंगल 100-110 डिग्री कोण का होता है जिसकी शाखाएं 90-120से. मी. तक फैली होती है। इस प्रणाली की सबसे लाभदायक बात यह है कि इसमें फलगुच्छों को सीधी तेज धूप से बचाया जा सकता है।

        अंगूर की बेलों की छंटाई

        उत्तरी भारत में, मध्य दिसंबर से मध्य जनवरी के दौरान जबकि बेलें निष्क्रिय अवस्था में होती हैं, मध्य बेल की कटाई-छंटाई प्रारंभ की जा सकती है लेकिन मध्य भारत (यथा छत्तीसगढ़) में दोहरी कटाई-छंटाई भी की जा सकती है। फल दने वाली बेलों की छंटाई सामान्यतः रोपण के 2-3 वर्ष पश्चात बेल को वांछित आकृति देने और अपनाई जा रही प्रणाली के अनुसार की जाती है। चूंकि अंगूर के गुच्छे प्रत्येक मौसम में बेल से फूटने वाली नई टहनियों पर फलते हैं, अतः पिछलें वर्ष कीटहनियों की निश्चित लंबाई तक छंटाई करना महत्वपूर्ण होता है। किस गांठ तक बेल को छांटा जाए यह किस्म की प्रबलता पर निर्भर करता है।

        अंगूर की कुछ किस्मों में छंटाई की सीमा
        छंटाई के उपरांत बेलो पर 2.2 प्रतिशत ब्लीटॉक्स की छिड़काव करना चाहिए। पौधे के आधार पर दिखाई पड़ने वाले सभी अंकुरों को हाथ से हटा देना चाहिए।

        खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग

        युवा एवं फल वहन करने वाली बेलों को पोषक तत्व प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है। सामान्यतः बेलों को पोषक तत्वों की आधी खुराक मिट्‌टी के माध्यम से तथा शेष आधी पत्तियों पर छिड़काव करके दिए जाने की सिफारिश की जाती है। विशेषकर नव विकसित पत्तियों पर सुबह के समय यूरिया (2 प्रतिशत वाले घोल) के छिड़काव की सिफारिश की जाती है। प्रति पौधा 25 कि. ग्रा. की दर से अच्छी तरह से सड़े हुए गोबर की खाद को फरवरी माह में मिट्‌टी में मिलाया जाता है। उसके उपरांत फरवरी माह में ही  बेलों की छंटाई के तुरंत बाद प्रत्येक बेल में 200 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट, 250  ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 250 ग्रा. अमोनियम सल्फेट के प्रयोग की सिफारिश की जाती है। फल लगना शुरू हाने के पश्चात अप्रैल माह में 200  ग्रा. पोटेशियम सल्फेट की दूसरी खुराक का प्रयोग किया जाता है। आयरन एवं जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए इनका 0.2 प्रतिशत की दर से छिड़काव किया जाता है।

        उपोष्ण- कटिबंधीय फलदार बेलों में उर्वरीकरण की अनुसूच

        सिंचाई

        नई रोपी गई बेलों को रोपण के पश्चात्‌ सींचा जाता है। खाद एवं उर्वरकों के प्रयोग के बाद भी सिंचाई की जानी चाहिए। यह तब और भी महत्वपूर्ण है जब फलों का विकास हो रहा हो। जैसे-जैसे फलों के रंग में परिवर्तन आने से परिपक्वता का पता चले सिंचाई की आवृत्ति कम की जा सकती है, ताकि फलों में अधिक शर्करा संचित की जा सके। यदि वर्षा न हो तो फलों की तुड़ाई के उपरांत भी सिंचाई जारी रखी जा सकती है। निष्क्रय अवधि (नवम्बर से जनवरी) के दौरान किसी प्रकार की सिंचाई की आवश्यकता नहीं है। ड्रिप सिंचाई के भी आशातीत नतीजे प्राप्त हुए हैं। शून्य (0) से 0.25 बार के मृदा नमी क्षेत्र में बंसत तथा ग्रीष्म में 5-7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। बसंत एवं ग्रीष्म में प्रति बेल 3.5 ली. जल क्षमता वाली 15 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।

        फलों की गुणवत्ता-महत्वपूर्ण दिशानिर्देश

        पादप जैव विनियामकों एवं सस्यक्रियाओं द्वारा फलों की क्वालिटी में सुधार।

        भा. कृ. अ. सं. द्वारा मानसूनी वर्षा प्रारंभ हाने से पहले ही अंगूरों की अगेती तुड़ाई कर लेने की तकनीक विकसित की गयी है। जनवरी के प्रथम सप्ताह में छंटाई के तुरन्त पश्चात अंगूर बेलों पर डार्मेक्स अथवा डॉरब्रेक (30 मि.ली. का एक छिड़काव किया जाता है। इस उपचार से फल 2 से 3 सप्ताह पूर्व ही कलियां खिल जाती है तथा अंगूर पक जाते है।

        लंबे अंगूर प्राप्त करने के लिए पुष्पगुच्छों के आधा खिलने के समय उन्हें जिब्रेलिक एसिड में डुबोने सिफारिश की जाती है। ब्यूटी सीडलेस किस्म 45 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति, तथा पर्लेट, पूसा उर्वशी और पूसा सीडलेस किस्में 25-30 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति इस संबध में अनुकूल प्रतिक्रिया प्रदर्शित करती हैं।

        फल के रंग और मिठास की दृष्टि से अंगूर की क्वालिटी में सुधार लाने के साथ-साथ फलों को शीघ्र पकाने हेतु अंगूरों को मटर के दानों के बराबर के आकार में बनाए गए घोल में डुबोया जा सकता है।

        इसके अतिरिक्त, फल क्वालिटी में सुधार लाने के लिए मुखय तने की गर्डलिंग और गुच्छों में अंगूरों की सघनता कम करने जैसी क्रियाएं (थिनिंग) भी लाभदायक पाई गई है। फल आने के 4-5 दिन पश्चात गर्डलिंग चाकू की मदद से तने के चारों ओर भू-सतह से 30 सें. मी. ऊंचाई तक पतली छाल (0.5-1.0 सें. मी.) को गोलाकार हटा दिया जाता है। कैंची अथवा ब्रशिंग द्वारा पुष्पगुच्छ के एक तरफ से फलों को पूरी तरह हटाकर गुच्छों की थिनिंग की जाती है। अकेले गर्डलिंग करने से फल के भार में वृद्धि की जा सकती है लेकिन थिनिंग (छरहरापन) के साथ गर्डलिंग करने से अंगूर की मिठास (टीएसएस) में 2-3 प्रतिशत वृद्धि होती है और उन्हें एक सप्ताह अगेती पकाया जा सकता है।

        खाद कब दें

        छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए। शेष मात्र फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें।

        कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार

        अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए। ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं। परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है।

        फसल निर्धारण

        फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है। अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं। अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं। अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें।

        छल्ला विधि

        इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है। अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौड़ी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए।

        नाशीजीवों एवं बीमारियों का नियंत्रण

        पत्ती लपेटक इल्लियां पत्ती के किनारों को मध्यधारी की ओर लपेट देती है। ये इल्लियां पत्तियों की निचली बाह्‌य सतह पर पलती हैं। इस नाशीजीव के नियंत्रण हेतु 2 मि. ली. मेलाथियॉन अथवा डाइमेथोएट को प्रति लीटर पानी में 2 मि. ली. की दर से डाइमेथोएट अथवा  मेलाथियॉन का छिड़काव करने से लीफ हॉपर (पात-फुदके) को भी नियंत्रित किया जा सकता है। अंगूर की बेलों पर शल्क (स्केल) भी दिखाई पड़ते हैं जिन्हें प्रति ली. पानी में 1 मि. ली. डाइजिनॉन मिलाकर बेलों  की छंटाई के तुरंत बाद छिड़कने से सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। दीमकों के हमले से बचने के लिए 15-20 दिन के  अन्तराल पर एक बार 5 मि. ली. क्लोरोपायरीफॉस को प्रति लिटर जल में घोलकर तने पर छिड़कना तथा मिट्‌टी को इस घोल से भिगोना लाभदायक है।

        सफ़ेद चूर्णी रोग

        अन्य फफूंद बीमारियों की अपेक्षा यह शुष्क जलवायु में अधिक फैलाती है। प्रायः पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफ़ेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं। ये दाग धीरे - धीरे पुरे पत्तों एवं फलों पर फ़ैल जाते हैं। जिसके कारण फल गिर सकते हैं या देर से पकते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 0.2% घुलनशील गंधक, या 0.1% कैरोथेन के दो छिडकाव 10 - 15 दिन के अंतराल पर करें।

        उपोष्ण क्षेत्र में अंगूर की फसल प्रायः चूर्णी फफूंद तथा एथ्रेक्नोज के प्रकोप से बच जाती है क्योंकि इनका संक्रमण भारी वर्षा हाने पर ही देखने में आया है। जून-सितम्बर के दौरान 1-1 पखवाड़े के अन्तराल पर 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स अथवा बेविस्टिन को प्रति लीटर जल में मिलाकर बने घोल का छिड़काव करने से इन बीमारियों को नियंत्रण में रखा जा सकता है।

        कीट

        • थ्रिप्स, चैफर, बीटल एवं चिडिया, पक्षी अंगूर को हानि पहुंचाते हैं। थ्रिप्स का प्रकोप मार्च से अक्तूबर तक रहता है। ये पत्तियों, शाखाओं, एवं फलों का रस चूसकर हानि पहुंचाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए 500 मिली. मेलाथियान का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें।
        • चैफर बीटल कीट रात में पत्तों को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त करता है, वर्षाकाल में 10 दिन के अंतराल पर 10 % बी.एच.सी. पावडर बुरक देना इस कीट के नियंत्रण हेतु लाभदायक पाया गया है।
        • चिड़िया अंगूर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। फल पकने के समय चिडिया गुच्छे खा जाती है। अतः घर से आंगन में लगी बेल के गुच्छों को हरे रंग की मलमल की थैलियों से ढक देना चाहिए। बड़े - बड़े बगीचों में नाइलोन के जाल से ढक दें , ढोल बजाकर चिडियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

        फलों की तुड़ाई

        गुच्छों को पूरी तरह से पकने पर तोड़ना चाहिए। फलों का पकना वांछित टी एस एस व अम्लता के अनुपात से जाना जा सकता है जो विभिन्न किस्मों में 25-35 के बीच अलग-अलग होती है (पूसा सीडलेस में 29.24)। पूसा किस्में जून के प्रथम सप्ताह में पकना आरंभ कर देती हैं। अंगूर के गुच्छों को तोड़कर प्लास्टिक की ट्रे में रखना चाहिए। गुच्छों को एक के ऊपर एक करके नहीं रखना चाहिए। गुच्छों से खेत की गर्मी को कम करने के लिए उन्हें कुछ समय तक छाया में रखना चाहिए। इसके उपरांत खराब अंगूरों को गुच्छों से हटा देना चाहिए। उत्पाद को लहरदार (कारूगेटिड) फाइबर बोर्ड बक्सों में पैक करके स्थानिय अथवा दूरवर्ती बाजार में भेजा जा सकता है।

        भंडारण एवं उपयोग

        अंगूरों को 80-90 प्रतिशत आर्द्रता एवं शून्य डिग्री तापमान पर 4 सप्ताह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जून माह में अंगूरों का अच्छा दाम मिलता है किशमिश और शराब बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर उसे अमल में लाकर भी लाभ कमाया जा सकता है।

        सस्यक्रियाओं का कैलेण्डर

        उपोष्ण कटिबंधीय अंगूर की खेती की सस्यक्रियाओं का कैलेण्डर

        जनवरी के प्रथम से द्वितीय सप्ताह तक

        परिपक्व अंगूर की कटाई-छंटाई एवं नवविकसित बेलोंक की संधाई (ट्रेनिंग)। प्रत्येक युवा एवं परिपक्व बेल में 25 कि. ग्रा. अच्छी तरह से सड़ी हुए घूरे की खाद का प्रयोग कर थियोयूरिया अथवा डॉर्मेक्स का इस्तेमाल।

        जनवरी के तीसरे से चौथे सप्ताह तक

        अंगूर की प्रत्येक बेल में 250 ग्रा.अमोनियम सल्फेट और 250 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट द्वारा उर्वरीकरण। अप्रैल का प्रथम सप्ताह : सरस फल विकास और बेहतर क्वालिटी के लिए प्रति फलदार बेल के लिए 200 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट का प्रयोग।

        अप्रैल के दूसरे सप्ताह से जून के अंत तक

        एक दिन के अन्तराल पर सिंचाई (परिपक्वता से एक सप्ताह पूर्व सिंचाई को रोक देना चाहिए)। फलों की तुड़ाई के तुरंत पश्चात्‌ एंथ्रेक्नोज के प्रकोप से बचने के लिए प्रति लीटर जल में 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स/बैविस्टिन के घोल का छिड़काव।जुलाई

        फलों

        -अगस्त-सितंबर की तुड़ाई के तुरंत बाद सितम्बर तक 15-20दिन के अंतराल पर प्रति लीटर जल में 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स के घोल का छिड़काव।

        नवम्बर-दिसम्बर

        प्रति लीटर 3 ग्रा. ब्लीटाक्स के घोल का जल के साथ अन्तिम छिड़काव।

        मान्यता

        भा. कृ.अ. सं. के प्रधान वैज्ञानिक एवं अंगूर प्रजनक स्वर्गीय डॉ, पी.सी. जिंदल तथा छत्तीसगढ़ के प्रगतिशील किसान डॉ. बी. एन.पालीवाल के उललेखनीय प्रयासों को राज्य सरकार द्वारा मान्यता दी गई है। सरकार के अनेक गण्यमान्य पदाधिकारियों ने प्रायोगिक फार्म का दौरा किया। डॉ. जिंदल एवं डॉ. पॉलीवाल के योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए वर्ष 2003 में राज्य कृषि विभाग एवं जिला क्लेक्ट्रेट, रायपुर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित राज्य बागवानी प्रदर्शनी में छत्तीसगढ़ राज्य के कृषि एवं उद्योग मंत्री ने डॉ. जिंदल एवं डॉ. पॉलीवाल को रजत पटि्‌टका व प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित किया। इस सफलता से उत्साहित होकर पड़ोसी राज्य उड़ीसा के सीमावर्ती जिलों के किसानों ने भी उपोष्ण कटिबंधीय अंगूर की खेती करना प्रारंभ कर दिया है। 'द ग्रेप ग्रोअर्स कॉआपरेटिव ऑफ छत्तीसगढ़' द्वारा अब अपने उत्पादों के प्रसंस्करण हेतु किशमिश तथा शराब बनाने का संयंत्र स्थापित करने की योजना तैयार की जा रही है।

        अंगूर से किशमिश बनाने की विधि

        किशमिश बनाने के लिए अंगूर की ऐसी किस्म का चयन किया जाता है जिसमें कम से कम 20 फीसदी मिठास हो। किशमिश को तैयार करने की तीन विधियां हैं- पहली- प्राकृतिक प्रक्रिया, दूसरी-गंधक प्रक्रिया और तीसरी-कृत्रिम प्रक्रिया। पहली प्राकृतिक प्रक्रिया में अंगूर को गुच्छों से तोड़ने के बाद सुखाने के लिए 9क् सेंटीमीटर लंबी और 60 सेंटीमीटर चौड़ी ट्रे या

        60 सेंटीमीटर लंबी और 45 सेंटीमीटर चौड़ी ट्रे, जिसके नीचे प्लाई-वुड या लकड़ी की पट्टियां लगी हुई हों, में अंगूरों को अच्छी तरह फैला दें। फिर तेज धूप में 6-7 दिन तक रखें। अंगूरों को प्रतिदिन उलटते-पलटते रहें। इसके पश्चात ट्रे को छायादार स्थान पर रख दें, जहां अच्छी तरह हवा लगे सके। छायादार स्थान में सुखाने से किशमिश मुलायम रहती है और इसका इसका रंग भी खराब नहीं होता है। तैयार किशमिश में 15 फीसदी नमी रहनी चाहिए। गंधक प्रक्रिया से किशमिश बनाने पर उसका रंग बिल्कुल नहीं बदलता है। इसका मतलब है कि इस प्रक्रिया से बनी किशमिश हरी रहती है। धूप में सुखाने से किशमिश का रंग थोड़ा भूरा हो जाता है।

        इसे रोकने के लिए गंधक के धुएं का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया के लिए ताजे अंगूरों को गंधक के धुएं से भर कक्ष में लकड़ी की ट्रे पर किशमिश बिछा देते हैं। कमर के भीतर गंधक के धुएं के फैलने का पर्याप्त इंतजाम होना चाहिए। अंगूरों पर तेल की परत भी चढ़ाई जा सकती है। इसके लिए नारियल या मूंगफली तेल का उपयोग किया जाता है। तेल लगाने से किशमिश चमकीली हो जाती है और इसे लंबे समय तक भंडारित किया जा सकता है। कृत्रिम प्रक्रिया से किशमिश बनाने के लिए माइक्रोवेव किरणों से अंगूरों को सुखाया जाता है। इस प्रक्रिया से अंगूर में मौजूद पानी भाप बनकर उड़ जाता है और किशशि की गुणवत्ता भी बनी रहती है। इस प्रक्रिया से 90 फीसदी समय की बचत होती है। अंगूर एक समान सूखता है, जिससे फल का रंग, खुशबू व पोषक तत्व ताजे फल जैसे बने रहते हैं। तैयार किशमिश को शीशे के मर्तबान या पॉलीथीन की थैलियों में बंद करके किसी साफ सुथर हवादार स्थान पर रखना चाहिए।

        अंगूर का शरबत

        ठीक से सफाई करने के बाद अंगूर के बराबर मात्रा में पानी डालकर उसे 10 मिनट तक पका लें। यह ध्यान रहे कि पानी का तापमान 60-70 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक न हो। उबले अंगूरों को छलनी में रगड़कर रस निकाल लें। बड़े पैमाने पर शरबत तैयार करना हो, तब बाल्टी के तले में छोटे छेद करके भी उबले अंगूरों से निकाला जा सकता है। एक अलग बर्तन में चाशनी तैयार करके उसमें सिट्रिक एसिड डाल दें। प्रति लीटर चाशनी में 8-10 ग्राम सिट्रिक एसिड डालना चाहिए। इसके बाद इसे डालकर ठंडी होने। बाद में अंगूर से निकाला रस मिला लें। तैयार रस में प्रति लीटर एक ग्राम के हिसाब से पोटेशियम मेटाबाइ सल्फाइट मिलाएं। पोटेशियम मेटाबाइ सल्फाइट पूर शरबत में एकसाथ मिलने के बजाय छोटी कटोरी में पहले मिलाए और बाद में उसे पूर शरबत में मिलाएं। इस शरबत को साफ बोतल में भरकर ठंडे स्थान में रखें। अंगूरों के बजाय इससे बने उत्पादों का बाजार में कहीं बेहतर दाम मिलेगा। एक फायदा यह भी है कि उत्पादकों पर ताजे अंगूर बेचने का दबाव भी नहीं होगा। इससे उन्हें कम दाम पर अंगूर नहीं बेचने होंगे

         

                                                अंगूर की आधुनिक खेती

        अंगूर संसार के उपोष्ण कटिबंध के फलों में विशेष महत्व रखता है। हमारे देश में लगभग 620 ई.पूर्व ही उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अंगूर की व्यवसायिक खेती एक लाभकारी उद्यम के रूप में विकसित हो गई थी लेकिन उत्तरी भारत में व्यवसायिक उत्पादन धीरे - धीरे बहुत देर से शुरू हुआ। आज अंगूर ने उत्तर भारत में भी एक महत्वपूर्ण फल के रूप में अपना स्थान बना लिया है और इन क्षेत्रों में इसका क्षेत्रफल काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है। पिछले तीन दशकों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अंगूर कि खेती ने प्रगति की है जिसके फलस्वरूप भारत में अंगूर के उत्पादन, उत्पादकता एवं क्षेत्रफल में अपेक्षा से अधिक वृद्धि होती जा रही है। 

        उपयोग 
        अंगूर एक स्वादिष्ट फल है। भारत में अंगूर अधिकतर ताजा ही खाया जाता है वैसे अंगूर के कई उपयोग हैं। इससे किशमिश, रस एवं मदिरा भी बनाई जाती है। 

        मिट्टी एवं जलवायु 
        अंगूर की जड़ की संरचना काफी मजबूत होती है। अतः यह कंकरीली,रेतीली से चिकनी तथा उथली से लेकर गहरी मिट्टियों में सफलतापूर्वक पनपता है लेकिन रेतीली, दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो अंगूर की खेती के लिए उचित पाई गयी है। अधिक चिकनी मिट्टी में इसकी खेती न करे तो बेहतर है। अंगूर लवणता के प्रति कुछ हद तक सहिष्णु है। जलवायु का फल के विकास तथा पके हुए अंगूर की बनावट और गुणों पर काफी असर पड़ता है। इसकी खेती के लिए गर्म, शुष्क, तथा दीर्घ ग्रीष्म ऋतू अनुकूल रहती है। अंगूर के पकते समय वर्षा या बादल का होना बहुत ही हानिकारक है। इससे दाने फट जाते हैं और फलों की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ता है। अतः उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों की सिफारिश की जाती है। 

        किस्में 
        उत्तर भारत में लगाई जाने वाली कुछ किस्मों की विशेषताएं नीचे दी जा रही हैं। 

        परलेट 
        यह उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों में से एक है। इसकी बेल अधिक फलदायी तथा ओजस्वी होती है। गुच्छे माध्यम, बड़े तथा गठीले होते हैं एवं फल सफेदी लिए हरे तथा गोलाकार होते हैं। फलों में 18 - 19 तक घुलनशील ठोस पदार्थ होते हैं। गुच्छों में छोटे - छोटे अविकसित फलों का होना इस किस्म की मुख्य समस्या है। 

        ब्यूटी सीडलेस 
        यह वर्षा के आगमन से पूर्व मई के अंत तक पकने वाली किस्म है गुच्छे मध्यम से बड़े लम्बे तथा गठीले होते हैं। फल मध्यम आकर के गोलाकार बीज रहित एवं काले होते हैं। जिनमे लगभग 17 - 18 घुलनशील ठोस तत्त्व पाए जाते हैं। 

        पूसा सीडलेस 
        इस किस्म के कई गुण 'थाम्पसन सीडलेस' किस्म से मेल खाते हैं। यह जून के तीसरे सप्ताह तक पकना शुरू होती है। गुच्छे मध्यम, लम्बे, बेलनाकार सुगन्धयुक्त एवं गठे हुए होते हैं। फल छोटे एवं अंडाकार होते हैं। पकने पर हरे पीले सुनहरे हो जाते हैं। फल खाने के अतिरिक्त अच्छी किशमिश बनाने के लिए उपयुक्त है। 

        पूसा नवरंग 
        यह संकर किस्म भी हाल ही में भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित की गयी है। यह शीघ्र पकने वाली काफी उपज देने वाली किस्म है। गुच्छे मध्यम आकर के होते हैं। फल बीजरहित, गोलाकार एवं काले रंग के होते हैं। इस किस्म में गुच्छा भी लाल रंग का होता है। यह किस्म रस एवं मदिरा बनाने के लिए उपयुक्त है। 

        प्रवर्धन 
        अंगूर का प्रवर्धन मुख्यतः कटिंग कलम द्वारा होता है। जनवरी माह में काट छाँट से निकली टहनियों से कलमे ली जाती हैं। कलमे सदैव स्वस्थ एवं परिपक्व टहनियों से लिए जाने चाहिए। सामान्यतः 4 - 6 गांठों वाली 23 - 45 से.मी. लम्बी कलमें ली जाती हैं।कलम बनाते समय यह ध्यान रखें कि कलम का निचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए एवं ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए। इन कलमों को अच्छी प्रकार से तैयार की गयी तथा सतह से ऊँची क्यारियों में लगा देते हैं। एक वर्ष पुरानी जड़युक्त कलमों को जनवरी माह में नर्सरी से निकल कर खेत में रोपित कर देते हैं। 

        बेलों की रोपाई 
        रोपाई से पूर्व मिट्टी की जाँच अवश्य करवा लें। खेत को भलीभांति तैयार कर लें। बेल की बीच की दुरी किस्म विशेष एवं साधने की पद्धति पर निर्भर करती है। इन सभी चीजों को ध्यान में रख कर 90 x 90 से.मी. आकर के गड्ढे खोदने के बाद उन्हें 1/2 भाग मिट्टी, 1/2 भाग गोबर की सड़ी हुई खाद एवं 30 ग्राम क्लोरिपाईरीफास, 1 कि.ग्रा. सुपर फास्फेट व 500 ग्राम पोटेशीयम सल्फेट आदि को अच्छी तरह मिलाकर भर दें। जनवरी माह में इन गड्ढों में 1 साल पुरानी जड़वाली कलमों को लगा दें। बेल लगाने के तुंरत बाद पानी आवश्यक है। 

        बेलों की सधाई एवं छंटाई 
        बेलों से लगातार अच्छी फसल लेने के लिए एवं उचित आकर देने के लिए साधना एवं काट - छाँट की सिफारिश की जाती है। बेल को उचित आकर देने के लिए इसके अनचाहे भाग के काटने को साधना कहते हैं, एवं बेल में फल लगने वाली शाखाओं को सामान्य रूप से वितरण हेतु किसी भी हिस्से की छंटनी को छंटाई कहतें हैं। 
        अंगूर की बेल साधने हेतु पण्डाल, बाबर, टेलीफोन, निफिन एवं हैड आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं। लेकिन व्यवसायिक इतर पर पण्डाल पद्धति ही अधिक उपयोगी सिद्ध हुयी है। पण्डाल पद्धति द्वारा बेलों को साधने हेतु 2.1 - 2.5 मीटर ऊँचाई पर कंक्रीट के खंभों के सहारे लगी तारों के जाल पर बेलों को फैलाया जाता है। जाल तक पहुँचने के लिए केवल एक ही ताना बना दिया जाता है। तारों के जाल पर पहुँचने पर ताने को काट दिया जाता है ताकि पार्श्व शाखाएँ उग आयें।उगी हुई प्राथमिक शाखाओं पर सभी दिशाओं में 60 सेमी दूसरी पार्श्व शाखाओं के रूप में विकसित किया जाता है। इस तरह द्वितीयक शाखाओं से 8 - 10 तृतीयक शाखाएँ विकसित होंगी इन्ही शाखाओं पर फल लगते हैं। 

        छंटाई 
        बेलों से लगातार एवं अच्छी फसल लेने के लिए उनकी उचित समय पर काट - छाँट अति आवश्यक है। छंटाई कब करें : जब बेल सुसुप्त अवस्था में हो तो छंटाई की जा सकती है, परन्तु कोंपले फूटने से पहले प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए। सामान्यतः काट - छांट जनवरी माह में की जाती है। 

        कितनी छंटाई करें 
        छंटाई की प्रक्रिया में बेल के जिस भाग में फल लगें हों, उसके बढे हुए भाग को कुछ हद तक काट देते हैं। यह किस्म विशेष पर निर्भर करता है। किस्म के अनुसार कुछ स्पर को केवल एक अथवा दो आँख छोड़कर शेष को काट देना चाहिए। इन्हें 'रिनिवल स्पर' कहते हैं। आमतौर पर जिन शाखाओं पर फल लग चुके हों उन्हें ही रिनिवल स्पर के रूप में रखते हैं। 
        छंटाई करते समय रोगयुक्त एवं मुरझाई हुई शाखाओं को हटा दें एवं बेलों पर ब्लाईटोक्स 0.2 % का छिडकाव अवश्य करें। 
        किस्म कितनी आँखें छोडें 
        1 ब्यूटी सीडलेस 3 - 3 
        2 परलेट 3-4 
        3 पूसा उर्वसी 3-5 
        4 पूसा नवरंग 3-5 
        5 पूसा सीडलेस 8-10 

        सिंचाई 
        नवम्बर से दिसम्बर माह तक सिंचाई की खास आवश्यकता नहीं होती क्योंकि बेल सुसुप्ता अवस्था में होती है लेकिन छंटाई के बाद सिंचाई आवश्यक होती है। फूल आने तथा पूरा फल बनने (मार्च से मई ) तक पानी की आवश्यकता होती है। क्योंकि इस दौरान पानी की कमी से उत्पादन एवं हुन्वात्ता दोनों पर बुरा असर पड़ता है। इस दौरान तापमान तथा पर्यावरण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 7 - 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। फल पकने की प्रक्रिया शुरू होते ही पानी बंद कर देना चाहिए नहीं तो फल फट एवं सड़ सकते हैं। फलों की तुडाई के बाद भी एक सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए। 

        खाद एवं उर्वरक 
        अंगूर की बेल भूमि से काफी मात्र में पोषक तत्वों को ग्रहण करती है। अतः मिट्टी कि उर्वरता बनाये रखने के लिए एवं लगातार अच्छी गुणवत्ता वाली फसल लेने के लिए यह आवश्यक है की खाद और उर्वरकों द्वारा पोषक तत्वों की पूर्ति की जाये। पण्डाल पद्धति से साधी गई एवं 3 x 3 मी. की दुरी पर लगाई गयी अंगूर की 5 वर्ष की बेल में लगभग 500 ग्राम नाइट्रोजन, 700 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश, 700 ग्राम पोटेशियम सल्फेट एवं 50 - 60 कि.ग्रा. गोबर की खाद की आवश्यकता होती है। 

        खाद कब दें 
        छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए। शेष मात्र फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें। 

        कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार 
        अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए। ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं। परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है। 

        फसल निर्धारण 
        फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है। अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं। अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं। अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें। 

        छल्ला विधि 
        इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है। अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौडी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए। 

        वृद्धि नियंत्रकों का उपयोग 
        बीज रहित किस्मों में जिब्बरेलिक एसिड का प्रयोग करने से दानो का आकर दो गुना होता है। पूसा सीडलेस किस्म में पुरे फूल आने पर 45 पी.पी.एम. 450 मि.ग्रा. प्रति 10 ली. पानी में, ब्यूटी सीडलेस मने आधा फूल खिलने पर 45 पी.पी.एम. एवं परलेट किस्म में भी आधे फूल खिलने पर 30 पी.पी.एम का प्रयोग करना चाहिए। जिब्बरेलिक एसिड के घोल का या तो छिडकाव किया जाता है या फिर गुच्छों को आधे मिनट तक इस घोल में डुबाया जाता है। यदि गुच्छों को 500 पी.पी.एम 5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी में इथेफ़ोन में डुबाया जाये तो फलों में अम्लता की कमी आती है। फल जल्दी पकते हैं एवं रंगीन किस्मों में दानों पर रंग में सुधार आता है। यदि जनवरी के प्रारंभ में डोरमैक्स 3 का छिडकाव कर दिया जाये तो अंगूर 1 - 2 सप्ताह जल्दी पक सकते हैं। 

        फल तुड़ाई एवं उत्पादन 
        अंगूर तोड़ने के पश्चात् पकते नहीं हैं, अतः जब खाने योग्य हो जाये अथवा बाजार में बेचना हो तो उसी समय तोड़ना चाहिए। शर्करा में वृद्धि एवं तथा अम्लता में कमी होना फल पकने के लक्षण हैं। फलों की तुडाई प्रातः काल या सायंकाल में करनी चाहिए। उचित कीमत लेने के लिए गुच्छों का वर्गीकरण करें। पैकिंग के पूर्व गुच्छों से टूटे एवं गले सड़े दानों को निकाल दें। अंगूर के अच्छे रख - रखाव वाले बाग़ से तीन वर्ष पश्चात् फल मिलना शुरू हो जाते हैं और 2 - 3 दशक तक फल प्राप्त किये जा सकते हैं। परलेट किस्म के 14 - 15 साल के बगीचे से 30 - 35 टन एवं पूसा सीडलेस से 15 - 20 टन प्रति हैक्टेयर फल लिया जा सकता है। 

        बीमारियाँ एवं कीट 
        बीमारियाँ 
        उत्तरी भारत में अंगूर को मुख्यतः एन्थ्रक्नोज एवं सफ़ेद चुरनी रोग ही मुख्य बीमारियाँ हैं। एन्थ्रक्नोज बहुत ही विनाशकारी रोग है। इसका प्रभाव फल एवं पत्ती दोनों पर होता है। पत्तों की शिराओं के बीच जगह - जगह टेढ़े-मेढ़े गहरे भूरे दाग पद जाते हैं। इनके किनारे गहरे भूरे या लाल रंग के होते हैं। परन्तु मध्य भाग धंसा हुआ हलके रंग का होता है और बाद में पत्ता गिर जाता है। आरम्भ में फलों पर धब्बे हल्के रंग के होते हैं परन्तु बाद में बड़ा आकर लेकर बीच में गहरे हो जाते हैं तथा चारों ओर से लालिमा से घिर जाते हैं। इस बीमारी के नियंत्रण हेतु छंटाई के बाद प्रभावित भागों को नष्ट कर दे। कॉपर आक्सीक्लोराइड 0.2 % के घोल का छिड़काव करें एवम पत्ते निकलने पर 0.2 % बाविस्टिन का छिड़काव करें। वर्षा ऋतु में कार्बेन्डाजिम 0.2% का छिडकाव 15 दिन के अंतराल पर आवश्यक है। 

        सफ़ेद चूर्णी रोग 
        अन्य फफूंद बीमारियों की अपेक्षा यह शुष्क जलवायु में अधिक फैलाती है। प्रायः पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफ़ेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं। ये दाग धीरे - धीरे पुरे पत्तों एवं फलों पर फ़ैल जाते हैं। जिसके कारण फल गिर सकते हैं या देर से पकते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 0.2% घुलनशील गंधक, या 0.1% कैरोथेन के दो छिडकाव 10 - 15 दिन के अंतराल पर करें। 

        कीट 
        थ्रिप्स, चैफर, बीटल एवं चिडिया, पक्षी अंगूर को हानि पहुंचाते हैं। थ्रिप्स का प्रकोप मार्च से अक्तूबर तक रहता है। ये पत्तियों, शाखाओं, एवं फलों का रस चूसकर हानि पहुंचाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए 500 मिली. मेलाथियान का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें। 
        चैफर बीटल कीट रात में पत्तों को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त करता है, वर्षाकाल में 10 दिन के अंतराल पर 10 % बी.एच.सी. पावडर बुरक देना इस कीट के नियंत्रण हेतु लाभदायक पाया गया है। 
        चिडिया अंगूर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। फल पकने के समय चिडिया गुच्छे खा जाती है। अतः घर से आंगन में लगी बेल के गुच्छों को हरे रंग की मलमल की थैलियों से ढक देना चाहिए। बड़े - बड़े बगीचों में नाइलोन के जाल से ढक दें , ढोल बजाकर चिडियों से छुटकारा पाया जा सकता है। 

        फलों की गुणवत्ता-महत्वपूर्ण दिशानिर्देश

        पादप जैव विनियामकों एवं सस्यक्रियाओं द्वारा फलों की क्वालिटी में सुधार।

        भा. कृ. अ. सं. द्वारा मानसूनी वर्षा प्रारंभ हाने से पहले ही अंगूरों की अगेती तुड़ाई कर लेने की तकनीक विकसित की गयी है। जनवरी के प्रथम सप्ताह में छंटाई के तुरन्त पश्चात अंगूर बेलों पर डार्मेक्स अथवा डॉरब्रेक (30 मि.ली. का एक छिड़काव किया जाता है। इस उपचार से फल 2 से 3 सप्ताह पूर्व ही कलियां खिल जाती है तथा अंगूर पक जाते है।

        लंबे अंगूर प्राप्त करने के लिए पुष्पगुच्छों के आधा खिलने के समय उन्हें जिब्रेलिक एसिड में डुबोने सिफारिश की जाती है। ब्यूटी सीडलेस किस्म 45 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति, तथा पर्लेट, पूसा उर्वशी और पूसा सीडलेस किस्में 25-30 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति इस संबध में अनुकूल प्रतिक्रिया प्रदर्शित करती हैं।

        फल के रंग और मिठास की दृष्टि से अंगूर की क्वालिटी में सुधार लाने के साथ-साथ फलों को शीघ्र पकाने हेतु अंगूरों को मटर के दानों के बराबर के आकार में बनाए गए घोल में डुबोया जा सकता है।

        इसके अतिरिक्त, फल क्वालिटी में सुधार लाने के लिए मुखय तने की गर्डलिंग और गुच्छों में अंगूरों की सघनता कम करने जैसी क्रियाएं (थिनिंग) भी लाभदायक पाई गई है। फल आने के 4-5 दिन पश्चात गर्डलिंग चाकू की मदद से तने के चारों ओर भू-सतह से 30 सें. मी. ऊंचाई तक पतली छाल (0.5-1.0 सें. मी.) को गोलाकार हटा दिया जाता है। कैंची अथवा ब्रशिंग द्वारा पुष्पगुच्छ के एक तरफ से फलों को पूरी तरह हटाकर गुच्छों की थिनिंग की जाती है। अकेले गर्डलिंग करने से फल के भार में वृद्धि की जा सकती है लेकिन थिनिंग (छरहरापन) के साथ गर्डलिंग करने से अंगूर की मिठास (टीएसएस) में 2-3 प्रतिशत वृद्धि होती है और उन्हें एक सप्ताह अगेती पकाया जा सकता है।

        खाद कब दें

        छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए। शेष मात्र फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें।

        कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार

        अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए। ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं। परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है।

        फसल निर्धारण

        फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है। अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं। अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं। अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें।

        छल्ला विधि

        इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है। अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौड़ी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए।

        नाशीजीवों एवं बीमारियों का नियंत्रण

        पत्ती लपेटक इल्लियां पत्ती के किनारों को मध्यधारी की ओर लपेट देती है। ये इल्लियां पत्तियों की निचली बाह्‌य सतह पर पलती हैं। इस नाशीजीव के नियंत्रण हेतु 2 मि. ली. मेलाथियॉन अथवा डाइमेथोएट को प्रति लीटर पानी में 2 मि. ली. की दर से डाइमेथोएट अथवा  मेलाथियॉन का छिड़काव करने से लीफ हॉपर (पात-फुदके) को भी नियंत्रित किया जा सकता है। अंगूर की बेलों पर शल्क (स्केल) भी दिखाई पड़ते हैं जिन्हें प्रति ली. पानी में 1 मि. ली. डाइजिनॉन मिलाकर बेलों  की छंटाई के तुरंत बाद छिड़कने से सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। दीमकों के हमले से बचने के लिए 15-20 दिन के  अन्तराल पर एक बार 5 मि. ली. क्लोरोपायरीफॉस को प्रति लिटर जल में घोलकर तने पर छिड़कना तथा मिट्‌टी को इस घोल से भिगोना लाभदायक है।

        सफ़ेद चूर्णी रोग

        अन्य फफूंद बीमारियों की अपेक्षा यह शुष्क जलवायु में अधिक फैलाती है। प्रायः पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफ़ेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं। ये दाग धीरे - 

         प्रस्तावना

        हमारे देश में व्यावसायिक रूप से अंगूर की खेती पिछले लगभग छः दशकों से की जा रही है और अब आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बागवानी उद्यम के रूप से अंगूर की खेती काफी उन्नति पर है। आज महाराष्ट्र में सबसे अधिक क्षेत्र में अंगूर की खेती की जाती है तथा उत्पादन की दृष्टि से यह देश में अग्रणी है। भारत में अंगूर की उत्पादकता पूरे विश्व में सर्वोच्च है। उचित कटाई-छंटाई की तकनीक का उपयोग करते हुए मूलवृंतों के उपयोग से भारत के विभिन्‍न क्षेत्रों में अंगूर की खेती की व्‍यापक संभावनाएं उजागर हुई हैं।

        भारत में अंगूर की खेती अनूठी है क्योंकि यह, उष्ण शीतोष्ण,सभी प्रकार की जलवायु में पैदा किया जा सकता है। हालांकि अंगूर की अधिकांशतः व्यावसायिक खेती (85प्रतिशत क्षेत्र में) उष्णकटिबन्धीय जलवायु वाले क्षेत्रों में (महाराष्ट्र,कर्नाटक,आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु) तथा उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु वाले उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से ताजा अंगूर उपलब्ध नहीं होते हैं। अतः उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश तथा दिल्ली व राजस्थान के कुछ भागों में अंगूर की खेती की जा रही है, जिससे जून माह में भी अंगूर मिलते हैं।

        संस्थान द्वारा की गई पहल

        भारतीय कृषि अनुसंधान में अंगूर की खेती जननद्रव्य के संग्रहण,नए जीन प्ररूपों के प्रजनन,वृद्धि नियामकों के इस्तेमाल,सस्य तकनीकों के मानकीकरण(इनमें कटाई-छंटाई, मूल-वृन्त,जल एवं पोषकतत्वों की आवश्यकता आदि विषय भी शामिल हैं) और कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी पर वर्ष 1956 मं अनुसंधान कार्य शुरू किया गया। प्रचलन में लाने के लिए अंगूर की अनेक किस्में विकसित की गई। इन सभी किस्मों की व्यावसायिक खेती की जा रही है, तथापि इन तीनों में ही इस क्षेत्र की आदर्श किस्म बनने की दृष्टि से कोई न कोई कमी है। इसे ध्यान में रखते हुए अगेती परिपक्वता,अच्छे सरस फल के साथ उच्च पैदावार के गुणों से युक्त जीनप्ररूपों के विकास का एक सघन प्रजनन कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। भा.कृ.अं.सं. में दो सफल हाइब्रिड नामतः पूसा उर्वशी एवं पूसा नवरंग विकसित किए गए और उन्हें कई सालों तक बहु-स्थानक परीक्षणों के उपरांत 1996-97 में जारी किया गया। उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में बुवाई के लिए उपयुक्त अंगूर की किस्मों के मुखय गुण नीचे दिए गए हैं:

        भा.कृ.अ.सं. द्वारा जारी /सिफारिश की गई किस्में

        ब्यूटी सीडलेस

        मूलतः कैलिफोर्निया (यूएसए) की किस्म ब्यूटी सीडलेस एक जल्दी पकने वाला किस्म है। इसके गुच्छे शंक्वाकार व छाटे से मध्यम आकार के होते हैं। इसके दाने सरस, छोटे, गोल, गहरे लसल से लगभग काले रंग के होते है। फलों का गूदा मुलायम और हल्का सा अम्लीय होता है। फलों में एक-दो खाली व अप्पविकसित खोखले बीज हाते हैं तथा छिलका मध्यम मोटा होता है। इस किस्म में कुल घुलनशील शर्करा (टीएसएस) 18-19 प्रतिशत है। यह किस्म मध्य जून तक पकती है। तत्काल खाने की दृष्टि से यह एक उपयुक्त किस्म है।

        पर्लेट

        मूलतः कैलिफोर्निया की किस्म पर्लेट को उगाने की सिफारिश उत्तर भारत की परिस्थितियों के लिए की जाती है। यह शीघ्र पकने वाली, मध्यम प्रबल, बीजरहित तथा मीठे स्वाद वाली किस्म है। इसके गुच्छे मध्यम से लंबे, खंक्वाकार और गठे हुए होते हैं। इसका फल सरस, हरा, मुलायम गूदे और पतल छिलके वाला होता है। इस किस्म में कुल घुलनशील शर्करा (टीएसएस) 20-22 प्रतिशत है। फसल के आधे पक जाने पर जिब्रेलिक अम्ल (30 प्रति दस लक्षांश) GA3 का छिड़काव बहुत लाभदायक होता है। यह किस्म जून के दूसरे सप्ताह से पकना शुरू हो जाती है।

        पूसा सीडलेस

        लोकप्रिय किस्म पूसा सीडलेस की खेती उत्तरी भार में की जाती है। यह जून के तीसरे सप्ताह में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी लताएं समजबूत होती हैं और उनमें मध्यम से लंबे आकार के गठीले गुच्छे आते हैं। इसके दाने सरस, छोटे, बीज रहित और हरापन लिए हुए पीले रंग के हाते हैं। गूदा मुलायम और मीठा हाता हैं जिसमें कुल घुलनशील शर्करा (टी एस एस) 22 प्रतिशत है।

         

        पूसा उर्वशी (हर X ब्यूटी सीडलेस)

        पूसा उर्वशी अंगूर की एक शीघ्र पकने वाली हाइब्रिड किस्म है जिसके फल तने के आधरा पर लगने शुरू हो जाते हैं। इसके गुच्छे कम गठीले (खुले) तथा आकार में मध्यम हाते हैं जिनमें मध्यम आकार के, अंडाकार,हरापन लिए हुए पीले बीज रहित अंगूर लगते है। यह किस्म ताजा खाने तथा किशमिश बनाने हेतु उपयुक्त हैं। इस हाइब्रिड में कुल घुलनशील शर्करा (टी एस एस) का स्तर 20-22 प्रतिशत है और यह बीमारियों का प्रतिरोधी है तथा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों मंध जहां मानसून से पहले छुट-पुट वर्षा की समस्याहै, उगाए जाने के लिए अच्छी है।

        पूसा नवरंग (मेडीलाइन एंजीवाइन X रूबीरेड)

        पूसा नवरंग एक टंनटुरियर हाइब्रिड किस्म है जो जल्दी पकने वाली है। इसमें फल बेल में नीचे की ओर लगते है। इसके गुच्छे कम गठीले, मघ्यम आकर के होते हैं। तथा अंगूर मध्यम गोलाकार होते हैं। यह किस्म जूस तथा रंगीन शराब के लिए अच्छी है। यह हाइब्रिड ऐन्थ्रक्नोज बीमारी का प्रतिरोधी है तथा उपोष्ण-कटिबन्धीय क्षेत्रों में जहां मानसून से पहले छुट-पुट वर्षा की समस्या है, उगाए जाने के लिए अच्छा है।

        अंगूर की पूसा किस्मों की लोकप्रियता

        पूसा उर्वशी एवं पूसा नवरंग दोनों किस्मों के जारी होने के बाद से ही अंगूर की खेती करने वाले किसानों को आकर्षित किया है। जननद्रव्य विनिमय एवं वितरण के तहत, राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केन्द्र, पुणे, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना तथा चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर सहित विभिन्न अनुसंधान केन्द्रों को अंगूर की बेलों की कलमों की आपूर्ति की गयी। इसी प्रकार सिनौली, मेरठ (उ. प्र.); सांगली (हि.प्र.); हिन्दौर (म. प्र.) तथा रायपुर के समीप राजनंद गांव (छत्तीसगढ़); रायगढ़ (उड़ीसा) आदि के प्रगतिशील किसानों को अंगूर की कलमें उपलब्ध कराई गई जहां इनका प्रदर्शन बेहतर रहा। ऊपर बताए गए बहुत से क्षेत्र अंगूर की खेती के लिए परंपरागत क्षेत्र नहीं माने जाते। अतः पूसा अंगूर किस्मों को लोकप्रिय बनाने और विभिन्न क्षेत्रों में अंगूर की खेती की संभावना तलाशने के उद्‌देश्य से प्रगतिशील किसानों की मदद से एक सहयोगी अनुसंधान कार्यक्रम की शुरूआत की गयी।

        गैर-परंपरागत क्षेत्रों में अंगूर की सफल खेती की शुरूआत

        इस विवरण में छत्तीसगढ़ में अंगूर की खेती की सफलतम तकनीकों पर प्रकाश डाला गया है। संस्थान ने रायपुर जिले के राजनंद  गांव के निवासी एवं प्रगतिशील किसान डॉ. बी. एन पालीवाल के साथ सक्रिय सम्पर्क स्थापित किया। पारम्भ में उनके भालूकोन्हा गांव स्थित फार्म हाउस पर थॉमसन सीडलेस, पर्लेट, हिमरोद, सोनाका, तास-ए-गणेश आदि जैसी आठ किस्मों के साथ पूसा नवरंग और पूसा उर्वसी दोनों की 50-50 कलमें लगाई गई। साथ ही अंगूर की खेती की पूरी सस्य विधियां उपलब्ध कराई गई। वर्ष 1999 में फार्म हाउस की अंगूर लताओं में फल आने के उपरांत छत्तीसगढ़ जैसे अंगूर की खेती वाले गैर-परंपरागत क्षेत्र में अंगूर की सफल खेती एक  राष्ट्रीय समाचार बन गई। भा. कृ. अं. सं. के वैज्ञानिकों के सक्रिय परामर्श और खेत दौरों के परिणामस्वरूप अंगूर की खेती की विभिन्न सस्य क्रियाओं का मानकीकरण किया गया। इस सफलता से समग्र क्षेत्र की आंखें खोल दीं तथा क्षेत्र के अन्य किसानों को भी पूसा नवरंग और पूसा उर्वशी पौधों की हाइब्रिड कलमों की आपूर्ति की गई।

        वर्तमान में, लगभग 15 हैक्टर क्षेत्र में पूरी तरह से पूसा अंगूर की खेती की जाती है। इस सफलता ने राज्य के किसानों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित किया और राज्य कृषि विभाग ने रायपुर को छतीसगढ़ का अंगूर की खेती वाला जिला घोषित कर दिया है। पिछले कुछ वर्षो के दौरान स्थानीय गैर सरकारी संगठन, पालीवाल ग्रेप रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्‌यूट, भालूकोना, राजनन्द गांव के प्रयासों से अंगूर की खेती का दायरा पड़ोसी जिलों नामतः दुर्ग और कावर्धा तक बढ़ा। वर्तमान में अंगूर की व्यावसायिक खेती करने वाले 15 से अधिक प्रगतिशील किसानों ने एक सहकारी समिति का गठन किया है।

        लवण सहिष्णु मूलवृंतों का उपयोग, ड्रिप सिंचाई आदि जैसी अंगूर की खेती की नई तकनीकें काफी लोकप्रिय हो रही है। डॉ. पालीवाल के फार्म हाउस में प्राप्त नतीजे उत्साहवर्धक हैं। समुचित छंटाई तकनीक के साथ मूलवृंत के प्रयोग से उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई है। डॉगरिज मूलवृंत के इस्तेमाल से पूसा उर्वशी और पूसा नवरंग किस्माकें के अंगूरों के आकार और गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय सुधार पाया गया है। क्षेत्र में अंगूर की खेती से प्राप्त लागत : लाभ आकलन से पता चलता है कि ताजे अंगूरों के उत्पादन में जहां प्रति एकड़ 1,0,000 रूपये का लाभ है, वहीं किशमिश उत्पादन में यह लाभ बढ़कर 1,50,000 रूपये प्रति एकड़ हो जाता है।

         मृदा एवं जलवायु संबंधी आवश्यकताएं

        इस क्षेत्र के लिए मानकीकृत और अनुशंसित अंगूर उत्पादन प्रौद्योगिकी नीचे दी गई हैः

        अंगूर की खेती के लिए गर्म, शुष्क व वर्षा रहित गर्मी तथा अति ठंड वाले सर्दी के मौसमों की आवश्यकता होती है। मई -जून के दौरान फलों के पकते समय वर्षा का होना नुकसान दायक है। इससे फल की मिठास में कमी आती है, फल असमान रूप से पकता है और चटक जाता है। अंगूर की खेती  के लिए अच्छी जल-निकासी वाली मिट्‌टी बेहतर मानी जाती है। अंगूर की खेती अलग-अलग प्रकार की ऐसी मिट्‌टी मे की जा सकती है जिसमें फर्टिलाइजर का पर्याप्त उपयोग हुआ हो और उसकी अच्छी देखभाल की गई हो। रेतीली तथा बजरीदार मिट्‌टी में भी अंगूर की अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की परिस्थतियों के तहत अंगूर की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्‌टयों यथा लाल बजरी, काली मिट्‌टी, कंकड़ीली तथा कठोर सतह वाले क्षेत्रों में भी संभव है। हालांकि इस क्षेत्र में लाल बजरी और यहां तक कि रेतीली मिट्‌टी की बहुतायत है, फिर भी परिणामों से पता चलता है कि पर्याप्त उर्वरकों और सिंचाई के प्रयोग से यहां अंगूर की अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है। सामान्तः 2.5 मीटर गहराई तक की मिट्‌टी आदर्श मानी जाती है। इसका pH मान 6.5 से 8 होना चाहिए। विनिमय शील सोडियम की दर 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। किसानों को 0.3 प्रतिशत अथवा अधिक अवणता वाली मिट्‌टी में अंगूर की खेती से बचना चाहिए। समस्याग्रस्त क्षेत्रों समें अंगूर की खेती के लिए साल्ट क्रीक, डॉगरिज ओर 1613 जैसे लवण सहिष्णु मूलवृंतों के प्रयोग का सुझाव दिया जाता है जिनका प्रयोग उपरोक्त किस्मों के मूलवृंत रोपण के लिए किया जा सकता है।

        प्रवर्धन

        प्रूनिंग वुड से ली गई एक वर्षीय परिपक्व केन से तने की कटिंग कर अंगूर का प्रवर्धन आसानी से किया जा सकता है। प्रत्येक कटिंग पैंसिल जितनी मोटी व 20-25 सें. मी. लंबी होनी चाहिए जिसमें 3-4 गांठे हों। इस प्रकार तैयार की गई कलम को या तो क्यारियों में अथवा मेंड़ों पर 45 डिग्री के कोण पर रोपा जाता है। अभी हाल ही में, वेज ग्राफ्टिंग का प्रयोग करते हुए फरवरी -मार्च (सुशुप्त कलियों में अंकुरण से पूर्व) तथा जुलाई-अगस्त (वर्षा उपरान्त) के दौरान एक वर्ष पुरानी मूलवृंत की स्व-स्थाने (इन सिटू) (मूल अवस्था में) ग्राफ्टिंग की गयी है।

        रोपण

        बेलों के बीच उचित दूरी रखने के लिए रोपण से पहले किसानों को एक ले-आउट प्लान तैयार कर लेना चाहिए। सामान्य तौर पर यह दूरी इस प्रकार रखी जाती है - हैड सिस्टम में 2 मी. ग 2 मी.; ट्रेलिस सिस्टम में 3 मी. ग 3 मी.; बॉवर सिस्टम में 4 मी. ग 4 मी.; Y सिस्टम में 3 मी. ग 4 मी.।

        नवम्बर-दिसंबर के दौरान 75 सें मी. ग 75 सें. मी. आकार के गड्‌ढे खोदकर उनमें गोबर की खाद और 1000 ग्राम नीम की खली को मिट्‌टी के  साथ 1:1 अनुपात में मिला देना चाहिए। अच्छी तरह मिलाने के उपरांत इसमें  एक कि. ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट और 500 ग्रा. सल्फेट ऑफ पोटाश मिला देना चाहिए। दीमकों द्वारा संक्रमित क्षेत्रों में गड्ढों को 30-50 लीटर जल में 0.2 प्रतिशत क्लोरापइरीफॉस मिलाकर पानी से भर देना चाहिए। एक भारी सिंचाई करके मिट्‌टी को ठीक से बैठ जाने लिए छोड़ देना चाहिए। जनवरी के अंतिम सप्ताह में शाम के समय प्रत्येक गड्‌ढे में एक वर्षीय जड़ कटिंग का रोपण किया जाता है। एक पखवाड़े के बाद बेल कांट-छांट करके एक मजबूत व परिपक्व तने के रूप में रहने दिया जाता है। ऐसी बेलों का रोपण समुचित अंतराल पर किया जाना चाहिए।

        बेलों की स्थाई (ट्रेनिंग)

        यद्यपि उपोष्ण क्षेत्र के लिए बेल के आधार पर फल देने वाली किस्में अधिक उपयुक्त है लेकिन ऐसे क्षेत्र में पुष्ट बेल वाली किस्में उगाई जाती है।

        हैड सिस्टम :

        यह सिस्टम सबसे सस्ता है क्योंकि इसमें कम निवेश की जरूरत होती है। अतः यह अल्प संसाधन वाले किसानों के लिए उपयुक्त है। इस प्रणली के तहत, बेलों को एकल तने के रूप में 1.2 मी. ऊंचाई तक बढ़ाया जाता है और उनमें विभिन्न दिशाओं में अच्छी तरह से फैली हुई चार से छः शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है। बाद में ये शाखाएं लकड़ी की भांति काष्ठीय बन जाती हैं जिनमें फलों के 8-10 गुच्छे लगते हैं। छंटाई करने पर अगले वर्ष के लिए नई शाखाएं निकलती हैं। सामान्यतः अंगूर की खेती के लिए कुछ अन्य प्रणालियों को भी आजमाया जा सकता है। जिनमें प्रमुख हैः

        ट्रेलिस सिस्टम :

        हालांकि यह थोड़ी खर्चीली है, फिर भी इसे सभी अर्ध-प्रबल किस्मों हेतु अपनया जा सकता है। पौधे 3 मी. ग् 3 मी. दूरी पर रोपे जाते हैं तथा लता की शाखाओं को तार पर 2 स्तरों पर फैलने दिया जाता है। लोहे के खंभों की मदद से तार क्षैतिज बांधे जाते हैं, पहला भू-सतह से 3/4मीटर की ऊंचाई पर तथा दूसरा पहले से 25 सें. मी. ऊपर रखा जाता है।शाखाओं को मुख्य तने के दोनों और फैलने दिया जाता है।

        बॉवर, परगोला अथवा पंडाल सिस्टम :

        पौधों को 2 मी. की ऊंचाई तक एकल तने के रूप में बढ़ने दिया जाता है तथा उसके उपरांत लता को मंडप के ऊपर सभी दिशाओं में फैलने दिया जाता है। यह लता मंडप 12 गेज वाली तारो से जाली के रूप में बुना जाता है। और इस जाली को एंगल आरनपत्थरों या लकड़ी के खंभों के सहारे फैलाया जाता है। बेल की मुखयटहनियों पर फल देने वाली शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है और इनकी कटाई-छटाई प्रति वर्ष की जाती है।

        ‘Y’ ट्रेलिस सिस्टम :

        अंगूर की बेलों को विभाजित कर खुली (केनोपी) परबढ़ने दिया जाता है। ‘Y’ के आकार वाले एंगल ट्रेलिस पर 120 से 130 सें.मी. की ऊंचाई पर बांधे गए तारों पर फलदार शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है। सामन्यतः एंगल 100-110 डिग्री कोण का होता है जिसकी शाखाएं 90-120से. मी. तक फैली होती है। इस प्रणाली की सबसे लाभदायक बात यह है कि इसमें फलगुच्छों को सीधी तेज धूप से बचाया जा सकता है।

         

        अंगूर की बेलों की छंटाई

        उत्तरी भारत में, मध्य दिसंबर से मध्य जनवरी के दौरान जबकि बेलें निष्क्रिय अवस्था में होती हैं, मध्य बेल की कटाई-छंटाई प्रारंभ की जा सकती है लेकिन मध्य भारत (यथा छत्तीसगढ़) में दोहरी कटाई-छंटाई भी की जा सकती है। फल दने वाली बेलों की छंटाई सामान्यतः रोपण के 2-3 वर्ष पश्चात बेल को वांछित आकृति देने और अपनाई जा रही प्रणाली के अनुसार की जाती है। चूंकि अंगूर के गुच्छे प्रत्येक मौसम में बेल से फूटने वाली नई टहनियों पर फलते हैं, अतः पिछलें वर्ष कीटहनियों की निश्चित लंबाई तक छंटाई करना महत्वपूर्ण होता है। किस गांठ तक बेल को छांटा जाए यह किस्म की प्रबलता पर निर्भर करता है।

        अंगूर की कुछ किस्मों में छंटाई की सीमा

        खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग
        छंटाई के उपरांत बेलो पर 2.2 प्रतिशत ब्लीटॉक्स की छिड़काव करना चाहिए। पौधे के आधार पर दिखाई पड़ने वाले सभी अंकुरों को हाथ से हटा देना चाहिए।

        युवा एवं फल वहन करने वाली बेलों को पोषक तत्व प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है। सामान्यतः बेलों को पोषक तत्वों की आधी खुराक मिट्‌टी के माध्यम से तथा शेष आधी पत्तियों पर छिड़काव करके दिए जाने की सिफारिश की जाती है। विशेषकर नव विकसित पत्तियों पर सुबह के समय यूरिया (2 प्रतिशत वाले घोल) के छिड़काव की सिफारिश की जाती है। प्रति पौधा 25 कि. ग्रा. की दर से अच्छी तरह से सड़े हुए गोबर की खाद को फरवरी माह में मिट्‌टी में मिलाया जाता है। उसके उपरांत फरवरी माह में ही  बेलों की छंटाई के तुरंत बाद प्रत्येक बेल में 200 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट, 250  ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 250 ग्रा. अमोनियम सल्फेट के प्रयोग की सिफारिश की जाती है। फल लगना शुरू हाने के पश्चात अप्रैल माह में 200  ग्रा. पोटेशियम सल्फेट की दूसरी खुराक का प्रयोग किया जाता है। आयरन एवं जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए इनका 0.2 प्रतिशत की दर से छिड़काव किया जाता है।

        उपोष्ण- कटिबंधीय फलदार बेलों में उर्वरीकरण की अनुसूची

        सिंचाई

        नई रोपी गई बेलों को रोपण के पश्चात्‌ सींचा जाता है। खाद एवं उर्वरकों के प्रयोग के बाद भी सिंचाई की जानी चाहिए। यह तब और भी महत्वपूर्ण है जब फलों का विकास हो रहा हो। जैसे-जैसे फलों के रंग में परिवर्तन आने से परिपक्वता का पता चले सिंचाई की आवृत्ति कम की जा सकती है, ताकि फलों में अधिक शर्करा संचित की जा सके। यदि वर्षा न हो तो फलों की तुड़ाई के उपरांत भी सिंचाई जारी रखी जा सकती है। निष्क्रय अवधि (नवम्बर से जनवरी) के दौरान किसी प्रकार की सिंचाई की आवश्यकता नहीं है। ड्रिप सिंचाई के भी आशातीत नतीजे प्राप्त हुए हैं। शून्य (0) से 0.25 बार के मृदा नमी क्षेत्र में बंसत तथा ग्रीष्म में 5-7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। बसंत एवं ग्रीष्म में प्रति बेल 3.5 ली. जल क्षमता वाली 15 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।

        फलों की गुणवत्ता-महत्वपूर्ण दिशानिर्देश

        पादप जैव विनियामकों एवं सस्यक्रियाओं द्वारा फलों की क्वालिटी में सुधार।

        भा. कृ. अ. सं. द्वारा मानसूनी वर्षा प्रारंभ हाने से पहले ही अंगूरों की अगेती तुड़ाई कर लेने की तकनीक विकसित की गयी है। जनवरी के प्रथम सप्ताह में छंटाई के तुरन्त पश्चात अंगूर बेलों पर डार्मेक्स अथवा डॉरब्रेक (30 मि.ली. का एक छिड़काव किया जाता है। इस उपचार से फल 2 से 3 सप्ताह पूर्व ही कलियां खिल जाती है तथा अंगूर पक जाते है।

        लंबे अंगूर प्राप्त करने के लिए पुष्पगुच्छों के आधा खिलने के समय उन्हें जिब्रेलिक एसिड में डुबोने सिफारिश की जाती है। ब्यूटी सीडलेस किस्म 45 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति, तथा पर्लेट, पूसा उर्वशी और पूसा सीडलेस किस्में 25-30 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति इस संबध में अनुकूल प्रतिक्रिया प्रदर्शित करती हैं।

        फल के रंग और मिठास की दृष्टि से अंगूर की क्वालिटी में सुधार लाने के साथ-साथ फलों को शीघ्र पकाने हेतु अंगूरों को मटर के दानों के बराबर के आकार में बनाए गए घोल में डुबोया जा सकता है।

        इसके अतिरिक्त, फल क्वालिटी में सुधार लाने के लिए मुखय तने की गर्डलिंग और गुच्छों में अंगूरों की सघनता कम करने जैसी क्रियाएं (थिनिंग) भी लाभदायक पाई गई है। फल आने के 4-5 दिन पश्चात गर्डलिंग चाकू की मदद से तने के चारों ओर भू-सतह से 30 सें. मी. ऊंचाई तक पतली छाल (0.5-1.0 सें. मी.) को गोलाकार हटा दिया जाता है। कैंची अथवा ब्रशिंग द्वारा पुष्पगुच्छ के एक तरफ से फलों को पूरी तरह हटाकर गुच्छों की थिनिंग की जाती है। अकेले गर्डलिंग करने से फल के भार में वृद्धि की जा सकती है लेकिन थिनिंग (छरहरापन) के साथ गर्डलिंग करने से अंगूर की मिठास (टीएसएस) में 2-3 प्रतिशत वृद्धि होती है और उन्हें एक सप्ताह अगेती पकाया जा सकता है।

        खाद कब दें

        छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए। शेष मात्र फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें।

        कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार

        अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए। ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं। परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है।

        फसल निर्धारण

        फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है। अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं। अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं। अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें।

        छल्ला विधि

        इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है। अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौड़ी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए।

        नाशीजीवों एवं बीमारियों का नियंत्रण

        पत्ती लपेटक इल्लियां पत्ती के किनारों को मध्यधारी की ओर लपेट देती है। ये इल्लियां पत्तियों की निचली बाह्‌य सतह पर पलती हैं। इस नाशीजीव के नियंत्रण हेतु 2 मि. ली. मेलाथियॉन अथवा डाइमेथोएट को प्रति लीटर पानी में 2 मि. ली. की दर से डाइमेथोएट अथवा  मेलाथियॉन का छिड़काव करने से लीफ हॉपर (पात-फुदके) को भी नियंत्रित किया जा सकता है। अंगूर की बेलों पर शल्क (स्केल) भी दिखाई पड़ते हैं जिन्हें प्रति ली. पानी में 1 मि. ली. डाइजिनॉन मिलाकर बेलों  की छंटाई के तुरंत बाद छिड़कने से सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। दीमकों के हमले से बचने के लिए 15-20 दिन के  अन्तराल पर एक बार 5 मि. ली. क्लोरोपायरीफॉस को प्रति लिटर जल में घोलकर तने पर छिड़कना तथा मिट्‌टी को इस घोल से भिगोना लाभदायक है।

        सफ़ेद चूर्णी रोग

        अन्य फफूंद बीमारियों की अपेक्षा यह शुष्क जलवायु में अधिक फैलाती है। प्रायः पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफ़ेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं। ये दाग धीरे - धीरे पुरे पत्तों एवं फलों पर फ़ैल जाते हैं। जिसके कारण फल गिर सकते हैं या देर से पकते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 0.2% घुलनशील गंधक, या 0.1% कैरोथेन के दो छिडकाव 10 - 15 दिन के अंतराल पर करें।

        उपोष्ण क्षेत्र में अंगूर की फसल प्रायः चूर्णी फफूंद तथा एथ्रेक्नोज के प्रकोप से बच जाती है क्योंकि इनका संक्रमण भारी वर्षा हाने पर ही देखने में आया है। जून-सितम्बर के दौरान 1-1 पखवाड़े के अन्तराल पर 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स अथवा बेविस्टिन को प्रति लीटर जल में मिलाकर बने घोल का छिड़काव करने से इन बीमारियों को नियंत्रण में रखा जा सकता है।

        कीट

        • थ्रिप्स, चैफर, बीटल एवं चिडिया, पक्षी अंगूर को हानि पहुंचाते हैं। थ्रिप्स का प्रकोप मार्च से अक्तूबर तक रहता है। ये पत्तियों, शाखाओं, एवं फलों का रस चूसकर हानि पहुंचाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए 500 मिली. मेलाथियान का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें।
        • चैफर बीटल कीट रात में पत्तों को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त करता है, वर्षाकाल में 10 दिन के अंतराल पर 10 % बी.एच.सी. पावडर बुरक देना इस कीट के नियंत्रण हेतु लाभदायक पाया गया है।
        • चिड़िया अंगूर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। फल पकने के समय चिडिया गुच्छे खा जाती है। अतः घर से आंगन में लगी बेल के गुच्छों को हरे रंग की मलमल की थैलियों से ढक देना चाहिए। बड़े - बड़े बगीचों में नाइलोन के जाल से ढक दें , ढोल बजाकर चिडियों से छुटकारा पाया जा सकता है

        फलों की तुड़ाई

        गुच्छों को पूरी तरह से पकने पर तोड़ना चाहिए। फलों का पकना वांछित टी एस एस व अम्लता के अनुपात से जाना जा सकता है जो विभिन्न किस्मों में 25-35 के बीच अलग-अलग होती है (पूसा सीडलेस में 29.24)। पूसा किस्में जून के प्रथम सप्ताह में पकना आरंभ कर देती हैं। अंगूर के गुच्छों को तोड़कर प्लास्टिक की ट्रे में रखना चाहिए। गुच्छों को एक के ऊपर एक करके नहीं रखना चाहिए। गुच्छों से खेत की गर्मी को कम करने के लिए उन्हें कुछ समय तक छाया में रखना चाहिए। इसके उपरांत खराब अंगूरों को गुच्छों से हटा देना चाहिए। उत्पाद को लहरदार (कारूगेटिड) फाइबर बोर्ड बक्सों में पैक करके स्थानिय अथवा दूरवर्ती बाजार में भेजा जा सकता है।

        भंडारण एवं उपयोग

        अंगूरों को 80-90 प्रतिशत आर्द्रता एवं शून्य डिग्री तापमान पर 4 सप्ताह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जून माह में अंगूरों का अच्छा दाम मिलता है किशमिश और शराब बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर उसे अमल में लाकर भी लाभ कमाया जा सकता है।

        सस्यक्रियाओं का कैलेण्डर

        उपोष्ण कटिबंधीय अंगूर की खेती की सस्यक्रियाओं का कैलेण्डर

        जनवरी के प्रथम से द्वितीय सप्ताह तक

        परिपक्व अंगूर की कटाई-छंटाई एवं नवविकसित बेलोंक की संधाई (ट्रेनिंग)। प्रत्येक युवा एवं परिपक्व बेल में 25 कि. ग्रा. अच्छी तरह से सड़ी हुए घूरे की खाद का प्रयोग कर थियोयूरिया अथवा डॉर्मेक्स का इस्तेमाल।

        जनवरी के तीसरे से चौथे सप्ताह तक

        अंगूर की प्रत्येक बेल में 250 ग्रा.अमोनियम सल्फेट और 250 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट द्वारा उर्वरीकरण। अप्रैल का प्रथम सप्ताह : सरस फल विकास और बेहतर क्वालिटी के लिए प्रति फलदार बेल के लिए 200 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट का प्रयोग।

        अप्रैल के दूसरे सप्ताह से जून के अंत तक

        एक दिन के अन्तराल पर सिंचाई (परिपक्वता से एक सप्ताह पूर्व सिंचाई को रोक देना चाहिए)। फलों की तुड़ाई के तुरंत पश्चात्‌ एंथ्रेक्नोज के प्रकोप से बचने के लिए प्रति लीटर जल में 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स/बैविस्टिन के घोल का छिड़काव।

        जुलाई-अगस्त-सितंबर

        फलों की तुड़ाई के तुरंत बाद सितम्बर तक 15-20दिन के अंतराल पर प्रति लीटर जल में 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स के घोल का छिड़काव।

        नवम्बर-दिसम्बर

        प्रति लीटर 3 ग्रा. ब्लीटाक्स के घोल का जल के साथ अन्तिम छिड़काव।

        मान्यता

        भा. कृ.अ. सं. के प्रधान वैज्ञानिक एवं अंगूर प्रजनक स्वर्गीय डॉ, पी.सी. जिंदल तथा छत्तीसगढ़ के प्रगतिशील किसान डॉ. बी. एन.पालीवाल के उललेखनीय प्रयासों को राज्य सरकार द्वारा मान्यता दी गई है। सरकार के अनेक गण्यमान्य पदाधिकारियों ने प्रायोगिक फार्म का दौरा किया। डॉ. जिंदल एवं डॉ. पॉलीवाल के योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए वर्ष 2003 में राज्य कृषि विभाग एवं जिला क्लेक्ट्रेट, रायपुर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित राज्य बागवानी प्रदर्शनी में छत्तीसगढ़ राज्य के कृषि एवं उद्योग मंत्री ने डॉ. जिंदल एवं डॉ. पॉलीवाल को रजत पटि्‌टका व प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित किया। इस सफलता से उत्साहित होकर पड़ोसी राज्य उड़ीसा के सीमावर्ती जिलों के किसानों ने भी उपोष्ण कटिबंधीय अंगूर की खेती करना प्रारंभ कर दिया है। 'द ग्रेप ग्रोअर्स कॉआपरेटिव ऑफ छत्तीसगढ़' द्वारा अब अपने उत्पादों के प्रसंस्करण हेतु किशमिश तथा शराब बनाने का संयंत्र स्थापित करने की योजना तैयार की जा रही है।

        अंगूर से किशमिश बनाने की विधि

        किशमिश बनाने के लिए अंगूर की ऐसी किस्म का चयन किया जाता है जिसमें कम से कम 20 फीसदी मिठास हो। किशमिश को तैयार करने की तीन विधियां हैं- पहली- प्राकृतिक प्रक्रिया, दूसरी-गंधक प्रक्रिया और तीसरी-कृत्रिम प्रक्रिया। पहली प्राकृतिक प्रक्रिया में अंगूर को गुच्छों से तोड़ने के बाद सुखाने के लिए 9क् सेंटीमीटर लंबी और 60 सेंटीमीटर चौड़ी ट्रे या

        60 सेंटीमीटर लंबी और 45 सेंटीमीटर चौड़ी ट्रे, जिसके नीचे प्लाई-वुड या लकड़ी की पट्टियां लगी हुई हों, में अंगूरों को अच्छी तरह फैला दें। फिर तेज धूप में 6-7 दिन तक रखें। अंगूरों को प्रतिदिन उलटते-पलटते रहें। इसके पश्चात ट्रे को छायादार स्थान पर रख दें, जहां अच्छी तरह हवा लगे सके। छायादार स्थान में सुखाने से किशमिश मुलायम रहती है और इसका इसका रंग भी खराब नहीं होता है। तैयार किशमिश में 15 फीसदी नमी रहनी चाहिए। गंधक प्रक्रिया से किशमिश बनाने पर उसका रंग बिल्कुल नहीं बदलता है। इसका मतलब है कि इस प्रक्रिया से बनी किशमिश हरी रहती है। धूप में सुखाने से किशमिश का रंग थोड़ा भूरा हो जाता है।

        इसे रोकने के लिए गंधक के धुएं का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया के लिए ताजे अंगूरों को गंधक के धुएं से भर कक्ष में लकड़ी की ट्रे पर किशमिश बिछा देते हैं। कमर के भीतर गंधक के धुएं के फैलने का पर्याप्त इंतजाम होना चाहिए। अंगूरों पर तेल की परत भी चढ़ाई जा सकती है। इसके लिए नारियल या मूंगफली तेल का उपयोग किया जाता है। तेल लगाने से किशमिश चमकीली हो जाती है और इसे लंबे समय तक भंडारित किया जा सकता है। कृत्रिम प्रक्रिया से किशमिश बनाने के लिए माइक्रोवेव किरणों से अंगूरों को सुखाया जाता है। इस प्रक्रिया से अंगूर में मौजूद पानी भाप बनकर उड़ जाता है और किशशि की गुणवत्ता भी बनी रहती है। इस प्रक्रिया से 90 फीसदी समय की बचत होती है। अंगूर एक समान सूखता है, जिससे फल का रंग, खुशबू व पोषक तत्व ताजे फल जैसे बने रहते हैं। तैयार किशमिश को शीशे के मर्तबान या पॉलीथीन की थैलियों में बंद करके किसी साफ सुथर हवादार स्थान पर रखना चाहिए।

         

        अंगूर का शरबत

        ठीक से सफाई करने के बाद अंगूर के बराबर मात्रा में पानी डालकर उसे 10 मिनट तक पका लें। यह ध्यान रहे कि पानी का तापमान 60-70 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक न हो। उबले अंगूरों को छलनी में रगड़कर रस निकाल लें। बड़े पैमाने पर शरबत तैयार करना हो, तब बाल्टी के तले में छोटे छेद करके भी उबले अंगूरों से निकाला जा सकता है। एक अलग बर्तन में चाशनी तैयार करके उसमें सिट्रिक एसिड डाल दें। प्रति लीटर चाशनी में 8-10 ग्राम सिट्रिक एसिड डालना चाहिए। इसके बाद इसे डालकर ठंडी होने। बाद में अंगूर से निकाला रस मिला लें। तैयार रस में प्रति लीटर एक ग्राम के हिसाब से पोटेशियम मेटाबाइ सल्फाइट मिलाएं। पोटेशियम मेटाबाइ सल्फाइट पूर शरबत में एकसाथ मिलने के बजाय छोटी कटोरी में पहले मिलाए और बाद में उसे पूर शरबत में मिलाएं। इस शरबत को साफ बोतल में भरकर ठंडे स्थान में रखें। अंगूरों के बजाय इससे बने उत्पादों का बाजार में कहीं बेहतर दाम मिलेगा। एक फायदा यह भी है कि उत्पादकों पर ताजे अंगूर बेचने का दबाव भी नहीं होगा। इससे उन्हें कम दाम पर अंगूर नहीं बेचने होंगे।                                     

         

                                                अंगूर की आधुनिक खेती

        अंगूर संसार के उपोष्ण कटिबंध के फलों में विशेष महत्व रखता है। हमारे देश में लगभग 620 ई.पूर्व ही उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अंगूर की व्यवसायिक खेती एक लाभकारी उद्यम के रूप में विकसित हो गई थी लेकिन उत्तरी भारत में व्यवसायिक उत्पादन धीरे - धीरे बहुत देर से शुरू हुआ। आज अंगूर ने उत्तर भारत में भी एक महत्वपूर्ण फल के रूप में अपना स्थान बना लिया है और इन क्षेत्रों में इसका क्षेत्रफल काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है। पिछले तीन दशकों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अंगूर कि खेती ने प्रगति की है जिसके फलस्वरूप भारत में अंगूर के उत्पादन, उत्पादकता एवं क्षेत्रफल में अपेक्षा से अधिक वृद्धि होती जा रही है। 

        उपयोग 
        अंगूर एक स्वादिष्ट फल है। भारत में अंगूर अधिकतर ताजा ही खाया जाता है वैसे अंगूर के कई उपयोग हैं। इससे किशमिश, रस एवं मदिरा भी बनाई जाती है। 

        मिट्टी एवं जलवायु 
        अंगूर की जड़ की संरचना काफी मजबूत होती है। अतः यह कंकरीली,रेतीली से चिकनी तथा उथली से लेकर गहरी मिट्टियों में सफलतापूर्वक पनपता है लेकिन रेतीली, दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो अंगूर की खेती के लिए उचित पाई गयी है। अधिक चिकनी मिट्टी में इसकी खेती न करे तो बेहतर है। अंगूर लवणता के प्रति कुछ हद तक सहिष्णु है। जलवायु का फल के विकास तथा पके हुए अंगूर की बनावट और गुणों पर काफी असर पड़ता है। इसकी खेती के लिए गर्म, शुष्क, तथा दीर्घ ग्रीष्म ऋतू अनुकूल रहती है। अंगूर के पकते समय वर्षा या बादल का होना बहुत ही हानिकारक है। इससे दाने फट जाते हैं और फलों की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ता है। अतः उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों की सिफारिश की जाती है। 

        किस्में 
        उत्तर भारत में लगाई जाने वाली कुछ किस्मों की विशेषताएं नीचे दी जा रही हैं। 

        परलेट 
        यह उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों में से एक है। इसकी बेल अधिक फलदायी तथा ओजस्वी होती है। गुच्छे माध्यम, बड़े तथा गठीले होते हैं एवं फल सफेदी लिए हरे तथा गोलाकार होते हैं। फलों में 18 - 19 तक घुलनशील ठोस पदार्थ होते हैं। गुच्छों में छोटे - छोटे अविकसित फलों का होना इस किस्म की मुख्य समस्या है। 

        ब्यूटी सीडलेस 
        यह वर्षा के आगमन से पूर्व मई के अंत तक पकने वाली किस्म है गुच्छे मध्यम से बड़े लम्बे तथा गठीले होते हैं। फल मध्यम आकर के गोलाकार बीज रहित एवं काले होते हैं। जिनमे लगभग 17 - 18 घुलनशील ठोस तत्त्व पाए जाते हैं। 

        पूसा सीडलेस 
        इस किस्म के कई गुण 'थाम्पसन सीडलेस' किस्म से मेल खाते हैं। यह जून के तीसरे सप्ताह तक पकना शुरू होती है। गुच्छे मध्यम, लम्बे, बेलनाकार सुगन्धयुक्त एवं गठे हुए होते हैं। फल छोटे एवं अंडाकार होते हैं। पकने पर हरे पीले सुनहरे हो जाते हैं। फल खाने के अतिरिक्त अच्छी किशमिश बनाने के लिए उपयुक्त है। 

        पूसा नवरंग 
        यह संकर किस्म भी हाल ही में भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित की गयी है। यह शीघ्र पकने वाली काफी उपज देने वाली किस्म है। गुच्छे मध्यम आकर के होते हैं। फल बीजरहित, गोलाकार एवं काले रंग के होते हैं। इस किस्म में गुच्छा भी लाल रंग का होता है। यह किस्म रस एवं मदिरा बनाने के लिए उपयुक्त है। 

        प्रवर्धन 
        अंगूर का प्रवर्धन मुख्यतः कटिंग कलम द्वारा होता है। जनवरी माह में काट छाँट से निकली टहनियों से कलमे ली जाती हैं। कलमे सदैव स्वस्थ एवं परिपक्व टहनियों से लिए जाने चाहिए। सामान्यतः 4 - 6 गांठों वाली 23 - 45 से.मी. लम्बी कलमें ली जाती हैं।कलम बनाते समय यह ध्यान रखें कि कलम का निचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए एवं ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए। इन कलमों को अच्छी प्रकार से तैयार की गयी तथा सतह से ऊँची क्यारियों में लगा देते हैं। एक वर्ष पुरानी जड़युक्त कलमों को जनवरी माह में नर्सरी से निकल कर खेत में रोपित कर देते हैं। 

        बेलों की रोपाई 
        रोपाई से पूर्व मिट्टी की जाँच अवश्य करवा लें। खेत को भलीभांति तैयार कर लें। बेल की बीच की दुरी किस्म विशेष एवं साधने की पद्धति पर निर्भर करती है। इन सभी चीजों को ध्यान में रख कर 90 x 90 से.मी. आकर के गड्ढे खोदने के बाद उन्हें 1/2 भाग मिट्टी, 1/2 भाग गोबर की सड़ी हुई खाद एवं 30 ग्राम क्लोरिपाईरीफास, 1 कि.ग्रा. सुपर फास्फेट व 500 ग्राम पोटेशीयम सल्फेट आदि को अच्छी तरह मिलाकर भर दें। जनवरी माह में इन गड्ढों में 1 साल पुरानी जड़वाली कलमों को लगा दें। बेल लगाने के तुंरत बाद पानी आवश्यक है। 

        बेलों की सधाई एवं छंटाई 
        बेलों से लगातार अच्छी फसल लेने के लिए एवं उचित आकर देने के लिए साधना एवं काट - छाँट की सिफारिश की जाती है। बेल को उचित आकर देने के लिए इसके अनचाहे भाग के काटने को साधना कहते हैं, एवं बेल में फल लगने वाली शाखाओं को सामान्य रूप से वितरण हेतु किसी भी हिस्से की छंटनी को छंटाई कहतें हैं। 
        अंगूर की बेल साधने हेतु पण्डाल, बाबर, टेलीफोन, निफिन एवं हैड आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं। लेकिन व्यवसायिक इतर पर पण्डाल पद्धति ही अधिक उपयोगी सिद्ध हुयी है। पण्डाल पद्धति द्वारा बेलों को साधने हेतु 2.1 - 2.5 मीटर ऊँचाई पर कंक्रीट के खंभों के सहारे लगी तारों के जाल पर बेलों को फैलाया जाता है। जाल तक पहुँचने के लिए केवल एक ही ताना बना दिया जाता है। तारों के जाल पर पहुँचने पर ताने को काट दिया जाता है ताकि पार्श्व शाखाएँ उग आयें।उगी हुई प्राथमिक शाखाओं पर सभी दिशाओं में 60 सेमी दूसरी पार्श्व शाखाओं के रूप में विकसित किया जाता है। इस तरह द्वितीयक शाखाओं से 8 - 10 तृतीयक शाखाएँ विकसित होंगी इन्ही शाखाओं पर फल लगते हैं। 

        छंटाई 
        बेलों से लगातार एवं अच्छी फसल लेने के लिए उनकी उचित समय पर काट - छाँट अति आवश्यक है। छंटाई कब करें : जब बेल सुसुप्त अवस्था में हो तो छंटाई की जा सकती है, परन्तु कोंपले फूटने से पहले प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए। सामान्यतः काट - छांट जनवरी माह में की जाती है। 

        कितनी छंटाई करें 
        छंटाई की प्रक्रिया में बेल के जिस भाग में फल लगें हों, उसके बढे हुए भाग को कुछ हद तक काट देते हैं। यह किस्म विशेष पर निर्भर करता है। किस्म के अनुसार कुछ स्पर को केवल एक अथवा दो आँख छोड़कर शेष को काट देना चाहिए। इन्हें 'रिनिवल स्पर' कहते हैं। आमतौर पर जिन शाखाओं पर फल लग चुके हों उन्हें ही रिनिवल स्पर के रूप में रखते हैं। 
        छंटाई करते समय रोगयुक्त एवं मुरझाई हुई शाखाओं को हटा दें एवं बेलों पर ब्लाईटोक्स 0.2 % का छिडकाव अवश्य करें। 
        किस्म कितनी आँखें छोडें 
        1 ब्यूटी सीडलेस 3 - 3 
        2 परलेट 3-4 
        3 पूसा उर्वसी 3-5 
        4 पूसा नवरंग 3-5 
        5 पूसा सीडलेस 8-10 

        सिंचाई 
        नवम्बर से दिसम्बर माह तक सिंचाई की खास आवश्यकता नहीं होती क्योंकि बेल सुसुप्ता अवस्था में होती है लेकिन छंटाई के बाद सिंचाई आवश्यक होती है। फूल आने तथा पूरा फल बनने (मार्च से मई ) तक पानी की आवश्यकता होती है। क्योंकि इस दौरान पानी की कमी से उत्पादन एवं हुन्वात्ता दोनों पर बुरा असर पड़ता है। इस दौरान तापमान तथा पर्यावरण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 7 - 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। फल पकने की प्रक्रिया शुरू होते ही पानी बंद कर देना चाहिए नहीं तो फल फट एवं सड़ सकते हैं। फलों की तुडाई के बाद भी एक सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए। 

        खाद एवं उर्वरक 
        अंगूर की बेल भूमि से काफी मात्र में पोषक तत्वों को ग्रहण करती है। अतः मिट्टी कि उर्वरता बनाये रखने के लिए एवं लगातार अच्छी गुणवत्ता वाली फसल लेने के लिए यह आवश्यक है की खाद और उर्वरकों द्वारा पोषक तत्वों की पूर्ति की जाये। पण्डाल पद्धति से साधी गई एवं 3 x 3 मी. की दुरी पर लगाई गयी अंगूर की 5 वर्ष की बेल में लगभग 500 ग्राम नाइट्रोजन, 700 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश, 700 ग्राम पोटेशियम सल्फेट एवं 50 - 60 कि.ग्रा. गोबर की खाद की आवश्यकता होती है। 

        खाद कब दें 
        छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए। शेष मात्र फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें। 

        कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार 
        अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए। ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं। परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है। 

        फसल निर्धारण 
        फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है। अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं। अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं। अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें। 

        छल्ला विधि 
        इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है। अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौडी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए। 

        वृद्धि नियंत्रकों का उपयोग 
        बीज रहित किस्मों में जिब्बरेलिक एसिड का प्रयोग करने से दानो का आकर दो गुना होता है। पूसा सीडलेस किस्म में पुरे फूल आने पर 45 पी.पी.एम. 450 मि.ग्रा. प्रति 10 ली. पानी में, ब्यूटी सीडलेस मने आधा फूल खिलने पर 45 पी.पी.एम. एवं परलेट किस्म में भी आधे फूल खिलने पर 30 पी.पी.एम का प्रयोग करना चाहिए। जिब्बरेलिक एसिड के घोल का या तो छिडकाव किया जाता है या फिर गुच्छों को आधे मिनट तक इस घोल में डुबाया जाता है। यदि गुच्छों को 500 पी.पी.एम 5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी में इथेफ़ोन में डुबाया जाये तो फलों में अम्लता की कमी आती है। फल जल्दी पकते हैं एवं रंगीन किस्मों में दानों पर रंग में सुधार आता है। यदि जनवरी के प्रारंभ में डोरमैक्स 3 का छिडकाव कर दिया जाये तो अंगूर 1 - 2 सप्ताह जल्दी पक सकते हैं। 

        फल तुड़ाई एवं उत्पादन 
        अंगूर तोड़ने के पश्चात् पकते नहीं हैं, अतः जब खाने योग्य हो जाये अथवा बाजार में बेचना हो तो उसी समय तोड़ना चाहिए। शर्करा में वृद्धि एवं तथा अम्लता में कमी होना फल पकने के लक्षण हैं। फलों की तुडाई प्रातः काल या सायंकाल में करनी चाहिए। उचित कीमत लेने के लिए गुच्छों का वर्गीकरण करें। पैकिंग के पूर्व गुच्छों से टूटे एवं गले सड़े दानों को निकाल दें। अंगूर के अच्छे रख - रखाव वाले बाग़ से तीन वर्ष पश्चात् फल मिलना शुरू हो जाते हैं और 2 - 3 दशक तक फल प्राप्त किये जा सकते हैं। परलेट किस्म के 14 - 15 साल के बगीचे से 30 - 35 टन एवं पूसा सीडलेस से 15 - 20 टन प्रति हैक्टेयर फल लिया जा सकता है। 

        बीमारियाँ एवं कीट 
        बीमारियाँ 
        उत्तरी भारत में अंगूर को मुख्यतः एन्थ्रक्नोज एवं सफ़ेद चुरनी रोग ही मुख्य बीमारियाँ हैं। एन्थ्रक्नोज बहुत ही विनाशकारी रोग है। इसका प्रभाव फल एवं पत्ती दोनों पर होता है। पत्तों की शिराओं के बीच जगह - जगह टेढ़े-मेढ़े गहरे भूरे दाग पद जाते हैं। इनके किनारे गहरे भूरे या लाल रंग के होते हैं। परन्तु मध्य भाग धंसा हुआ हलके रंग का होता है और बाद में पत्ता गिर जाता है। आरम्भ में फलों पर धब्बे हल्के रंग के होते हैं परन्तु बाद में बड़ा आकर लेकर बीच में गहरे हो जाते हैं तथा चारों ओर से लालिमा से घिर जाते हैं। इस बीमारी के नियंत्रण हेतु छंटाई के बाद प्रभावित भागों को नष्ट कर दे। कॉपर आक्सीक्लोराइड 0.2 % के घोल का छिड़काव करें एवम पत्ते निकलने पर 0.2 % बाविस्टिन का छिड़काव करें। वर्षा ऋतु में कार्बेन्डाजिम 0.2% का छिडकाव 15 दिन के अंतराल पर आवश्यक है। 

        सफ़ेद चूर्णी रोग 
        अन्य फफूंद बीमारियों की अपेक्षा यह शुष्क जलवायु में अधिक फैलाती है। प्रायः पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफ़ेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं। ये दाग धीरे - धीरे पुरे पत्तों एवं फलों पर फ़ैल जाते हैं। जिसके कारण फल गिर सकते हैं या देर से पकते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 0.2% घुलनशील गंधक, या 0.1% कैरोथेन के दो छिडकाव 10 - 15 दिन के अंतराल पर करें। 

        कीट 
        थ्रिप्स, चैफर, बीटल एवं चिडिया, पक्षी अंगूर को हानि पहुंचाते हैं। थ्रिप्स का प्रकोप मार्च से अक्तूबर तक रहता है। ये पत्तियों, शाखाओं, एवं फलों का रस चूसकर हानि पहुंचाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए 500 मिली. मेलाथियान का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें। 
        चैफर बीटल कीट रात में पत्तों को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त करता है, वर्षाकाल में 10 दिन के अंतराल पर 10 % बी.एच.सी. पावडर बुरक देना इस कीट के नियंत्रण हेतु लाभदायक पाया गया है। 
        चिडिया अंगूर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। फल पकने के समय चिडिया गुच्छे खा जाती है। अतः घर से आंगन में लगी बेल के गुच्छों को हरे रंग की मलमल की थैलियों से ढक देना चाहिए। बड़े - बड़े बगीचों में नाइलोन के जाल से ढक दें , ढोल बजाकर चिडियों से छुटकारा पाया जा सकता है। 

        फलों की गुणवत्ता-महत्वपूर्ण दिशानिर्देश

        पादप जैव विनियामकों एवं सस्यक्रियाओं द्वारा फलों की क्वालिटी में सुधार।

        भा. कृ. अ. सं. द्वारा मानसूनी वर्षा प्रारंभ हाने से पहले ही अंगूरों की अगेती तुड़ाई कर लेने की तकनीक विकसित की गयी है। जनवरी के प्रथम सप्ताह में छंटाई के तुरन्त पश्चात अंगूर बेलों पर डार्मेक्स अथवा डॉरब्रेक (30 मि.ली. का एक छिड़काव किया जाता है। इस उपचार से फल 2 से 3 सप्ताह पूर्व ही कलियां खिल जाती है तथा अंगूर पक जाते है।

        लंबे अंगूर प्राप्त करने के लिए पुष्पगुच्छों के आधा खिलने के समय उन्हें जिब्रेलिक एसिड में डुबोने सिफारिश की जाती है। ब्यूटी सीडलेस किस्म 45 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति, तथा पर्लेट, पूसा उर्वशी और पूसा सीडलेस किस्में 25-30 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति इस संबध में अनुकूल प्रतिक्रिया प्रदर्शित करती हैं।

        फल के रंग और मिठास की दृष्टि से अंगूर की क्वालिटी में सुधार लाने के साथ-साथ फलों को शीघ्र पकाने हेतु अंगूरों को मटर के दानों के बराबर के आकार में बनाए गए घोल में डुबोया जा सकता है।

        इसके अतिरिक्त, फल क्वालिटी में सुधार लाने के लिए मुखय तने की गर्डलिंग और गुच्छों में अंगूरों की सघनता कम करने जैसी क्रियाएं (थिनिंग) भी लाभदायक पाई गई है। फल आने के 4-5 दिन पश्चात गर्डलिंग चाकू की मदद से तने के चारों ओर भू-सतह से 30 सें. मी. ऊंचाई तक पतली छाल (0.5-1.0 सें. मी.) को गोलाकार हटा दिया जाता है। कैंची अथवा ब्रशिंग द्वारा पुष्पगुच्छ के एक तरफ से फलों को पूरी तरह हटाकर गुच्छों की थिनिंग की जाती है। अकेले गर्डलिंग करने से फल के भार में वृद्धि की जा सकती है लेकिन थिनिंग (छरहरापन) के साथ गर्डलिंग करने से अंगूर की मिठास (टीएसएस) में 2-3 प्रतिशत वृद्धि होती है और उन्हें एक सप्ताह अगेती पकाया जा सकता है।

        खाद कब दें

        छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए। शेष मात्र फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें।

        कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार

        अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए। ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं। परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है।

        फसल निर्धारण

        फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है। अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं। अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं। अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें।

        छल्ला विधि

        इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है। अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौड़ी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए।

        नाशीजीवों एवं बीमारियों का नियंत्रण

        पत्ती लपेटक इल्लियां पत्ती के किनारों को मध्यधारी की ओर लपेट देती है। ये इल्लियां पत्तियों की निचली बाह्‌य सतह पर पलती हैं। इस नाशीजीव के नियंत्रण हेतु 2 मि. ली. मेलाथियॉन अथवा डाइमेथोएट को प्रति लीटर पानी में 2 मि. ली. की दर से डाइमेथोएट अथवा  मेलाथियॉन का छिड़काव करने से लीफ हॉपर (पात-फुदके) को भी नियंत्रित किया जा सकता है। अंगूर की बेलों पर शल्क (स्केल) भी दिखाई पड़ते हैं जिन्हें प्रति ली. पानी में 1 मि. ली. डाइजिनॉन मिलाकर बेलों  की छंटाई के तुरंत बाद छिड़कने से सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। दीमकों के हमले से बचने के लिए 15-20 दिन के  अन्तराल पर एक बार 5 मि. ली. क्लोरोपायरीफॉस को प्रति लिटर जल में घोलकर तने पर छिड़कना तथा मिट्‌टी को इस घोल से भिगोना लाभदायक है।

        सफ़ेद चूर्णी रोग

        अन्य फफूंद बीमारियों की अपेक्षा यह शुष्क जलवायु में अधिक फैलाती है। प्रायः पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफ़ेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं। ये दाग धीरे - 

         प्रस्तावना

        हमारे देश में व्यावसायिक रूप से अंगूर की खेती पिछले लगभग छः दशकों से की जा रही है और अब आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बागवानी उद्यम के रूप से अंगूर की खेती काफी उन्नति पर है। आज महाराष्ट्र में सबसे अधिक क्षेत्र में अंगूर की खेती की जाती है तथा उत्पादन की दृष्टि से यह देश में अग्रणी है। भारत में अंगूर की उत्पादकता पूरे विश्व में सर्वोच्च है। उचित कटाई-छंटाई की तकनीक का उपयोग करते हुए मूलवृंतों के उपयोग से भारत के विभिन्‍न क्षेत्रों में अंगूर की खेती की व्‍यापक संभावनाएं उजागर हुई हैं।

        भारत में अंगूर की खेती अनूठी है क्योंकि यह, उष्ण शीतोष्ण,सभी प्रकार की जलवायु में पैदा किया जा सकता है। हालांकि अंगूर की अधिकांशतः व्यावसायिक खेती (85प्रतिशत क्षेत्र में) उष्णकटिबन्धीय जलवायु वाले क्षेत्रों में (महाराष्ट्र,कर्नाटक,आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु) तथा उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु वाले उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से ताजा अंगूर उपलब्ध नहीं होते हैं। अतः उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश तथा दिल्ली व राजस्थान के कुछ भागों में अंगूर की खेती की जा रही है, जिससे जून माह में भी अंगूर मिलते हैं।

        संस्थान द्वारा की गई पहल

        भारतीय कृषि अनुसंधान में अंगूर की खेती जननद्रव्य के संग्रहण,नए जीन प्ररूपों के प्रजनन,वृद्धि नियामकों के इस्तेमाल,सस्य तकनीकों के मानकीकरण(इनमें कटाई-छंटाई, मूल-वृन्त,जल एवं पोषकतत्वों की आवश्यकता आदि विषय भी शामिल हैं) और कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी पर वर्ष 1956 मं अनुसंधान कार्य शुरू किया गया। प्रचलन में लाने के लिए अंगूर की अनेक किस्में विकसित की गई। इन सभी किस्मों की व्यावसायिक खेती की जा रही है, तथापि इन तीनों में ही इस क्षेत्र की आदर्श किस्म बनने की दृष्टि से कोई न कोई कमी है। इसे ध्यान में रखते हुए अगेती परिपक्वता,अच्छे सरस फल के साथ उच्च पैदावार के गुणों से युक्त जीनप्ररूपों के विकास का एक सघन प्रजनन कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। भा.कृ.अं.सं. में दो सफल हाइब्रिड नामतः पूसा उर्वशी एवं पूसा नवरंग विकसित किए गए और उन्हें कई सालों तक बहु-स्थानक परीक्षणों के उपरांत 1996-97 में जारी किया गया। उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में बुवाई के लिए उपयुक्त अंगूर की किस्मों के मुखय गुण नीचे दिए गए हैं:

        भा.कृ.अ.सं. द्वारा जारी /सिफारिश की गई किस्में

         

        ब्यूटी सीडलेस

        मूलतः कैलिफोर्निया (यूएसए) की किस्म ब्यूटी सीडलेस एक जल्दी पकने वाला किस्म है। इसके गुच्छे शंक्वाकार व छाटे से मध्यम आकार के होते हैं। इसके दाने सरस, छोटे, गोल, गहरे लसल से लगभग काले रंग के होते है। फलों का गूदा मुलायम और हल्का सा अम्लीय होता है। फलों में एक-दो खाली व अप्पविकसित खोखले बीज हाते हैं तथा छिलका मध्यम मोटा होता है। इस किस्म में कुल घुलनशील शर्करा (टीएसएस) 18-19 प्रतिशत है। यह किस्म मध्य जून तक पकती है। तत्काल खाने की दृष्टि से यह एक उपयुक्त किस्म है।

        पर्लेट

        मूलतः कैलिफोर्निया की किस्म पर्लेट को उगाने की सिफारिश उत्तर भारत की परिस्थितियों के लिए की जाती है। यह शीघ्र पकने वाली, मध्यम प्रबल, बीजरहित तथा मीठे स्वाद वाली किस्म है। इसके गुच्छे मध्यम से लंबे, खंक्वाकार और गठे हुए होते हैं। इसका फल सरस, हरा, मुलायम गूदे और पतल छिलके वाला होता है। इस किस्म में कुल घुलनशील शर्करा (टीएसएस) 20-22 प्रतिशत है। फसल के आधे पक जाने पर जिब्रेलिक अम्ल (30 प्रति दस लक्षांश) GA3 का छिड़काव बहुत लाभदायक होता है। यह किस्म जून के दूसरे सप्ताह से पकना शुरू हो जाती है।

        पूसा सीडलेस

        लोकप्रिय किस्म पूसा सीडलेस की खेती उत्तरी भार में की जाती है। यह जून के तीसरे सप्ताह में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी लताएं समजबूत होती हैं और उनमें मध्यम से लंबे आकार के गठीले गुच्छे आते हैं। इसके दाने सरस, छोटे, बीज रहित और हरापन लिए हुए पीले रंग के हाते हैं। गूदा मुलायम और मीठा हाता हैं जिसमें कुल घुलनशील शर्करा (टी एस एस) 22 प्रतिशत है।

        पूसा उर्वशी (हर X ब्यूटी सीडलेस)

        पूसा उर्वशी अंगूर की एक शीघ्र पकने वाली हाइब्रिड किस्म है जिसके फल तने के आधरा पर लगने शुरू हो जाते हैं। इसके गुच्छे कम गठीले (खुले) तथा आकार में मध्यम हाते हैं जिनमें मध्यम आकार के, अंडाकार,हरापन लिए हुए पीले बीज रहित अंगूर लगते है। यह किस्म ताजा खाने तथा किशमिश बनाने हेतु उपयुक्त हैं। इस हाइब्रिड में कुल घुलनशील शर्करा (टी एस एस) का स्तर 20-22 प्रतिशत है और यह बीमारियों का प्रतिरोधी है तथा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों मंध जहां मानसून से पहले छुट-पुट वर्षा की समस्याहै, उगाए जाने के लिए अच्छी है।

        पूसा नवरंग (मेडीलाइन एंजीवाइन X रूबीरेड)

        पूसा नवरंग एक टंनटुरियर हाइब्रिड किस्म है जो जल्दी पकने वाली है। इसमें फल बेल में नीचे की ओर लगते है। इसके गुच्छे कम गठीले, मघ्यम आकर के होते हैं। तथा अंगूर मध्यम गोलाकार होते हैं। यह किस्म जूस तथा रंगीन शराब के लिए अच्छी है। यह हाइब्रिड ऐन्थ्रक्नोज बीमारी का प्रतिरोधी है तथा उपोष्ण-कटिबन्धीय क्षेत्रों में जहां मानसून से पहले छुट-पुट वर्षा की समस्या है, उगाए जाने के लिए अच्छा है।

        अंगूर की पूसा किस्मों की लोकप्रियता

        पूसा उर्वशी एवं पूसा नवरंग दोनों किस्मों के जारी होने के बाद से ही अंगूर की खेती करने वाले किसानों को आकर्षित किया है। जननद्रव्य विनिमय एवं वितरण के तहत, राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केन्द्र, पुणे, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना तथा चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर सहित विभिन्न अनुसंधान केन्द्रों को अंगूर की बेलों की कलमों की आपूर्ति की गयी। इसी प्रकार सिनौली, मेरठ (उ. प्र.); सांगली (हि.प्र.); हिन्दौर (म. प्र.) तथा रायपुर के समीप राजनंद गांव (छत्तीसगढ़); रायगढ़ (उड़ीसा) आदि के प्रगतिशील किसानों को अंगूर की कलमें उपलब्ध कराई गई जहां इनका प्रदर्शन बेहतर रहा। ऊपर बताए गए बहुत से क्षेत्र अंगूर की खेती के लिए परंपरागत क्षेत्र नहीं माने जाते। अतः पूसा अंगूर किस्मों को लोकप्रिय बनाने और विभिन्न क्षेत्रों में अंगूर की खेती की संभावना तलाशने के उद्‌देश्य से प्रगतिशील किसानों की मदद से एक सहयोगी अनुसंधान कार्यक्रम की शुरूआत की गयी।

        गैर-परंपरागत क्षेत्रों में अंगूर की सफल खेती की शुरूआत

        इस विवरण में छत्तीसगढ़ में अंगूर की खेती की सफलतम तकनीकों पर प्रकाश डाला गया है। संस्थान ने रायपुर जिले के राजनंद  गांव के निवासी एवं प्रगतिशील किसान डॉ. बी. एन पालीवाल के साथ सक्रिय सम्पर्क स्थापित किया। पारम्भ में उनके भालूकोन्हा गांव स्थित फार्म हाउस पर थॉमसन सीडलेस, पर्लेट, हिमरोद, सोनाका, तास-ए-गणेश आदि जैसी आठ किस्मों के साथ पूसा नवरंग और पूसा उर्वसी दोनों की 50-50 कलमें लगाई गई। साथ ही अंगूर की खेती की पूरी सस्य विधियां उपलब्ध कराई गई। वर्ष 1999 में फार्म हाउस की अंगूर लताओं में फल आने के उपरांत छत्तीसगढ़ जैसे अंगूर की खेती वाले गैर-परंपरागत क्षेत्र में अंगूर की सफल खेती एक  राष्ट्रीय समाचार बन गई। भा. कृ. अं. सं. के वैज्ञानिकों के सक्रिय परामर्श और खेत दौरों के परिणामस्वरूप अंगूर की खेती की विभिन्न सस्य क्रियाओं का मानकीकरण किया गया। इस सफलता से समग्र क्षेत्र की आंखें खोल दीं तथा क्षेत्र के अन्य किसानों को भी पूसा नवरंग और पूसा उर्वशी पौधों की हाइब्रिड कलमों की आपूर्ति की गई।

        वर्तमान में, लगभग 15 हैक्टर क्षेत्र में पूरी तरह से पूसा अंगूर की खेती की जाती है। इस सफलता ने राज्य के किसानों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित किया और राज्य कृषि विभाग ने रायपुर को छतीसगढ़ का अंगूर की खेती वाला जिला घोषित कर दिया है। पिछले कुछ वर्षो के दौरान स्थानीय गैर सरकारी संगठन, पालीवाल ग्रेप रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्‌यूट, भालूकोना, राजनन्द गांव के प्रयासों से अंगूर की खेती का दायरा पड़ोसी जिलों नामतः दुर्ग और कावर्धा तक बढ़ा। वर्तमान में अंगूर की व्यावसायिक खेती करने वाले 15 से अधिक प्रगतिशील किसानों ने एक सहकारी समिति का गठन किया है।

        लवण सहिष्णु मूलवृंतों का उपयोग, ड्रिप सिंचाई आदि जैसी अंगूर की खेती की नई तकनीकें काफी लोकप्रिय हो रही है। डॉ. पालीवाल के फार्म हाउस में प्राप्त नतीजे उत्साहवर्धक हैं। समुचित छंटाई तकनीक के साथ मूलवृंत के प्रयोग से उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई है। डॉगरिज मूलवृंत के इस्तेमाल से पूसा उर्वशी और पूसा नवरंग किस्माकें के अंगूरों के आकार और गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय सुधार पाया गया है। क्षेत्र में अंगूर की खेती से प्राप्त लागत : लाभ आकलन से पता चलता है कि ताजे अंगूरों के उत्पादन में जहां प्रति एकड़ 1,0,000 रूपये का लाभ है, वहीं किशमिश उत्पादन में यह लाभ बढ़कर 1,50,000 रूपये प्रति एकड़ हो जाता है।

         मृदा एवं जलवायु संबंधी आवश्यकताएं

        इस क्षेत्र के लिए मानकीकृत और अनुशंसित अंगूर उत्पादन प्रौद्योगिकी नीचे दी गई हैः

        अंगूर की खेती के लिए गर्म, शुष्क व वर्षा रहित गर्मी तथा अति ठंड वाले सर्दी के मौसमों की आवश्यकता होती है। मई -जून के दौरान फलों के पकते समय वर्षा का होना नुकसान दायक है। इससे फल की मिठास में कमी आती है, फल असमान रूप से पकता है और चटक जाता है। अंगूर की खेती  के लिए अच्छी जल-निकासी वाली मिट्‌टी बेहतर मानी जाती है। अंगूर की खेती अलग-अलग प्रकार की ऐसी मिट्‌टी मे की जा सकती है जिसमें फर्टिलाइजर का पर्याप्त उपयोग हुआ हो और उसकी अच्छी देखभाल की गई हो। रेतीली तथा बजरीदार मिट्‌टी में भी अंगूर की अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की परिस्थतियों के तहत अंगूर की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्‌टयों यथा लाल बजरी, काली मिट्‌टी, कंकड़ीली तथा कठोर सतह वाले क्षेत्रों में भी संभव है। हालांकि इस क्षेत्र में लाल बजरी और यहां तक कि रेतीली मिट्‌टी की बहुतायत है, फिर भी परिणामों से पता चलता है कि पर्याप्त उर्वरकों और सिंचाई के प्रयोग से यहां अंगूर की अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है। सामान्तः 2.5 मीटर गहराई तक की मिट्‌टी आदर्श मानी जाती है। इसका pH मान 6.5 से 8 होना चाहिए। विनिमय शील सोडियम की दर 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। किसानों को 0.3 प्रतिशत अथवा अधिक अवणता वाली मिट्‌टी में अंगूर की खेती से बचना चाहिए। समस्याग्रस्त क्षेत्रों समें अंगूर की खेती के लिए साल्ट क्रीक, डॉगरिज ओर 1613 जैसे लवण सहिष्णु मूलवृंतों के प्रयोग का सुझाव दिया जाता है जिनका प्रयोग उपरोक्त किस्मों के मूलवृंत रोपण के लिए किया जा सकता है।

        प्रवर्धन

        प्रूनिंग वुड से ली गई एक वर्षीय परिपक्व केन से तने की कटिंग कर अंगूर का प्रवर्धन आसानी से किया जा सकता है। प्रत्येक कटिंग पैंसिल जितनी मोटी व 20-25 सें. मी. लंबी होनी चाहिए जिसमें 3-4 गांठे हों। इस प्रकार तैयार की गई कलम को या तो क्यारियों में अथवा मेंड़ों पर 45 डिग्री के कोण पर रोपा जाता है। अभी हाल ही में, वेज ग्राफ्टिंग का प्रयोग करते हुए फरवरी -मार्च (सुशुप्त कलियों में अंकुरण से पूर्व) तथा जुलाई-अगस्त (वर्षा उपरान्त) के दौरान एक वर्ष पुरानी मूलवृंत की स्व-स्थाने (इन सिटू) (मूल अवस्था में) ग्राफ्टिंग की गयी है।

        रोपण

        बेलों के बीच उचित दूरी रखने के लिए रोपण से पहले किसानों को एक ले-आउट प्लान तैयार कर लेना चाहिए। सामान्य तौर पर यह दूरी इस प्रकार रखी जाती है - हैड सिस्टम में 2 मी. ग 2 मी.; ट्रेलिस सिस्टम में 3 मी. ग 3 मी.; बॉवर सिस्टम में 4 मी. ग 4 मी.; Y सिस्टम में 3 मी. ग 4 मी.।

        नवम्बर-दिसंबर के दौरान 75 सें मी. ग 75 सें. मी. आकार के गड्‌ढे खोदकर उनमें गोबर की खाद और 1000 ग्राम नीम की खली को मिट्‌टी के  साथ 1:1 अनुपात में मिला देना चाहिए। अच्छी तरह मिलाने के उपरांत इसमें  एक कि. ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट और 500 ग्रा. सल्फेट ऑफ पोटाश मिला देना चाहिए। दीमकों द्वारा संक्रमित क्षेत्रों में गड्ढों को 30-50 लीटर जल में 0.2 प्रतिशत क्लोरापइरीफॉस मिलाकर पानी से भर देना चाहिए। एक भारी सिंचाई करके मिट्‌टी को ठीक से बैठ जाने लिए छोड़ देना चाहिए। जनवरी के अंतिम सप्ताह में शाम के समय प्रत्येक गड्‌ढे में एक वर्षीय जड़ कटिंग का रोपण किया जाता है। एक पखवाड़े के बाद बेल कांट-छांट करके एक मजबूत व परिपक्व तने के रूप में रहने दिया जाता है। ऐसी बेलों का रोपण समुचित अंतराल पर किया जाना चाहिए।

        बेलों की स्थाई (ट्रेनिंग)

        यद्यपि उपोष्ण क्षेत्र के लिए बेल के आधार पर फल देने वाली किस्में अधिक उपयुक्त है लेकिन ऐसे क्षेत्र में पुष्ट बेल वाली किस्में उगाई जाती है।

        हैड सिस्टम :

        यह सिस्टम सबसे सस्ता है क्योंकि इसमें कम निवेश की जरूरत होती है। अतः यह अल्प संसाधन वाले किसानों के लिए उपयुक्त है। इस प्रणली के तहत, बेलों को एकल तने के रूप में 1.2 मी. ऊंचाई तक बढ़ाया जाता है और उनमें विभिन्न दिशाओं में अच्छी तरह से फैली हुई चार से छः शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है। बाद में ये शाखाएं लकड़ी की भांति काष्ठीय बन जाती हैं जिनमें फलों के 8-10 गुच्छे लगते हैं। छंटाई करने पर अगले वर्ष के लिए नई शाखाएं निकलती हैं। सामान्यतः अंगूर की खेती के लिए कुछ अन्य प्रणालियों को भी आजमाया जा सकता है। जिनमें प्रमुख हैः

        ट्रेलिस सिस्टम :

        हालांकि यह थोड़ी खर्चीली है, फिर भी इसे सभी अर्ध-प्रबल किस्मों हेतु अपनया जा सकता है। पौधे 3 मी. ग् 3 मी. दूरी पर रोपे जाते हैं तथा लता की शाखाओं को तार पर 2 स्तरों पर फैलने दिया जाता है। लोहे के खंभों की मदद से तार क्षैतिज बांधे जाते हैं, पहला भू-सतह से 3/4मीटर की ऊंचाई पर तथा दूसरा पहले से 25 सें. मी. ऊपर रखा जाता है।शाखाओं को मुख्य तने के दोनों और फैलने दिया जाता है।

        बॉवर, परगोला अथवा पंडाल सिस्टम :

        पौधों को 2 मी. की ऊंचाई तक एकल तने के रूप में बढ़ने दिया जाता है तथा उसके उपरांत लता को मंडप के ऊपर सभी दिशाओं में फैलने दिया जाता है। यह लता मंडप 12 गेज वाली तारो से जाली के रूप में बुना जाता है। और इस जाली को एंगल आरनपत्थरों या लकड़ी के खंभों के सहारे फैलाया जाता है। बेल की मुखयटहनियों पर फल देने वाली शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है और इनकी कटाई-छटाई प्रति वर्ष की जाती है।

        ‘Y’ ट्रेलिस सिस्टम :

        अंगूर की बेलों को विभाजित कर खुली (केनोपी) परबढ़ने दिया जाता है। ‘Y’ के आकार वाले एंगल ट्रेलिस पर 120 से 130 सें.मी. की ऊंचाई पर बांधे गए तारों पर फलदार शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है। सामन्यतः एंगल 100-110 डिग्री कोण का होता है जिसकी शाखाएं 90-120से. मी. तक फैली होती है। इस प्रणाली की सबसे लाभदायक बात यह है कि इसमें फलगुच्छों को सीधी तेज धूप से बचाया जा सकता है।

        अंगूर की बेलों की छंटाई

        उत्तरी भारत में, मध्य दिसंबर से मध्य जनवरी के दौरान जबकि बेलें निष्क्रिय अवस्था में होती हैं, मध्य बेल की कटाई-छंटाई प्रारंभ की जा सकती है लेकिन मध्य भारत (यथा छत्तीसगढ़) में दोहरी कटाई-छंटाई भी की जा सकती है। फल दने वाली बेलों की छंटाई सामान्यतः रोपण के 2-3 वर्ष पश्चात बेल को वांछित आकृति देने और अपनाई जा रही प्रणाली के अनुसार की जाती है। चूंकि अंगूर के गुच्छे प्रत्येक मौसम में बेल से फूटने वाली नई टहनियों पर फलते हैं, अतः पिछलें वर्ष कीटहनियों की निश्चित लंबाई तक छंटाई करना महत्वपूर्ण होता है। किस गांठ तक बेल को छांटा जाए यह किस्म की प्रबलता पर निर्भर करता है।

        अंगूर की कुछ किस्मों में छंटाई की सीमा

        छंटाई के उपरांत बेलो पर 2.2 प्रतिशत ब्लीटॉक्स की छिड़काव करना चाहिए। पौधे के आधार पर दिखाई पड़ने वाले सभी अंकुरों को हाथ से हटा देना चाहिए।

        खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग

        युवा एवं फल वहन करने वाली बेलों को पोषक तत्व प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है। सामान्यतः बेलों को पोषक तत्वों की आधी खुराक मिट्‌टी के माध्यम से तथा शेष आधी पत्तियों पर छिड़काव करके दिए जाने की सिफारिश की जाती है। विशेषकर नव विकसित पत्तियों पर सुबह के समय यूरिया (2 प्रतिशत वाले घोल) के छिड़काव की सिफारिश की जाती है। प्रति पौधा 25 कि. ग्रा. की दर से अच्छी तरह से सड़े हुए गोबर की खाद को फरवरी माह में मिट्‌टी में मिलाया जाता है। उसके उपरांत फरवरी माह में ही  बेलों की छंटाई के तुरंत बाद प्रत्येक बेल में 200 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट, 250  ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 250 ग्रा. अमोनियम सल्फेट के प्रयोग की सिफारिश की जाती है। फल लगना शुरू हाने के पश्चात अप्रैल माह में 200  ग्रा. पोटेशियम सल्फेट की दूसरी खुराक का प्रयोग किया जाता है। आयरन एवं जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए इनका 0.2 प्रतिशत की दर से छिड़काव किया जाता है।

        उपोष्ण- कटिबंधीय फलदार बेलों में उर्वरीकरण की अनुसूची

        नई रोपी गई बेलों को रोपण के पश्चात्‌ सींचा जाता है। खाद एवं उर्वरकों के प्रयोग के बाद भी सिंचाई की जानी चाहिए। यह तब और भी महत्वपूर्ण है जब फलों का विकास हो रहा हो। जैसे-जैसे फलों के रंग में परिवर्तन आने से परिपक्वता का पता चले सिंचाई की आवृत्ति कम की जा सकती है, ताकि फलों में अधिक शर्करा संचित की जा सके। यदि वर्षा न हो तो फलों की तुड़ाई के उपरांत भी सिंचाई जारी रखी जा सकती है। निष्क्रय अवधि (नवम्बर से जनवरी) के दौरान किसी प्रकार की सिंचाई की आवश्यकता नहीं है। ड्रिप सिंचाई के भी आशातीत नतीजे प्राप्त हुए हैं। शून्य (0) से 0.25 बार के मृदा नमी क्षेत्र में बंसत तथा ग्रीष्म में 5-7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। बसंत एवं ग्रीष्म में प्रति बेल 3.5 ली. जल क्षमता वाली 15 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।सिंचाई

        फलों की गुणवत्ता-महत्वपूर्ण दिशानिर्देश

        पादप जैव विनियामकों एवं सस्यक्रियाओं द्वारा फलों की क्वालिटी में सुधार।

        भा. कृ. अ. सं. द्वारा मानसूनी वर्षा प्रारंभ हाने से पहले ही अंगूरों की अगेती तुड़ाई कर लेने की तकनीक विकसित की गयी है। जनवरी के प्रथम सप्ताह में छंटाई के तुरन्त पश्चात अंगूर बेलों पर डार्मेक्स अथवा डॉरब्रेक (30 मि.ली. का एक छिड़काव किया जाता है। इस उपचार से फल 2 से 3 सप्ताह पूर्व ही कलियां खिल जाती है तथा अंगूर पक जाते है।

        लंबे अंगूर प्राप्त करने के लिए पुष्पगुच्छों के आधा खिलने के समय उन्हें जिब्रेलिक एसिड में डुबोने सिफारिश की जाती है। ब्यूटी सीडलेस किस्म 45 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति, तथा पर्लेट, पूसा उर्वशी और पूसा सीडलेस किस्में 25-30 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति इस संबध में अनुकूल प्रतिक्रिया प्रदर्शित करती हैं।

        फल के रंग और मिठास की दृष्टि से अंगूर की क्वालिटी में सुधार लाने के साथ-साथ फलों को शीघ्र पकाने हेतु अंगूरों को मटर के दानों के बराबर के आकार में बनाए गए घोल में डुबोया जा सकता है।

        इसके अतिरिक्त, फल क्वालिटी में सुधार लाने के लिए मुखय तने की गर्डलिंग और गुच्छों में अंगूरों की सघनता कम करने जैसी क्रियाएं (थिनिंग) भी लाभदायक पाई गई है। फल आने के 4-5 दिन पश्चात गर्डलिंग चाकू की मदद से तने के चारों ओर भू-सतह से 30 सें. मी. ऊंचाई तक पतली छाल (0.5-1.0 सें. मी.) को गोलाकार हटा दिया जाता है। कैंची अथवा ब्रशिंग द्वारा पुष्पगुच्छ के एक तरफ से फलों को पूरी तरह हटाकर गुच्छों की थिनिंग की जाती है। अकेले गर्डलिंग करने से फल के भार में वृद्धि की जा सकती है लेकिन थिनिंग (छरहरापन) के साथ गर्डलिंग करने से अंगूर की मिठास (टीएसएस) में 2-3 प्रतिशत वृद्धि होती है और उन्हें एक सप्ताह अगेती पकाया जा सकता है।

        खाद कब दें

        छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए। शेष मात्र फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें।

        कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार

        अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए। ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं। परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है।

        फसल निर्धारण

        फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है। अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं। अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं। अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें।

        छल्ला विधि

        इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है। अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौड़ी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए।

        नाशीजीवों एवं बीमारियों का नियंत्रण

        पत्ती लपेटक इल्लियां पत्ती के किनारों को मध्यधारी की ओर लपेट देती है। ये इल्लियां पत्तियों की निचली बाह्‌य सतह पर पलती हैं। इस नाशीजीव के नियंत्रण हेतु 2 मि. ली. मेलाथियॉन अथवा डाइमेथोएट को प्रति लीटर पानी में 2 मि. ली. की दर से डाइमेथोएट अथवा  मेलाथियॉन का छिड़काव करने से लीफ हॉपर (पात-फुदके) को भी नियंत्रित किया जा सकता है। अंगूर की बेलों पर शल्क (स्केल) भी दिखाई पड़ते हैं जिन्हें प्रति ली. पानी में 1 मि. ली. डाइजिनॉन मिलाकर बेलों  की छंटाई के तुरंत बाद छिड़कने से सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। दीमकों के हमले से बचने के लिए 15-20 दिन के  अन्तराल पर एक बार 5 मि. ली. क्लोरोपायरीफॉस को प्रति लिटर जल में घोलकर तने पर छिड़कना तथा मिट्‌टी को इस घोल से भिगोना लाभदायक है।

        सफ़ेद चूर्णी रोग

        अन्य फफूंद बीमारियों की अपेक्षा यह शुष्क जलवायु में अधिक फैलाती है। प्रायः पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफ़ेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं। ये दाग धीरे - धीरे पुरे पत्तों एवं फलों पर फ़ैल जाते हैं। जिसके कारण फल गिर सकते हैं या देर से पकते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 0.2% घुलनशील गंधक, या 0.1% कैरोथेन के दो छिडकाव 10 - 15 दिन के अंतराल पर करें।

        उपोष्ण क्षेत्र में अंगूर की फसल प्रायः चूर्णी फफूंद तथा एथ्रेक्नोज के प्रकोप से बच जाती है क्योंकि इनका संक्रमण भारी वर्षा हाने पर ही देखने में आया है। जून-सितम्बर के दौरान 1-1 पखवाड़े के अन्तराल पर 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स अथवा बेविस्टिन को प्रति लीटर जल में मिलाकर बने घोल का छिड़काव करने से इन बीमारियों को नियंत्रण में रखा जा सकता है।

        कीट

        • थ्रिप्स, चैफर, बीटल एवं चिडिया, पक्षी अंगूर को हानि पहुंचाते हैं। थ्रिप्स का प्रकोप मार्च से अक्तूबर तक रहता है। ये पत्तियों, शाखाओं, एवं फलों का रस चूसकर हानि पहुंचाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए 500 मिली. मेलाथियान का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें।
        • चैफर बीटल कीट रात में पत्तों को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त करता है, वर्षाकाल में 10 दिन के अंतराल पर 10 % बी.एच.सी. पावडर बुरक देना इस कीट के नियंत्रण हेतु लाभदायक पाया गया है।
        • चिड़िया अंगूर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। फल पकने के समय चिडिया गुच्छे खा जाती है। अतः घर से आंगन में लगी बेल के गुच्छों को हरे रंग की मलमल की थैलियों से ढक देना चाहिए। बड़े - बड़े बगीचों में नाइलोन के जाल से ढक दें , ढोल बजाकर चिडियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

        फलों की तुड़ाई

        गुच्छों को पूरी तरह से पकने पर तोड़ना चाहिए। फलों का पकना वांछित टी एस एस व अम्लता के अनुपात से जाना जा सकता है जो विभिन्न किस्मों में 25-35 के बीच अलग-अलग होती है (पूसा सीडलेस में 29.24)। पूसा किस्में जून के प्रथम सप्ताह में पकना आरंभ कर देती हैं। अंगूर के गुच्छों को तोड़कर प्लास्टिक की ट्रे में रखना चाहिए। गुच्छों को एक के ऊपर एक करके नहीं रखना चाहिए। गुच्छों से खेत की गर्मी को कम करने के लिए उन्हें कुछ समय तक छाया में रखना चाहिए। इसके उपरांत खराब अंगूरों को गुच्छों से हटा देना चाहिए। उत्पाद को लहरदार (कारूगेटिड) फाइबर बोर्ड बक्सों में पैक करके स्थानिय अथवा दूरवर्ती बाजार में भेजा जा सकता है।

        भंडारण एवं उपयोग

        अंगूरों को 80-90 प्रतिशत आर्द्रता एवं शून्य डिग्री तापमान पर 4 सप्ताह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जून माह में अंगूरों का अच्छा दाम मिलता है किशमिश और शराब बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर उसे अमल में लाकर भी लाभ कमाया जा सकता है।

        सस्यक्रियाओं का कैलेण्डर

        उपोष्ण कटिबंधीय अंगूर की खेती की सस्यक्रियाओं का कैलेण्डर

        जनवरी के प्रथम से द्वितीय सप्ताह तक

        परिपक्व अंगूर की कटाई-छंटाई एवं नवविकसित बेलोंक की संधाई (ट्रेनिंग)। प्रत्येक युवा एवं परिपक्व बेल में 25 कि. ग्रा. अच्छी तरह से सड़ी हुए घूरे की खाद का प्रयोग कर थियोयूरिया अथवा डॉर्मेक्स का इस्तेमाल।

        जनवरी के तीसरे से चौथे सप्ताह तक

        अंगूर की प्रत्येक बेल में 250 ग्रा.अमोनियम सल्फेट और 250 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट द्वारा उर्वरीकरण। अप्रैल का प्रथम सप्ताह : सरस फल विकास और बेहतर क्वालिटी के लिए प्रति फलदार बेल के लिए 200 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट का प्रयोग।

        अप्रैल के दूसरे सप्ताह से जून के अंत तक

        एक दिन के अन्तराल पर सिंचाई (परिपक्वता से एक सप्ताह पूर्व सिंचाई को रोक देना चाहिए)। फलों की तुड़ाई के तुरंत पश्चात्‌ एंथ्रेक्नोज के प्रकोप से बचने के लिए प्रति लीटर जल में 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स/बैविस्टिन के घोल का छिड़काव।

        जुलाई-अगस्त-सितंबर

        फलों की तुड़ाई के तुरंत बाद सितम्बर तक 15-20दिन के अंतराल पर प्रति लीटर जल में 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स के घोल का छिड़काव।

        नवम्बर-दिसम्बर

        प्रति लीटर 3 ग्रा. ब्लीटाक्स के घोल का जल के साथ अन्तिम छिड़काव।

        मान्यता

        भा. कृ.अ. सं. के प्रधान वैज्ञानिक एवं अंगूर प्रजनक स्वर्गीय डॉ, पी.सी. जिंदल तथा छत्तीसगढ़ के प्रगतिशील किसान डॉ. बी. एन.पालीवाल के उललेखनीय प्रयासों को राज्य सरकार द्वारा मान्यता दी गई है। सरकार के अनेक गण्यमान्य पदाधिकारियों ने प्रायोगिक फार्म का दौरा किया। डॉ. जिंदल एवं डॉ. पॉलीवाल के योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए वर्ष 2003 में राज्य कृषि विभाग एवं जिला क्लेक्ट्रेट, रायपुर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित राज्य बागवानी प्रदर्शनी में छत्तीसगढ़ राज्य के कृषि एवं उद्योग मंत्री ने डॉ. जिंदल एवं डॉ. पॉलीवाल को रजत पटि्‌टका व प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित किया। इस सफलता से उत्साहित होकर पड़ोसी राज्य उड़ीसा के सीमावर्ती जिलों के किसानों ने भी उपोष्ण कटिबंधीय अंगूर की खेती करना प्रारंभ कर दिया है। 'द ग्रेप ग्रोअर्स कॉआपरेटिव ऑफ छत्तीसगढ़' द्वारा अब अपने उत्पादों के प्रसंस्करण हेतु किशमिश तथा शराब बनाने का संयंत्र स्थापित करने की योजना तैयार की जा रही है।

        अंगूर से किशमिश बनाने की विधि

        किशमिश बनाने के लिए अंगूर की ऐसी किस्म का चयन किया जाता है जिसमें कम से कम 20 फीसदी मिठास हो। किशमिश को तैयार करने की तीन विधियां हैं- पहली- प्राकृतिक प्रक्रिया, दूसरी-गंधक प्रक्रिया और तीसरी-कृत्रिम प्रक्रिया। पहली प्राकृतिक प्रक्रिया में अंगूर को गुच्छों से तोड़ने के बाद सुखाने के लिए 9क् सेंटीमीटर लंबी और 60 सेंटीमीटर चौड़ी ट्रे या

        60 सेंटीमीटर लंबी और 45 सेंटीमीटर चौड़ी ट्रे, जिसके नीचे प्लाई-वुड या लकड़ी की पट्टियां लगी हुई हों, में अंगूरों को अच्छी तरह फैला दें। फिर तेज धूप में 6-7 दिन तक रखें। अंगूरों को प्रतिदिन उलटते-पलटते रहें। इसके पश्चात ट्रे को छायादार स्थान पर रख दें, जहां अच्छी तरह हवा लगे सके। छायादार स्थान में सुखाने से किशमिश मुलायम रहती है और इसका इसका रंग भी खराब नहीं होता है। तैयार किशमिश में 15 फीसदी नमी रहनी चाहिए। गंधक प्रक्रिया से किशमिश बनाने पर उसका रंग बिल्कुल नहीं बदलता है। इसका मतलब है कि इस प्रक्रिया से बनी किशमिश हरी रहती है। धूप में सुखाने से किशमिश का रंग थोड़ा भूरा हो जाता है।

        इसे रोकने के लिए गंधक के धुएं का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया के लिए ताजे अंगूरों को गंधक के धुएं से भर कक्ष में लकड़ी की ट्रे पर किशमिश बिछा देते हैं। कमर के भीतर गंधक के धुएं के फैलने का पर्याप्त इंतजाम होना चाहिए। अंगूरों पर तेल की परत भी चढ़ाई जा सकती है। इसके लिए नारियल या मूंगफली तेल का उपयोग किया जाता है। तेल लगाने से किशमिश चमकीली हो जाती है और इसे लंबे समय तक भंडारित किया जा सकता है। कृत्रिम प्रक्रिया से किशमिश बनाने के लिए माइक्रोवेव किरणों से अंगूरों को सुखाया जाता है। इस प्रक्रिया से अंगूर में मौजूद पानी भाप बनकर उड़ जाता है और किशशि की गुणवत्ता भी बनी रहती है। इस प्रक्रिया से 90 फीसदी समय की बचत होती है। अंगूर एक समान सूखता है, जिससे फल का रंग, खुशबू व पोषक तत्व ताजे फल जैसे बने रहते हैं। तैयार किशमिश को शीशे के मर्तबान या पॉलीथीन की थैलियों में बंद करके किसी साफ सुथर हवादार स्थान पर रखना चाहिए।

        अंगूर का शरबत

        ठीक से सफाई करने के बाद अंगूर के बराबर मात्रा में पानी डालकर उसे 10 मिनट तक पका लें। यह ध्यान रहे कि पानी का तापमान 60-70 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक न हो। उबले अंगूरों को छलनी में रगड़कर रस निकाल लें। बड़े पैमाने पर शरबत तैयार करना हो, तब बाल्टी के तले में छोटे छेद करके भी उबले अंगूरों से निकाला जा सकता है। एक अलग बर्तन में चाशनी तैयार करके उसमें सिट्रिक एसिड डाल दें। प्रति लीटर चाशनी में 8-10 ग्राम सिट्रिक एसिड डालना चाहिए। इसके बाद इसे डालकर ठंडी होने। बाद में अंगूर से निकाला रस मिला लें। तैयार रस में प्रति लीटर एक ग्राम के हिसाब से पोटेशियम मेटाबाइ सल्फाइट मिलाएं। पोटेशियम मेटाबाइ सल्फाइट पूर शरबत में एकसाथ मिलने के बजाय छोटी कटोरी में पहले मिलाए और बाद में उसे पूर शरबत में मिलाएं। इस शरबत को साफ बोतल में भरकर ठंडे स्थान में रखें। अंगूरों के बजाय इससे बने उत्पादों का बाजार में कहीं बेहतर दाम मिलेगा। एक फायदा यह भी है कि उत्पादकों पर ताजे अंगूर बेचने का दबाव भी नहीं होगा। इससे उन्हें कम दाम पर अंगूर नहीं बेचने होंगे।

                                             

                                                अंगूर की आधुनिक खेती

        अंगूर संसार के उपोष्ण कटिबंध के फलों में विशेष महत्व रखता है। हमारे देश में लगभग 620 ई.पूर्व ही उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अंगूर की व्यवसायिक खेती एक लाभकारी उद्यम के रूप में विकसित हो गई थी लेकिन उत्तरी भारत में व्यवसायिक उत्पादन धीरे - धीरे बहुत देर से शुरू हुआ। आज अंगूर ने उत्तर भारत में भी एक महत्वपूर्ण फल के रूप में अपना स्थान बना लिया है और इन क्षेत्रों में इसका क्षेत्रफल काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है। पिछले तीन दशकों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अंगूर कि खेती ने प्रगति की है जिसके फलस्वरूप भारत में अंगूर के उत्पादन, उत्पादकता एवं क्षेत्रफल में अपेक्षा से अधिक वृद्धि होती जा रही है। 

        उपयोग 
        अंगूर एक स्वादिष्ट फल है। भारत में अंगूर अधिकतर ताजा ही खाया जाता है वैसे अंगूर के कई उपयोग हैं। इससे किशमिश, रस एवं मदिरा भी बनाई जाती है। 

        मिट्टी एवं जलवायु 
        अंगूर की जड़ की संरचना काफी मजबूत होती है। अतः यह कंकरीली,रेतीली से चिकनी तथा उथली से लेकर गहरी मिट्टियों में सफलतापूर्वक पनपता है लेकिन रेतीली, दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो अंगूर की खेती के लिए उचित पाई गयी है। अधिक चिकनी मिट्टी में इसकी खेती न करे तो बेहतर है। अंगूर लवणता के प्रति कुछ हद तक सहिष्णु है। जलवायु का फल के विकास तथा पके हुए अंगूर की बनावट और गुणों पर काफी असर पड़ता है। इसकी खेती के लिए गर्म, शुष्क, तथा दीर्घ ग्रीष्म ऋतू अनुकूल रहती है। अंगूर के पकते समय वर्षा या बादल का होना बहुत ही हानिकारक है। इससे दाने फट जाते हैं और फलों की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ता है। अतः उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों की सिफारिश की जाती है। 

        किस्में 
        उत्तर भारत में लगाई जाने वाली कुछ किस्मों की विशेषताएं नीचे दी जा रही हैं। 

        परलेट 
        यह उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों में से एक है। इसकी बेल अधिक फलदायी तथा ओजस्वी होती है। गुच्छे माध्यम, बड़े तथा गठीले होते हैं एवं फल सफेदी लिए हरे तथा गोलाकार होते हैं। फलों में 18 - 19 तक घुलनशील ठोस पदार्थ होते हैं। गुच्छों में छोटे - छोटे अविकसित फलों का होना इस किस्म की मुख्य समस्या है। 

        ब्यूटी सीडलेस 
        यह वर्षा के आगमन से पूर्व मई के अंत तक पकने वाली किस्म है गुच्छे मध्यम से बड़े लम्बे तथा गठीले होते हैं। फल मध्यम आकर के गोलाकार बीज रहित एवं काले होते हैं। जिनमे लगभग 17 - 18 घुलनशील ठोस तत्त्व पाए जाते हैं। 

        पूसा सीडलेस 
        इस किस्म के कई गुण 'थाम्पसन सीडलेस' किस्म से मेल खाते हैं। यह जून के तीसरे सप्ताह तक पकना शुरू होती है। गुच्छे मध्यम, लम्बे, बेलनाकार सुगन्धयुक्त एवं गठे हुए होते हैं। फल छोटे एवं अंडाकार होते हैं। पकने पर हरे पीले सुनहरे हो जाते हैं। फल खाने के अतिरिक्त अच्छी किशमिश बनाने के लिए उपयुक्त है। 

        पूसा नवरंग 
        यह संकर किस्म भी हाल ही में भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित की गयी है। यह शीघ्र पकने वाली काफी उपज देने वाली किस्म है। गुच्छे मध्यम आकर के होते हैं। फल बीजरहित, गोलाकार एवं काले रंग के होते हैं। इस किस्म में गुच्छा भी लाल रंग का होता है। यह किस्म रस एवं मदिरा बनाने के लिए उपयुक्त है। 

        प्रवर्धन 
        अंगूर का प्रवर्धन मुख्यतः कटिंग कलम द्वारा होता है। जनवरी माह में काट छाँट से निकली टहनियों से कलमे ली जाती हैं। कलमे सदैव स्वस्थ एवं परिपक्व टहनियों से लिए जाने चाहिए। सामान्यतः 4 - 6 गांठों वाली 23 - 45 से.मी. लम्बी कलमें ली जाती हैं।कलम बनाते समय यह ध्यान रखें कि कलम का निचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए एवं ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए। इन कलमों को अच्छी प्रकार से तैयार की गयी तथा सतह से ऊँची क्यारियों में लगा देते हैं। एक वर्ष पुरानी जड़युक्त कलमों को जनवरी माह में नर्सरी से निकल कर खेत में रोपित कर देते हैं। 

        बेलों की रोपाई 
        रोपाई से पूर्व मिट्टी की जाँच अवश्य करवा लें। खेत को भलीभांति तैयार कर लें। बेल की बीच की दुरी किस्म विशेष एवं साधने की पद्धति पर निर्भर करती है। इन सभी चीजों को ध्यान में रख कर 90 x 90 से.मी. आकर के गड्ढे खोदने के बाद उन्हें 1/2 भाग मिट्टी, 1/2 भाग गोबर की सड़ी हुई खाद एवं 30 ग्राम क्लोरिपाईरीफास, 1 कि.ग्रा. सुपर फास्फेट व 500 ग्राम पोटेशीयम सल्फेट आदि को अच्छी तरह मिलाकर भर दें। जनवरी माह में इन गड्ढों में 1 साल पुरानी जड़वाली कलमों को लगा दें। बेल लगाने के तुंरत बाद पानी आवश्यक है। 

        बेलों की सधाई एवं छंटाई 
        बेलों से लगातार अच्छी फसल लेने के लिए एवं उचित आकर देने के लिए साधना एवं काट - छाँट की सिफारिश की जाती है। बेल को उचित आकर देने के लिए इसके अनचाहे भाग के काटने को साधना कहते हैं, एवं बेल में फल लगने वाली शाखाओं को सामान्य रूप से वितरण हेतु किसी भी हिस्से की छंटनी को छंटाई कहतें हैं। 
        अंगूर की बेल साधने हेतु पण्डाल, बाबर, टेलीफोन, निफिन एवं हैड आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं। लेकिन व्यवसायिक इतर पर पण्डाल पद्धति ही अधिक उपयोगी सिद्ध हुयी है। पण्डाल पद्धति द्वारा बेलों को साधने हेतु 2.1 - 2.5 मीटर ऊँचाई पर कंक्रीट के खंभों के सहारे लगी तारों के जाल पर बेलों को फैलाया जाता है। जाल तक पहुँचने के लिए केवल एक ही ताना बना दिया जाता है। तारों के जाल पर पहुँचने पर ताने को काट दिया जाता है ताकि पार्श्व शाखाएँ उग आयें।उगी हुई प्राथमिक शाखाओं पर सभी दिशाओं में 60 सेमी दूसरी पार्श्व शाखाओं के रूप में विकसित किया जाता है। इस तरह द्वितीयक शाखाओं से 8 - 10 तृतीयक शाखाएँ विकसित होंगी इन्ही शाखाओं पर फल लगते हैं। 

        छंटाई 
        बेलों से लगातार एवं अच्छी फसल लेने के लिए उनकी उचित समय पर काट - छाँट अति आवश्यक है। छंटाई कब करें : जब बेल सुसुप्त अवस्था में हो तो छंटाई की जा सकती है, परन्तु कोंपले फूटने से पहले प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए। सामान्यतः काट - छांट जनवरी माह में की जाती है। 

        कितनी छंटाई करें 
        छंटाई की प्रक्रिया में बेल के जिस भाग में फल लगें हों, उसके बढे हुए भाग को कुछ हद तक काट देते हैं। यह किस्म विशेष पर निर्भर करता है। किस्म के अनुसार कुछ स्पर को केवल एक अथवा दो आँख छोड़कर शेष को काट देना चाहिए। इन्हें 'रिनिवल स्पर' कहते हैं। आमतौर पर जिन शाखाओं पर फल लग चुके हों उन्हें ही रिनिवल स्पर के रूप में रखते हैं। 
        छंटाई करते समय रोगयुक्त एवं मुरझाई हुई शाखाओं को हटा दें एवं बेलों पर ब्लाईटोक्स 0.2 % का छिडकाव अवश्य करें। 
        किस्म कितनी आँखें छोडें 
        1 ब्यूटी सीडलेस 3 - 3 
        2 परलेट 3-4 
        3 पूसा उर्वसी 3-5 
        4 पूसा नवरंग 3-5 
        5 पूसा सीडलेस 8-10 

        सिंचाई 
        नवम्बर से दिसम्बर माह तक सिंचाई की खास आवश्यकता नहीं होती क्योंकि बेल सुसुप्ता अवस्था में होती है लेकिन छंटाई के बाद सिंचाई आवश्यक होती है। फूल आने तथा पूरा फल बनने (मार्च से मई ) तक पानी की आवश्यकता होती है। क्योंकि इस दौरान पानी की कमी से उत्पादन एवं हुन्वात्ता दोनों पर बुरा असर पड़ता है। इस दौरान तापमान तथा पर्यावरण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 7 - 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। फल पकने की प्रक्रिया शुरू होते ही पानी बंद कर देना चाहिए नहीं तो फल फट एवं सड़ सकते हैं। फलों की तुडाई के बाद भी एक सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए। 

        खाद एवं उर्वरक 
        अंगूर की बेल भूमि से काफी मात्र में पोषक तत्वों को ग्रहण करती है। अतः मिट्टी कि उर्वरता बनाये रखने के लिए एवं लगातार अच्छी गुणवत्ता वाली फसल लेने के लिए यह आवश्यक है की खाद और उर्वरकों द्वारा पोषक तत्वों की पूर्ति की जाये। पण्डाल पद्धति से साधी गई एवं 3 x 3 मी. की दुरी पर लगाई गयी अंगूर की 5 वर्ष की बेल में लगभग 500 ग्राम नाइट्रोजन, 700 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश, 700 ग्राम पोटेशियम सल्फेट एवं 50 - 60 कि.ग्रा. गोबर की खाद की आवश्यकता होती है। 

        खाद कब दें 
        छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए। शेष मात्र फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें। 

        कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार 
        अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए। ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं। परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है। 

        फसल निर्धारण 
        फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है। अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं। अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं। अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें। 

        छल्ला विधि 
        इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है। अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौडी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए। 

        वृद्धि नियंत्रकों का उपयोग 
        बीज रहित किस्मों में जिब्बरेलिक एसिड का प्रयोग करने से दानो का आकर दो गुना होता है। पूसा सीडलेस किस्म में पुरे फूल आने पर 45 पी.पी.एम. 450 मि.ग्रा. प्रति 10 ली. पानी में, ब्यूटी सीडलेस मने आधा फूल खिलने पर 45 पी.पी.एम. एवं परलेट किस्म में भी आधे फूल खिलने पर 30 पी.पी.एम का प्रयोग करना चाहिए। जिब्बरेलिक एसिड के घोल का या तो छिडकाव किया जाता है या फिर गुच्छों को आधे मिनट तक इस घोल में डुबाया जाता है। यदि गुच्छों को 500 पी.पी.एम 5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी में इथेफ़ोन में डुबाया जाये तो फलों में अम्लता की कमी आती है। फल जल्दी पकते हैं एवं रंगीन किस्मों में दानों पर रंग में सुधार आता है। यदि जनवरी के प्रारंभ में डोरमैक्स 3 का छिडकाव कर दिया जाये तो अंगूर 1 - 2 सप्ताह जल्दी पक सकते हैं। 

        फल तुड़ाई एवं उत्पादन 
        अंगूर तोड़ने के पश्चात् पकते नहीं हैं, अतः जब खाने योग्य हो जाये अथवा बाजार में बेचना हो तो उसी समय तोड़ना चाहिए। शर्करा में वृद्धि एवं तथा अम्लता में कमी होना फल पकने के लक्षण हैं। फलों की तुडाई प्रातः काल या सायंकाल में करनी चाहिए। उचित कीमत लेने के लिए गुच्छों का वर्गीकरण करें। पैकिंग के पूर्व गुच्छों से टूटे एवं गले सड़े दानों को निकाल दें। अंगूर के अच्छे रख - रखाव वाले बाग़ से तीन वर्ष पश्चात् फल मिलना शुरू हो जाते हैं और 2 - 3 दशक तक फल प्राप्त किये जा सकते हैं। परलेट किस्म के 14 - 15 साल के बगीचे से 30 - 35 टन एवं पूसा सीडलेस से 15 - 20 टन प्रति हैक्टेयर फल लिया जा सकता है। 

        बीमारियाँ एवं कीट 
        बीमारियाँ 
        उत्तरी भारत में अंगूर को मुख्यतः एन्थ्रक्नोज एवं सफ़ेद चुरनी रोग ही मुख्य बीमारियाँ हैं। एन्थ्रक्नोज बहुत ही विनाशकारी रोग है। इसका प्रभाव फल एवं पत्ती दोनों पर होता है। पत्तों की शिराओं के बीच जगह - जगह टेढ़े-मेढ़े गहरे भूरे दाग पद जाते हैं। इनके किनारे गहरे भूरे या लाल रंग के होते हैं। परन्तु मध्य भाग धंसा हुआ हलके रंग का होता है और बाद में पत्ता गिर जाता है। आरम्भ में फलों पर धब्बे हल्के रंग के होते हैं परन्तु बाद में बड़ा आकर लेकर बीच में गहरे हो जाते हैं तथा चारों ओर से लालिमा से घिर जाते हैं। इस बीमारी के नियंत्रण हेतु छंटाई के बाद प्रभावित भागों को नष्ट कर दे। कॉपर आक्सीक्लोराइड 0.2 % के घोल का छिड़काव करें एवम पत्ते निकलने पर 0.2 % बाविस्टिन का छिड़काव करें। वर्षा ऋतु में कार्बेन्डाजिम 0.2% का छिडकाव 15 दिन के अंतराल पर आवश्यक है। 

        सफ़ेद चूर्णी रोग 
        अन्य फफूंद बीमारियों की अपेक्षा यह शुष्क जलवायु में अधिक फैलाती है। प्रायः पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफ़ेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं। ये दाग धीरे - धीरे पुरे पत्तों एवं फलों पर फ़ैल जाते हैं। जिसके कारण फल गिर सकते हैं या देर से पकते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 0.2% घुलनशील गंधक, या 0.1% कैरोथेन के दो छिडकाव 10 - 15 दिन के अंतराल पर करें। 

        कीट 
        थ्रिप्स, चैफर, बीटल एवं चिडिया, पक्षी अंगूर को हानि पहुंचाते हैं। थ्रिप्स का प्रकोप मार्च से अक्तूबर तक रहता है। ये पत्तियों, शाखाओं, एवं फलों का रस चूसकर हानि पहुंचाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए 500 मिली. मेलाथियान का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें। 
        चैफर बीटल कीट रात में पत्तों को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त करता है, वर्षाकाल में 10 दिन के अंतराल पर 10 % बी.एच.सी. पावडर बुरक देना इस कीट के नियंत्रण हेतु लाभदायक पाया गया है। 
        चिडिया अंगूर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। फल पकने के समय चिडिया गुच्छे खा जाती है। अतः घर से आंगन में लगी बेल के गुच्छों को हरे रंग की मलमल की थैलियों से ढक देना चाहिए। बड़े - बड़े बगीचों में नाइलोन के जाल से ढक दें , ढोल बजाकर चिडियों से छुटकारा पाया जा सकता है। 

         

        फलों की गुणवत्ता-महत्वपूर्ण दिशानिर्देश

        पादप जैव विनियामकों एवं सस्यक्रियाओं द्वारा फलों की क्वालिटी में सुधार।

        भा. कृ. अ. सं. द्वारा मानसूनी वर्षा प्रारंभ हाने से पहले ही अंगूरों की अगेती तुड़ाई कर लेने की तकनीक विकसित की गयी है। जनवरी के प्रथम सप्ताह में छंटाई के तुरन्त पश्चात अंगूर बेलों पर डार्मेक्स अथवा डॉरब्रेक (30 मि.ली. का एक छिड़काव किया जाता है। इस उपचार से फल 2 से 3 सप्ताह पूर्व ही कलियां खिल जाती है तथा अंगूर पक जाते है।

        लंबे अंगूर प्राप्त करने के लिए पुष्पगुच्छों के आधा खिलने के समय उन्हें जिब्रेलिक एसिड में डुबोने सिफारिश की जाती है। ब्यूटी सीडलेस किस्म 45 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति, तथा पर्लेट, पूसा उर्वशी और पूसा सीडलेस किस्में 25-30 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति इस संबध में अनुकूल प्रतिक्रिया प्रदर्शित करती हैं।

        फल के रंग और मिठास की दृष्टि से अंगूर की क्वालिटी में सुधार लाने के साथ-साथ फलों को शीघ्र पकाने हेतु अंगूरों को मटर के दानों के बराबर के आकार में बनाए गए घोल में डुबोया जा सकता है।

        इसके अतिरिक्त, फल क्वालिटी में सुधार लाने के लिए मुखय तने की गर्डलिंग और गुच्छों में अंगूरों की सघनता कम करने जैसी क्रियाएं (थिनिंग) भी लाभदायक पाई गई है। फल आने के 4-5 दिन पश्चात गर्डलिंग चाकू की मदद से तने के चारों ओर भू-सतह से 30 सें. मी. ऊंचाई तक पतली छाल (0.5-1.0 सें. मी.) को गोलाकार हटा दिया जाता है। कैंची अथवा ब्रशिंग द्वारा पुष्पगुच्छ के एक तरफ से फलों को पूरी तरह हटाकर गुच्छों की थिनिंग की जाती है। अकेले गर्डलिंग करने से फल के भार में वृद्धि की जा सकती है लेकिन थिनिंग (छरहरापन) के साथ गर्डलिंग करने से अंगूर की मिठास (टीएसएस) में 2-3 प्रतिशत वृद्धि होती है और उन्हें एक सप्ताह अगेती पकाया जा सकता है।

        खाद कब दें

        छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए। शेष मात्र फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें।

        कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार

        अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए। ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं। परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है।

        फसल निर्धारण

        फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है। अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं। अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं। अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें।

        छल्ला विधि

        इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है। अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौड़ी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए।

        नाशीजीवों एवं बीमारियों का नियंत्रण

        पत्ती लपेटक इल्लियां पत्ती के किनारों को मध्यधारी की ओर लपेट देती है। ये इल्लियां पत्तियों की निचली बाह्‌य सतह पर पलती हैं। इस नाशीजीव के नियंत्रण हेतु 2 मि. ली. मेलाथियॉन अथवा डाइमेथोएट को प्रति लीटर पानी में 2 मि. ली. की दर से डाइमेथोएट अथवा  मेलाथियॉन का छिड़काव करने से लीफ हॉपर (पात-फुदके) को भी नियंत्रित किया जा सकता है। अंगूर की बेलों पर शल्क (स्केल) भी दिखाई पड़ते हैं जिन्हें प्रति ली. पानी में 1 मि. ली. डाइजिनॉन मिलाकर बेलों  की छंटाई के तुरंत बाद छिड़कने से सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। दीमकों के हमले से बचने के लिए 15-20 दिन के  अन्तराल पर एक बार 5 मि. ली. क्लोरोपायरीफॉस को प्रति लिटर जल में घोलकर तने पर छिड़कना तथा मिट्‌टी को इस घोल से भिगोना लाभदायक है।

        सफ़ेद चूर्णी रोग

        अन्य फफूंद बीमारियों की अपेक्षा यह शुष्क जलवायु में अधिक फैलाती है। प्रायः पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफ़ेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं। ये दाग धीरे - 

         प्रस्तावना

        हमारे देश में व्यावसायिक रूप से अंगूर की खेती पिछले लगभग छः दशकों से की जा रही है और अब आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बागवानी उद्यम के रूप से अंगूर की खेती काफी उन्नति पर है। आज महाराष्ट्र में सबसे अधिक क्षेत्र में अंगूर की खेती की जाती है तथा उत्पादन की दृष्टि से यह देश में अग्रणी है। भारत में अंगूर की उत्पादकता पूरे विश्व में सर्वोच्च है। उचित कटाई-छंटाई की तकनीक का उपयोग करते हुए मूलवृंतों के उपयोग से भारत के विभिन्‍न क्षेत्रों में अंगूर की खेती की व्‍यापक संभावनाएं उजागर हुई हैं।

        भारत में अंगूर की खेती अनूठी है क्योंकि यह, उष्ण शीतोष्ण,सभी प्रकार की जलवायु में पैदा किया जा सकता है। हालांकि अंगूर की अधिकांशतः व्यावसायिक खेती (85प्रतिशत क्षेत्र में) उष्णकटिबन्धीय जलवायु वाले क्षेत्रों में (महाराष्ट्र,कर्नाटक,आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु) तथा उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु वाले उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से ताजा अंगूर उपलब्ध नहीं होते हैं। अतः उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश तथा दिल्ली व राजस्थान के कुछ भागों में अंगूर की खेती की जा रही है, जिससे जून माह में भी अंगूर मिलते हैं।

        संस्थान द्वारा की गई पहल

        भारतीय कृषि अनुसंधान में अंगूर की खेती जननद्रव्य के संग्रहण,नए जीन प्ररूपों के प्रजनन,वृद्धि नियामकों के इस्तेमाल,सस्य तकनीकों के मानकीकरण(इनमें कटाई-छंटाई, मूल-वृन्त,जल एवं पोषकतत्वों की आवश्यकता आदि विषय भी शामिल हैं) और कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी पर वर्ष 1956 मं अनुसंधान कार्य शुरू किया गया। प्रचलन में लाने के लिए अंगूर की अनेक किस्में विकसित की गई। इन सभी किस्मों की व्यावसायिक खेती की जा रही है, तथापि इन तीनों में ही इस क्षेत्र की आदर्श किस्म बनने की दृष्टि से कोई न कोई कमी है। इसे ध्यान में रखते हुए अगेती परिपक्वता,अच्छे सरस फल के साथ उच्च पैदावार के गुणों से युक्त जीनप्ररूपों के विकास का एक सघन प्रजनन कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। भा.कृ.अं.सं. में दो सफल हाइब्रिड नामतः पूसा उर्वशी एवं पूसा नवरंग विकसित किए गए और उन्हें कई सालों तक बहु-स्थानक परीक्षणों के उपरांत 1996-97 में जारी किया गया। उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में बुवाई के लिए उपयुक्त अंगूर की किस्मों के मुखय गुण नीचे दिए गए हैं:

        भा.कृ.अ.सं. द्वारा जारी /सिफारिश की गई किस्में

        ब्यूटी सीडलेस

        मूलतः कैलिफोर्निया (यूएसए) की किस्म ब्यूटी सीडलेस एक जल्दी पकने वाला किस्म है। इसके गुच्छे शंक्वाकार व छाटे से मध्यम आकार के होते हैं। इसके दाने सरस, छोटे, गोल, गहरे लसल से लगभग काले रंग के होते है। फलों का गूदा मुलायम और हल्का सा अम्लीय होता है। फलों में एक-दो खाली व अप्पविकसित खोखले बीज हाते हैं तथा छिलका मध्यम मोटा होता है। इस किस्म में कुल घुलनशील शर्करा (टीएसएस) 18-19 प्रतिशत है। यह किस्म मध्य जून तक पकती है। तत्काल खाने की दृष्टि से यह एक उपयुक्त किस्म है।

        पर्लेट

        मूलतः कैलिफोर्निया की किस्म पर्लेट को उगाने की सिफारिश उत्तर भारत की परिस्थितियों के लिए की जाती है। यह शीघ्र पकने वाली, मध्यम प्रबल, बीजरहित तथा मीठे स्वाद वाली किस्म है। इसके गुच्छे मध्यम से लंबे, खंक्वाकार और गठे हुए होते हैं। इसका फल सरस, हरा, मुलायम गूदे और पतल छिलके वाला होता है। इस किस्म में कुल घुलनशील शर्करा (टीएसएस) 20-22 प्रतिशत है। फसल के आधे पक जाने पर जिब्रेलिक अम्ल (30 प्रति दस लक्षांश) GA3 का छिड़काव बहुत लाभदायक होता है। यह किस्म जून के दूसरे सप्ताह से पकना शुरू हो जाती है।

        पूसा सीडलेसलोकप्रिय किस्म पूसा सीडलेस की खेती उत्तरी भार में की जाती है। यह जून के तीसरे सप्ताह में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी लताएं समजबूत होती हैं और उनमें मध्यम से लंबे आकार के गठीले गुच्छे आते हैं। इसके दाने सरस, छोटे, बीज रहित और हरापन लिए हुए पीले रंग के हाते हैं। गूदा मुलायम और मीठा हाता हैं जिसमें कुल घुलनशील शर्करा (टी एस एस) 22 प्रतिशत है।

        पूसा उर्वशी (हर X ब्यूटी सीडलेस)

        पूसा उर्वशी अंगूर की एक शीघ्र पकने वाली हाइब्रिड किस्म है जिसके फल तने के आधरा पर लगने शुरू हो जाते हैं। इसके गुच्छे कम गठीले (खुले) तथा आकार में मध्यम हाते हैं जिनमें मध्यम आकार के, अंडाकार,हरापन लिए हुए पीले बीज रहित अंगूर लगते है। यह किस्म ताजा खाने तथा किशमिश बनाने हेतु उपयुक्त हैं। इस हाइब्रिड में कुल घुलनशील शर्करा (टी एस एस) का स्तर 20-22 प्रतिशत है और यह बीमारियों का प्रतिरोधी है तथा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों मंध जहां मानसून से पहले छुट-पुट वर्षा की समस्याहै, उगाए जाने के लिए अच्छी है।

        पूसा नवरंग (मेडीलाइन एंजीवाइन X रूबीरेड)

        पूसा नवरंग एक टंनटुरियर हाइब्रिड किस्म है जो जल्दी पकने वाली है। इसमें फल बेल में नीचे की ओर लगते है। इसके गुच्छे कम गठीले, मघ्यम आकर के होते हैं। तथा अंगूर मध्यम गोलाकार होते हैं। यह किस्म जूस तथा रंगीन शराब के लिए अच्छी है। यह हाइब्रिड ऐन्थ्रक्नोज बीमारी का प्रतिरोधी है तथा उपोष्ण-कटिबन्धीय क्षेत्रों में जहां मानसून से पहले छुट-पुट वर्षा की समस्या है, उगाए जाने के लिए अच्छा है।

        अंगूर की पूसा किस्मों की लोकप्रियता

        पूसा उर्वशी एवं पूसा नवरंग दोनों किस्मों के जारी होने के बाद से ही अंगूर की खेती करने वाले किसानों को आकर्षित किया है। जननद्रव्य विनिमय एवं वितरण के तहत, राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केन्द्र, पुणे, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना तथा चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर सहित विभिन्न अनुसंधान केन्द्रों को अंगूर की बेलों की कलमों की आपूर्ति की गयी। इसी प्रकार सिनौली, मेरठ (उ. प्र.); सांगली (हि.प्र.); हिन्दौर (म. प्र.) तथा रायपुर के समीप राजनंद गांव (छत्तीसगढ़); रायगढ़ (उड़ीसा) आदि के प्रगतिशील किसानों को अंगूर की कलमें उपलब्ध कराई गई जहां इनका प्रदर्शन बेहतर रहा। ऊपर बताए गए बहुत से क्षेत्र अंगूर की खेती के लिए परंपरागत क्षेत्र नहीं माने जाते। अतः पूसा अंगूर किस्मों को लोकप्रिय बनाने और विभिन्न क्षेत्रों में अंगूर की खेती की संभावना तलाशने के उद्‌देश्य से प्रगतिशील किसानों की मदद से एक सहयोगी अनुसंधान कार्यक्रम की शुरूआत की गयी।

        गैर-परंपरागत क्षेत्रों में अंगूर की सफल खेती की शुरूआत

        इस विवरण में छत्तीसगढ़ में अंगूर की खेती की सफलतम तकनीकों पर प्रकाश डाला गया है। संस्थान ने रायपुर जिले के राजनंद  गांव के निवासी एवं प्रगतिशील किसान डॉ. बी. एन पालीवाल के साथ सक्रिय सम्पर्क स्थापित किया। पारम्भ में उनके भालूकोन्हा गांव स्थित फार्म हाउस पर थॉमसन सीडलेस, पर्लेट, हिमरोद, सोनाका, तास-ए-गणेश आदि जैसी आठ किस्मों के साथ पूसा नवरंग और पूसा उर्वसी दोनों की 50-50 कलमें लगाई गई। साथ ही अंगूर की खेती की पूरी सस्य विधियां उपलब्ध कराई गई। वर्ष 1999 में फार्म हाउस की अंगूर लताओं में फल आने के उपरांत छत्तीसगढ़ जैसे अंगूर की खेती वाले गैर-परंपरागत क्षेत्र में अंगूर की सफल खेती एक  राष्ट्रीय समाचार बन गई। भा. कृ. अं. सं. के वैज्ञानिकों के सक्रिय परामर्श और खेत दौरों के परिणामस्वरूप अंगूर की खेती की विभिन्न सस्य क्रियाओं का मानकीकरण किया गया। इस सफलता से समग्र क्षेत्र की आंखें खोल दीं तथा क्षेत्र के अन्य किसानों को भी पूसा नवरंग और पूसा उर्वशी पौधों की हाइब्रिड कलमों की आपूर्ति की गई।

        वर्तमान में, लगभग 15 हैक्टर क्षेत्र में पूरी तरह से पूसा अंगूर की खेती की जाती है। इस सफलता ने राज्य के किसानों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित किया और राज्य कृषि विभाग ने रायपुर को छतीसगढ़ का अंगूर की खेती वाला जिला घोषित कर दिया है। पिछले कुछ वर्षो के दौरान स्थानीय गैर सरकारी संगठन, पालीवाल ग्रेप रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्‌यूट, भालूकोना, राजनन्द गांव के प्रयासों से अंगूर की खेती का दायरा पड़ोसी जिलों नामतः दुर्ग और कावर्धा तक बढ़ा। वर्तमान में अंगूर की व्यावसायिक खेती करने वाले 15 से अधिक प्रगतिशील किसानों ने एक सहकारी समिति का गठन किया है।

        लवण सहिष्णु मूलवृंतों का उपयोग, ड्रिप सिंचाई आदि जैसी अंगूर की खेती की नई तकनीकें काफी लोकप्रिय हो रही है। डॉ. पालीवाल के फार्म हाउस में प्राप्त नतीजे उत्साहवर्धक हैं। समुचित छंटाई तकनीक के साथ मूलवृंत के प्रयोग से उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई है। डॉगरिज मूलवृंत के इस्तेमाल से पूसा उर्वशी और पूसा नवरंग किस्माकें के अंगूरों के आकार और गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय सुधार पाया गया है। क्षेत्र में अंगूर की खेती से प्राप्त लागत : लाभ आकलन से पता चलता है कि ताजे अंगूरों के उत्पादन में जहां प्रति एकड़ 1,0,000 रूपये का लाभ है, वहीं किशमिश उत्पादन में यह लाभ बढ़कर 1,50,000 रूपये प्रति एकड़ हो जाता है।

         मृदा एवं जलवायु संबंधी आवश्यकताएं

        इस क्षेत्र के लिए मानकीकृत और अनुशंसित अंगूर उत्पादन प्रौद्योगिकी नीचे दी गई हैः

        अंगूर की खेती के लिए गर्म, शुष्क व वर्षा रहित गर्मी तथा अति ठंड वाले सर्दी के मौसमों की आवश्यकता होती है। मई -जून के दौरान फलों के पकते समय वर्षा का होना नुकसान दायक है। इससे फल की मिठास में कमी आती है, फल असमान रूप से पकता है और चटक जाता है। अंगूर की खेती  के लिए अच्छी जल-निकासी वाली मिट्‌टी बेहतर मानी जाती है। अंगूर की खेती अलग-अलग प्रकार की ऐसी मिट्‌टी मे की जा सकती है जिसमें फर्टिलाइजर का पर्याप्त उपयोग हुआ हो और उसकी अच्छी देखभाल की गई हो। रेतीली तथा बजरीदार मिट्‌टी में भी अंगूर की अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की परिस्थतियों के तहत अंगूर की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्‌टयों यथा लाल बजरी, काली मिट्‌टी, कंकड़ीली तथा कठोर सतह वाले क्षेत्रों में भी संभव है। हालांकि इस क्षेत्र में लाल बजरी और यहां तक कि रेतीली मिट्‌टी की बहुतायत है, फिर भी परिणामों से पता चलता है कि पर्याप्त उर्वरकों और सिंचाई के प्रयोग से यहां अंगूर की अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है। सामान्तः 2.5 मीटर गहराई तक की मिट्‌टी आदर्श मानी जाती है। इसका pH मान 6.5 से 8 होना चाहिए। विनिमय शील सोडियम की दर 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। किसानों को 0.3 प्रतिशत अथवा अधिक अवणता वाली मिट्‌टी में अंगूर की खेती से बचना चाहिए। समस्याग्रस्त क्षेत्रों समें अंगूर की खेती के लिए साल्ट क्रीक, डॉगरिज ओर 1613 जैसे लवण सहिष्णु मूलवृंतों के प्रयोग का सुझाव दिया जाता है जिनका प्रयोग उपरोक्त किस्मों के मूलवृंत रोपण के लिए किया जा सकता है।

        प्रवर्धन

        प्रूनिंग वुड से ली गई एक वर्षीय परिपक्व केन से तने की कटिंग कर अंगूर का प्रवर्धन आसानी से किया जा सकता है। प्रत्येक कटिंग पैंसिल जितनी मोटी व 20-25 सें. मी. लंबी होनी चाहिए जिसमें 3-4 गांठे हों। इस प्रकार तैयार की गई कलम को या तो क्यारियों में अथवा मेंड़ों पर 45 डिग्री के कोण पर रोपा जाता है। अभी हाल ही में, वेज ग्राफ्टिंग का प्रयोग करते हुए फरवरी -मार्च (सुशुप्त कलियों में अंकुरण से पूर्व) तथा जुलाई-अगस्त (वर्षा उपरान्त) के दौरान एक वर्ष पुरानी मूलवृंत की स्व-स्थाने (इन सिटू) (मूल अवस्था में) ग्राफ्टिंग की गयी है।

        रोपण

        बेलों के बीच उचित दूरी रखने के लिए रोपण से पहले किसानों को एक ले-आउट प्लान तैयार कर लेना चाहिए। सामान्य तौर पर यह दूरी इस प्रकार रखी जाती है - हैड सिस्टम में 2 मी. ग 2 मी.; ट्रेलिस सिस्टम में 3 मी. ग 3 मी.; बॉवर सिस्टम में 4 मी. ग 4 मी.; Y सिस्टम में 3 मी. ग 4 मी.।

        नवम्बर-दिसंबर के दौरान 75 सें मी. ग 75 सें. मी. आकार के गड्‌ढे खोदकर उनमें गोबर की खाद और 1000 ग्राम नीम की खली को मिट्‌टी के  साथ 1:1 अनुपात में मिला देना चाहिए। अच्छी तरह मिलाने के उपरांत इसमें  एक कि. ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट और 500 ग्रा. सल्फेट ऑफ पोटाश मिला देना चाहिए। दीमकों द्वारा संक्रमित क्षेत्रों में गड्ढों को 30-50 लीटर जल में 0.2 प्रतिशत क्लोरापइरीफॉस मिलाकर पानी से भर देना चाहिए। एक भारी सिंचाई करके मिट्‌टी को ठीक से बैठ जाने लिए छोड़ देना चाहिए। जनवरी के अंतिम सप्ताह में शाम के समय प्रत्येक गड्‌ढे में एक वर्षीय जड़ कटिंग का रोपण किया जाता है। एक पखवाड़े के बाद बेल कांट-छांट करके एक मजबूत व परिपक्व तने के रूप में रहने दिया जाता है। ऐसी बेलों का रोपण समुचित अंतराल पर किया जाना चाहिए।

        बेलों की स्थाई (ट्रेनिंग)

        यद्यपि उपोष्ण क्षेत्र के लिए बेल के आधार पर फल देने वाली किस्में अधिक उपयुक्त है लेकिन ऐसे क्षेत्र में पुष्ट बेल वाली किस्में उगाई जाती है।

        हैड सिस्टम :

        यह सिस्टम सबसे सस्ता है क्योंकि इसमें कम निवेश की जरूरत होती है। अतः यह अल्प संसाधन वाले किसानों के लिए उपयुक्त है। इस प्रणली के तहत, बेलों को एकल तने के रूप में 1.2 मी. ऊंचाई तक बढ़ाया जाता है और उनमें विभिन्न दिशाओं में अच्छी तरह से फैली हुई चार से छः शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है। बाद में ये शाखाएं लकड़ी की भांति काष्ठीय बन जाती हैं जिनमें फलों के 8-10 गुच्छे लगते हैं। छंटाई करने पर अगले वर्ष के लिए नई शाखाएं निकलती हैं। सामान्यतः अंगूर की खेती के लिए कुछ अन्य प्रणालियों को भी आजमाया जा सकता है। जिनमें प्रमुख हैः

        ट्रेलिस सिस्टम :

        हालांकि यह थोड़ी खर्चीली है, फिर भी इसे सभी अर्ध-प्रबल किस्मों हेतु अपनया जा सकता है। पौधे 3 मी. ग् 3 मी. दूरी पर रोपे जाते हैं तथा लता की शाखाओं को तार पर 2 स्तरों पर फैलने दिया जाता है। लोहे के खंभों की मदद से तार क्षैतिज बांधे जाते हैं, पहला भू-सतह से 3/4मीटर की ऊंचाई पर तथा दूसरा पहले से 25 सें. मी. ऊपर रखा जाता है।शाखाओं को मुख्य तने के दोनों और फैलने दिया जाता है।

        बॉवर, परगोला अथवा पंडाल सिस्टम :

        पौधों को 2 मी. की ऊंचाई तक एकल तने के रूप में बढ़ने दिया जाता है तथा उसके उपरांत लता को मंडप के ऊपर सभी दिशाओं में फैलने दिया जाता है। यह लता मंडप 12 गेज वाली तारो से जाली के रूप में बुना जाता है। और इस जाली को एंगल आरनपत्थरों या लकड़ी के खंभों के सहारे फैलाया जाता है। बेल की मुखयटहनियों पर फल देने वाली शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है और इनकी कटाई-छटाई प्रति वर्ष की जाती है।

        ‘Y’ ट्रेलिस सिस्टम :

        अंगूर की बेलों को विभाजित कर खुली (केनोपी) परबढ़ने दिया जाता है। ‘Y’ के आकार वाले एंगल ट्रेलिस पर 120 से 130 सें.मी. की ऊंचाई पर बांधे गए तारों पर फलदार शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है। सामन्यतः एंगल 100-110 डिग्री कोण का होता है जिसकी शाखाएं 90-120से. मी. तक फैली होती है। इस प्रणाली की सबसे लाभदायक बात यह है कि इसमें फलगुच्छों को सीधी तेज धूप से बचाया जा सकता है।

        अंगूर की बेलों की छंटाई

        उत्तरी भारत में, मध्य दिसंबर से मध्य जनवरी के दौरान जबकि बेलें निष्क्रिय अवस्था में होती हैं, मध्य बेल की कटाई-छंटाई प्रारंभ की जा सकती है लेकिन मध्य भारत (यथा छत्तीसगढ़) में दोहरी कटाई-छंटाई भी की जा सकती है। फल दने वाली बेलों की छंटाई सामान्यतः रोपण के 2-3 वर्ष पश्चात बेल को वांछित आकृति देने और अपनाई जा रही प्रणाली के अनुसार की जाती है। चूंकि अंगूर के गुच्छे प्रत्येक मौसम में बेल से फूटने वाली नई टहनियों पर फलते हैं, अतः पिछलें वर्ष कीटहनियों की निश्चित लंबाई तक छंटाई करना महत्वपूर्ण होता है। किस गांठ तक बेल को छांटा जाए यह किस्म की प्रबलता पर निर्भर करता है।

        अंगूर की कुछ किस्मों में छंटाई की सीमा
        छंटाई के उपरांत बेलो पर 2.2 प्रतिशत ब्लीटॉक्स की छिड़काव करना चाहिए। पौधे के आधार पर दिखाई पड़ने वाले सभी अंकुरों को हाथ से हटा देना चाहिए।

        खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग

        युवा एवं फल वहन करने वाली बेलों को पोषक तत्व प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है। सामान्यतः बेलों को पोषक तत्वों की आधी खुराक मिट्‌टी के माध्यम से तथा शेष आधी पत्तियों पर छिड़काव करके दिए जाने की सिफारिश की जाती है। विशेषकर नव विकसित पत्तियों पर सुबह के समय यूरिया (2 प्रतिशत वाले घोल) के छिड़काव की सिफारिश की जाती है। प्रति पौधा 25 कि. ग्रा. की दर से अच्छी तरह से सड़े हुए गोबर की खाद को फरवरी माह में मिट्‌टी में मिलाया जाता है। उसके उपरांत फरवरी माह में ही  बेलों की छंटाई के तुरंत बाद प्रत्येक बेल में 200 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट, 250  ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 250 ग्रा. अमोनियम सल्फेट के प्रयोग की सिफारिश की जाती है। फल लगना शुरू हाने के पश्चात अप्रैल माह में 200  ग्रा. पोटेशियम सल्फेट की दूसरी खुराक का प्रयोग किया जाता है। आयरन एवं जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए इनका 0.2 प्रतिशत की दर से छिड़काव किया जाता है।

        उपोष्ण- कटिबंधीय फलदार बेलों में उर्वरीकरण की अनुसूची

        नई रोपी गई बेलों को रोपण के पश्चात्‌ सींचा जाता है। खाद एवं उर्वरकों के प्रयोग के बाद भी सिंचाई की जानी चाहिए। यह तब और भी महत्वपूर्ण है जब फलों का विकास हो रहा हो। जैसे-जैसे फलों के रंग में परिवर्तन आने से परिपक्वता का पता चले सिंचाई की आवृत्ति कम की जा सकती है, ताकि फलों में अधिक शर्करा संचित की जा सके। यदि वर्षा न हो तो फलों की तुड़ाई के उपरांत भी सिंचाई जारी रखी जा सकती है। निष्क्रय अवधि (नवम्बर से जनवरी) के दौरान किसी प्रकार की सिंचाई की आवश्यकता नहीं है। ड्रिप सिंचाई के भी आशातीत नतीजे प्राप्त हुए हैं। शून्य (0) से 0.25 बार के मृदा नमी क्षेत्र में बंसत तथा ग्रीष्म में 5-7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। बसंत एवं ग्रीष्म में प्रति बेल 3.5 ली. जल क्षमता वाली 15 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।सिंचाई

        फलों की गुणवत्ता-महत्वपूर्ण दिशानिर्देश

        पादप जैव विनियामकों एवं सस्यक्रियाओं द्वारा फलों की क्वालिटी में सुधार।

        भा. कृ. अ. सं. द्वारा मानसूनी वर्षा प्रारंभ हाने से पहले ही अंगूरों की अगेती तुड़ाई कर लेने की तकनीक विकसित की गयी है। जनवरी के प्रथम सप्ताह में छंटाई के तुरन्त पश्चात अंगूर बेलों पर डार्मेक्स अथवा डॉरब्रेक (30 मि.ली. का एक छिड़काव किया जाता है। इस उपचार से फल 2 से 3 सप्ताह पूर्व ही कलियां खिल जाती है तथा अंगूर पक जाते है।

        लंबे अंगूर प्राप्त करने के लिए पुष्पगुच्छों के आधा खिलने के समय उन्हें जिब्रेलिक एसिड में डुबोने सिफारिश की जाती है। ब्यूटी सीडलेस किस्म 45 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति, तथा पर्लेट, पूसा उर्वशी और पूसा सीडलेस किस्में 25-30 पीपीएम वाले जीए3 के प्रति इस संबध में अनुकूल प्रतिक्रिया प्रदर्शित करती हैं।

        फल के रंग और मिठास की दृष्टि से अंगूर की क्वालिटी में सुधार लाने के साथ-साथ फलों को शीघ्र पकाने हेतु अंगूरों को मटर के दानों के बराबर के आकार में बनाए गए घोल में डुबोया जा सकता है।

        इसके अतिरिक्त, फल क्वालिटी में सुधार लाने के लिए मुखय तने की गर्डलिंग और गुच्छों में अंगूरों की सघनता कम करने जैसी क्रियाएं (थिनिंग) भी लाभदायक पाई गई है। फल आने के 4-5 दिन पश्चात गर्डलिंग चाकू की मदद से तने के चारों ओर भू-सतह से 30 सें. मी. ऊंचाई तक पतली छाल (0.5-1.0 सें. मी.) को गोलाकार हटा दिया जाता है। कैंची अथवा ब्रशिंग द्वारा पुष्पगुच्छ के एक तरफ से फलों को पूरी तरह हटाकर गुच्छों की थिनिंग की जाती है। अकेले गर्डलिंग करने से फल के भार में वृद्धि की जा सकती है लेकिन थिनिंग (छरहरापन) के साथ गर्डलिंग करने से अंगूर की मिठास (टीएसएस) में 2-3 प्रतिशत वृद्धि होती है और उन्हें एक सप्ताह अगेती पकाया जा सकता है।

        खाद कब दें

        छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए। शेष मात्र फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें।

        कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार

        अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए। ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं। परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है।

         

        फसल निर्धारण

        फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है। अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं। अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं। अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें।

         

        छल्ला विधि

        इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है। अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौड़ी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए।

         

        नाशीजीवों एवं बीमारियों का नियंत्रण

        पत्ती लपेटक इल्लियां पत्ती के किनारों को मध्यधारी की ओर लपेट देती है। ये इल्लियां पत्तियों की निचली बाह्‌य सतह पर पलती हैं। इस नाशीजीव के नियंत्रण हेतु 2 मि. ली. मेलाथियॉन अथवा डाइमेथोएट को प्रति लीटर पानी में 2 मि. ली. की दर से डाइमेथोएट अथवा  मेलाथियॉन का छिड़काव करने से लीफ हॉपर (पात-फुदके) को भी नियंत्रित किया जा सकता है। अंगूर की बेलों पर शल्क (स्केल) भी दिखाई पड़ते हैं जिन्हें प्रति ली. पानी में 1 मि. ली. डाइजिनॉन मिलाकर बेलों  की छंटाई के तुरंत बाद छिड़कने से सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। दीमकों के हमले से बचने के लिए 15-20 दिन के  अन्तराल पर एक बार 5 मि. ली. क्लोरोपायरीफॉस को प्रति लिटर जल में घोलकर तने पर छिड़कना तथा मिट्‌टी को इस घोल से भिगोना लाभदायक है।

         

        सफ़ेद चूर्णी रोग

        अन्य फफूंद बीमारियों की अपेक्षा यह शुष्क जलवायु में अधिक फैलाती है। प्रायः पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफ़ेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं। ये दाग धीरे - धीरे पुरे पत्तों एवं फलों पर फ़ैल जाते हैं। जिसके कारण फल गिर सकते हैं या देर से पकते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 0.2% घुलनशील गंधक, या 0.1% कैरोथेन के दो छिडकाव 10 - 15 दिन के अंतराल पर करें।

        उपोष्ण क्षेत्र में अंगूर की फसल प्रायः चूर्णी फफूंद तथा एथ्रेक्नोज के प्रकोप से बच जाती है क्योंकि इनका संक्रमण भारी वर्षा हाने पर ही देखने में आया है। जून-सितम्बर के दौरान 1-1 पखवाड़े के अन्तराल पर 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स अथवा बेविस्टिन को प्रति लीटर जल में मिलाकर बने घोल का छिड़काव करने से इन बीमारियों को नियंत्रण में रखा जा सकता है।

        कीट

        • थ्रिप्स, चैफर, बीटल एवं चिडिया, पक्षी अंगूर को हानि पहुंचाते हैं। थ्रिप्स का प्रकोप मार्च से अक्तूबर तक रहता है। ये पत्तियों, शाखाओं, एवं फलों का रस चूसकर हानि पहुंचाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए 500 मिली. मेलाथियान का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें।
        • चैफर बीटल कीट रात में पत्तों को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त करता है, वर्षाकाल में 10 दिन के अंतराल पर 10 % बी.एच.सी. पावडर बुरक देना इस कीट के नियंत्रण हेतु लाभदायक पाया गया है।
        • चिड़िया अंगूर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। फल पकने के समय चिडिया गुच्छे खा जाती है। अतः घर से आंगन में लगी बेल के गुच्छों को हरे रंग की मलमल की थैलियों से ढक देना चाहिए। बड़े - बड़े बगीचों में नाइलोन के जाल से ढक दें , ढोल बजाकर चिडियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

        फलों की तुड़ाई

        गुच्छों को पूरी तरह से पकने पर तोड़ना चाहिए। फलों का पकना वांछित टी एस एस व अम्लता के अनुपात से जाना जा सकता है जो विभिन्न किस्मों में 25-35 के बीच अलग-अलग होती है (पूसा सीडलेस में 29.24)। पूसा किस्में जून के प्रथम सप्ताह में पकना आरंभ कर देती हैं। अंगूर के गुच्छों को तोड़कर प्लास्टिक की ट्रे में रखना चाहिए। गुच्छों को एक के ऊपर एक करके नहीं रखना चाहिए। गुच्छों से खेत की गर्मी को कम करने के लिए उन्हें कुछ समय तक छाया में रखना चाहिए। इसके उपरांत खराब अंगूरों को गुच्छों से हटा देना चाहिए। उत्पाद को लहरदार (कारूगेटिड) फाइबर बोर्ड बक्सों में पैक करके स्थानिय अथवा दूरवर्ती बाजार में भेजा जा सकता है।

        भंडारण एवं उपयोग

        अंगूरों को 80-90 प्रतिशत आर्द्रता एवं शून्य डिग्री तापमान पर 4 सप्ताह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जून माह में अंगूरों का अच्छा दाम मिलता है किशमिश और शराब बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर उसे अमल में लाकर भी लाभ कमाया जा सकता है।

         

        सस्यक्रियाओं का कैलेण्डर

        उपोष्ण कटिबंधीय अंगूर की खेती की सस्यक्रियाओं का कैलेण्डर

        जनवरी के प्रथम से द्वितीय सप्ताह तक

        परिपक्व अंगूर की कटाई-छंटाई एवं नवविकसित बेलोंक की संधाई (ट्रेनिंग)। प्रत्येक युवा एवं परिपक्व बेल में 25 कि. ग्रा. अच्छी तरह से सड़ी हुए घूरे की खाद का प्रयोग कर थियोयूरिया अथवा डॉर्मेक्स का इस्तेमाल।

        जनवरी के तीसरे से चौथे सप्ताह तक

        अंगूर की प्रत्येक बेल में 250 ग्रा.अमोनियम सल्फेट और 250 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट द्वारा उर्वरीकरण। अप्रैल का प्रथम सप्ताह : सरस फल विकास और बेहतर क्वालिटी के लिए प्रति फलदार बेल के लिए 200 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट का प्रयोग।

        अप्रैल के दूसरे सप्ताह से जून के अंत तक

        एक दिन के अन्तराल पर सिंचाई (परिपक्वता से एक सप्ताह पूर्व सिंचाई को रोक देना चाहिए)। फलों की तुड़ाई के तुरंत पश्चात्‌ एंथ्रेक्नोज के प्रकोप से बचने के लिए प्रति लीटर जल में 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स/बैविस्टिन के घोल का छिड़काव।

        जुलाई-अगस्त-सितंबर

        फलों की तुड़ाई के तुरंत बाद सितम्बर तक 15-20दिन के अंतराल पर प्रति लीटर जल में 3 ग्रा. ब्लीटॉक्स के घोल का छिड़काव।

        नवम्बर-दिसम्बर

        प्रति लीटर 3 ग्रा. ब्लीटाक्स के घोल का जल के साथ अन्तिम छिड़काव।

        मान्यता

        भा. कृ.अ. सं. के प्रधान वैज्ञानिक एवं अंगूर प्रजनक स्वर्गीय डॉ, पी.सी. जिंदल तथा छत्तीसगढ़ के प्रगतिशील किसान डॉ. बी. एन.पालीवाल के उललेखनीय प्रयासों को राज्य सरकार द्वारा मान्यता दी गई है। सरकार के अनेक गण्यमान्य पदाधिकारियों ने प्रायोगिक फार्म का दौरा किया। डॉ. जिंदल एवं डॉ. पॉलीवाल के योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए वर्ष 2003 में राज्य कृषि विभाग एवं जिला क्लेक्ट्रेट, रायपुर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित राज्य बागवानी प्रदर्शनी में छत्तीसगढ़ राज्य के कृषि एवं उद्योग मंत्री ने डॉ. जिंदल एवं डॉ. पॉलीवाल को रजत पटि्‌टका व प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित किया। इस सफलता से उत्साहित होकर पड़ोसी राज्य उड़ीसा के सीमावर्ती जिलों के किसानों ने भी उपोष्ण कटिबंधीय अंगूर की खेती करना प्रारंभ कर दिया है। 'द ग्रेप ग्रोअर्स कॉआपरेटिव ऑफ छत्तीसगढ़' द्वारा अब अपने उत्पादों के प्रसंस्करण हेतु किशमिश तथा शराब बनाने का संयंत्र स्थापित करने की योजना तैयार की जा रही है।

        अंगूर से किशमिश बनाने की विधि

        किशमिश बनाने के लिए अंगूर की ऐसी किस्म का चयन किया जाता है जिसमें कम से कम 20 फीसदी मिठास हो। किशमिश को तैयार करने की तीन विधियां हैं- पहली- प्राकृतिक प्रक्रिया, दूसरी-गंधक प्रक्रिया और तीसरी-कृत्रिम प्रक्रिया। पहली प्राकृतिक प्रक्रिया में अंगूर को गुच्छों से तोड़ने के बाद सुखाने के लिए 9क् सेंटीमीटर लंबी और 60 सेंटीमीटर चौड़ी ट्रे या

        60 सेंटीमीटर लंबी और 45 सेंटीमीटर चौड़ी ट्रे, जिसके नीचे प्लाई-वुड या लकड़ी की पट्टियां लगी हुई हों, में अंगूरों को अच्छी तरह फैला दें। फिर तेज धूप में 6-7 दिन तक रखें। अंगूरों को प्रतिदिन उलटते-पलटते रहें। इसके पश्चात ट्रे को छायादार स्थान पर रख दें, जहां अच्छी तरह हवा लगे सके। छायादार स्थान में सुखाने से किशमिश मुलायम रहती है और इसका इसका रंग भी खराब नहीं होता है। तैयार किशमिश में 15 फीसदी नमी रहनी चाहिए। गंधक प्रक्रिया से किशमिश बनाने पर उसका रंग बिल्कुल नहीं बदलता है। इसका मतलब है कि इस प्रक्रिया से बनी किशमिश हरी रहती है। धूप में सुखाने से किशमिश का रंग थोड़ा भूरा हो जाता है।

        इसे रोकने के लिए गंधक के धुएं का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया के लिए ताजे अंगूरों को गंधक के धुएं से भर कक्ष में लकड़ी की ट्रे पर किशमिश बिछा देते हैं। कमर के भीतर गंधक के धुएं के फैलने का पर्याप्त इंतजाम होना चाहिए। अंगूरों पर तेल की परत भी चढ़ाई जा सकती है। इसके लिए नारियल या मूंगफली तेल का उपयोग किया जाता है। तेल लगाने से किशमिश चमकीली हो जाती है और इसे लंबे समय तक भंडारित किया जा सकता है। कृत्रिम प्रक्रिया से किशमिश बनाने के लिए माइक्रोवेव किरणों से अंगूरों को सुखाया जाता है। इस प्रक्रिया से अंगूर में मौजूद पानी भाप बनकर उड़ जाता है और किशशि की गुणवत्ता भी बनी रहती है। इस प्रक्रिया से 90 फीसदी समय की बचत होती है। अंगूर एक समान सूखता है, जिससे फल का रंग, खुशबू व पोषक तत्व ताजे फल जैसे बने रहते हैं। तैयार किशमिश को शीशे के मर्तबान या पॉलीथीन की थैलियों में बंद करके किसी साफ सुथर हवादार स्थान पर रखना चाहिए।

        अंगूर का शरबत

        ठीक से सफाई करने के बाद अंगूर के बराबर मात्रा में पानी डालकर उसे 10 मिनट तक पका लें। यह ध्यान रहे कि पानी का तापमान 60-70 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक न हो। उबले अंगूरों को छलनी में रगड़कर रस निकाल लें। बड़े पैमाने पर शरबत तैयार करना हो, तब बाल्टी के तले में छोटे छेद करके भी उबले अंगूरों से निकाला जा सकता है। एक अलग बर्तन में चाशनी तैयार करके उसमें सिट्रिक एसिड डाल दें। प्रति लीटर चाशनी में 8-10 ग्राम सिट्रिक एसिड डालना चाहिए। इसके बाद इसे डालकर ठंडी होने। बाद में अंगूर से निकाला रस मिला लें। तैयार रस में प्रति लीटर एक ग्राम के हिसाब से पोटेशियम मेटाबाइ सल्फाइट मिलाएं। पोटेशियम मेटाबाइ सल्फाइट पूर शरबत में एकसाथ मिलने के बजाय छोटी कटोरी में पहले मिलाए और बाद में उसे पूर शरबत में मिलाएं। इस शरबत को साफ बोतल में भरकर ठंडे स्थान में रखें। अंगूरों के बजाय इससे बने उत्पादों का बाजार में कहीं बेहतर दाम मिलेगा। एक फायदा यह भी है कि उत्पादकों पर ताजे अंगूर बेचने का दबाव भी नहीं होगा। इससे उन्हें कम दाम पर अंगूर नहीं बेचने होंगे।

        स्त्रोत-                                      

                                                अंगूर की आधुनिक खेती

        अंगूर संसार के उपोष्ण कटिबंध के फलों में विशेष महत्व रखता है। हमारे देश में लगभग 620 ई.पूर्व ही उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अंगूर की व्यवसायिक खेती एक लाभकारी उद्यम के रूप में विकसित हो गई थी लेकिन उत्तरी भारत में व्यवसायिक उत्पादन धीरे - धीरे बहुत देर से शुरू हुआ। आज अंगूर ने उत्तर भारत में भी एक महत्वपूर्ण फल के रूप में अपना स्थान बना लिया है और इन क्षेत्रों में इसका क्षेत्रफल काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है। पिछले तीन दशकों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अंगूर कि खेती ने प्रगति की है जिसके फलस्वरूप भारत में अंगूर के उत्पादन, उत्पादकता एवं क्षेत्रफल में अपेक्षा से अधिक वृद्धि होती जा रही है। 

        उपयोग 
        अंगूर एक स्वादिष्ट फल है। भारत में अंगूर अधिकतर ताजा ही खाया जाता है वैसे अंगूर के कई उपयोग हैं। इससे किशमिश, रस एवं मदिरा भी बनाई जाती है। 

        मिट्टी एवं जलवायु 
        अंगूर की जड़ की संरचना काफी मजबूत होती है। अतः यह कंकरीली,रेतीली से चिकनी तथा उथली से लेकर गहरी मिट्टियों में सफलतापूर्वक पनपता है लेकिन रेतीली, दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो अंगूर की खेती के लिए उचित पाई गयी है। अधिक चिकनी मिट्टी में इसकी खेती न करे तो बेहतर है। अंगूर लवणता के प्रति कुछ हद तक सहिष्णु है। जलवायु का फल के विकास तथा पके हुए अंगूर की बनावट और गुणों पर काफी असर पड़ता है। इसकी खेती के लिए गर्म, शुष्क, तथा दीर्घ ग्रीष्म ऋतू अनुकूल रहती है। अंगूर के पकते समय वर्षा या बादल का होना बहुत ही हानिकारक है। इससे दाने फट जाते हैं और फलों की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ता है। अतः उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों की सिफारिश की जाती है। 

        किस्में 
        उत्तर भारत में लगाई जाने वाली कुछ किस्मों की विशेषताएं नीचे दी जा रही हैं। 

        परलेट 
        यह उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों में से एक है। इसकी बेल अधिक फलदायी तथा ओजस्वी होती है। गुच्छे माध्यम, बड़े तथा गठीले होते हैं एवं फल सफेदी लिए हरे तथा गोलाकार होते हैं। फलों में 18 - 19 तक घुलनशील ठोस पदार्थ होते हैं। गुच्छों में छोटे - छोटे अविकसित फलों का होना इस किस्म की मुख्य समस्या है। 

        ब्यूटी सीडलेस 
        यह वर्षा के आगमन से पूर्व मई के अंत तक पकने वाली किस्म है गुच्छे मध्यम से बड़े लम्बे तथा गठीले होते हैं। फल मध्यम आकर के गोलाकार बीज रहित एवं काले होते हैं। जिनमे लगभग 17 - 18 घुलनशील ठोस तत्त्व पाए जाते हैं। 

         

         

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        नाशपाती की खेती

        Mon, 04/16/2018 - 10:54

        नाशपाती  

        नाशपाती एक लोकिप्रय फल है। नाशपाती सेब से जुड़ा एक उप-अम्लीय फल है। भारतवर्ष में पैदा होने वाले ठंढे जलवायु के फलों में नाशपाती का महत्व सेब से अधिक है। यह हर साल फल देती है। इसकी कुछ किस्में मैदानी जलवायु में भी पैदा की जाती है और उत्तम फलन देती हैं। नाशपाती के फल खाने में कुरकुरे, रसदार और स्वदिष्ट होते हैं। ये सेब की अपेक्षा सस्ती बिकती हैं। भारत में नाशपाती यूरोप और ईरान से आई और धीरे-धीरे इसकी काश्त बढ़ती गई। अनुमान किया जाता है कि अब हमारे देश में लगभग 4,000 एकड़ में इसकी खेती होने लगी है। पंजाब को कुलू घाटी तथा कश्मीर में यूरोपीय किस्में पैदा की जाती हैं और इनके फलों की गणना संसार के उत्तम फलों में होती है।

        मिट्टी तथा जलवायु

        नाशपाती के लिए मिट्टी का चुनाव इसके प्रकंद पर निर्भर करता है। क्विंस तथा जंगली नाशपाती, दो प्रकार के प्रकंदप्रसरण के काम आते हैं। पहले के लिए चिकनी दोमट तथा दूसरे के लिए बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम समझी जाती है। यूरोपीय मिस्मों के लिए समशीतोष्ण जलवायु अच्छी होती है। साधारण सहिष्णु किस्में मैदानी जलवायु में भी पैदा की जा सकती है। उत्तर प्रदेश की मेरठ कमिश्नरी तथा तराई के ज़िलों में नाशपाती की खेती सफलतापूर्वक होने लगी है।

        विसरण

        इसका विसरण समुद्भवन द्वारा तथा कलम बाँधकर, दोनों प्रकार से होता है। अधिकांशत: छल्ला चश्मा चढ़ाना और ढाल चश्मा चढ़ाना ही विसरण में प्रयुक्त होते हैं। अप्रैल का प्रथम सप्ताह समुद्भवन के लिए उत्तम समय समझा जात है। जिह्वा चश्मा चढ़ाने का प्रयोग मार्च के अंत में सफलतापूर्वक किया जाता है। बड़े पेड़ों के लिए जंगली नाशपाती (महल) तथा छोटे पौधों के लिए क्विंस प्रकंद काम में लाए जाते हैं।

        पौधे लगाना

        सर्दी के मौसम में जब नाशपाती के पौधे सुषुप्तावस्था में रहते है, वृक्षारोपण करना चाहिए। महल पर प्रसारित पौधे 20-25 फुट तथा क्विंस पर प्रसारित पौधे 12-15 फुट की दूरी पर गड्ढे खोदकर लगाना चाहिए।

        खाद, सिंचाई तथा अंतरासस्य

        पूर्ण फलनप्राप्त पेड़ों को दिसंबर के महीने में प्रति पेड़ लगभग दो मन सड़े गोबर की खाद, तीन पाउंड ऐमोनियम सल्फेट तथा एक पाउंड सुपरफॉस्फेट प्रति वर्ष देना चाहिए। खाद की यह मात्रा पेड़ों की बाढ़ तथा फलन में वृद्धि कराती है। मार्च में जब फल मटर के दाने से कुछ बड़े हो जाएँ, तब पेड़ों को हफ्तेवार पानी देना चाहिए और जून के मध्य तक इसी प्रकार सिंचाई करते रहना चाहिए। हर पानी के दो या तीन दिन बाद हल्की गुड़ाई, निराई करके थालों को साफ़ सुथरा रखना चाहिए।

        थालों को छोड़कर उद्यान की शेष भूमि में मटर, चना, लोबिया जैसी फलीदार फसलों का अंतरासस्य करते रहना चाहिए। इससे केवल अतिरिक्त आमदनी ही नहीं होगी, बल्कि भूमि की उर्वराशक्ति भी बनी रहेगी।

        किस्में

        फलों के अनुसार नाशपाती की समस्त किस्में निम्नलिखित भागों में विभाजित की जा सकती हैं :

        1. चाइना या साधारण नाशपाती
        2. यूरोपीय नाशपाती
        3. यूरोपीय और चाइना नाशपाती के संकर।

        चाइना नाशपाती उत्तर प्रदेश के पश्चिमी ज़िलों में पैदा होती है। इसके फल अन्य के मुकाबले में कठोर होते हैं और मुरब्बा बनाने अथवा डिब्बाबंदी के कार्य में लाए जाते हैं।

        यूरोपीय किस्मों में लैक्सटन्स सुपर्व, विलियम्स तथा कॉन्फ्रसें उत्तम किस्में है। इनके फल कोमल, रसदार और मीठे होते हैं। इनकी कृषि कुमाऊँ तथा चकराता में सफलतापूर्वक की जा सकती है। संकर किस्मों को नाख भी कहते हैं। यूरोपीय किस्मों की अपेक्षा ये अधिक सहिष्णु होती हैं। इनमें लेकांट, स्मिथ तथा किफर बहुत ही प्रचलित किस्में हैं।

        कांट छाँट

        पेड़ लगाने के दूसरे वर्ष से ही हल्की काट छाँट करके पौधे को कटोरे का ढाँचा देना चाहिए। बाहर की तरफ फैलनेवाली शाखों को काट छाँटकर, पेड़ का फैलाव ऊपर की ओर करना चाहिए। ढाँचा प्रतिस्थापित हो जान के बाद फलवाली टहनियों की हल्की कटाई करते रहना चाहिए। सभी प्रकार की काट छाँट का उचित समय दिसंबर या जनवरी है। काट छाँट के बिना पेड़ झाड़ जैसे बन जाते हैं और फलन की कम हो जाता है।

        फलन

        वसंत के शुरू होते ही पेड़ों पर हरी कोपलें तथा फूल आने शुरू हो जाते हैं। इनके फल जून के अंत में पकने लगते हैं। चाइना नाशपाती की उपज सबसे अधिक होती हैं। पूर्ण वृद्धिप्राप्त पेड़ से लगभग चार मन तक फल उतारे जाते हैं। नाख की उपज ढाई से तीन मन तक होती है। अनुभवी लोगों का कहना है कि उद्यान में दो या तीन किस्मों को साथ साथ लगाने से फसल बढ़ जाती है।

        विपणन

        नाशपाती के फल को पेड़ पर पूरा नहीं पकने देना चाहिए, क्योंकि यह रस से भर जाता है और उतारने में थोड़ी सी भी खुरच लगने से सड़ने लगता है। ज्योंही फल की सतह पीली होने लगे तथा उसपर के हरे हरे, छोटे छोटे, गोल निशान भूरे होने लगें, फलों का सावधानी से उतारने लगना चाहिए। इनको बक्सों में चार या पाँच दिन तक सुरक्षित रख देने स, ऊपरी सतह पीली पीली हो जाती है और गूदा रसदार और मीठा हो जाता है। 4.5रू सें. ताप पर इसके फल 20-25 दिन तक रखे जा सकते हैं।

        उपयोग

        चाइना नाशपाती के फल अधिकतर मुरब्बा बनाने तथा डिब्बाबंदी के कार्य में लाए जाते हैं। यूरोपीय और संकर किस्मों के फल ताजे ही खाने के काम में आते हैं।

        कीड़े तथा रोग

        नाशपाती के फलों में कभी कभी एक प्रकार का कीड़ा पाया जाता है। जैसे ही ये कीड़े फलों में छेद करना शुरू करें, कीड़ेवाले फलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए ताकि इनका प्रकोप और न बढ़े। नाशपाती के रोगों में तना फफोला, तना कैंसर तथा दग्ध विवर्णता मुख्य हैं। इनसे बचने के लिए रोगरोधी पदार्थों का उपयोग करना चाहिए।
        नाशपाती एक लोकिप्रय फल है। नाशपाती सेब से जुड़ा एक उप-अम्लीय फल है। भारतवर्ष में पैदा होने वाले ठंढे जलवायु के फलों में नाशपाती का महत्व सेब से अधिक है। यह हर साल फल देती है। इसकी कुछ किस्में मैदानी जलवायु में भी पैदा की जाती है और उत्तम फलन देती हैं। नाशपाती के फल खाने में कुरकुरे, रसदार और स्वदिष्ट होते हैं। ये सेब की अपेक्षा सस्ती बिकती हैं। भारत में नाशपाती यूरोप और ईरान से आई और धीरे-धीरे इसकी काश्त बढ़ती गई। अनुमान किया जाता है कि अब हमारे देश में लगभग 4,000 एकड़ में इसकी खेती होने लगी है। पंजाब को कुलू घाटी तथा कश्मीर में यूरोपीय किस्में पैदा की जाती हैं और इनके फलों की गणना संसार के उत्तम फलों में होती है।नाशपाती  

        मिट्टी तथा जलवायु

        नाशपाती के लिए मिट्टी का चुनाव इसके प्रकंद पर निर्भर करता है। क्विंस तथा जंगली नाशपाती, दो प्रकार के प्रकंदप्रसरण के काम आते हैं। पहले के लिए चिकनी दोमट तथा दूसरे के लिए बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम समझी जाती है। यूरोपीय मिस्मों के लिए समशीतोष्ण जलवायु अच्छी होती है। साधारण सहिष्णु किस्में मैदानी जलवायु में भी पैदा की जा सकती है। उत्तर प्रदेश की मेरठ कमिश्नरी तथा तराई के ज़िलों में नाशपाती की खेती सफलतापूर्वक होने लगी है।

        विसरण

        इसका विसरण समुद्भवन द्वारा तथा कलम बाँधकर, दोनों प्रकार से होता है। अधिकांशत: छल्ला चश्मा चढ़ाना और ढाल चश्मा चढ़ाना ही विसरण में प्रयुक्त होते हैं। अप्रैल का प्रथम सप्ताह समुद्भवन के लिए उत्तम समय समझा जात है। जिह्वा चश्मा चढ़ाने का प्रयोग मार्च के अंत में सफलतापूर्वक किया जाता है। बड़े पेड़ों के लिए जंगली नाशपाती (महल) तथा छोटे पौधों के लिए क्विंस प्रकंद काम में लाए जाते हैं।

        पौधे लगाना

        सर्दी के मौसम में जब नाशपाती के पौधे सुषुप्तावस्था में रहते है, वृक्षारोपण करना चाहिए। महल पर प्रसारित पौधे 20-25 फुट तथा क्विंस पर प्रसारित पौधे 12-15 फुट की दूरी पर गड्ढे खोदकर लगाना चाहिए।

        खाद, सिंचाई तथा अंतरासस्य

        पूर्ण फलनप्राप्त पेड़ों को दिसंबर के महीने में प्रति पेड़ लगभग दो मन सड़े गोबर की खाद, तीन पाउंड ऐमोनियम सल्फेट तथा एक पाउंड सुपरफॉस्फेट प्रति वर्ष देना चाहिए। खाद की यह मात्रा पेड़ों की बाढ़ तथा फलन में वृद्धि कराती है। मार्च में जब फल मटर के दाने से कुछ बड़े हो जाएँ, तब पेड़ों को हफ्तेवार पानी देना चाहिए और जून के मध्य तक इसी प्रकार सिंचाई करते रहना चाहिए। हर पानी के दो या तीन दिन बाद हल्की गुड़ाई, निराई करके थालों को साफ़ सुथरा रखना चाहिए।

        थालों को छोड़कर उद्यान की शेष भूमि में मटर, चना, लोबिया जैसी फलीदार फसलों का अंतरासस्य करते रहना चाहिए। इससे केवल अतिरिक्त आमदनी ही नहीं होगी, बल्कि भूमि की उर्वराशक्ति भी बनी रहेगी।

        किस्में

        फलों के अनुसार नाशपाती की समस्त किस्में निम्नलिखित भागों में विभाजित की जा सकती हैं :

        1. चाइना या साधारण नाशपाती
        2. यूरोपीय नाशपाती
        3. यूरोपीय और चाइना नाशपाती के संकर।

        चाइना नाशपाती उत्तर प्रदेश के पश्चिमी ज़िलों में पैदा होती है। इसके फल अन्य के मुकाबले में कठोर होते हैं और मुरब्बा बनाने अथवा डिब्बाबंदी के कार्य में लाए जाते हैं।

        यूरोपीय किस्मों में लैक्सटन्स सुपर्व, विलियम्स तथा कॉन्फ्रसें उत्तम किस्में है। इनके फल कोमल, रसदार और मीठे होते हैं। इनकी कृषि कुमाऊँ तथा चकराता में सफलतापूर्वक की जा सकती है। संकर किस्मों को नाख भी कहते हैं। यूरोपीय किस्मों की अपेक्षा ये अधिक सहिष्णु होती हैं। इनमें लेकांट, स्मिथ तथा किफर बहुत ही प्रचलित किस्में हैं।

        कांट छाँट

        पेड़ लगाने के दूसरे वर्ष से ही हल्की काट छाँट करके पौधे को कटोरे का ढाँचा देना चाहिए। बाहर की तरफ फैलनेवाली शाखों को काट छाँटकर, पेड़ का फैलाव ऊपर की ओर करना चाहिए। ढाँचा प्रतिस्थापित हो जान के बाद फलवाली टहनियों की हल्की कटाई करते रहना चाहिए। सभी प्रकार की काट छाँट का उचित समय दिसंबर या जनवरी है। काट छाँट के बिना पेड़ झाड़ जैसे बन जाते हैं और फलन की कम हो जाता है।

        फलन

        वसंत के शुरू होते ही पेड़ों पर हरी कोपलें तथा फूल आने शुरू हो जाते हैं। इनके फल जून के अंत में पकने लगते हैं। चाइना नाशपाती की उपज सबसे अधिक होती हैं। पूर्ण वृद्धिप्राप्त पेड़ से लगभग चार मन तक फल उतारे जाते हैं। नाख की उपज ढाई से तीन मन तक होती है। अनुभवी लोगों का कहना है कि उद्यान में दो या तीन किस्मों को साथ साथ लगाने से फसल बढ़ जाती है।

        विपणन

        नाशपाती के फल को पेड़ पर पूरा नहीं पकने देना चाहिए, क्योंकि यह रस से भर जाता है और उतारने में थोड़ी सी भी खुरच लगने से सड़ने लगता है। ज्योंही फल की सतह पीली होने लगे तथा उसपर के हरे हरे, छोटे छोटे, गोल निशान भूरे होने लगें, फलों का सावधानी से उतारने लगना चाहिए। इनको बक्सों में चार या पाँच दिन तक सुरक्षित रख देने स, ऊपरी सतह पीली पीली हो जाती है और गूदा रसदार और मीठा हो जाता है। 4.5रू सें. ताप पर इसके फल 20-25 दिन तक रखे जा सकते हैं।

        उपयोग

        चाइना नाशपाती के फल अधिकतर मुरब्बा बनाने तथा डिब्बाबंदी के कार्य में लाए जाते हैं। यूरोपीय और संकर किस्मों के फल ताजे ही खाने के काम में आते हैं।

        कीड़े तथा रोग

        नाशपाती के फलों में कभी कभी एक प्रकार का कीड़ा पाया जाता है। जैसे ही ये कीड़े फलों में छेद करना शुरू करें, कीड़ेवाले फलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए ताकि इनका प्रकोप और न बढ़े। नाशपाती के रोगों में तना फफोला, तना कैंसर तथा दग्ध विवर्णता मुख्य हैं। इनसे बचने के लिए रोगरोधी पदार्थों का उपयोग करना चाहिए।

         

         

         

         

        Tags: नाशपाती का पेड़नाशपाती के प्रकारबबूगोशाCategory: खेती

        अनार की खेती

        Mon, 04/16/2018 - 10:38

        अनार की खेती

        खेतीभारत में अनार की खेती मुखय रूप से महाराष्ट्र में की जाती है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, गुजरात में छोटे स्तर में इसके बगीचे देखे जा सकते हैं। इसका रस स्वादिष्ट तथा औषधीय गुणों से भरपूर होता है। भारत में अनार का क्षेत्रफल 113.2 हजार हेक्टेयर, उत्पादन 745 हजार मैट्रिक टन एवं उत्पादकता 6.60 मैट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है। (2012-13)

        जलवायु

        अनार उपोष्ण जलवायु का पौधा है। यह अर्द्ध शुष्क जलवायु में अच्छी तरह उगाया जा सकता है। फलों के विकास एवं पकने के समय गर्म एवं शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। लम्बे समय तक उच्च तापमान रहने से फलों में मिठास बढ़ती है। आर्द्र जलवायु से फलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।एवं फफूॅंद जनक रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है। इसकी खेती समुद्रतल से 500 मीटर सें अधिक ऊॅंचें स्थानों पर की जा सकती है।

        मृदा

        अनार विभिन्न प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है। परन्तु अच्छे जल विकास वाली रेतीेली दोमट मिट्‌टी सर्वोतम होती है। फलों की गुणवत्ता एवं रंग भारी मृदाओं की अपेक्षा हल्की मृदाओं में अच्छा होता है। अनार मृदा लवणीयता 9.00 ई.सी./मि.ली. एवं क्षारीयता 6.78 ई.एस.पी. तक सहन कर सकता है।

        किस्में

        1. गणेश-यह किस्म डॉं. जी.एस.चीमा द्वारा गणेश रिवण्ड फल अनुसंधान केन्द्र, पूना से 1936 में आलंदी किस्म के वरण से विकसित की। इस किस्म के फल मध्यम आकार के बीज कोमल तथा गुलाबी रंग के होते हैं। यह महाराष्ट्र की मशहूर किस्म है।
        2. ज्योति- यह किस्म बेसिन एवं ढ़ोलका के संकरण की संतति से चयन के द्वारा विकसित की गई है। फल मध्यम से बड़े आकार के चिकनी सतह एवं पीलापन लिए हुए लाल रंग के होते हैं। एरिल गुलाबी रंग की बीज मुलायम बहुत मीठे होते हैं। प्रति पौधा 8-10 कि.ग्रा. उपज प्राप्त की जा सकती है।
        3. मृदुला- यह किस्म गणेश एवं गुल-ए-शाह किस्म के संकरण की एफ-1 संतति से चयन के द्वारा महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी, महाराष्ट्र से विकसित की गई है। फल मध्यम आकार के चिकनी सतह वाले गहरे लाल रंग के होते हैं। एरिल गहरे लाल रंग की बीज मुलायम, रसदार एवं मीठे होते हैं। इस किस्म के फलों का औसत वजन 250-300 ग्राम होता है।
        4. भगवा-इस किस्म के फल बड़े आकार के भगवा रंग के चिकने चमकदार होते हैं। एरिल आकर्षक लाल रंग की एवं बीज मुलायम होते हैं। उच्च प्रबंधन करने पर प्रति पौधा 30.38 कि.ग्रा. उपज प्राप्त की जा सकती है।
        5. अरक्ता-यह किस्म महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी, महाराष्ट्र से विकसित की गई है।यह एक अधिक उपज देने वाली किस्म है। फल बड़े आकार के, मीठे, मुलायम बीजों वाले होते हैं। एरिल लाल रंग की एवं छिल्का आकर्षक लाल रंग का होता है। उच्च प्रबंधन करने पर प्रति पौधा 25-30 कि.ग्रा. उपज प्राप्त की जा सकती है।

        प्रवर्धन

        1. कलम द्वारा- एक वर्ष पुरानी शाखाओं से 20-30 से.मी.लम्बी कलमें काटकर पौध शाला में लगा दी जाती हैं। इन्डोल ब्यूटारिक अम्ल (आई.बी.ए.) 3000 पी.पी.एम. से कलमों को उपचारित करने से जड़ें शीघ्र एवं अधिक संख्या में निकलती हैं।
        2. गूटी द्वारा-अनार का व्यावसायिक प्रर्वधन गूटीद्वारा किया जाता है। इस विधि में जुलाई-अगस्त में एक वर्ष पुरानी पेन्सिल समान मोटाई वाली स्वस्थ, ओजस्वी, परिपक्व, 45-60 से.मी. लम्बाई की शाखा का चयन करें । चुनी गई शाखा से कलिका के नीचे 3 से.मी. चौड़ी गोलाई में छाल पूर्णरूप से अलग कर दें। छाल निकाली गई शाखा के ऊपरी भाग में आई. बी.ए.10,000 पी.पी.एम. का लेप लगाकर नमी युक्त स्फेगनम मास चारों और लगाकर पॉलीथीन शीट से ढ़ॅंककर सुतली से बाँध दें। जब पालीथीन से जड़े दिखाई देने लगें उस समय शाखा को स्केटियर से काटकर क्यारी या गमलो में लगा दें।

        रोपण

        पौध रोपण की आपसी दूरी मृदा का प्रकार एवं जलवायु पर निर्भर करती है। सामान्यतः 4-5 मीटर की दूरी पर अनार का रोपण किया जाता है।सघन रोपण पद्धति में 5 ग2 मीटर (1,000 पौधें/हें.), 5 ग 3 मीटर (666 पौधें/हें.), 4.5 ग 3 (740 पौधें/हें.) की आपसी अन्तराल पर रोपण किया जा सकता है। पौध रोपण के एक माह पूर्व 60 ग 60 ग 60 सेमी. (लम्बाई*चौड़ाई*गहराई.) आकार के गड्‌ढे खोद कर 15 दिनों के लिए खुला छोड़ दें। तत्पश्चात गड्‌ढे की ऊपरी मिट्‌टी में 20 किग्रा.पकी हुई गोबर की खाद 1 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट .50 ग्राम क्लोरो पायरीफास चूर्ण मिट्‌टी में मिलाकर गड्‌डों को सतह से 15 सेमी. ऊंचाई तक भर दें।गड्‌ढे भरने के बाद सिंचाई करें ताकि मिट्‌टी अच्छी तरह से जम जाए तदुपरान्त पौधों का रोपण करें एवं रोपण पश्चात तुरन्त सिचाई करें।

        खाद एवं उर्वरक

        1. पत्ते गिरने के एक सप्ताह बाद या 80-85 प्रतिशत पत्तियों के गिरने के बाद पौधों की आयु खाद एवं उर्वरक को पौधों की आयु के अनुसार कार्बनिक खाद एवं नाइट्रोजन, फॅास्फोरस और पोटाश का प्रयोग करें। पकी हुई गोबर की खाद नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश की दर को मृदा परीक्षण तथा पत्ती विश्लेषण के आधार पर उपयोग करें। खाद एवं उर्वरकों का उपयोग केनोपी के नीचे चारों ओर 8-10 सेमी.गहरी खाई बनाकर देना चाहिए।
        2. नाइट्रोजन एवं पोटाश युक्त उर्वरकों को तीन हिस्सों में बांट कर पहली खुराक सिंचाई के समय या बहार प्रबंधन के बाद और दूसरी खुराक पहली खुराक के 3-4 सप्ताह बाद दें, फॉस्फोरस की पूरी खाद को पहली सिंचाई के समय दें।
        3. नत्रजन की आपूर्ति के लिए काली मिट्‌टी में यूरिया एवं लाल मिट्‌टी में कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट का प्रयोग करें, फॉस्फोरस की आपूर्ति के लिए सिंगल सुपर फास्फेट एवं पोटाश की आपूर्ति के लिए म्यूरेट ऑफ पोटाश का प्रयोग करें।
        4. जिंक,आयरन,मैगनीज तथा बोरान की 25 ग्राम की मात्रा प्रति पौधे में पकी गोबर की खाद के साथ मिलाकर डालें, सूक्ष्म पोषक तत्व की मात्रा का निर्धारण मृदा तथा पत्ती परीक्षण द्वारा करें।
        5. जब पौधों पर पुष्प आना शुरू हो जाएं तो उसमें नत्रजनःफॉस्फोरसःपोटाश:12:61:00 को 8 किलो/हेक्टेयर की दर से एक दिन के अंराल पर एक महीने तक दें।
        6. जब पौधों में फल लगने शुरू हो जाएं तो नत्रजनःफॉस्फोरसःपोटाश:19:19:19 को ड्रिप की सहायता से 8 कि.ग्रा./हैक्टेयर की दर से एक दिन के अंतराल पर एक महीने तक दें।
        7. जब पौधों पर शत प्रतिशत फल आ जाएं तो नत्रजनःफॉस्फोरसःपोटाश:00:52:34 या मोनोपोटेशियम फास्फेट 2.5 किलो/हेक्टेयर की मात्रा को एक दिन के अन्तराल पर एक महीने तक दें।
        8. फल की तुड़ाई के एक महीने पहले कैल्शियम नाइट्रेट की 12.5 किलो ग्राम/हेक्टेयर की मात्रा ड्रिप की सहायता से 15 दिनों के अंतराल पर दो बार दें।

        सिंचाई

        अनार के पौधे सूखा सहनशील होते हैं। परन्तु अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई आवश्यक है। मृग बहार की फसल लेने के लिए सिंचाई मई के मध्य से शुरु करके मानसून आने तक नियमित रूप से करना चाहिए। वर्षा ऋतु के बाद फलों के अच्छे विकास हेतु नियमित सिंचाई 10-12 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए। ड्रिप सिंचाई अनार के लिए उपयोगी साबित हुई है।इसमें 43 प्रतिशत पानी की बचत एवं 30-35 प्रतिशत उपज में वृद्धि पाई गई है।ड्रिप द्वारा सिंचाई विभिन्न मौसम में उनकी आवश्यकता के अनुसार करें।

        सधाई

        अनार मे सधाई का बहुत महत्व है। अनार की दो प्रकार से सधाई की जा सकती है।

        1. एक तना पद्धति - इस पद्धति में एक तने को छोडकर बाकी सभी बाहरी टहनियों को काट दिया जाता है। इस पद्धति में जमीन की सतह से अधिक सकर निकलते हैं।जिससे पौधा झाड़ीनुमा हो जाता है। इस विधि में तना छेदक का अधिक प्रकोप होता है। यह पद्धति व्यावसायिक उत्पादन के लिए उपयुक्त नही हैं।
        2. बहु तना पद्धति - इस पद्धति में अनार को इस प्रकार साधा जाता है कि इसमे तीन से चार तने छूटे हों,बाकी टहनियों को काट दिया जाता है। इस तरह साधे हुए तनें में प्रकाश अच्छी तरह से पहुॅंचता है। जिससे फूल व फल अच्छी तरह आते हैं।

        कॉट-छॉट

        1. ऐसे बगीचे जहाँ पर ऑइली स्पाट का प्रकोप ज्यादा दिखाई दे रहा हो वहाँ पर फल की तुड़ाई के तुरन्त बाद गहरी छँटाई करनी चाहिए तथा ऑइली स्पाट संक्रमित सभी शाखों को काट देना चाहिए।
        2. संक्रमित भाग के 2 इंच नीचे तक छँटाई करें तथा तनों पर बने सभी कैंकर को गहराई से छिल कर निकाल देना चाहिए। छँटाई के बाद 10 प्रतिशत बोर्डो पेस्ट को कटे हुऐ भाग पर लगायें। बारिश के समय में छँटाई के बाद तेल युक्त कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड + 1 लीटर अलसी का तेल) का उपयोग करें।
        3. अतिसंक्रमित पौधों को जड़ से उखाड़ कर जला दें और उनकी जगह नये स्वस्थ पौधों का रोपण करें या संक्रमित पौधों को जमीन से 2-3 इंच छोड़कर काट दें तथा उसके उपरान्त आए फुटानों को प्रबन्धित करें।
        4. रोगमुक्त बगीचे में सिथिल अवस्था के बाद जरूरत के अनुसार छँटाई करें।
        5. छँटाई के तुरन्त बाद बोर्डो मिश्रण (1प्रतिशत) का छिड़काव करें।
        6. रेस्ट पीरियड के बाद पौधों से पत्तों को गिराने के लिए इथरैल (39 प्रतिशत एस.सी.) 2-2.5मि.ली./लीटर की दर से मृदा में नमी के आधार पर उपयोग करें।
        7. गिरे हुए पत्तों को इकठ्‌ठा करके जला दें। ब्लीचिंग पावडर के घोल (25 कि.ग्रा./1000 लीटर/हेक्टेयर) से पौधे के नीचे की मृदा को तर कर दें।

        बहार नियंत्रण

        अनार में वर्ष मे तीन बार जून-जुलाई (मृग बहार), सितम्बर-अक्टूबर (हस्त बहार) एवं जनवरी-फरवरी (अम्बे बहार) में फूल आते हैं। व्यवसायिक रूप से केवल एक बार की फसल ली जाती है। और इसका निर्धारण पानी की उपलब्धता एवं बाजार की मांग के अनुसार किया जाता है। जिन क्षेत्रों मे सिंचाई की सुविधा नही होती है,वहाँ मृग बहार से फल लिये जाते हैं। तथा जिन क्षेत्रों में सिचाई की सुविधा होती है वहॉ फल अम्बें बहार से लिए जाते हैं। बहार नियंत्रण के लिए जिस बहार से फल लेने हो उसके फूल आने से दो माह पूर्व सिचाई बन्द कर देनी चाहिये।

        तुड़ाई

        अनार नान-क्लामेट्रिक फल है जब फल पूर्ण रूप से पक जाये तभी पौंधे से तोड़ना चाहिए। पौधों में फल सेट होने के बाद 120-130 दिन बाद तुड़ाई के तैयार हो जाते हैं। पके फल पीलापन लिए लाल हो जाते हैं।

        उपज

        पौधे रोपण के 2-3 वर्ष पश्चात फलना प्रारम्भ कर देते हैं। लेकिन व्यावसायिक रूप से उत्पादन रोपण के 4-5 वर्षों बाद ही लेना चाहिए। अच्छी तरह से विकसित पौधा 60-80 फल प्रति वर्ष 25-30 वर्षो तक देता है।

        श्रेणीकरण

        अनार के फलों के वजन,आकार एवं बाहरी रंग के आधार पर निम्नलिखित श्रेणियों मे रखा जाता है।

        1. सुपर साईज-इस श्रेणी में चमकदार लाल रंग के बिना धब्बे वाले फल जिनका भार 750 ग्राम से अधिक हो आते हैं।
        2. किंग साईज-इस श्रेणी में आर्कषक लाल रंग के बिना धब्बे वाले फल जिनका भार 500 से 750 ग्राम हो आते हैं।
        3. क्वीन साईज-इस श्रेणी में चमकदार लाल रंग के बिना धब्बे वाले फल जिनका भार 400-500 ग्राम हो आते हैं।
        4. प्रिंन्स साईज- पूर्ण पके हुए लाल रंग के 300 से 400 ग्राम के फल इस श्रेणी में आते हैं।
        5. शेष बचे हुए फल दो श्रेणीयों 12-ए. एवं 12-बी. के अंर्तगत आते हैं। 12-बी. के अंर्तगत 250-300 ग्राम भार वाले फल जिनमें कुछ धब्बे हो जाते हैं।

        भंड़ारण

        शीत गृह में 5 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 2 माह तक भण्डारित किया जा सकता है।

        पौध संरक्षण

        एकीकृत कीट प्रबंधन

        १. अनार की तितली-इस कीट का वैज्ञानिक नाम ड्‌यूड़ोरिक्स आईसोक्रेट्‌स है यह अनार का सबसे गंभीर कीट है। इसके द्वारा 20-80 प्रतिशत हानि की जाती है। प्रौढ तितली फूलों पर तथा छोटे फलों पर अण्डे देती है। जिनसे इल्ली निकलकर फलों के अन्दर प्रवेश कर जाती है तथा बीजों को खाती है। प्रकोपित फल सड़ जाते हैं और असमय झड़ जाते हैं।

        प्रबंधन

        1. प्रभावित फलों को इकट्‌ठा करके नष्ट कर दें।
        2. खेत को खरपतवारों से मुक्त रखें ।
        3. स्पाइनोसेड (एस.पी.) की 0.5 ग्राम मात्रा या इण्डोक्साकार्व (14.5 एस.पी.) 1 मिली. मात्रा या ट्रायजोफास (40 ई.सी.) की 1 किलो मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर प्रथम छिड़काव फूल आते समय एवं द्वितीय छिड़काव 15 दिन बाद करें।
        4. फलों को बाहर पेपर से ढॅक दें।

        २. तना छेदक -इस कीट का वैज्ञानिक नाम जाइलोबोरस स्पी. है। इस कीट की इल्लियाँ शाखाओं में छेद बनाकर अंदर ही अंदर खाकर खोखला करती है शाखाएँ पीली पड़कर सूख जाती हैं।

        प्रबंधन

        1. क्षतिग्रस्त शाखाओं को काट कर इल्लियों सहित नष्ट कर देना चाहिए।
        2. पूर्ण रूप से प्रभावित पौधौं को जड़ सहित उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए।
        3. कीट के प्रकोप की अवस्था में मुख्य तने के आस-पास क्लोरोपायरीफास 2.5 मिली./लीटर पानी़ट्राईडेमार्फ 1 मिली./लीटर पानी में घोलकर टोआ (ड्रेन्चिग) दें।
        4. अधिक प्रकोप की अवस्था में तने के छेद में न्यूवान (डी.डी.वी.पी.) की 2-3 मिली. मात्रा छेद में डालकर छेद को गीली मिट्‌टी से बंद कर दें।

        ३. माहू - इस कीट का वैज्ञानिक नाम एफिस पुनेकी है। यह कीट नई शाखाओं, पुष्पों से रस चूसते हैं। परिणाम स्वरूप पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं। साथ ही पत्तियों पर मधु सा्रव स्त्रावित करने से सूटी मोल्ड नामक फफूॅंद विकसित हो जाती है। जिससे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है।

        प्रबंधन

        1. प्रारम्भिक प्रकोप होने पर प्रोफेनाफास-50 या डायमिथोएट-30की 2 मिली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। वर्षा ऋतु के दिनों में घोल में स्टीकर 1मिली./लीटर पानी में मिलाएं।
        2. अधिक प्रकोप होने पर इमिडाक्लोप्रिड (17.8 एस.एल.) 0.3 मिली./लीटर या थायामिथोग्जाम (25 डब्लू.जी.) 0.25 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

        ४.मकड़ी -इस कीट का वैज्ञानिक नाम ओलीगोनाइचस पुनेकी है। इस कीट के प्रौढ एवं शिशु पत्तियों की निचली सतह से रस चुसते हैं। परिणाम स्वरूप पत्तियाँ सिकुड़कर सुख जाती हैैं।

        प्रबंधन

        1. प्रारम्भिक अवस्था में डायकोफाल 2.5 मि.ली./लीटर,स्टीकर 1मि.ली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें ।
        2. अधिक प्रकोप की अवस्था फेन्जावक्वीन (10 ई.सी.) 2 मिली./लीटर या अबामेक्टीन (1.9 ई.सी.) 0.5 मिली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

        ५.मिलीबग-इस कीट का वैज्ञानिक नाम फैर्रिसिया विरगाटा है ये कीट कोमल पत्तों तथा फलों पर सफेद मोमी कपास जैसा दिखाई देता है एवं कोमल पत्तों तथा शाखाओं, फलों से रस चूसता है।

        प्रबंधन

        1. कीट की प्रारम्भिक अवस्था में प्रोफेनोफास-50 या डायमिथोएट (30 ई.सी.) 2 मिली./पानी में घोलकर छिड़काव करें।
        2. अधिक प्रकोप की अवस्था में इमिडाक्लोप्रिड (17.8 एस.एल.) 0.3 मिली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

        एकीकृत रोग प्रबंधन

        (i)सरकोस्पोरा फल धब्बा-यह रोग सरकोस्पोरा स्पी. नामक फफूँद से होता है। इस रोग में फलों पर अनियमित आकार में छोटे काले रंग के धब्बे बन जाते हैं जो बाद बढ़े धब्बों में परिवर्तित हो जाते हैं।

        प्रबंधन

        1. प्रभावित फलों को तोड़कर अलग कर नष्ट कर दें।
        2. रोग की प्रारम्भिक अवस्था मेंमैन्कोजेब (75 डब्लू.पी.) 2.5 ग्राम/लीटर या क्लोरोथायलोनिल (75डब्लू.पी.) 2 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर 2-3 छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करें।
        3. अधिक प्रकोप की अवस्था में हेक्साकोनाजोल(5 ई.सी.)1मिली./लीटर या डाईफनकोनाजोल (25 ई.सी.) 0.5 मिली./प्रति लीटर पानी में घोलकर 30-40 के अन्तराल पर छिड़काव करें।

        (ii) फल सड़न-यह रोग एस्परजिलस फोइटिडस नामक फफूँद से होता है। इस रोग में गोलाकार काले धब्बे फल एवं पुष्पय डण्डल पर बन जाते हैं। काले धब्बे पूष्पिय पत्तियां से शुरू होकर पूरे फल पर फैल जाते हैं।

        प्रबंधन

        1. कार्बेन्डिाजिम (50 डब्लू.पी.) 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
        2. जीवाणु पत्ती झुलसा -यह रोग जेन्थोमोनास एक्सोनोपोड़िस पी. व्ही. पुनेकी नामक जीवाणु से होता है। इस रोग में छोटे अनियमित आकार के पनीले धब्बे पत्तियों पर बन जाते हैं। यह धब्बे हल्के भूरे से गहरे भूरे रंग के होते हैं। बाद में फल भी गल जाते हैं।

        प्रबंधन

        1. रोग रहित रोपण सामग्री का चुनाव करें।
        2. पेड़ों से गिरी हुई पत्तियों एवं शाखाओं को इकट्‌ठा करके नष्ट कर देना चाहिए।
        3. बोर्डो मिश्रण 1 प्रतिशत का छिड़काव करें या स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 0.2 ग्राम/लीटर + कॉपर आक्सीक्लोराईड 2.5ग्राम/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

        4. उकटाः-इस रोग में पत्तियों का पीला पड़ना, जड़ों तथा तनों की नीचले भाग को बीच से चीरने पर अंदर की लकड़ी हल्के भूरे/काले विवर्णन दश्र्ााना सीरेटोसिस्टीस फिम्ब्रीयाटा का संक्रमण दिखाता है और यदि सिर्फ जायलम का रंग भूरा दिखता है तो यूजेरियम स्पीसीज का संक्रमण सिद्ध होता है।

        प्रबंधन

        1. उकटा रोग से पूर्णतः प्रभावित पौधों को बगीचे से उखाड़कर जला दें उखाड़ते समय संक्रमित पौधों की जड़ों और उसके आस-पास की मृदा को बोरे या पालीथीन बैग में भरकर बाहर फेंक दें।
        2. रोग के लक्षण दिखाई देते ही कार्बेन्डाजिम (50 डब्लू.पी.) 2 ग्राम/लीटर या ट्राईडिमोर्फ (80 ई.सी.) 1 मिली./लीटर पानी में घोलकर पौधों के नीचे की मृदा को तर कर दें।

        कार्यिकी विकृति

        (1) फल फटना - अनार में फलों का फटना एक गंभीर समस्या है। यह समस्या शुष्क क्षेत्रों में अधिक तीव्र होती है। इस विकृति में फल फट जाते हैं। जिससे फलों की भंडारण क्षमता कम हो जाती है। फटी हुए स्थान पर फल पर फफूॅदों के आक्रमण के कारण जल्दी सड़ जाते हैं 

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        पपीते की खेती

        Mon, 04/16/2018 - 10:07

        पपीते की खेती

        परिचय

        पपीते का फल थोड़ा लम्बा व गोलाकार होता है तथा गूदा पीले रंग का होता है। गूदे के बीच में काले रंग के बीज होते हैं। पेड़ के

        ऊपर के हिस्से में पत्तों के घेरे के नीचे पपीते के फल आते हैं ताकि यह पत्तों का घेरा कोमल फल की सुरक्षा कर सके। कच्चा पपीता हरे रंग का और पकने के बाद हरे पीले रंग का होता है। आजकल नयी जातियों में बिना बीज के पपीते की किस्में ईजाद की गई हैं।  एक पपीते का वजन 300, 400 ग्राम से लेकर 1 किलो ग्राम तक हो सकता है।

        पपीते के पेड़ नर और मादा के रुप में अलग-अलग होते हैं लेकिन कभी-कभी एक ही पेड़ में दोनों तरह के फूल खिलते हैं। हवाईयन और मेक्सिकन पपीते बहुत प्रसिद्ध हैं। भारतीय पपीते भी अत्यन्त स्वादिष्ट होते हैं। अलग-अलग किस्मों के अनुसार इनके स्वाद में थोड़ी बहुत भिन्नता हो सकती है।

        भूमिका

        पपीता स्वास्थ्यवर्द्धक तथा विटामिन ए से भरपूर फल होता है। पपीता ट्रापिकल अमेरिका में पाया जाता है। पपीते का वानस्पतिक नाम केरिका पपाया है। पपीता कैरिकेसी परिवार का एक महत्त्वपूर्ण सदस्य है। पपीता एक बहुलिडीस पौधा है तथा मुरकरटय से तीन प्रकार के लिंग नर, मादा तथा नर व मादा दोनों लिंग एक पेड़ पर होते हैं। पपीता के पके व कच्चे फल दोनो उपयोगी होते हैं। कच्चे फल से पपेन बनाया जाता है। जिसका सौन्दर्य जगत में तथा उद्योग जगत में व्यापक प्रयोग किया जाता है। पपीता एक सदाबहार मधुर फल है, जो स्वादिष्ट और रुचिकर होता है। यह हमारे देश में सभी जगह उत्पन्न होता है। यह बारहों महीने होता है, लेकिन यह फ़रवरी-मार्च और मई से अक्टूबर के मध्य विशेष रूप से पैदा होता है। इसका कच्चा फल हरा और पकने पर पीले रंग का हो जाता है। पका पपीता मधुर, भारी, गर्म, स्निग्ध और सारक होता है। पपीता पित्त का शमन तथा भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न करता है।

        पपीता बहुत ही जल्दी बढ़ने वाला पेड़ है। साधारण ज़मीन, थोड़ी गरमी और अच्छी धूप मिले तो यह पेड़ अच्छा पनपता है, पर इसे अधिक पानी या ज़मीन में क्षार की ज़्यादा मात्रा रास नहीं आती। इसकी पूरी ऊँचाई क़रीब 10-12 फुट तक होती है। जैसे-जैसे पेड़ बढ़ता है, नीचे से एक एक पत्ता गिरता रहता है और अपना निशान तने पर छोड़ जाता है। तना एकदम सीधा हरे या भूरे रंग का और अन्दर से खोखला होता है। पत्ते पेड़ के सबसे ऊपरी हिस्से में ही होते हैं। एक समय में एक पेड़ पर 80 से 100 फल तक भी लग जाते हैं।

        पपीता पोषक तत्वों से भरपूर अत्यंत स्वास्थ्यवर्द्धक जल्दी तैयार होने वाला फल है । जिसे पके तथा कच्चे रूप में प्रयोग किया जाता है । आर्थिक महत्व ताजे फलों के अतिरिक्त पपेन के कारण भी है । जिसका प्रयोग बहुत से औद्योगिक कामों में होता है । अतः इसकी खेती की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और क्षेत्रफल की दृष्टि से यह हमारे देश का पांचवा लोकप्रिय फल है, देश की अधिकांश भागों में घर की बगिया से लेकर बागों तक इसकी बागवानी का क्षेत्र निरंतर बढ़ता जा रहा है । देश की विभिन्न राज्यों आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, असम, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर, उत्तरांचल और मिजोरम में इसकी खेती की जा रही है।अतः इसके सफल उत्पादन के लिए वैज्ञानिक पद्धति और तकनीकों का उपयोग करके कृषक स्वयं और राष्ट्र को आर्थिक दृष्टि से लाभान्वित कर सकते हैं। इसके लिए तकनीकी बातों का ध्यान रखना चाहिए ।

        पपीते की किस्में

        पपीते की मुख्य किस्मों का विवरण निम्नवत है-

        पूसा डोलसियरा

        यह अधिक ऊपज देने वाली पपीते की गाइनोडाइसियश प्रजाति है। जिसमें मादा तथा नर-मादा दो प्रकार के फूल एक ही पौधे पर आते हैं पके फल का स्वाद मीठा तथा आकर्षक सुगंध लिये होता है।

        पूसा मेजेस्टी

        यह भी एक गाइनोडाइसियश प्रजाति है। इसकी उत्पादकता अधिक है, तथा भंडारण क्षमता भी अधिक होती है।

        'रेड लेडी 786'

        पपीते की एक नई किस्म पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना द्वारा विकसित की गई है, जिसे 'रेड लेडी 786' नाम दिया है। यह एक संकर किस्म है। इस किस्म की खासीयत यह है कि नर व मादा फूल ही पौधे पर होते हैं, लिहाजा हर पौधे से फल  मिलने की गारंटी होती है।

        पपीते की अन्य किस्मों में नर व मादा फूल अलग-अलग पौधे पर लगते हैं, ऐसे में फूल निकलने तक यह पहचानना कठिन होता है कि कौन सा पौध नर है और कौन सा मादा। इस नई किस्म की एक खासीयत यह है कि इसमें साधरण पपीते में लगने वाली 'पपायरिक स्काट वायरस' नहीं लगता है। यह किस्म सिर्फ  9 महीने में तैयार हो जाती है।

        इस किस्म के फलों की भंडारण क्षमता भी ज्यादा होती है। पपीते में एंटी आक्सीडेंट पोषक तत्त्व कैरोटिन,पोटैशियम,मैग्नीशियम, रेशा और विटामिन ए, बी, सी सहित कई अन्य गुणकारी तत्व भी पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं।

        पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने तकरीबन 3 सालों की खोज के बाद इसे पंजाब में उगाने के लिए किसानों को दिया। वैसे इसे हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और राजस्थान में भी उगाया जा रहा है।

        पपीते का फूल

        पूसा जाइन्ट

        यह किस्म बहुत अधिक वृद्धि वाली मानी जाती है। नर तथा मादा फूल अलग-अलग पौधे पर पाये जाते हैं। पौधे अधिक मज़बूत तथा तेज़ हवा से गिरते नहीं हैं।।

        पूसा ड्रवार्फ

        यह छोटी बढ़वार वाली डादसियश किस्म कही जाती है।जिसमें नर तथा मादा फूल अलग अलग पौधे पर आते हैं। फल मध्यम तथा ओवल आकार के होते हैं।

        पूसा नन्हा

        इस प्रजाति के पौधे बहुत छोटे होते हैं। तथा यह गृहवाटिका के लिए अधिक उपयोगी होता है। साथ साथ सफल बागवानी के लिए भी उपयुक्त है।

        कोयम्बर-1

        पौधा छोटा तथा डाइसियरा होता है। फल मध्य आकार के तथा गोलाकार होते हैं।

        कोयम्बर-3

        यह एक गाइनोडाइसियश प्रजाति है। पौधा लम्बा, मज़बूत तथा मध्य आकार का फल देने वाला होता है। पके फल में शर्करा की मात्रा अधिक होती है। तथा गूदा लाल रंग का होता है।

        हनीइयू (मधु बिन्दु)

        इस पौधे में नर पौधों की संख्या कम होती है,तथा बीज के प्रकरण अधिक लाभदायक होते हैं। इसका फल मध्यम आकार का बहुत मीठा तथा ख़ुशबू वाला होता है।

        पपीते का पेड़

        कूर्गहनि डयू

        यह गाइनोडाइसियश जाति है। इसमें नर पौधे नहीं होते हैं। फल का आकार मध्यम तथा लम्बवत गोलाकार होता है। गूदे का रंग नारंगी पीला होता है।

        वाशिगंटन

        यह अधिक उपज देने वाली विभिन्न जलवायु में उगाई जाने वाली प्रजाति है। इस पौधे की पत्तियों के डंठल बैगनी रंग के होते हैं। जो इस किस्म की पहचान कराते हैं। यह डाइसियन किस्म हैं फल मीठा,गूदा पीला तथा अच्छी सुगंध वाला होता है।

        पन्त पपीता-1

        इस किस्म का पौधा छोटा तथा डाइसियरा होता है। फल मध्यम आकार के गोल होते हैं। फल मीठा तथा सुगंधित तथा पीला गूदा होता है। यह पककर खाने वाली अच्छी किस्म है तथा तराई एवं भावर जैसे क्षेत्र में उगाने के लिए अधिक उपयोगी है।

        पपीते के लिए आबोहवा

        पपीता एक उष्ण कटिबंधीय फल है,परंतु इसकी खेती समशीतोष्ण आबोहवा में भी की जा सकती है। ज्यादा ठंड से पौधे के विकास पर खराब असर पड़ता है। इसके फलों की बढ़वार रूक जाती है। फलों के पकने व मिठास बढ़ने के लिए गरम मौसम बेहतर है।

        पपीता की खेती योग्य भूमि या मृदा

        इस पपीते के सफल उत्पादन के लिए दोमट मिट्‌टी अच्छी होती है। खेत में पानी निकलने का सही इंतजाम होना जरूरी है, क्योंकि पपीते के पौधे की जड़ों व तने के पास पानी भरा रहने से पौधे का तना सड़ने लगता है। इस पपीते के लिहाज से मिट्‌टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 तक होना चाहिए।

        पपीता के लिए हलकी दोमट या दोमट मृदा जिसमें जलनिकास अच्छा हो सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए इसके लिए दोमट, हवादार, काली उपजाऊ भूमि का चयन करना चाहिए और इसका अम्ल्तांक 6.5-7.5 के बीच होना चाहिए तथा पानी बिलकुल नहीं रुकना चाहिए। मध्य काली और जलोढ़ भूमि इसके लिए भी अच्छी होती है ।

        यह मुख्य रूप से उष्ण प्रदेशीय फल है इसके उत्पादन के लिए तापक्रम 22-26 डिग्री से०ग्रे० के बीच और 10 डिग्री से०ग्रे० से कम नहीं होना चाहिए क्योंकि अधिक ठंड तथा पाला इसके शत्रु हैं, जिससे पौधे और फल दोनों ही प्रभावित होते हैं। इसके सकल उत्पादन के लिए तुलनात्मक उच्च तापक्रम, कम आर्द्रता और पर्याप्त नमी की जरुरत है।

        पपीता में नियंत्रित परगन के अभाव और बीज प्रवर्धन के कारण क़िस्में अस्थाई हैं और एक ही क़िस्म में विभिन्नता पाई जाती है। अतः फूल आने से पहले नर और मादा पौधों का अनुमान लगाना कठिन है। इनमें कुछ प्रचलित क़िस्में जो देश के विभिन्न भागों में उगाई जाती हैं और अधिक संख्या में मादा फूलों के पौधे मिलते हैं मुख्य हैं। हनीडियू या मधु बिंदु, कुर्ग हनीडियू, वाशिंगटन, कोय -1, कोय- 2, कोय- 3, फल उत्पादन और पपेय उत्पादन के लिए कोय-5, कोय-6, एम. ऍफ़.-1 और पूसा मेजस्टी मुख्या हैं। उत्तरी भारत में तापक्रम का उतर चढ़ाव अधिक होता है। अतः उभयलिंगी फूल वाली क़िस्में ठीक उत्पादन नहीं दे पाती हैं। कोय-1, पंजाब स्वीट, पूसा देलिसियास, पूसा मेजस्टी, पूसा जाइंट, पूसा ड्वार्फ, पूसा नन्हा (म्यूटेंट) आदि क़िस्में जिनमे मादा फूलों की संख्या अधिक होती है और उभयलिंगी हैं, उत्तरी भारत में काफी सफल हैं। हवाई की 'सोलो' क़िस्म जो उभयलिंगी और मादा पौधे होते है, उत्तरी भारत में इसके फल छोटे और निम्न कोटि के होते हैं।

        पपीते की बोआई

        पपीते का व्यवसाय उत्पादन बीजों द्वारा किया जाता है। इसके सफल उत्पादन के लिए यह जरूरी है कि बीज अच्छी क्वालिटी का हो। बीज के मामले में निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए :

        1. बीज बोने का समय जुलाई से सितम्बर और फरवरी-मार्च होता है।

        2. बीज अच्छी किस्म के अच्छे व स्वस्थ फलों से लेने चाहिए। चूंकि यह नई किस्म संकर प्रजाति की है, लिहाजा हर बार इसका नया बीज ही बोना चाहिए।

        3. बीजों को क्यारियों, लकड़ी के बक्सों, मिट्‌टी के गमलों व पोलीथीन की थैलियों में बोया जा सकता है।

        4. क्यारियाँ जमीन की सतह से 15 सेंटीमीटर ऊंची व 1 मीटर चौड़ी होनी चाहिए।

        5. क्यारियों में गोबर की खाद, कंपोस्ट या वर्मी कंपोस्ट काफी मात्रा में मिलाना चाहिए। पौधे को पद विगलन रोग से बचाने के लिए क्यारियों को फार्मलीन के 1:40 के घोल से उपचारित कर लेना चाहिए और बीजों को 0.1 फीसदी कॉपर आक्सीक्लोराइड के घोल से उपचारित करके बोना चाहिए।

        6. जब पौधे 8-10 सेंटीमीटर लंबे हो जाएँ, तो उन्हें क्यारी से पौलीथीन में स्थानांतरित कर देते हैं।

        7. जब पौधे 15 सेंटीमीटर ऊँचे हो जाएँ, तब 0.3 फीसदी फफूंदीनाशक घोल का छिड़काव कर देना चाहिए।

        पपीते के उत्पादन के लिए नर्सरी में पौधों का उगाना बहुत महत्व रखता है। इसके लिए बीज की मात्रा एक हेक्टेयर के लिए 500 ग्राम पर्याप्त होती है। बीज पूर्ण पका हुआ, अच्छी तरह सूखा हुआ और शीशे की जार या बोतल में रखा हो जिसका मुँह ढका हो और 6 महीने से पुराना न हो, उपयुक्त है। बोने से पहले बीज को 3 ग्राम केप्टान से एक किलो बीज को उपचारित करना चाहिए।

        बीज बोने के लिए क्यारी जो जमीन से ऊँची उठी हुई संकरी होनी चाहिए इसके अलावा बड़े गमले या लकड़ी के बक्सों का भी प्रयोग कर सकते हैं। इन्हें तैयार करने के लिए पत्ती की खाद, बालू, तथा सदी हुई गोबर की खाद को बराबर मात्र में मिलाकर मिश्रण तैयार कर लेते हैं। जिस स्थान पर नर्सरी हो उस स्थान की अच्छी जुताई, गुड़ाई,करके समस्त कंकड़-पत्थर और खरपतवार निकाल कर साफ़ कर देना चाहिए तथा ज़मीन को 2 प्रतिशत फोरमिलिन से उपचारित कर लेना चाहिए। वह स्थान जहाँ तेज़ धूप तथा अधिक छाया न आये चुनना चाहिए। एक एकड़ के लिए 4059 मीटर ज़मीन में उगाये गए पौधे काफी होते हैं। इसमें 2.5 x 10 x 0.5 आकर की क्यारी बनाकर उपरोक्त मिश्रण अच्छी तरह मिला दें, और क्यारी को ऊपर से समतल कर दें। इसके बाद मिश्रण की तह लगाकर 1/2' गहराई पर 3' x 6' के फासले पर पंक्ति बनाकर उपचारित बीज बो दे और फिर 1/2' गोबर की खाद के मिश्रण से ढ़क कर लकड़ी से दबा दें ताकि बीज ऊपर न रह जाये। यदि गमलों या बक्सों का उगाने के लिए प्रयोग करें तो इनमे भी इसी मिश्रण का प्रयोग करें। बोई गयी क्यारियों को सूखी घास या पुआल से ढक दें और सुबह शाम होज द्वारा पानी दें। बोने के लगभग 15-20 दिन भीतर बीज जम जाते हैं। जब इन पौधों में 4-5 पत्तियाँ और ऊँचाई 25 से.मी. हो जाये तो दो महीने बाद खेत में प्रतिरोपण करना चाहिए, प्रतिरोपण से पहले गमलों को धूप में रखना चाहिए, ज्यादा सिंचाई करने से सड़न और उकठा रोग लग जाता है। उत्तरी भारत में नर्सरी में बीज मार्च-अप्रैल,जून-अगस्त में उगाने चाहिए।

        पपीते का रोपण

        अच्छी तरह से तैयार खेत में 2 x2 मीटर की दूरी पर 50x50x50 सेंटीमीटर आकार के गड्‌ढे मई के महीने में खोद कर 15 दिनों के लिए खुले छोड़ देने चाहिएं, ताकि गड्‌ढों को अच्छी तरह धूप लग जाए और हानिकारक कीड़े-मकोड़े, रोगाणु वगैरह नष्ट हो जाएँ।

        पौधे लगाने के बाद गड्‌ढे को मिट्‌टी और गोबर की खाद 50 ग्राम एल्ड्रिन मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10-15 सेंटीमीटर ऊँचा रहे। गड्‌ढे की भराई के बाद सिंचाई कर देनी चाहिए, जिससे मिट्‌टी अच्छी तरह बैठ जाए।

        वैसे पपीते के पौधे  जून-जुलाई या फरवरी -मार्च में लगाए जाते हैं, पर ज्यादा बारिश व सर्दी वाले इलाकों में सितंबर या फरवरी -मार्च में लगाने चाहिए। जब तक पौधे अच्छी तरह पनप न जाएँ, तब तक रोजाना दोपहर बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए

        प्लानास्टिक थैलियों में बीज उगा

        इसके लिए 200 गेज और 20 x 15 सेमी आकर की थैलियों की जरुरत होती है । जिनको किसी कील से नीचे और साइड में छेड़ कर देते हैं तथा 1:1:1:1 पत्ती की खाद, रेट, गोबर और मिट्टी का मिश्रण बनाकर थैलियों में भर देते हैं । प्रत्येक थैली में दो या तीन बीज बो देते हैं। उचित ऊँचाई होने पर पौधों को खेत में प्रतिरोपण कर देते हैं । प्रतिरोपण करते समय थाली के नीचे का भाग फाड़ देना चाहिए।

        गड्ढे की तैयारी तथा पौधारोपण

        पौध लगाने से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी करके खेत को समतल कर लेना चाहिए ताकि पानी न भर सकें। फिर पपीता के लिए 50x50x50 से०मी० आकार के गड्ढे 1.5x1.5 मीटर के फासले पर खोद लेने चाहिए और प्रत्येक गड्ढे में 30 ग्राम बी.एच.सी. 10 प्रतिशत डस्ट मिलकर उपचारित कर लेना चाहिए। ऊँची बढ़ने वाली क़िस्मों के लिए1.8x1.8 मीटर फासला रखते हैं। पौधे 20-25 से०मी० के फासले पर लगा देते हैं। पौधे लगते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि गड्ढे को ढक देना चाहिए जिससे पानी तने से न लगे।

        खाद व उर्वरक का प्रयोग

        पपीता जल्दी फल देना शुरू कर देता है। इसलिए इसे अधिक उपजाऊ भूमि की जरुरत है। अतः अच्छी फ़सल लेने के लिए 200 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फ़ॉस्फ़रस एवं 500 ग्राम पोटाश प्रति पौधे की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त प्रति वर्ष प्रति पौधे 20-25 कि०ग्रा० गोबर की सड़ी खाद, एक कि०ग्रा० बोनमील और एक कि०ग्रा० नीम की खली की जरुरत पड़ती है। खाद की यह मात्र तीन बार बराबर मात्रा में मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त और अक्तूबर महीनों में देनी चाहिए।

        पपीता जल्दी बढ़ने व फल देने वाला पौधा है, जिसके कारण भूमि से काफी मात्रा में पोषक तत्व निकल जाते हैं। लिहाजा अच्छी उपज हासिल करने के लिए 250 ग्राम नाइट्रोजन, 150 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधे हर साल देना चाहिए। नाइट्रोजन की मात्रा को 6 भागों में बाँट कर पौधा रोपण के 2 महीने बाद से हर दूसरे महीने डालना चाहिए।

        फास्फोरस व पोटाश की आधी-आधी मात्रा 2 बार में देनी चाहिए। उर्वरकों को तने से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधें के चारों ओर बिखेर कर मिट्‌टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। फास्फोरस व पोटाश की आधी मात्रा फरवरी-मार्च और आधी जुलाई-अगस्त में देनी चाहिए। उर्वरक देने के बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए।

        पाले से पेड़ की रक्षा

        पौधे को पाले से बचाना बहुत आवश्यक है। इसके लिए नवम्बर के अंत में तीन तरफ से फूंस से अच्छी प्रकार ढक दें एवं पूर्व-दक्षिण दिशा में खुला छोड़ दें। बाग़ के चारों तरफ रामाशन से हेज लगा दें जिससे तेज़ गर्म और ठंडी हवा से बचाव हो जाता है। समय-समय पर धुआँ कर देना चाहिए।

        उष्ण प्रदेशीय जलवायु में जाड़े और गर्मी के तापमान में अधिक अंतर नहीं होता है और आर्द्रता भी साल भर रहती है। पपीता साल भर फलता फूलता है। लेकिन उत्तर भारत में यदि खेत में प्रतिरोपण अप्रैल-जुलाई तक किया जाय तो अगली बसंत ऋतू तक पौधे फूलने लगते हैं और मार्च-अप्रैल या बाद में लगे फल दिसम्बर-जनवरी में पकने लगते हैं। यदि फल तोड़ने पर दूध, पानी से तरह निकलने लगता है तब पपीता तोड़ने योग्य हो जाता है। अच्छी देख-रेख करने पर प्रति पौधे से 40-50 किलो उपज मिल जाती है।

        पपीते में कीट, बीमारी व उनकी रोकथाम

        प्रमुख रूप से किसी कीड़े से नुकसान नहीं होता है परन्तु वायरस, रोग फैलाने में सहायक होते हैं। इसमें निम्न रोग लगते हैं-

        तने तथा जड़ के गलने से बीमारी

        इसमें भूमि के तल के पास तने का ऊपरी छिलका पीला होकर गलने लगता है और जड़ भी गलने लगती है। पत्तियाँ सुख जाती हैं और पौधा मर जाता है। इसके उपचार के लिए जल निकास में सुधार और ग्रसित पौधों को तुंरत उखाड़कर फेंक देना चाहिए। पौधों पर एक प्रतिशत वोरडोक्स मिश्रण या कोंपर आक्सीक्लोराइड को 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करने से काफ़ी रोकथाम होती है।

        डेम्पिग ओंफ

        इसमें नर्सरी में ही छोटे पौधे नीचे से गलकर मर जाते हैं। इससे बचने के लिए बीज बोने से पहले सेरेसान एग्रोसन जी.एन. से उपचारित करना चाहिए तथा सीड बेड को 2.5 % फार्मेल्डिहाइड घोल से उपचारित करना चाहिए।

        मौजेक (पत्तियों का मुड़ना) : इससे प्रभावित पत्तियों का रंग पीला हो जाता है व डंठल छोटा और आकर में सिकुड़ जाता है। इसके लिए 250 मि. ली. मैलाथियान 50 ई०सी० 250 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करना काफ़ी फायदेमंद होता है।

        चैंपा : इस कीट के बच्चे व जवान दोनों पौधे के तमाम हिस्सों का रस चूसते हैं और विषाणु रोग फैलाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए डायमेथोएट 30 ईसी 1.5 मिलीलीटर या पफास्पफोमिडाल 5 मिलीलीटर को 1 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।

        लाल मकड़ी : इस कीट का हमला पत्तियों व फलों की सतहों पर होता है। इसके प्रकोप के कारण पत्तियाँ पीली पड़ जाती है और बाद में लाल भूरे रंग की हो जाती है। इसकी रोकथाम के लिए थायमेथोएट 30 ईसी 1.5 मिलीलीटर को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

        पद विगलन : यह रोग पीथियम फ्रयूजेरियम नामक पफपफूंदी के कारण होता है। रोगी पौधें की बढ़वार रूक जाती है। पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और पौध सड़कर गिर जाता है। इसकी रोकथाम के लिए रोग वाले हिस्से को खुरचकर उस पर ब्रासीकोल 2 ग्राम को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

        श्याम वर्ण: इस रोग का असर पत्तियों व फलों  पर होता है, जिससे इनकी वृद्धि रूक जाती है। इससे फलों  के ऊपर  भूरे रंग के धब्बे  पड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए ब्लाईटाक्स 3 ग्राम को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

        पपीते के अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई

        पानी की कमी तथा निराई-गुड़ाई न होने से पपीते के उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ता है। अतः दक्षिण भारत की जलवायु में जाड़े में 8-10 दिन तथा गर्मी में 6 दिन के अंतर पर पानी देना चाहिए। उत्तर भारत में अप्रैल से जून तक सप्ताह में दो बार तथा जाड़े में 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पानी तने को छूने न पाए अन्यथा पौधे में गलने की बीमारी लगने का अंदेशा रहेगा इसलिए तने के आस-पास मिट्टी ऊँची रखनी चाहिए। पपीता का बाग़ साफ़ सुथरा रहे इसके लिए प्रत्येक सिंचाई के बाद पेड़ों के चारो तरफ हल्की गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए।

        पपीते के अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई का सही इंतजाम बेहद जरूरी है। गर्मियों में 6-7 दिनों के अंदर पर और सर्दियों में 10-12 दिनों के अंदर सिंचाई करनी चाहिए। बारिश के मौसम में जब लंबे समय तक बरसात न हो, तो सिंचाई की जरूरत पड़ती है। पानी को तने के सीधे संपर्क में नहीं आना चाहिए। इसके लिए तने के पास चारों ओर मिट्‌टी चढ़ा देनी चाहिए।

        खरपतवार नियंत्रण

        पपीते के बगीचे में तमाम खरपतवार उग आते हैं, जो जमीन से नमी, पोषक तत्त्वों, वायु व प्रकाश वगैरह के लिए पपीते के पौधे से मुकाबला करते हैं, जिससे पौधे की बढ़वार व उत्पादन पर उल्टा असर पड़ता है। खरपतवारों से बचाव के लिए जरूरत के मुताबिक निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए। बराबर सिंचाई करते रहने से मिट्‌टी की सतह काफी कठोर हो जाती है, जिससे पौधे की बढ़वार पर उल्टा असर पड़ता है। लिहाजा 2-3 बार सिंचाई के बाद थालों की हल्की निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए।

        परिचय

        पपीते का फल थोड़ा लम्बा व गोलाकार होता है तथा गूदा पीले रंग का होता है। गूदे के बीच में काले रंग के बीज होते हैं। पेड़ के

        ऊपर के हिस्से में पत्तों के घेरे के नीचे पपीते के फल आते हैं ताकि यह पत्तों का घेरा कोमल फल की सुरक्षा कर सके। कच्चा पपीता हरे रंग का और पकने के बाद हरे पीले रंग का होता है। आजकल नयी जातियों में बिना बीज के पपीते की किस्में ईजाद की गई हैं।  एक पपीते का वजन 300, 400 ग्राम से लेकर 1 किलो ग्राम तक हो सकता है।

        पपीते के पेड़ नर और मादा के रुप में अलग-अलग होते हैं लेकिन कभी-कभी एक ही पेड़ में दोनों तरह के फूल खिलते हैं। हवाईयन और मेक्सिकन पपीते बहुत प्रसिद्ध हैं। भारतीय पपीते भी अत्यन्त स्वादिष्ट होते हैं। अलग-अलग किस्मों के अनुसार इनके स्वाद में थोड़ी बहुत भिन्नता हो सकती है।

        भूमिका

        पपीता स्वास्थ्यवर्द्धक तथा विटामिन ए से भरपूर फल होता है। पपीता ट्रापिकल अमेरिका में पाया जाता है। पपीते का वानस्पतिक नाम केरिका पपाया है। पपीता कैरिकेसी परिवार का एक महत्त्वपूर्ण सदस्य है। पपीता एक बहुलिडीस पौधा है तथा मुरकरटय से तीन प्रकार के लिंग नर, मादा तथा नर व मादा दोनों लिंग एक पेड़ पर होते हैं। पपीता के पके व कच्चे फल दोनो उपयोगी होते हैं। कच्चे फल से पपेन बनाया जाता है। जिसका सौन्दर्य जगत में तथा उद्योग जगत में व्यापक प्रयोग किया जाता है। पपीता एक सदाबहार मधुर फल है, जो स्वादिष्ट और रुचिकर होता है। यह हमारे देश में सभी जगह उत्पन्न होता है। यह बारहों महीने होता है, लेकिन यह फ़रवरी-मार्च और मई से अक्टूबर के मध्य विशेष रूप से पैदा होता है। इसका कच्चा फल हरा और पकने पर पीले रंग का हो जाता है। पका पपीता मधुर, भारी, गर्म, स्निग्ध और सारक होता है। पपीता पित्त का शमन तथा भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न करता है।

        पपीता बहुत ही जल्दी बढ़ने वाला पेड़ है। साधारण ज़मीन, थोड़ी गरमी और अच्छी धूप मिले तो यह पेड़ अच्छा पनपता है, पर इसे अधिक पानी या ज़मीन में क्षार की ज़्यादा मात्रा रास नहीं आती। इसकी पूरी ऊँचाई क़रीब 10-12 फुट तक होती है। जैसे-जैसे पेड़ बढ़ता है, नीचे से एक एक पत्ता गिरता रहता है और अपना निशान तने पर छोड़ जाता है। तना एकदम सीधा हरे या भूरे रंग का और अन्दर से खोखला होता है। पत्ते पेड़ के सबसे ऊपरी हिस्से में ही होते हैं। एक समय में एक पेड़ पर 80 से 100 फल तक भी लग जाते हैं।

        पपीता पोषक तत्वों से भरपूर अत्यंत स्वास्थ्यवर्द्धक जल्दी तैयार होने वाला फल है । जिसे पके तथा कच्चे रूप में प्रयोग किया जाता है । आर्थिक महत्व ताजे फलों के अतिरिक्त पपेन के कारण भी है । जिसका प्रयोग बहुत से औद्योगिक कामों में होता है । अतः इसकी खेती की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और क्षेत्रफल की दृष्टि से यह हमारे देश का पांचवा लोकप्रिय फल है, देश की अधिकांश भागों में घर की बगिया से लेकर बागों तक इसकी बागवानी का क्षेत्र निरंतर बढ़ता जा रहा है । देश की विभिन्न राज्यों आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, असम, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर, उत्तरांचल और मिजोरम में इसकी खेती की जा रही है।अतः इसके सफल उत्पादन के लिए वैज्ञानिक पद्धति और तकनीकों का उपयोग करके कृषक स्वयं और राष्ट्र को आर्थिक दृष्टि से लाभान्वित कर सकते हैं। इसके लिए तकनीकी बातों का ध्यान रखना चाहिए ।

        पपीते की किस्में

        पपीते की मुख्य किस्मों का विवरण निम्नवत है-

        पूसा डोलसियरा

        यह अधिक ऊपज देने वाली पपीते की गाइनोडाइसियश प्रजाति है। जिसमें मादा तथा नर-मादा दो प्रकार के फूल एक ही पौधे पर आते हैं पके फल का स्वाद मीठा तथा आकर्षक सुगंध लिये होता है।

        पूसा मेजेस्टी

        यह भी एक गाइनोडाइसियश प्रजाति है। इसकी उत्पादकता अधिक है, तथा भंडारण क्षमता भी अधिक होती है।

        'रेड लेडी 786'

        पपीते की एक नई किस्म पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना द्वारा विकसित की गई है, जिसे 'रेड लेडी 786' नाम दिया है। यह एक संकर किस्म है। इस किस्म की खासीयत यह है कि नर व मादा फूल ही पौधे पर होते हैं, लिहाजा हर पौधे से फल  मिलने की गारंटी होती है।

        पपीते की अन्य किस्मों में नर व मादा फूल अलग-अलग पौधे पर लगते हैं, ऐसे में फूल निकलने तक यह पहचानना कठिन होता है कि कौन सा पौध नर है और कौन सा मादा। इस नई किस्म की एक खासीयत यह है कि इसमें साधरण पपीते में लगने वाली 'पपायरिक स्काट वायरस' नहीं लगता है। यह किस्म सिर्फ  9 महीने में तैयार हो जाती है।

        इस किस्म के फलों की भंडारण क्षमता भी ज्यादा होती है। पपीते में एंटी आक्सीडेंट पोषक तत्त्व कैरोटिन,पोटैशियम,मैग्नीशियम, रेशा और विटामिन ए, बी, सी सहित कई अन्य गुणकारी तत्व भी पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं।

        पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने तकरीबन 3 सालों की खोज के बाद इसे पंजाब में उगाने के लिए किसानों को दिया। वैसे इसे हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और राजस्थान में भी उगाया जा रहा है।

        पपीते का फूल

        पूसा जाइन्ट

        यह किस्म बहुत अधिक वृद्धि वाली मानी जाती है। नर तथा मादा फूल अलग-अलग पौधे पर पाये जाते हैं। पौधे अधिक मज़बूत तथा तेज़ हवा से गिरते नहीं हैं।।

        पूसा ड्रवार्फ

        यह छोटी बढ़वार वाली डादसियश किस्म कही जाती है।जिसमें नर तथा मादा फूल अलग अलग पौधे पर आते हैं। फल मध्यम तथा ओवल आकार के होते हैं।

        पूसा नन्हा

        इस प्रजाति के पौधे बहुत छोटे होते हैं। तथा यह गृहवाटिका के लिए अधिक उपयोगी होता है। साथ साथ सफल बागवानी के लिए भी उपयुक्त है।

        कोयम्बर-1

        पौधा छोटा तथा डाइसियरा होता है। फल मध्य आकार के तथा गोलाकार होते हैं।

        कोयम्बर-3

        यह एक गाइनोडाइसियश प्रजाति है। पौधा लम्बा, मज़बूत तथा मध्य आकार का फल देने वाला होता है। पके फल में शर्करा की मात्रा अधिक होती है। तथा गूदा लाल रंग का होता है।

        हनीइयू (मधु बिन्दु)

        इस पौधे में नर पौधों की संख्या कम होती है,तथा बीज के प्रकरण अधिक लाभदायक होते हैं। इसका फल मध्यम आकार का बहुत मीठा तथा ख़ुशबू वाला होता है।

        पपीते का पेड़

        कूर्गहनि डयू

        यह गाइनोडाइसियश जाति है। इसमें नर पौधे नहीं होते हैं। फल का आकार मध्यम तथा लम्बवत गोलाकार होता है। गूदे का रंग नारंगी पीला होता है।

        वाशिगंटन

        यह अधिक उपज देने वाली विभिन्न जलवायु में उगाई जाने वाली प्रजाति है। इस पौधे की पत्तियों के डंठल बैगनी रंग के होते हैं। जो इस किस्म की पहचान कराते हैं। यह डाइसियन किस्म हैं फल मीठा,गूदा पीला तथा अच्छी सुगंध वाला होता है।

        पन्त पपीता-1

        इस किस्म का पौधा छोटा तथा डाइसियरा होता है। फल मध्यम आकार के गोल होते हैं। फल मीठा तथा सुगंधित तथा पीला गूदा होता है। यह पककर खाने वाली अच्छी किस्म है तथा तराई एवं भावर जैसे क्षेत्र में उगाने के लिए अधिक उपयोगी है।

        पपीते के लिए आबोहवा

        पपीता एक उष्ण कटिबंधीय फल है,परंतु इसकी खेती समशीतोष्ण आबोहवा में भी की जा सकती है। ज्यादा ठंड से पौधे के विकास पर खराब असर पड़ता है। इसके फलों की बढ़वार रूक जाती है। फलों के पकने व मिठास बढ़ने के लिए गरम मौसम बेहतर है।

        पपीता की खेती योग्य भूमि या मृदा

        इस पपीते के सफल उत्पादन के लिए दोमट मिट्‌टी अच्छी होती है। खेत में पानी निकलने का सही इंतजाम होना जरूरी है, क्योंकि पपीते के पौधे की जड़ों व तने के पास पानी भरा रहने से पौधे का तना सड़ने लगता है। इस पपीते के लिहाज से मिट्‌टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 तक होना चाहिए।

        पपीता के लिए हलकी दोमट या दोमट मृदा जिसमें जलनिकास अच्छा हो सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए इसके लिए दोमट, हवादार, काली उपजाऊ भूमि का चयन करना चाहिए और इसका अम्ल्तांक 6.5-7.5 के बीच होना चाहिए तथा पानी बिलकुल नहीं रुकना चाहिए। मध्य काली और जलोढ़ भूमि इसके लिए भी अच्छी होती है ।

        यह मुख्य रूप से उष्ण प्रदेशीय फल है इसके उत्पादन के लिए तापक्रम 22-26 डिग्री से०ग्रे० के बीच और 10 डिग्री से०ग्रे० से कम नहीं होना चाहिए क्योंकि अधिक ठंड तथा पाला इसके शत्रु हैं, जिससे पौधे और फल दोनों ही प्रभावित होते हैं। इसके सकल उत्पादन के लिए तुलनात्मक उच्च तापक्रम, कम आर्द्रता और पर्याप्त नमी की जरुरत है।

        पपीता में नियंत्रित परगन के अभाव और बीज प्रवर्धन के कारण क़िस्में अस्थाई हैं और एक ही क़िस्म में विभिन्नता पाई जाती है। अतः फूल आने से पहले नर और मादा पौधों का अनुमान लगाना कठिन है। इनमें कुछ प्रचलित क़िस्में जो देश के विभिन्न भागों में उगाई जाती हैं और अधिक संख्या में मादा फूलों के पौधे मिलते हैं मुख्य हैं। हनीडियू या मधु बिंदु, कुर्ग हनीडियू, वाशिंगटन, कोय -1, कोय- 2, कोय- 3, फल उत्पादन और पपेय उत्पादन के लिए कोय-5, कोय-6, एम. ऍफ़.-1 और पूसा मेजस्टी मुख्या हैं। उत्तरी भारत में तापक्रम का उतर चढ़ाव अधिक होता है। अतः उभयलिंगी फूल वाली क़िस्में ठीक उत्पादन नहीं दे पाती हैं। कोय-1, पंजाब स्वीट, पूसा देलिसियास, पूसा मेजस्टी, पूसा जाइंट, पूसा ड्वार्फ, पूसा नन्हा (म्यूटेंट) आदि क़िस्में जिनमे मादा फूलों की संख्या अधिक होती है और उभयलिंगी हैं, उत्तरी भारत में काफी सफल हैं। हवाई की 'सोलो' क़िस्म जो उभयलिंगी और मादा पौधे होते है, उत्तरी भारत में इसके फल छोटे और निम्न कोटि के होते हैं।

        पपीते की बोआई

        पपीते का व्यवसाय उत्पादन बीजों द्वारा किया जाता है। इसके सफल उत्पादन के लिए यह जरूरी है कि बीज अच्छी क्वालिटी का हो। बीज के मामले में निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए :

        1. बीज बोने का समय जुलाई से सितम्बर और फरवरी-मार्च होता है।

        2. बीज अच्छी किस्म के अच्छे व स्वस्थ फलों से लेने चाहिए। चूंकि यह नई किस्म संकर प्रजाति की है, लिहाजा हर बार इसका नया बीज ही बोना चाहिए।

        3. बीजों को क्यारियों, लकड़ी के बक्सों, मिट्‌टी के गमलों व पोलीथीन की थैलियों में बोया जा सकता है।

        4. क्यारियाँ जमीन की सतह से 15 सेंटीमीटर ऊंची व 1 मीटर चौड़ी होनी चाहिए।

        5. क्यारियों में गोबर की खाद, कंपोस्ट या वर्मी कंपोस्ट काफी मात्रा में मिलाना चाहिए। पौधे को पद विगलन रोग से बचाने के लिए क्यारियों को फार्मलीन के 1:40 के घोल से उपचारित कर लेना चाहिए और बीजों को 0.1 फीसदी कॉपर आक्सीक्लोराइड के घोल से उपचारित करके बोना चाहिए।

        6. जब पौधे 8-10 सेंटीमीटर लंबे हो जाएँ, तो उन्हें क्यारी से पौलीथीन में स्थानांतरित कर देते हैं।

        7. जब पौधे 15 सेंटीमीटर ऊँचे हो जाएँ, तब 0.3 फीसदी फफूंदीनाशक घोल का छिड़काव कर देना चाहिए।

        पपीते के उत्पादन के लिए नर्सरी में पौधों का उगाना बहुत महत्व रखता है। इसके लिए बीज की मात्रा एक हेक्टेयर के लिए 500 ग्राम पर्याप्त होती है। बीज पूर्ण पका हुआ, अच्छी तरह सूखा हुआ और शीशे की जार या बोतल में रखा हो जिसका मुँह ढका हो और 6 महीने से पुराना न हो, उपयुक्त है। बोने से पहले बीज को 3 ग्राम केप्टान से एक किलो बीज को उपचारित करना चाहिए।

        बीज बोने के लिए क्यारी जो जमीन से ऊँची उठी हुई संकरी होनी चाहिए इसके अलावा बड़े गमले या लकड़ी के बक्सों का भी प्रयोग कर सकते हैं। इन्हें तैयार करने के लिए पत्ती की खाद, बालू, तथा सदी हुई गोबर की खाद को बराबर मात्र में मिलाकर मिश्रण तैयार कर लेते हैं। जिस स्थान पर नर्सरी हो उस स्थान की अच्छी जुताई, गुड़ाई,करके समस्त कंकड़-पत्थर और खरपतवार निकाल कर साफ़ कर देना चाहिए तथा ज़मीन को 2 प्रतिशत फोरमिलिन से उपचारित कर लेना चाहिए। वह स्थान जहाँ तेज़ धूप तथा अधिक छाया न आये चुनना चाहिए। एक एकड़ के लिए 4059 मीटर ज़मीन में उगाये गए पौधे काफी होते हैं। इसमें 2.5 x 10 x 0.5 आकर की क्यारी बनाकर उपरोक्त मिश्रण अच्छी तरह मिला दें, और क्यारी को ऊपर से समतल कर दें। इसके बाद मिश्रण की तह लगाकर 1/2' गहराई पर 3' x 6' के फासले पर पंक्ति बनाकर उपचारित बीज बो दे और फिर 1/2' गोबर की खाद के मिश्रण से ढ़क कर लकड़ी से दबा दें ताकि बीज ऊपर न रह जाये। यदि गमलों या बक्सों का उगाने के लिए प्रयोग करें तो इनमे भी इसी मिश्रण का प्रयोग करें। बोई गयी क्यारियों को सूखी घास या पुआल से ढक दें और सुबह शाम होज द्वारा पानी दें। बोने के लगभग 15-20 दिन भीतर बीज जम जाते हैं। जब इन पौधों में 4-5 पत्तियाँ और ऊँचाई 25 से.मी. हो जाये तो दो महीने बाद खेत में प्रतिरोपण करना चाहिए, प्रतिरोपण से पहले गमलों को धूप में रखना चाहिए, ज्यादा सिंचाई करने से सड़न और उकठा रोग लग जाता है। उत्तरी भारत में नर्सरी में बीज मार्च-अप्रैल,जून-अगस्त में उगाने चाहिए।

        पपीते का रोपण

        अच्छी तरह से तैयार खेत में 2 x2 मीटर की दूरी पर 50x50x50 सेंटीमीटर आकार के गड्‌ढे मई के महीने में खोद कर 15 दिनों के लिए खुले छोड़ देने चाहिएं, ताकि गड्‌ढों को अच्छी तरह धूप लग जाए और हानिकारक कीड़े-मकोड़े, रोगाणु वगैरह नष्ट हो जाएँ।

        पौधे लगाने के बाद गड्‌ढे को मिट्‌टी और गोबर की खाद 50 ग्राम एल्ड्रिन मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10-15 सेंटीमीटर ऊँचा रहे। गड्‌ढे की भराई के बाद सिंचाई कर देनी चाहिए, जिससे मिट्‌टी अच्छी तरह बैठ जाए।

        वैसे पपीते के पौधे  जून-जुलाई या फरवरी -मार्च में लगाए जाते हैं, पर ज्यादा बारिश व सर्दी वाले इलाकों में सितंबर या फरवरी -मार्च में लगाने चाहिए। जब तक पौधे अच्छी तरह पनप न जाएँ, तब तक रोजाना दोपहर बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए।

        प्लास्टिक थैलियों में बीज उगाना

        इसके लिए 200 गेज और 20 x 15 सेमी आकर की थैलियों की जरुरत होती है । जिनको किसी कील से नीचे और साइड में छेड़ कर देते हैं तथा 1:1:1:1 पत्ती की खाद, रेट, गोबर और मिट्टी का मिश्रण बनाकर थैलियों में भर देते हैं । प्रत्येक थैली में दो या तीन बीज बो देते हैं। उचित ऊँचाई होने पर पौधों को खेत में प्रतिरोपण कर देते हैं । प्रतिरोपण करते समय थाली के नीचे का भाग फाड़ देना चाहिए।

        गड्ढे की तैयारी तथा पौधारोपण

        पौध लगाने से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी करके खेत को समतल कर लेना चाहिए ताकि पानी न भर सकें। फिर पपीता के लिए 50x50x50 से०मी० आकार के गड्ढे 1.5x1.5 मीटर के फासले पर खोद लेने चाहिए और प्रत्येक गड्ढे में 30 ग्राम बी.एच.सी. 10 प्रतिशत डस्ट मिलकर उपचारित कर लेना चाहिए। ऊँची बढ़ने वाली क़िस्मों के लिए1.8x1.8 मीटर फासला रखते हैं। पौधे 20-25 से०मी० के फासले पर लगा देते हैं। पौधे लगते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि गड्ढे को ढक देना चाहिए जिससे पानी तने से न लगे।

        खाद व उर्वरक का प्रयोग

        पपीता जल्दी फल देना शुरू कर देता है। इसलिए इसे अधिक उपजाऊ भूमि की जरुरत है। अतः अच्छी फ़सल लेने के लिए 200 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फ़ॉस्फ़रस एवं 500 ग्राम पोटाश प्रति पौधे की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त प्रति वर्ष प्रति पौधे 20-25 कि०ग्रा० गोबर की सड़ी खाद, एक कि०ग्रा० बोनमील और एक कि०ग्रा० नीम की खली की जरुरत पड़ती है। खाद की यह मात्र तीन बार बराबर मात्रा में मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त और अक्तूबर महीनों में देनी चाहिए।

        पपीता जल्दी बढ़ने व फल देने वाला पौधा है, जिसके कारण भूमि से काफी मात्रा में पोषक तत्व निकल जाते हैं। लिहाजा अच्छी उपज हासिल करने के लिए 250 ग्राम नाइट्रोजन, 150 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधे हर साल देना चाहिए। नाइट्रोजन की मात्रा को 6 भागों में बाँट कर पौधा रोपण के 2 महीने बाद से हर दूसरे महीने डालना चाहिए।

        फास्फोरस व पोटाश की आधी-आधी मात्रा 2 बार में देनी चाहिए। उर्वरकों को तने से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधें के चारों ओर बिखेर कर मिट्‌टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। फास्फोरस व पोटाश की आधी मात्रा फरवरी-मार्च और आधी जुलाई-अगस्त में देनी चाहिए। उर्वरक देने के बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए।

        पाले से पेड़ की रक्षा

        पौधे को पाले से बचाना बहुत आवश्यक है। इसके लिए नवम्बर के अंत में तीन तरफ से फूंस से अच्छी प्रकार ढक दें एवं पूर्व-दक्षिण दिशा में खुला छोड़ दें। बाग़ के चारों तरफ रामाशन से हेज लगा दें जिससे तेज़ गर्म और ठंडी हवा से बचाव हो जाता है। समय-समय पर धुआँ कर देना चाहिए।

        उष्ण प्रदेशीय जलवायु में जाड़े और गर्मी के तापमान में अधिक अंतर नहीं होता है और आर्द्रता भी साल भर रहती है। पपीता साल भर फलता फूलता है। लेकिन उत्तर भारत में यदि खेत में प्रतिरोपण अप्रैल-जुलाई तक किया जाय तो अगली बसंत ऋतू तक पौधे फूलने लगते हैं और मार्च-अप्रैल या बाद में लगे फल दिसम्बर-जनवरी में पकने लगते हैं। यदि फल तोड़ने पर दूध, पानी से तरह निकलने लगता है तब पपीता तोड़ने योग्य हो जाता है। अच्छी देख-रेख करने पर प्रति पौधे से 40-50 किलो उपज मिल जाती है।

        पपीते में कीट, बीमारी व उनकी रोकथाम

        प्रमुख रूप से किसी कीड़े से नुकसान नहीं होता है परन्तु वायरस, रोग फैलाने में सहायक होते हैं। इसमें निम्न रोग लगते हैं-

        तने तथा जड़ के गलने से बीमारी

        इसमें भूमि के तल के पास तने का ऊपरी छिलका पीला होकर गलने लगता है और जड़ भी गलने लगती है। पत्तियाँ सुख जाती हैं और पौधा मर जाता है। इसके उपचार के लिए जल निकास में सुधार और ग्रसित पौधों को तुंरत उखाड़कर फेंक देना चाहिए। पौधों पर एक प्रतिशत वोरडोक्स मिश्रण या कोंपर आक्सीक्लोराइड को 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करने से काफ़ी रोकथाम होती है।

        डेम्पिग ओंफ

        इसमें नर्सरी में ही छोटे पौधे नीचे से गलकर मर जाते हैं। इससे बचने के लिए बीज बोने से पहले सेरेसान एग्रोसन जी.एन. से उपचारित करना चाहिए तथा सीड बेड को 2.5 % फार्मेल्डिहाइड घोल से उपचारित करना चाहिए।

        मौजेक (पत्तियों का मुड़ना) : इससे प्रभावित पत्तियों का रंग पीला हो जाता है व डंठल छोटा और आकर में सिकुड़ जाता है। इसके लिए 250 मि. ली. मैलाथियान 50 ई०सी० 250 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करना काफ़ी फायदेमंद होता है।

        चैंपा : इस कीट के बच्चे व जवान दोनों पौधे के तमाम हिस्सों का रस चूसते हैं और विषाणु रोग फैलाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए डायमेथोएट 30 ईसी 1.5 मिलीलीटर या पफास्पफोमिडाल 5 मिलीलीटर को 1 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।

        लाल मकड़ी : इस कीट का हमला पत्तियों व फलों की सतहों पर होता है। इसके प्रकोप के कारण पत्तियाँ पीली पड़ जाती है और बाद में लाल भूरे रंग की हो जाती है। इसकी रोकथाम के लिए थायमेथोएट 30 ईसी 1.5 मिलीलीटर को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

        पद विगलन : यह रोग पीथियम फ्रयूजेरियम नामक पफपफूंदी के कारण होता है। रोगी पौधें की बढ़वार रूक जाती है। पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और पौध सड़कर गिर जाता है। इसकी रोकथाम के लिए रोग वाले हिस्से को खुरचकर उस पर ब्रासीकोल 2 ग्राम को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

        श्याम वर्ण: इस रोग का असर पत्तियों व फलों  पर होता है, जिससे इनकी वृद्धि रूक जाती है। इससे फलों  के ऊपर  भूरे रंग के धब्बे  पड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए ब्लाईटाक्स 3 ग्राम को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

        पपीते के अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई

        पानी की कमी तथा निराई-गुड़ाई न होने से पपीते के उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ता है। अतः दक्षिण भारत की जलवायु में जाड़े में 8-10 दिन तथा गर्मी में 6 दिन के अंतर पर पानी देना चाहिए। उत्तर भारत में अप्रैल से जून तक सप्ताह में दो बार तथा जाड़े में 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पानी तने को छूने न पाए अन्यथा पौधे में गलने की बीमारी लगने का अंदेशा रहेगा इसलिए तने के आस-पास मिट्टी ऊँची रखनी चाहिए। पपीता का बाग़ साफ़ सुथरा रहे इसके लिए प्रत्येक सिंचाई के बाद पेड़ों के चारो तरफ हल्की गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए।

        पपीते के अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई का सही इंतजाम बेहद जरूरी है। गर्मियों में 6-7 दिनों के अंदर पर और सर्दियों में 10-12 दिनों के अंदर सिंचाई करनी चाहिए। बारिश के मौसम में जब लंबे समय तक बरसात न हो, तो सिंचाई की जरूरत पड़ती है। पानी को तने के सीधे संपर्क में नहीं आना चाहिए। इसके लिए तने के पास चारों ओर मिट्‌टी चढ़ा देनी चाहिए।

        खरपतवार नियंत्रणपपीते के बगीचे में तमाम खरपतवार उग आते हैं, जो जमीन से नमी, पोषक तत्त्वों, वायु व प्रकाश वगैरह के लिए पपीते के पौधे से मुकाबला करते हैं, जिससे पौधे की बढ़वार व उत्पादन पर उल्टा असर पड़ता है। खरपतवारों से बचाव के लिए जरूरत के मुताबिक निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए। बराबर सिंचाई करते रहने से मिट्‌टी की सतह काफी कठोर हो जाती है, जिससे पौधे की बढ़वार पर उल्टा असर पड़ता है। लिहाजा 2-3 बार सिंचाई के बाद थालों की हल्की निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए।

        पपीते की उपज

        आमतौर पर पपीते की उन्नत किस्मों से प्रति पौध 35-50 किलोग्राम उपज मिल जाती है, जबकि इस नई किस्म से 2-3 गुणा ज्यादा उपज मिल जाती है।

        स्रोत: ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान, विकिपीडिया, दैनिक समाचार |

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        नारियल की खेती

        Sat, 04/14/2018 - 15:26

        भूमिका

        नारियल पेड़ (कोकोस न्यूसीफेरा लिन) दुनिया का सर्वाधिक उपयोगी पेड़ है। इसका प्रत्येक हिस्सा किसी न किसी रूप में मानव का लिए उपयोगी है। अत: इसे प्यार से कल्पवृक्ष यानी स्वर्ग का वृक्ष कहा गया है। नारियल का गरी सुखाकर प्राप्त किया जाने वाला खोपड़ा वनस्पतिक तेल का सर्वोत्तम स्रोत है जिसमें 65 से 70 प्रतिशत तेल निहित है।

        जलवायु और मृदा

        नारियल पेड़ विभीन प्रकार की जलवायु एवं मृदा परिस्थितियों में बढ़ते पाया जाता है। यह निश्चय ही एक उष्णकटिबंधीय क्षेत्र का पौधा है जो अधिकांशत: 20 डिग्री उत्तर 20 डिग्री दक्षिण अक्षान्तर के बीच बढ़ता है। तथापि प्रति वर्ष 2000 मि. मी. की वर्षा अच्छी तरह मिलें तो यह नारियल की बढ़वार एवं अधिकतम उत्पादन के लिए अनुकूल है।

        नारियल दोमट,मखराली,तटीय रेत,जलोढ़, मटियारी जैसे विभीन्न प्रकार के मृदाओं में और कच्छारी निम्न भूमि के मृदा में उगाया जाता है। उचित जलनिकासी व्यवस्था, अच्छी जलधारण क्षमता, 3 मीटर के भीतर जलाशय की उपलब्धता और सतह  से 2 मीटर के भीतर चट्टान या कोई ठोस वस्तु एवं न होना आदि ताड़ो के बेहतर बढ़वार और निष्पादन हेतु मृदा अनुकूल परिस्थितियाँ हैं।

        विविध किस्में

        नारियल के मुख्यत: दो किस्में हैं, लंबा और बौना।

        लंबी प्रजातियों में व्यापक तौर पर पश्चिम तटीय और तटीय लंबा उगाए जाते हैं। बौनी प्रजातियाँ आकार में कम होता है और इसकी आयु भी लंबी प्रजातियों की अपेक्षा कम होता है।

        लंबा x बौना (टी x डी) और बौना x लंबा

        (डी. X टी) आदि दो प्रमुख संकर किस्में हैं।

        केरल कृषि विश्वविद्यालय तथा तमिलनाडू कृषि विश्वविद्यालय तथा तमिलनाडू कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित विभीन्न प्रकार की 10 संकर प्रजातियाँ हैं और वणिज्यिक खेती के लिए विमोचित की गई हैं। अच्छी प्रबंधन परिस्थितियों में इनसे उच्च पैदावार प्राप्त हो सकती है। खेती की जाने वाली अन्य लंबी प्रजातियाँ हैं लक्षद्वीप ऑर्डिनरी, अंडमान ऑर्डिनरी, फिलिप्पाइन्स, जावा, कोचीन–चाइना, क्प्पडम आदि।

        रोपण सामग्रियाँ

        चुने गए बीजफलों से उगाए जाने वाले पौधों के जरिए नारियल बढ़ावा जाता है। सामान्यतया 9 से 12 महीने आयु वाले बीजपौधे रोपण के लिए उपयोग किए जाते हैं। 9 से 12 महीने आयु वाले उन पौधों को चुनना चाहिए जिनमें 6 से 8 पत्ते हो तथा जिनका गर्दनी घेरा 10-12 सें-मी. हो। बीज पौधों को चुनने का दूसरा मानदंड पत्तियों का जल्दी निकलना भी है।

        स्थान का चयन

        नीचे ठोस चट्टानों वाली ऊपरी मिट्टी, जल जमाव वाली निम्न भूमि और मटियारी मृदा आदि नारियल की खेती के लिए उचित नहीं हैं। रोपण करने से पहले वर्षा या सिंचाई के जरिए मृदा के लिए आवश्यक नमी प्रदान करना सुनिश्चित कर लेनी चाहिए।

        ढलान वाले क्षेत्रों में तथा लहभूमि की तयारी और रोपणरदार भूभागों में कोंटूर टेरसिंग या बांधो द्वारा भूमि की तैयारी की जाती है। निम्नवर्ती क्षेत्रों में जलीय स्तर से 1 मीटर ऊँचाई में टीला बनाकर रोपण के लिए स्थान तैयार किया जाता है। कृषि योग्य बनाए गए “कायल” क्षेत्रों में उन क्षेत्रों में पौध का रोपण किया जाता है।

        कम जल जमाव वाले दोमट मिट्टी में 1 मी. X  1 मी. X 1 मी. आकार का गढ्डा रोपण के लिए उचित हैं। नीचे चट्टानों वाली मखरली मिट्टी में 1.2 मी. X 1.2 मी. आकार के बड़े गड्ढे बनाने चाहिए। रेतीले मिट्टी में गड्ढे का आकार 0.75 मी. X 0.75 मी. X 0.75 मी. अधिक नहीं होना चाहिए।

        पौधों के बीच जगह छोड़ना रोपण का तरीका

        पौधों के बीच  जगह छोड़ना रोपण का तरीका और मृदा का प्रकार आदि पर निर्भर है। रेतीली और मखरली मृदाओं में विभिन्न रोपण प्रणालियों के अधीन पौधों के बीच निम्नलिखित स्पेसिंग अनुशंसित –

        1. त्रिकोणीय                       7.6 मीटर

        2. चौकोर आकार                   7.6 X 7.6 मी., 8 X 8 मी., 9 X 9 मी.

        3. एकल                          कतारों में 6.5 मी. – दो कतारों के बीच 9 मी.

        4. डबिल हेज                      कतारों में 6.5 मी. – दो कतारों के बीच 9 मी.

        रोपण का समय

        दक्षिण पश्चिम मानसून की शुरूआत के समय बीज पौधों का प्रतिरोपण किया जा सकता है। यदि सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध हो तो मानसून शुरू होने के एक महीने पहले पौधे लगाने चाहिए जो की  भारी वर्षा शुरू होने से पहले यह अच्छी तरह बढ़ने लगे। उत्तर–पूर्वी मानसून शुरू होने के पहले भी रोपण किया जा सकता है। निम्नवर्ती इलाकों में मानसून के समय बाढ़ आने की संभावना के मद्देनजर मानसून समाप्त होने के बाद रोपण किया जा सकता है।

        रोपण

        रोपण के पहले गड्ढों में 50 से 60 सें.मी. की गहराई तक ऊपरी मृदा और गोबर पाउडर/कम्पोस्ट से भर देना चाहिए। फिर इसके अंदर बीच में एक छोटा गड्ढा बनाकर उसमें बीजफलों से संलग्न पौधा लगाएं। बीजफल पूरी तरह छोटे गड्ढे के अंदर आने चाहिए। फिर गड्ढा मिट्टी से भरें। जल जमाव रोकने के लिए मिट्टी को अच्छी तरह दबाएँ। यदि सफेद चींटी का प्रकोप हो तो रोपण से पहले छोटे गड्ढे के अंदर सेविडोल 8जी (5ग्राम) डाल दें।

        मखरली मृदा वाले क्षेत्रों में मिट्टी की स्थिति सुधारने के लिए 2 कि. ग्राम साधारण नमक डाल दें। प्रत्येक गड्ढे में 25 से 30 नारियल छिलका गाड़ना नमी संरक्षण के लिए सहायक होता है

        Tags: नारियल का उत्पादननारियल पेड़नारियल का पेड़ कैसे लगायेनारियल का पौधा कैसे लगायेनारियल का बीजनारियल उत्पादक राज्यनारियल पेड़ लगाने की विधिबीज से पौधा बनने की प्रक्रिया.Category: खेती

        आम की खेती

        Sat, 04/14/2018 - 15:23

        आम को फलों का राजा कहा जाता है और यह हमारे देश का राष्ट्रीय फल है आम में विटामिन ए तथा सी प्रचुर मात्रा में होता है। इस फल से परिरक्षित पदार्थ जैसे अमचूर, चटनी, अचार, स्कैेवश, जैम इत्यादि बनाये जा सकते हैं।

        जलवायु : आम को समुद्रतल से लेकर 1250 मीटर ऊंचाई तक लिया जा सकता है। तीनों कृषि जलवायु क्षेत्रों में इसकी खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है। इस फल में फूल आने के समय वर्षा होने पर फसल कम बनते है और कीड़े व बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है। अधिक तेज हवा, आंधी द्वारा भी आम की फसल को नुकसान पहुंचता है।
        मिट्टी : केवल कंकरीली, पथरीली, उसर व पानी जमाव वाली भूमि को छोड़ कर यह फसल सभी प्रकार की मिट्टियों में पैदा किया जा सकता है। मिट्टी की गहराई कम से कम 6 फीट एवं मिट्टी का पीएच मान 5.5-7.5 होना चाहिए।
        प्रवर्धन : वीनियर, साईड, सॉफ्टवुड या एप्रोच ग्राफटिंग के द्वारा व्यवसायिक रुप से कलमी पौधे तैयार कर लगाये जाते हंै। बीजू पौधे लगाने पर पैतृक वृक्षों के गुणों के समान फल नहीं मिल पाते तथा अधिक समय बाद फल देना प्रारंभ करते है इसलिए वानस्पतिक प्रवर्धन द्वारा तैयार पौधों को प्राथमिकता दी जाती है।
        आम की गुठली लगाकर पौधे (मूलवृत्त) तैयार किये जाते हैं। तदपश्चात इन मूलवृंत पर उन्नत किस्म की शाखा विभिन्न प्रवर्धन विधियों से लगाकर पौधे तैयार (जुलाई-सितम्बर में)किये जाते है।
        जातियां :
        शीघ्र पकने वाली जातियां : हिमसागर, दिल पसंद, बाम्बेे ग्रीन, अमीन, बरबेलिया इत्यादि।
        मध्यम समय में पकने वाली जातियां : दशहरी, लंगडा, सुन्दरजा, अलफांसो, मल्लिका, केसर, मालदा, कृष्णभोग इत्यादि।
        देर से पकने वाली जातियां : चौसा, नीलम, फजली, आम्रपाली, तोतापरी, इत्यादि।
        भूमि की तैयारी : भूमि की अच्छी तरह से जुताई कर समतल बना लेना चाहिए एवं घास-पात, झाडिय़ोंं इत्यादि को जड़ समेत निकाल कर फेंक देना चाहिए।
        पौधा रोपण : वर्गाकार पद्धति द्वारा 10&10 मीटर की दूरी पर 1&1&1 (ल&चौ&ग) मीटर आकार का गड्ढ़ा (गर्मी में) खोद लिया जाता है। गड्ढ़ें की भराई 40 किलो गोबर खाद, आधा किग्रा सुपरफास्फेट और 250 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश मिट्टी में मिलाकर करना चाहिए।सघन पौध रोपण के लिये आम्रपाली किस्म का चयन किया जाता है जिसको 2.5 & 2.5 भी या 3&3 मीटर की दूरी पर लगाया जा सकता है।
        रोपण समय : पौधों को वर्षा की शुरुआत में (जून-जुलाई) ही लगाना अच्छा रहता है।
        सिंचाई : वर्षा ऋतु में पानी देने की आवश्यकता नहीं होती है परंतु फिर भी अगर वर्षा के असमान वितरण से सूखे जैसी स्थिति निर्मित हो तो सिंचाई देने की आवश्यकता पड़ती है ठण्ड के मौसम में 10 से 15 दिन के अंतराल पर तथा गर्मी के मौसम में 5-7 दिन के अंतराल पर सिंचाई देना चाहिए।
        पुराने फलदार वृक्षों को 10-15 दिन के अंतराल पर फल बनने से लेकर परिपक्व होने तक सिंचाई करने पर फल झडऩा कम हो जाता है तथा फल का आकार मिलता है। फलदार वृक्षों में वृक्षों में फूल आने के 2 महीने पहले सिंचाई रोक दी जानी चाहिए।
        खाद व उर्वरक प्रति पौध प्रतिवर्ष के हिसाब से वर्षा ऋतु के शुरुआत एवं मानसून के बाद दो बराबर भागों में मिट्टी में अच्छी तरह मिला कर देना चाहिए। व्यवसायिक रुप से उत्पादन शुरू कर चुके फलवार वृक्षों को नत्रजन की पूरी मात्रा मानसून के समय ही (तोड़ाई बाद) दे देनी चाहिए।
        कांट-छांट : सामान्यतया आम में कांट-छांट नहीं की जाती है परंतु सूखी रोगग्रसित, आड़ी तिरछी शाखाओं की कांट-छांट करनी चाहिए।
        एकांतरित फलन : आम में सामान्यत: एक वर्ष अच्छा फूल आता है। तथा दूसरे वर्ष बहुत कम या बिल्कुल नहीं आता है जिस वर्ष अच्छा फूल आता है उसे आन ईयर तथा जिस वर्ष फूल नहीं या कम आता है उसेे आफ ईयर कहते है। अधिकतर व्यवसायिक किस्मों में एकान्तरित फलन होता है कुछ प्रजातियां में एकान्तरित फलन की समस्या नहीं है जैसे नीलम, आम्रपाली, मलिका इत्यादि में प्रत्येक वर्ष फलन मिलता है। उचित प्रबंधन देखरेख करने पर अन्य कारणों से जो फलत कम हो जाती है उसे रोका जा सकता है।
        फल झडऩ : फल झडऩ चूंकि प्राकृतिक रुप से फल एवं वृद्धि के संतुलन को बनाये रखने के लिये होता है इसलिए पूर्ण रुप से इस पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता, केवल फल झडऩ को कम किया जा सकता है।
        सिंचाई द्वारा : फल बनने से लेकर परिपक्वता तक नियमित रुप से सिंचाई करने पर फलों का गिरना कम हो जाता है फल का आकार भी अच्छा मिलता है।
        हार्मोन द्वारा : एनएए का 15-25 पीपीएम का छिड़काव या बाजार में प्लेनोफिक्स नामक दवा आती है इसके छिड़काव से फल झडऩ कम हो जाता है।

         

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        मूली की खेती

        Sat, 04/14/2018 - 14:59

         मूली की खेती कैसे करें

         मूली जड़ वाली फसलों में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है । मूली गृह-वाटिका की भी मुख्य फसल है । इसको भोजन के साथ कच्ची सेवन करते हैं । इसके अतिरिक्त सलाद में, परांठे बनाकर तथा अचार में प्रयोग करते हैं । मूली के सेवन से पाचन-क्रिया सक्रिय रहती है । इसकी पत्तियों को मिलाकर भूजी के रूप मे खाना एक अलग ही स्वाद है । पेट गैस रोगियों के लिए इसका सेवन अच्छा रहता है तथा इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है ।

        जड़ व मुलायम पत्तियों के सेवन से शरीर को पोषक-तत्वों की प्राप्ति होती है । जैसे-कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम तथा विटामिन ‘ए’ व ‘सी’ प्रचुर मात्रा में पर्याप्त होते हैं ।

        मूली की खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु 

        मूली जड़ वाली फसल होने के कारण सर्वोत्तम बलुई-दोमट रहती है । जल-निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिए । पथरीली-भूमि उपयुक्त नहीं होती है तथा जीवांशयुक्त भूमि में फसल शीघ्र तैयार होती है । भूमि का पी. एच. मान 6-7 के बीच का उचित होता है ।

        मूली के लिए जलवायु ठण्डी होनी चाहिए । इसमें पाला व ठन्ड दोनों को सहने की क्षमता होती है | अच्छे उत्पादन के लिये 10-15 डी0 से0 तापमान उपयुक्त रहता है तथा अधिक वृद्धि करती है । अधिक तापमान से जड़ें कड़ी व चरपराहट तीव्र हो जाती हैं ।

        मूली की खेती के लिए खेत की तैयारी 

        इस फसल की तैयारी उचित ढंग से करें । मिट्‌टी बिल्कुल भुरभुरी करें क्योंकि ढीली मिट्‌टी में जड़ें अधिक वृद्धि करती हैं । इस प्रकार से मिट्‌टी के अनुसार 4-5 जुताई करनी चाहिए तथा खेत में से सूखी घास को बाहर निकाल कर जलायें तथा बाद में 4 * 3 मीटर की छोटी-छोटी क्यारियां बनायें ।

        बगीचों के लिये मूली मुख्य फसल है । इसलिए अपने क्षेत्र को फावड़े से 4-5 बार खोदें मिट्‌टी को भुरभुरी कर लें | गमलों में मूली पत्तियों के लिये लगा सकते हैं | लेकिन गमलों में जड़ें अधिक नहीं बढ़ती । अत: गमलों में भी खाद मिट्‌टी का मिश्रण भरकर तैयार कर लें ।

        मूली  उन्नतशील 

        पूसा-चेतकी- ये अधिक उपज देने वाली किस्म है । जो शरद व ग्रीष्म ऋतु दोनों के लिए उपयुक्त है । ग्रीष्म ऋतु में गर्मी सहने की क्षमता रखती है । ये 40-45 दिन में तैयार हो जाती है । इसकी जड़ें मध्य लम्बी, नीचे से नुकीली तथा स्वाद वाली होती हैं ।

        पूसा-हिमानी- ये किस्म 50-55 दिन में तैयार गूदा करारा, ऊपर से हरी तथा मीठे स्वाद वाली होती है । मध्य दिसम्बर मध्य फरवरी तक बोते हैं । यह अधिक ठन्डे स्थानों पर आसानी से उगाई जाती है । मूली सफेद तथा नीचे से कुछ थोथी होती है ।

        पूसा-देशी- यह किस्म शीघ्र तैयार होती है । 30-45 सेमी. लम्बी जड़ें होती हैं जो 45-50 दिन लेती हैं । इस किस्म को मध्य अगस्त से मध्य अक्टूबर तक बोते हैं । यह अगेती किस्म है ।

        पूसा-रश्मि- यह किस्म सितम्बर-नवम्बर तक बोते हैं । जड़ें लम्बी, सफेद, थोड़ी ऊपर हरापन लिये हुये होती हैं । जड़ें स्वाद में तीखी होती हैं जिन्हें स्वाद से खाते हैं । 50-55 दिन में तैयार होती है ।

         

        जापानी-व्हाइट- यह किस्म दूध जैसी सफेद, गोलाकार, चिकनी व गूदा करारा, खुशबूदार होता है । 55-60 दिन में खाने लायक हो जाती है जो अक्टूबर-दिसम्बर तक तैयार होती है ।

        रैपिड रैड व्हाइट यह किस्म शीघ्र तैयार होती है जो कि 25-30 दिन में मिलनी आरम्भ हो जाती है । जड़ें गोलाकार, चिकनी, चमकीली, नीचे से सफेद तथा गूदा सफेद कुरकुरा होता है । बुवाई अक्टूबर-मध्य फरवरी तक करते हैं ।

        बीज की मात्रा व बुवाई का समय 

        मूली के बीज की मात्रा तापमान पर निर्भर करती है । यह सभी प्रकार के मौसम में बोयी जाती है । इस प्रकार से मूली पूरे वर्ष बोई जा सकती है । बीज की मात्रा 8-10 किलो प्रति हैक्टर की आवश्यकता पड़ती है ।

        बुवाई मैदानी भागों में मध्य अगस्त-सितम्बर से जनवरी-फरवरी तक करते हैं तथा पहाड़ी क्षेत्रों में मार्च से अगस्त तक बुवाई करते रहते हैं । केवल पूसा चेतकी किस्म की बुवाई को मैदानी क्षेत्रों में मार्च-अप्रैल में करते हैं ।

        बगीचों के लिए बीज की मात्रा 20-25 ग्राम 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र के लिए काफी होती है तथा गमलों के आकार के अनुसार 4-5 बीज बोयें ।

        खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग 

        मूली के लिए सड़ी गोबर की खाद 20-22 ट्रैक्टर-ट्रौली प्रति हैक्टर डालकर मिट्‌टी में मिला दें तथा उर्वरक-नत्रजन 90-100 किलो, 425 किलो यूरिया, फास्फोरस 40 किलो, 240 किलो सिंगल सुपर फास्फेट तथा पोटाश 60 किलो (100 किलो म्यूरेट आफ पोटाश) प्रति हैक्टर पर्याप्त होता है । नत्रजन की आधी फास्फोरस व पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा बुवाई से 10-15 दिन पहले मिट्‌टी में डालें तथा एक जुताई कर लें । शेष नत्रजन को दो भागों में बांटकर पौधों पर 15-20 दिन व 35-40 दिन पर डालें जिससे पत्तियों व जड़ों की वृद्धि हो सके ।

        बगीचों के लिए 8-10 मी. क्षेत्र के लिए खाद 5-6 टोकरी तथा 500 ग्राम यूरिया 300 ग्राम डाई अमोनियम सल्फेट तथा 400 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश देने से मूली की जड़ें व पत्तियां अधिक मिलती हैं । प्रत्येक गमलें में 3-4 चम्मच उर्वरक डालें तथा पौधे बड़े होने पर 1-2 चम्मच यूरिया की 15-20 दिन के अन्तर से डालें । इसमें वृद्धि अच्छी होती है ।

        सिंचाई एवं खरपतवार-नियंत्रण 

        मूली की बुवाई के समय पर्याप्त नमी है तो पहली सिंचाई 12- 15 दिन बाद करें । यदि कम नमी हो तो हल्की सिंचाई शीघ्र कर दें तथा अन्य सिंचाई मौसम व नमी के आधार पर करते रहें, औसतन सप्ताह बाद करते रहें । मूली की फसल के लिए पानी अधिक चाहिए जिससे उपज पर प्रभाव पड़ता है |

        सिंचाई के बाद 1-2 निकाई-गुड़ाई करें जिससे खरपतवार न हो पायें । यूरिया की मात्रा खरपतवार रहित फसल में ही डालें अन्यथा खरपतवार ही पोषक तत्वों को लें लेंगे । इसी समय हल्की पौधों पर मिट्‌टी चढ़ाये जिससे जड़ें अधिक बढ़ सकें ।

        कीटों से मूली के पौधों की सुरक्षा कैसे करें 

         मूली को कुछ कीट क्षति पहुंचाते हैं ।

        एफिड्‌स व पत्ती काटने वाला कीड़ा- दोनों पर रोगोर या मेलाथियान द्वारा नियन्त्रण किया जा सकता है ।

        पत्तियों का धब्बा रोग इस पर बेवस्टिन या डाइथेन एम-45 या जैड-78 के 2% के घोल से नियन्त्रण कर सकते हैं ।

        उपज 

        मूली की उपज किस्म समय तथा भूमि की उर्वरा-शक्ति पर निर्भर करती है । औसतन उपज 250-500 क्विंटल प्रति हैक्टर प्राप्त होती है । बगीचों में मूली की पैदावार 20-25 किलो जाड़े के मौसम में 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र में पैदा की जा सकती है ।

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        टमाटर की उन्नत उत्पादन तकनीक

        Sat, 04/14/2018 - 14:45

         

        टमाटर की उन्नत उत्पादन तकनीक

        दर्श तापमान

        टमाटर की फसल पाला नहीं सहन कर सकती है। इसकी खेती हेतु आदर्श तापमान 18. से 27 डिग्री से.ग्रे. है। 21-24 डिग्री से.ग्रे तापक्रम पर टमाटर में लाल रंग सबसे अच्छा विकसित होता है। इन्हीं सब कारणों से सर्दियों में फल मीठे और गहरे लाल रंग के होते हैं। तापमान 38 डिग्री से.ग्रे से अधिक होने पर अपरिपक्व फल एवं फूल गिर जाते हैं।

        भूमि

        उचित जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि जिसमे पर्याप्त मात्रा मे जीवांश उपलब्ध हो।

        मेथी की खेती

        देसी किस्म-पूसा रूबी, पूसा-120,पूसा शीतल,पूसा गौरव,अर्का सौरभ, अर्का विकास, सोनाली

        संकर किस्म-पूसा हाइब्रिड-1, पूसा हाइब्रिड -2, पूसा हाइब्रिड-4, अविनाश-2, रश्मि तथा निजी क्षेत्र से शक्तिमान, रेड गोल्ड, 501, 2535उत्सव, अविनाश, चमत्कार, यू.एस.440 आदि।

        बीजदरबीज की मात्रा और बुवाई

        एक हेक्टयेर क्षेत्र में फसल उगाने के लिए नर्सरी तैयार करने हेतु लगभग 350 से 400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। संकर किस्मों के लिए बीज की मात्रा 150-200 ग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहती है।

        बुवाई

        वर्षा ऋतु के लिये जून-जुलाई तथा शीत ऋतु के लिये जनवरी-फरवरी। फसल पाले रहित क्षेत्रों में उगायी जानी चाहिए या इसकी पाल से समुचित रक्षा करनी चाहिए।

        बीज उपचार

        बुवाई पूर्व थाइरम/मेटालाक्सिल से बीजोपचार करें ताकि अंकुरण पूर्व फफून्द का आक्रमण रोका जा सके।

         

         

        नर्सरी एवं रोपाई

        • नर्सरी मे बुवाई हेतु 1X 3 मी. की ऊठी हुई क्यारियां बनाकर फॉर्मल्डिहाइड द्वारा स्टरलाइजेशन कर लें अथवा कार्बोफ्यूरान 30 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से मिलावें।
        • बीजों को बीज कार्बेन्डाजिम/ट्राइकोडर्मा प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित कर 5 से.मी. की दूरी रखते हुये कतारों में बीजों की बुवाई करें। बीज बोने के बाद गोबर की खाद या मिट्‌टी ढक दें और हजारे से छिड़काव -बीज उगने के बाद डायथेन एम-45/मेटालाक्सिल से छिड़काव 8-10 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।
        • 25 से 30 दिन का रोपा खेतों में रोपाई से पूर्व कार्बेन्डिजिम या ट्राईटोडर्मा के घोल में पौधों की जड़ों को 20-25 मिनट उपचारित करने के बाद ही पौधों की रोपाई करें। पौध को उचित खेत में 75 से.मी. की कतार की दूरी रखते हुये 60 से.मी के फासले पर पौधों की रोपाई करें।
        • मेड़ों पर चारों तरफ गेंदा की रोपाई करें। फूल खिलने की अवस्था में फल भेदक कीट टमाटर की फसल में कम जबकि गेदें की फलियों/फूलों में अधिक अंडा देते हैं।

        उर्वरक का प्रयोग

        20 से 25 मैट्रिक टन गोबर की खाद एवं 200 किलो नत्रजन,100 किलो फॉस्फोरस व 100किलो पोटाश। बोरेक्स की कमी हो वहॉ बोरेक्स 0.3 प्रतिशत का छिड़काव करने से फल अधिक लगते हैं।

        सिंचाई

        सर्दियों में 10-15 दिन के अन्तराल से एवं गर्मियों में 6-7 दिन के अन्तराल से हल्का पानी देते रहें। अगर संभव हो सके तो कृषकों को सिंचाई ड्रिप इर्रीगेशन द्वारा करनी चाहिए।

         

        मिट्‌टी चढ़ाना व पौधों को सहारा देना (स्टेकिंग)

        टमाटर मे फूल आने के समय पौधों में मिट्‌टी चढ़ाना एवं सहारा देना आवश्यक होता है। टमाटर की लम्बी बढ़ने वाली किस्मों को विशेष रूप से सहारा देने की आवश्यकता होती है। पौधों को सहारा देने से फल मिट्‌टी एवं पानी के सम्पर्क मे नही आ पाते जिससे फल सड़ने की समस्या नही होती है। सहारा देने के लिए रोपाई के 30 से 45 दिन के बाद बांस या लकड़ी के डंडों में विभिन्न ऊॅचाईयों पर छेद करके तार बांधकर फिर पौधों को तारों से सुतली बांधते हैं। इस प्रक्रिया को स्टेकिंग कहा जाता है।

        खरपतवार नियंत्रण

        • आवश्यकतानुसार फसलों की निराई-गुड़ाई करें। फूल और फल बनने की अवस्था मे निंदाई-गुड़ाई नही करनी चाहिए।
        • रासायनिक दवा के रूप मे खेत तैयार करते समय फ्लूक्लोरेलिन (बासालिन) या से रोपाई के 7 दिन के अंदर पेन्डीमिथेलिन छिड़काव करें।

        प्रमुख कीट एवं रोग

        प्रमुख रोग-आर्द्र गलन या डैम्पिंग ऑफ, झुलसा या ब्लाइट, फल संडन

        एकीकृत कीट एवं रोग नियंत्रण

        • गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें।
        • पौधशाला की क्यारियॉ भूमि धरातल से ऊंची रखे एवं फोर्मेल्डिहाइड द्वारा स्टरलाइजेशन करलें।
        • क्यारियों को मार्च अप्रैल माह मे पॉलीथीन शीट से ढके भू-तपन के लिए मृदा में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
        • गोबर की खाद मे ट्राइकोडर्मा मिलाकर क्यारी में मिट्‌टी में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए।
        • पौधशाला की मिट्‌टी को कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के घोल से बुवाई के 2-3 सप्ताह बाद छिड़काव करें।
        • पौध रोपण के समय पौध की जड़ों को कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोडर्मा के घोल मे 10 मिनट तक डुबो कर रखें।
        • पौध रोपण के 15-20 दिन के अंतराल पर चेपा, सफेद मक्खी एवं थ्रिप्स के लिए 2 से ३ छिड़काव इमीडाक्लोप्रिड या एसीफेट के करें। माइट की उपस्थिति होने पर ओमाइट का छिड़काव करें।
        • फल भेदक इल्ली एवं तम्बाकू की इल्ली के लिए इन्डोक्साकार्ब या प्रोफेनोफॉस का छिड़काव ब्याधि के उपचार के लिए बीजोपचार, कार्बेन्डाजिम या मेन्कोजेब से करना चाहिए। खड़ी फसल मेंं रोग के लक्षण पाये जाने पर मेटालेक्सिल + मैन्कोजेब या ब्लाईटॉक्स का धोल बनाकर छिड़काव करें। चूर्णी फंफूद होने सल्फर धोल का छिड़काव करें।

         

        फलों की तुड़ाई,उपज एवं विपणन

        जब फलों का रंग हल्का लाल होना शुरू हो उस अवस्था मे फलों की तुड़ाई करें तथा फलों की ग्रेडिंग कर कीट व व्याधि ग्रस्त फलों दागी फलों छोटे आकार के फलों को छाटकर अलग करें। ग्रेडिंग किये फलों को केरैटे में भरकर अपने निकटतम सब्जी मण्डी या जिस मण्डी मे अच्छा टमाटर का भाव हो वहां ले जाकर बेचें। टमाटर की औसत उपज 400-500 क्विंटल/है. होती है तथा संकर टमाटर की उपज 700-800 क्विंटल/है. तक हो सकती है।

         

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        चुकन्दर की खेती

        Sat, 04/14/2018 - 13:43

         चुकन्दर की खेती कैसे करें

        चुकन्दर भी जड़ वाली सब्जियों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है । इसकी जड़ों को सब्जी व सलाद के रूप में अधिक प्रयोग करते हैं । एक परिवार के लिए भी गार्डन में उगाना विशेष महत्त्व रखता है । जड़ों का आकार शलजम जैसा होता है । लेंकिन रंग अलग ही स्पेशल होता है । रंग को गहरा लाल कह सकते हैं ।

        चुकन्दर का सेवन कच्चा सलाद व जूस में विशेष स्थान रखते हैं । इसके अतिरिक्त चीनी-उद्योग में भी प्रयोग करते हैं । चुकन्दर के प्रयोग से कुछ महत्त्वपूर्ण पोषक तत्व भी प्राप्त होते हैं, जैसे- प्रोटीन, कैल्शियम, आजीलिक एसिड, फास्फोरस तथा कार्बोहाइड्रेटस आदि ।

         

        चुकन्दर की खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु  

        चुकन्दर की फसल को लगभग सभी प्रकार की मिट्‌टी में पैदा किया जा सकता है । लेकिन सर्वोत्तम भूमि बलुई दोमट या दोमट मानी जाती है । कंकरीली व पथरीली मिट्टी में वृद्धि ठीक नहीं होती । भूमि का पी.एच. मान 6 से 7 के बीच का होना चाहिए ।

        सर्दी की फसल होने के कारण जलवायु ठन्डी उपयुक्त रहती है । लेकिन कुछ गर्म मौसम में भी उगाया जा सकता है । जाड़ों की फसल में ‘सुगर’ की मात्रा अधिक बनती है । तापमान 8-10 डी० से० ग्रेड हो या नीचे हो तो जड़ों का आकार बढ़ता है तथा जड़ बाजार के लिए उचित होती है ।

        चुकन्दर की खेती के लिए खेत की तैयारी

         इस फसल की तैयारी उचित ढंग से करनी चाहिए यदि भूमि रेतीली है तो  2-3 जुताई करें तथा कुछ भारी हो तो पहली जुताई मिट्टी पलटने वालें हल से करें तथा अन्य 3-4 जुताई करके पाटा चलायें और मिट्‌टी को बिकुल भुरभुरी कर लें जिससे जड़ों की वृद्धि ठीक हो सके । तत्पश्चात् छोटी-छोटी क्यारियां बनायें ।

        बगीचों में 3-4 गहरी जुताई-खुदाई करें । घास-घूस को बाहर निकालें तथा छोटी-छोटी क्यारियां बनायें । मिटटी को बारीक कर लें ।

        चुकन्दर की उन्नतशील किस्में 

        चुकन्दर की दो मुख्य किस्में है जिन्हें उगाने की सिफारिश की जाती है-

        1. डेटरोडिट डार्क रेड (Detrpdot Dark Red)- यह किस्म 80-90 दिन में तैयार हो जाती हैं तथा पत्तियां कुछ गहरालाल रंग (Dark Red) लिये हरी होती हैं । जड़ें चिकनी, गोलाकार व गहरी लाल रंग की होती हैं तथा गूदे में हल्के लाल रंग की धारियां व गूदा रवेदार मीठा होता है |
        2. क्रिमसोन ग्लोब (Krimson Glob)- यह किस्म भी अधिकतर बोते हैं । जड़ें चपटे आकार की छोटी होती है । पत्तियां गहरी लाली लिये हुए हरे रंग वाली होती हैं । जड़ें ग्लूबलर होती है । गूदा गहरे लाल रंग का होता है तथा धारियों वाला होता है ।

        बीज की मात्रा एवं बुवाई का समय व ढंग 

        चुकन्दर के उत्तम सफल उत्पादन के लिए बीज का चुनाव मुख्य है । बीज का उत्तम होना आवश्यक है । साधारणत: बीज की मात्रा 6-8 किलो प्रति हैक्टर की आवश्यकता होती है । बीज की मात्रा, बुवाई का ढंग, समय व किस्म पर भी निर्भर करता है ।

        बुवाई खेत तैयारी के बाद सारे खेत में एक साथ न बोकर 10-15 दिन के अन्तर से बोयें जिससे जड़ें लम्बे समय तक मिलती रहें । जाड़े की फसल होने के कारण बोने का समय अक्टूबर से नवम्बर तक होता है । बीज की छोटी क्यारियां बनायें तथा कतारों में लगायें । इन कतारों की दूरी 30 सेमी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10-12 सेमी. रखें जिससे बड़ी जड़ें आपस में मिल न सकें । बीज की गहराई अधिक न लेकर 1-5-2 सेमी. रखें जिससे अंकुरण में परेशानी न आये । गहरा बीज गल, सड़ जाता है ।

        बगीचों के लिये बीज 20-25 ग्राम 8-10 मी. क्षेत्र के लिए काफी होता है । यदि गमलों में लगाना हो तो 2-3 बीज बोयें तथा उपरोक्त समय पर बोयें । कतारों की दूरी 25-30 सेमी. व पौधों की दूरी 8-10 सेमी. रखें ।

        खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग 

        जड़ों की फसल होने से देशी खाद या कम्पोस्ट खाद की मात्रा भूमि की किस्म के ऊपर निर्भर करती है । बलुई दोमट भूमि के लिये 15-20 ट्रौली खाद (एक ट्रौली में एक टन खाद) प्रति हैक्टर खेत तैयार करते समय दें । यदि भूमि रेतीली है तो हरी खाद के रूप में भी दें जिससे खेत में ह्यूमस व पोषक तत्वों की प्राप्ति हो जाये । रासायनिक खाद या उर्वरकों की मात्रा, जैसे-नत्रजन 60-70 किलो, फास्फोरस 60 किलो तथा पोटाश 80 किलो प्रति हैक्टर के लिये पर्याप्त होता है । नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा को बुवाई से 15-20 दिन पूर्व मिट्‌टी में मिलायें तथा शेष नत्रजन को बोने के बाद 20-25 दिन व 40-45 दिन के बाद दो बार में छिड़कने की सिफारिश की जाती है । इस प्रकार से जड़ों का विकास ठीक होता है ।

        बगीचों के लिये तीनों उर्वरकों की मात्रा 350 ग्राम (प्रत्येक-यूरिया, डी.ए.पी. व म्यूरेट ऑफ पोटाश) को 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र में डालें । यूरिया की मात्रा को देना पौधे बड़े होने के बाद 2-3 बार में छिड़कें । गमलों में तीनों उर्वरकों की 3-4 चम्मच मिट्‌टी के मिश्रण में मिलायें तथा यूरिया को पौधे कमजोर होने पर 1-2 चम्मच दें तथा 5-6 चम्मच प्रति गमला सड़ी गोबर की खाद बोने से पहले ही मिट्‌टी में मिला लें ।

        सिंचाई 

         बुवाई के बाद फसल की सिंचाई 10-15 दिन के बाद पहली सिंचाई करें । यदि पलेवा करके बुवाई की है तो नमी के अनुसार पानी लगायें । ध्यान रहे कि पहली सिंचाई हल्की करें । शरद-ऋतु की फसल होने से 12-15 दिन के अन्तराल से सिंचाई करते रहें अर्थात् खेत में नमी बनी रहे । यदि गर्मी हो तो 8-10 दिन के अन्तर से पानी देते रहें ।

        बगीचों व गमलों के लिये सिंचाई का विशेष ध्यान रखें । पहला पानी हल्का हो तथा अन्य पानी नमी के अनुसार 8-10 दिन के बाद देते रहे । गमलों में पानी 2-3 दिन के अन्तर से दें । कोशिश करें कि पानी शाम के समय दें जिससे मिट्‌टी कम सूखेगी और पौधों की अधिक वृद्धि होगी ।

        खरपतवारों का नियन्त्रण 

        चुकन्दर की फसल में रबी-फसल वाले खरपतवार अधिक पैदा होते हैं । नियन्त्रण के लिये सबसे उत्तम है कि सिंचाई के 3-4 दिन बाद निकाई-गुड़ाई कर दें जिससे घास, वथूआ आदि निकल जायेंगे तथा फसल की जड़ें अधिक वृद्धि कर सकेंगी अर्थात् उपज अधिक मिलेगी ।

        बगीचों व गमलों की 1-2 गुड़ाई आरम्भ में ही करें जिससे पौधों को क्षति न पहुंचे और घास को बाहर निकाल सकें । पौधों की गुड़ाई करने से जड़ें बड़ी मिलती हैं ।

        रोगों से चुकन्दर के पौधों की सुरक्षा कैसे करें 

        पौधों पर कुछ कीटों (Insects) का आक्रमण होता है । जैसे- पत्ती काटने वाला कीड़ा, वीटिल । नियन्त्रण के लिये अगेती फसल बोयें तथा मेटास्सिटाक्स या मैलाथियान का .2% (दो ग्राम दवा एक लीटर पानी में घोलकर) का छिड़काव करें ।

        बीमारी भी दो हैं- 1. पत्तियों का धब्बा एवं 2. रुट-रोट का रोग ।

        1. पत्तियों का धब्बा- इस रोग में पत्तियों पर धब्बे जैसे हो जाते हैं । बाद में गोल छेद बनकर पत्ती गल जाती है । नियन्त्रण के लिये फंजीसाइड, जैसे- डाइथेन एम-45 या बेवस्टिन के .1% घोल का छिड़काव 15-20 दिन के अन्तर पर करने से आक्रमण रुक जाता है ।
        2. रुट-रोग का रोग- यह रोग जड़ों को लगता है जिससे जड़ें खराब होती हैं । नियन्त्रण के लिए फसल-चक्र अपनायें । प्याज, मटर बोयें तथा बीजों को मकर्यूरिक क्लोराइड के 1% के घोल से 15 मिनट तक उपचारित करें । अन्य रोग अवरोधी फसलों को साथ बोयें ।

        खुदाई 

        खुदाई बड़ी व मीठी जड़ों की करें तथा बाजार की मांग के हिसाब से करते रहे । खुदाई खुरपी या पावड़े से करें तथा जड़ें कट न पायें । खोदने से पहले हल्की सिंचाई करें जिससे आसानी से खुद सकें तथा ग्रेडिंग करके बाजार भेजें जिससे मूल्य अधिक मिल सके ।

        उपज 

        चुकन्दर की औसतन 30-40 क्विंटल प्रति हैक्टर जड़ों की प्राप्ति हो जाती है ।

        बगीचों में 20-25 किलो जड़ें 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र प्राप्त हो जाती हैं जिनका कि समय-समय पर जूस, सलाद व सब्जी में प्रयोग करते रहते हैं ।

         

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        लहसुन की खेती

        Sat, 04/14/2018 - 13:32

        भूमि तथा जलवायु:
        लहसुन की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है लेकिन इसके लिये प्रचुर जीवांश और अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी सर्वोतम है। लहसुन की वृद्धि के लिये तुलनात्मक दृष्टि से ठंडा व नम जलवायु उपयुक्त रहता है। गर्म व बड़े दिन पौधे की वृद्धि पर विपरित प्रभाव डालते हैं। परन्तु कंद बनने क लिये लंबे व शुष्क दिन फायदेमंद हैं। परन्तु कंदों के बनने के बाद यदि तापमान कम हो जाये तो कंदों का विकास और अधिक अच्छा होगा, एवं कन्दों के विकास के लिये अधिक समय उपलब्ध होगा, अत: उनका विकास अच्छा होगा तथा उपज बढ़ेगी।
        खेत की तैयारी :
        लहसुन की जड़ें भूमि की ऊपरी सतह से करीब 15 सेमी गहराई तक ही सीमित रहती है अत: भूमि की अधिक गहरी जुताई की आवश्यकता नहीं है, इसलिये दो जुताई करके, हेरो चलाकर भूमि को भुरभुरा करके खरपतवार निकालकर, समतल कर देना चाहिए। जुताई के समय भूमि में उपयुक्त मात्रा में नमी आवश्यक है अन्यथा पलेवा देकर जुताई करें।
        उन्नत किस्में:
        लाडवा, मलेवा, एग्रीफांउड व्हाइट, आर जी एल-1, यमुना सफेद-3 एवं गारलिक 56-4 नामक किस्में अच्छी पैदावार देती है। लहसुन का चूर्ण बनाने के लिये बड़े आकार की लौंग वाली गुजरात की जामनगर व राजकोट किस्मों को उपयुक्त माना गया है।
        खाद एवं उर्वरक:
        खेत की तैयारी के समय 20-25 टन प्रति हेक्टर गोबर खाद खेत में मिला देनी चाहिये क्योंकि जैविक खाद का लहसुन की उपज पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा 50 किलो नत्रजन, 60 किलो फॉस्फोरस व 100 किलो पोटाश प्रति हेक्टर बुवाई के समय दें व 50 किलो नत्रजन बुवाई के 30 दिन बाद दें।
        बीज व बुवाई:
        लहसुन की बुवाई के लिये अच्छी किस्म के स्वस्थ बड़े आकार के आकर्षक कंदों की कलियों को अलग-अलग करके बुवाई के काम में लें। बुवाई हेतु प्रति हेक्टर 500 किलो कलियों की आवश्यकता होती है। इसकी बुवाई (रोपाई) कतारों में 15 से.मी. की दूरी पर करें व पौधे से पौधे की दूरी 7-8 से.मी. एवं गहराई 5 से.मी. ही रखें। इसकी बुवाई का उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक का है। भूमि का तापमान 300 से ज्यादा होने पर कलियों में सडऩ उत्पन्न हो सकती है।
        सिंचाई एवं निराई गुड़ाई:
        लहसुन की कलियों की बुवाई के बाद एक हल्की सिंचाई करनी चाहिये इसके पश्चात वानस्पतिक वृद्धि व कंद बनते समय 7-8 दिन के अन्तराल से व फसल के पकने की अवस्था में करीब 12 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें। सिंचाई के लिये क्यारी ज्यादा बड़ी नहीं बनावें। पकने पर पत्तियां सूखने लगे तब सिंचाई बंद कर देंं। जिस क्षेत्र में पानी भरता हो उसमें पैदा हुये कंद अधिक समय तक संग्रह नहीं किये जा सकते। खरपतवार नष्ट करने के लिये निराई गुडाई आवश्यक है। गुड़ाई गहरी नहीं करें। इस फसल में निराई गुड़ाई अन्य फसलों की तुलना में कठिन है क्योंकि पौधे पास-पास में होते हैं। अत: खरपतवार नाशी रसायनों का उपयोग किया जा सकता है। इसके लिये अंकुरण के पूर्व प्रति हैक्टर 150 ग्राम आक्सीफ्लूरफेन (600 ग्राम गोल) अथवा पेंडिमिथालिन 1 किलो सक्रिय तत्व (3.3 लीटर स्टॉम्प) का पानी में घोल बनाकर छिड़कावव अंकुरण पश्चात ऑक्साडायाजोन 1 किलो प्रति हेक्टर का पानी में घोल बनाकर छिड़का व करें या 25 से 30 दिन पर एक गुड़ाई करें।
        लहसुन के पकाव की पहचान पत्तियाँ पीली पडऩे लगे (फसल बुवाई के 4-5 माह बाद), कंद दबाने से नहीं दबे एवं कंद में 80 प्रतिशत कलियां बनी हुई दिखाई पड़े तब समझें लहसुन पक गया है। कुछ कंद जमीन से निकालकर 2-3 दिन छाया में रखें अगर वह नीला पड़ जाय तो समझेंअभी वह नहीं पका है, दो-चार दिन खेत में लहसुन खड़ा रहने देें।
        खुदाई एवं उपज :
        लहसुन खुदाई के वक्त भूमि में थोड़ी नमी रहनी चाहिये जिससे कंद आसानीसे बिना क्षति पहुंचाये निकाले जा सकें। कंदों को पत्तियों सहित निकालने के तुरन्त बाद कंद पर लगी मिट्टी उतार दें तथा छोटे-छोटे बंडल बनावें एवं छाया में सुखा देना चाहिये तथा सूखी पत्तियाँ अलग कर देनी चाहिये। यदि फर्श पर सुखाना पड़े तो कंदों कोसमय-समय पर पलटना चाहिये।
        यदि कंदों को उनकी पत्तियों द्वारा गुच्छों में बांध कर किन्हीं अवलंबों पर लटका कर सुखाया जाय तो उत्तम रहेगा। इससे लगभग 100-125 क्विंटल प्रति हेक्टर तक उपज प्राप्त की जा सक

        Tags: लहसुन की जैविक खेतीलहसुन की किस्मलहसुन की उन्नत किस्मलहसुन की खेती सेकमाई खेती करने की विधि लहसुन के रोग प्याज की उन्नत खेतीCategory: खेती

        अदरक की खेती

        Sat, 04/14/2018 - 13:32

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        अदरक की खेती

        जलवायु की आवश्यकताएँ

        अदरक गर्म और आर्द्र जलवायु में अच्छी तरह से बढ़ती है. मतलब इसके खेती समुद्र स्तर से ऊपर 1500 मीटर की ऊंचाई और आंशिक छाया में अच्छी तरह से पनपती है. लेकिन इसके सफल खेती के लिए इष्टतम ऊंचाई 300-900m है. मध्यम वर्षा बुवाई से rhizomes के अंकुर तक, और इसके सफल खेती के लिए बढ़ती अवधि में काफी भारी और अच्छी तरह से वितरित बारिश और कटाई से पहले शुष्क मौसम के साथ एक महीने के अवधि तक 28 ° -35 डिग्री सेल्सियस के तापमान इष्टतम आवश्यकताओं में से हैं. प्रारंभिक बुवाई rhizomes के बेहतर विकास और उच्च पैदावार में मदद करता है.

        मिट्टी की आवश्यकताएँ

        खेती के लिए मिट्टी अच्छा जल निकासी और वातन के साथ आदर्श होते हैं. यह रेतीले या दोमट मिट्टी, लाल दोमट मिट्टी और lateritic, गहरी और धरण में समृद्ध सहित मिट्टी की किस्म में अच्छी तरह से बढ़ती है. गीला दलदली भूमि यह शोभा नहीं करता है और पानी लॉगिन मिट्टी से यह बचा जाना चाहिए. रोगों की बिल्कुल रोकथाम के लिए जल निकासी आवश्यक है. जिंजर एक ही साइट में वर्ष के बाद वर्ष नहीं हो जाना चाहिए. लाल मिट्टी में बड़े हो रहे Rhizomes अच्छी गुणवत्ता रखने के कारण बाजार में पसंद करते हैं. प्रकंद विकास थोड़ा अम्लीय मिट्टी पर बेहतर है.

          फसल प्रणाली

        अदरक एक थकाऊ फसल है और मिट्टी के पोषक तत्व की स्थिति के बीच संतुलन साधने के लिए फसल रोटेशन आवश्यक है और यह अदरक में नरम सड़ांध रोग से बचने के लिए भी आवश्यक है. सिंचित भूमि में, अदरक पान-बेल, हल्दी, प्याज, लहसुन, मिर्च, अन्य सब्जियों, गन्ना, मक्का, रागी और मूंगफली के साथ घुमाया जा सकता है. वर्षा सिंचित परिस्थितियों में यह 3 या 4 साल में एक बार, टैपिओका, मधुर आलू, रतालू, मिर्च और सूखी धान के साथ रोटेशन में हो सकता है. यह अकेले ही या मिश्रित , छाया दे रही पौधों जैसे केला, तूर, पेड़रेंड़ी और क्लस्टर बीन्स (ग्वार की फलियों) और मक्का के साथ विकसित किया जा सकता है.

        पश्चिमी तट पर नारियल, युवा कॉफी और नारंगी बागान में, अदरक एक intercrop के रूप में उगाया जाता है. उच्च altitudes हिमाचल प्रदेश में, अदरक टमाटर और मिर्च के साथ intercrops के रूप में विकसित किया जाता है.

        सिक्किम में, मुख्य रूप से अदरक वर्षा आधारित रूप में और खरीफ के दौरान एक वार्षिक फसल के रूप में विकसित होता है. यह शुद्ध फसल या मक्का के साथ मिश्रित फसल के रूप में विकसित किया जा सकता है. 3 - 4 साल में एक बार रोटेशन के साथ और मिश्रित फसल मक्का के साथ सबसे अधिक आम है.

        झुम खेती में, यह पूर्वोत्तर क्षेत्र के पहाड़ी ढलानों पर धान और मक्का के साथ एक मिश्रित फसल के रूप में उगाया जाता है.

        मैदान तैयार करना और बुवाई

        एक गहरी जुताई ठीक प्राप्त प्राप्त करने के लिए मार्च अप्रैल में पहली वर्षा के साथ भूमि 5 या 6 बार जोता जाता है. एक बारिश से सिंचित फसल उठाने के लिए, भूमि 1 मीटर चौड़ी और सुविधाजनक लंबाई (3 से 6 मीटर) के साथ 15 सेमी ऊंचाई उठाया बेड में बांटा जाता है और बेड के बीच में जल निकासी चैनलों के लिए 30 सेमी की दूरी रखा जाता है. पहाड़ी ढलानों पर बेड समोच्च लाइनों पर गठन किया जाता है. अदरक पंक्तियों में उथले गड्ढे में, 25 सेमी की दूरी पर, पंक्ति के भीतर 15-20 सेमी की दूरी पर बोया जाता है. सिंचित फसल के मामले में 40-45 सेमी की चोटी रखा जाता है और रोपण चोटी के शीर्ष पर उथले गड्ढे में 22-30 सेमी की दूरी पर किया जाता है

        पूर्वोत्तर क्षेत्र की पहाड़ियों में आमतौर पर अदरक की खेती उठाया बेड या झुम क्षेत्र में किया जाता है.

        सिक्किम में, बीज rhizomes के प्रत्येक टुकड़े 100 से 200 ग्राम वजन के (मैदानों में 20-30gms) और कम से कम 2 से 4 कलियों (मैदानों में एक कली) दी गया अंतर में 5 सेमी गहरे बोया जाता है और मिट्टी के साथ कवर किया जाता है और हाथ से चिकना (smoothened ) किया जाता है . सिक्किम के पहाड़ी इलाकों में एक हेक्टेयर भूमि के लिए 40 से 60 क्विंटल rhizomes बीज (मैदानों में, 18-20 क्विंटल rhizomes बीज) बोना आवश्यक हैं. बुवाई दक्षिणी भारत में मार्च अप्रैल में और उत्तरी भारत में एक थोड़ा बाद में किया जाता है. दक्षिण भारत में बुवाई अप्रैल के मध्य तक और उत्तर भारत में मई के प्रथम सप्ताह में बुवाई से उच्च पैदावार देता है. सिक्किम में, बुवाई मार्च अप्रैल में किया जाता है और नवंबर, दिसंबर में फसल कटाई किया जाता है

        पहाड़ियों में, जहां पर्याप्त नमी बढ़ते मौसम की लगभग दो तिहाई के लिए उपलब्ध है, Mulching आम नहीं है. मैदानों में mulching अदरक की खेती का एक अनिवार्य हिस्सा है , जंगली घास की वृद्धि को रोकता है और मिट्टी और नमी की नुकसान को रोकता है और इसे उपज पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है

        अदरक के बढ़ते क्षेत्रों में, जंगली घास के द्वारा पोषक तत्वों की नुकसान से बचने के लिए weeding किया जाता है. भारी वर्षा के क्षेत्रों में विशेष रूप से पहाड़ी ढलानों पर विकासशील प्रकंद के बेनकाब से बचने के लिए ग्राउंडिंग ऊपर नीचे करने के लिए पौधों का समर्थन है. mulching के साथ ग्राउंडिंग जंगली घास की वृद्धि को कम कर देता है और यह एक बढ़ते पौधों के उचित पोषण के लिए भी उपयोगी है.

        खाद डालना

        FYM के 25-30 टन बेसल खुराक के साथ NPK का 75:50:50 किलो / हेक्टेयर की सिफारिश की है. रोपण के समय में P2O5 का समूचा और K2O का आधा भाग लागू किया जा सकता है. आधा एन रोपण (रोपण ) के 40 दिनों के बाद लागू किया जाता है और शेष एन और K2O उसके एक महीने के बाद लागू किया जाता है.

        नीम केक (2 टन हेक्टेयर ) बेसल ड्रेसिंग के रूप में इस्तेमाल से अदरक के नरम सड़ांध की घटनाओं को कम करता है और इससे पैदावार बढ़ जाती है.

        सिंचाई

        सिंचित फसल को बुवाई के बाद तुरंत पानी देना है. बारिश से सिंचित फसल के बेड, सूर्य और भारी वर्षा के खिलाफ संरक्षण ,मृदा नमी का संरक्षण ,जंगली घास विकास का दमन और मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ के परिणामस्वरूप बढ़ाने के लिए पत्ती के साथ mulched किया जाता है . हिमाचल प्रदेश में FYM का गीली घास के रूप में उपयोग किया जाता है. छाया के लिए क्लस्टर बीन्स, तूर (pigeon-pea) या एरेंड़ी के बीज उठाया बेड के कोनों पर सिंचाई चैनलों पर बोया जाता है. 10-20 दिनों में शूट उभरता है. सिंचाई बदलती अंतराल के रूप में, 4 से 10 दिन के अंतराल और जब आवश्यक है दिया जाता है.

        फसल की आसान कटाई के लिए और प्रकंद का टूटना से बचने के लिए हल्की सिंचाई 5-6 दिनों के पहले दी जाती है.

        खरपतवार प्रबंधन

        आम तौर पर फसल के लिए दो weeding दिया जाता है. पहली निराई(weeding) दूसरी mulching से बस पहले किया जाता है और घास विकास की तीव्रता के आधार पर दोहराया जाता है . यदि आवश्यकता के आधार पर weeding तीसरी बार के लिए दोहराया जाता है. अदरक बेड की mulching से मिट्टी और जल के संरक्षण में मदद मिलती है और यह जंगली घास की वृद्धि को भी रोकता है.

        फसल सुरक्षा

        अदरक अधिकतम फंगल और बैक्टीरियल रोगों से ग्रस्त हो जाता है

        नरम सड़ांध: :

        नरम सड़ांध अदरक के सबसे विनाशकारी रोगों में से एक है और यह रोग 50% से अधिक की भारी उपज के नुकसान का कारण बनता है. यह रोग मुख्य रूप से Pythium के कारण होता है लेकिन अन्य जीवों के सहयोग प्रजातियों की भी पहचान की गई है.

        नियंत्रण के उपाय :

          1. रेतीले दोमट मिट्टी में उचित जल निकासी स्वस्थ फसल सुनिश्चित करता है.
          2. जैसे ही रोग क्षेत्र में देखा जाता है रोगग्रस्त पौधों को जड़ से उखाड़ना और जलाना आवश्यक है.
          3. बीज प्रकंद चयन और उपचार: नरम सड़ांध के संक्रमण और प्रसार के क्षेत्र में संक्रमित rhizomes प्राथमिक स्रोत हैं. रोग प्रबंधन करने के लिए सबसे अच्छा तरीका रोपण के लिए रोग से मुक्त rhizomes के उपयोग करने की जरूरत है
          4. मिट्टी solarization: यह उच्च तापमान और तीव्र सौर विकिरण की अवधि के दौरान मिट्टी को पॉलिथीन पारदर्शी फिल्म के द्वारा आच्छादन करके किया जा सकता है.
          5. जैविक नियंत्रण: (organic control measures) अदरक के रोगज़नक़ों का भूमि में वहन दबाने के लिए Trichoderma harzianum, टी. hamatum, टी. virens और बैसिलस के बैक्टीरियल (जीवाणु) आइसोलेट्स और Pseudomonas fluorescens का उपयोग करने से किया जा सकता है.

        पत्ता धब्बI :

        ओवल से अनियमित पानी में भिग गया की तरह के स्पॉट पत्तों पर विकसित हो जाता है स्पॉट करने के लिए. पत्तियां काग़ज़ी और गोली मार दी हो के समान छेद दिखाई देते हैं. कई तरह के काले निकायों की तरह के डॉट पत्तियों की सतह पर गठित दिखाई देते हैं.

        नियंत्रण के उपाय:

        1. 2-3 साल या उससे अधिक साल के लिए फसल रोटेशन.
        2. रोपण.उच्च बुलंद क्षेत्र में जहाँ अच्छी तरह कि जल निकासी है वहाँ करना आवश्यक है.
        3. rhizomes बीज रोग से मुक्त क्षेत्र से चुना जाना चाहिए. नदिया की तरह की किस्में जो मध्यम प्रतिरोधी के साथ बीमारी सूचकांक 5 फीसदी से भी कम है चुना जाना चाहिए.
        4. बीज प्रकंद का Trichoderma harzianum जैसे जैव नियंत्रण एजेंटों के साथ इलाज किया जा सकता है.
        5. dhaincha / हरी खाद फसल जैसे छाया के पेड़ों के नीचे अदरक विकसित किया जा सकता है.
        6. जैसे ही रोग क्षेत्र में देखा जाता है रोगग्रस्त पौधों को जड़ से उखाड़ना और जलाना आवश्यक है.
        7. . भारी बारिश की शुरुआत से पहले बोर्डो मिश्रण (1%) के साथ पौधों को छिड़काव करने की जरूरत है. उचित नियंत्रण के लिए बोर्डो मिश्रण (1%) के 15 दिनों के अंतराल में छह स्प्रे आवश्यक हैं.

        प्रकंद सड़ांध सूखी सड़ांध 

        सिक्किम और अन्य राज्यों में अदरक के भारी उपज में कमी के कारण की यह एक अन्य महत्वपूर्ण बीमारी है. यह Fusarium oxysporum जीव के कारण होता है, जो पौधों को पीला और wilting करता है.

        नियंत्रण के उपायों में रोपण के लिए स्वस्थ rhizomes के चयन और 50 डिग्री सेंटीग्रेड गर्म पानी के साथ उन्हें 10 मिनट इलाज करने और Trichoderma सपा के साथ बीज उपचार शामिल हैं.

        बैक्टीरियल

        Ralstonia solanacearum की वजह से होता है जिसके परिणामस्वरूप पत्तियों का रोल होता है और पौधों सूख जाता है.. जब प्रभावित भागों को दबाया जाता है उस समय,ऊतक विघटन और दूधिया बैक्टीरियल के oozes का रसकर बहना आम है.

        नियंत्रण उपायों में, बीज rhizomes का रोग से मुक्त क्षेत्रों से चयन, solarisation के माध्यम से बीज rhizomes की गर्मी उपचार, फाइटो सैनिटरी-उपायों, स्वच्छ खेती, न्यूनतम जुताई, अनाज फसलों के साथ फसल रोटेशन,, मिट्टी सुधारक और Trichoderma, Pseudomonas और दण्डाणु संयोजनों के तरह के जैव नियंत्रण एजेंटों के प्रयोग शामिल है. प्रभावित पौधों को chlorinated पानी (3gm विरंजन पाउडर/लिटर पानी) की drenching से बीमारी को नियंत्रण रखने में मदद करता है.

        मोज़ेक लकीर: :

        एक वायरल बीमारी है, जिसका रोगनिरोधी उपायों के अलावा कोई नियंत्रण नहीं है. कुछ कीट भी फसल को प्रभावित करता है. वे अनुमोदित कीटनाशकों के उपयोग के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता 

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